आधारभूत ढाँचा

- आधारभूत संरचना के सिद्धांत का अर्थ- आधारभूत ढांचे का अभिप्राय, संविधान के उन मूल और अपृथक् भाग से है, जो संविधान की आत्मा एवं उसका सार तत्त्व है, जिसे संशोधित करने का आशय एक नए संविधान बनाने जैसा होगा।

आधारभूत संरचना का अर्थ-

“आधारभूत संरचना” का सिद्धांत सर्वप्रथम जर्मनी के हीडलबर्ग विधि विश्वविद्यालय के प्रो. डायटरीच कनरॉड द्वारा दिया गया।

- भारत में “आधारभूत संरचना” शब्द का प्रथम बार प्रयोग जे.आर. मधोलकर ने किया। भारत में यह शब्द सज्जनसिंह बनाम राजस्थान राज्य-1965 वाद के समय हुआ।

आधारभूत संरचना से संबंधित प्रमुख वाद संविधान संशोधन-

(1) प्रथम संविधान संशोधन-1951

विपक्ष (वाद)

अनुच्छेद-13(2) के अनुसार

किसी भी विधि के द्वारा यदि मूल अधिकारों की कटौती अथवा छीनने का प्रयत्न किया गया, तो यह विधि उच्चतम न्यायालय के द्वारा अवैध घोषित कर दी जाएगी, लेकिन संविधान के अन्य भागों हेतु ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है।

संसद द्वारा कार्यवाही

प्रथम संविधान संशोधन-1951 के तहत नौंवी अनुसूची जोड़ी गई तथा इसमें भूमि संबंधी कानूनों का प्रावधान किया गया। यह प्रावधान जमींदारी व्यवस्था को समाप्त करने के लिए था।

नोट:- प्रथम संविधान संशोधन को चुनौती: शंकरी प्रसादवाद 1951

कारण- इसमें मौलिक अधिकारों वाले भाग में उल्लिखित संपत्ति के अधिकार को सीमित किया गया।

निष्कर्ष- न्यायालय द्वारा कहा गया कि अनुच्छेद-368 में वर्णित प्रावधानों का प्रयोग करते हुए मौलिक अधिकारों में परिवर्तन किया जा सकता हैं।

(2) 17वाँ संविधान संशोधन-1964

प्रावधान

(1) यदि भूमि का बाजार मूल्य बतौर मुआवजा न दिया जाए तो व्यक्तिगत हितों के लिए भू-अधिग्रहण प्रतिबंधित

(2) नौंवी अनुसूची में 44 और अधिनियमों की बढ़ोतरी

चुनौती

गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य वाद-1967

अनुच्छेद-14 व  अनुच्छेद-19 के आधार पर चुनौती दी गई।

निष्कर्ष- न्यायालय ने कहा कि संसद अनुच्छेद-368 के तहत संविधान संशोधन का प्रयोग करके भी मौलिक अधिकारों को नहीं छीन सकती।

नोट- मौलिक अधिकारों को कम या समाप्त करने के लिए पुन: संविधान सभा का गठन होगा।

(3) 24वाँ संविधान संशोधन-1971

         प्रावधान

(1) संसद को यह अधिकार है कि वह संविधान के किसी भी हिस्से का, चाहे वह मूल अधिकार हो, संशोधन कर सकती है।

(2) संविधान के अनुच्छेद-368 में खंड (1) एवं खंड (3) जोड़ा गया

चुनौती

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य वाद-1973

इस वाद में 24वें , 25वें, 26वें, एवं 29वें संविधान संशोधन को चुनौती दी गई

अनुच्छेद 368 (1) संसद अपनी संविधायी शक्ति के द्वारा संविधन के किसी भी भाग में परिवर्तन कर सकती है, जोड़ अथवा घटा सकती है।

अनुच्छेद 368 (3) संविधान संशोधन विधी शब्द की से पृथक है।

 

निष्कर्ष- न्यायपालिका ने स्पष्ट रूप में कहा कि अनुच्छेद-368 की प्रक्रिया अपनाते हुए संसद विधान के किसी भी भाग का संशोधन कर सकती है। परंतु मूल ढांचे का संशोधन नहीं कर सकती।

- आधारभूत ढांचा परिवर्तित करने का प्रयास- केशवानंद भारतीवाद के निर्णय को निरस्त करने के लिए पुन: श्रीमति इंदिरा गांधी की सरकार ने 42वें संविधान संशोधन-1976 को पारित किया। 42वें संविधान संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई कि संसद मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भाग में परिवर्तित की शक्ति रखती है तथा कोई भी परिवर्तन कर सकती है साथ ही संविधान संशोधन न्यायिक पुनरावलोकन के दायरे में शामिल नहीं होगें।

- पुन: चुनौती- वर्ष 1980 में उच्चतम न्यायालय ने मिनर्वा मिल्स वाद में इस संविधान संशोधन को निरस्त कर दिया।

महत्वपूर्ण तथ्य-

नोट- (1) आधारभूत संरचना ढांचे”  के सिद्धांत का उल्लेख भारतीय संविधान में उल्लिखित नहीं है।

(2) आधारभूत ढांचे की व्याख्या की शक्ति को न्यायालय ने स्वत: धारण कर लिया है।

(3) केशवानंद भारती वाद में न्यायमूर्ति सीकरी ने निम्नलिखित तत्त्वों को संविधान का मूलभूत ढांचा माना। जैसे- संविधान की सर्वोच्चता, सरकार का लोकतांत्रिक व गणतांत्रिक स्वरूप संविधान की पंथनिरपेक्ष प्रकृति, शक्तियों का विभाजन या पृथक्करण एंव संघीय व्यवस्था।

(4) केशवानंद भारती बनाम केरल राज्यवाद-1973 में अब तक की सबसे बड़ी संवैधानिक पीठ का गठन किया गया। न्यायमूर्ति एस एम सिकरी सहित कुल 13 न्यायधीशों की पीठ थी।

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न्यायामूर्ति एस. एम. सिकरी

 जे. एम. शेलट

के. एस. हैगड़े

ए. एन. ग्रोवर

जगमोहन रेड्डी

डी. जी. पालेकर

एस. आर. खन्ना

ए. के. मुखर्जी

वाई. वी. चंद्रचूड

ए. एन. रे

के. के. मैथ्यू

हामिदउल्ला बेग

एस. एन. द्विवेदी