पुनर्जागरण एवं सामाजिक सुधार
सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलन
1. ब्रह्म समाज
• 20 अगस्त, 1828 को कलकत्ता में राजा राममोहन राय द्वारा स्थापना की थी।
• राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत का पिता, अतीत व भविष्य के बीच का सेतु तथा भारत में पुनर्जागरण का जनक कहा जाता है।
• राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित संगठन –
1. आत्मीय सभा – 1815
डच घड़ीसाज डेविड हेमर के सहयोग से
2. वेदान्त कॉलेज – 1825
3. ब्रिटिश यूनिटेरियन एसोसिएशन
• राजा राममोहन राय की पुस्तकें –
1. तुहफुतुल – मुवाहिद्दीन (फारसी, 1809 में)
(एकेश्वरवादियों को उपहार)
2. प्रीसेप्ट्स ऑफ जीसस-1820
3. हिन्दू उत्तराधिकार के नियम
• राजा राममोहन राय के समाचार पत्र –
1. मिरातुल अखबार (फारसी)
2. संवाद कौमुदी (बांग्ला)
3. प्रज्ञाचंद
• राजा राममोहन राय बचपन में सीरामपुर मिशनरियों के सम्पर्क में आए थे।
• मुगल बादशाह अकबर द्वितीय ने राममोहन राय को ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की थी।
• 1829 ई. में सती प्रथा पर रोक लगवाई।
• 1833 ई. में ब्रिस्टल (इंग्लैण्ड) में इनका निधन हो गया और ब्रिस्टल में इनका स्मारक बना हुआ है।
• राजा राममोहन राय ने अवतारवाद, जातिवाद, मूर्तिपूजा, बाल-विवाह, बहु विवाह, सती-प्रथा, धार्मिक अन्धविश्वास आदि का विरोध किया था।
• आधुनिक शिक्षा, महिला शिक्षा, विधवा विवाह, प्रेस की स्वतंत्रता, पूँजीवाद, स्थायी बन्दोबस्त आदि के समर्थक थे।
• एकेश्वरवाद के पक्ष में तर्क दिए।
• बहुदेववाद व वर्णव्यवस्था की आलोचना की।
• यूरोपीय मानववाद का समर्थन करते थे।
• ब्रह्म समाज की स्थापना में द्वारिकानाथ टैगोर प्रमुख सहयोगी थे। ब्रह्म समाज के प्रथम मंत्री ताराचन्द चक्रवर्ती (24 वर्ष की आयु उन्होंने अंग्रेजी, हिब्रू, गृीक, फ्रेंच, लेटिन आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया।) थे। प्रसन्न कुमार टैगोर व चन्द्रशेखर देव उनके प्रमुख अनुयायी थे।
• 1823 ई. में स्पेनिश क्रांति की सफलता पर सार्वजनिक भोज दिया। आयरलैण्ड में जमींदारों के उत्पीड़क राज की आलोचना की।
• कम्पनी के व्यापारिक अधिकार समाप्त करने, भारतीय वस्तुओं से भारी निर्यात शुल्क हटाने, उच्च सेवाओं के भारतीयकरण, कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण, न्यायिक समानता आदि की मांग की।
• 1843 ई. में देवेन्द्रनाथ टैगोर ने ब्रह्म समाज का संचालन किया।
• 1839 ई. में तत्वबोधिनी सभा की स्थापना देवेन्द्रनाथ टैगोर ने की। उपनिषदीय ज्ञान की तरफ अधिक झुकाव था, कालान्तर में इसका ब्रह्म समाज में विलय कर दिया गया।
• देवेन्द्रनाथ टैगोर की पुस्तक ‘ब्रह्म धर्म’ थी।
• ‘तत्वबोधिनी’ पत्रिका के सम्पादक अक्षय कुमार दत्त थे।
• केशवचन्द्र सेन को ब्रह्म समाज का आचार्य नियुक्त किया। वाक्पटु केशवचन्द्र सेन ने इस आंदोलन को लोकप्रिय बना दिया परन्तु उनकी अतिशय उदारता ने ब्रह्म समाज को हिन्दू धर्म सुधार आंदोलन से इतर नवीन धर्म सुधार आंदोलन बना दिया। अत: 1865 ई. में केशवचन्द्र सेन को निकाल दिया गया।
• केशवचन्द्र सेन ने भारतीय ब्रह्म समाज का गठन किया तथा टैगोर का ब्रह्म समाज ‘आदि ब्रह्म समाज’ कहलाया।
• केशवचन्द्र सेन ने ‘मैत्री संघ’ (संगत सभा) की स्थापना की तथा ‘इण्डियन मिरर’ (समाचार-पत्र) का प्रकाशन किया।
• 1872 ई. में केशवचन्द्र सेन के प्रयासों से नेटिव मैरिज एक्ट पारित हुआ जिसमें विवाह योग्य न्यूनतम आयु लड़का और लड़की की क्रमश: 18 व 14 वर्ष तय की गई।
• कालान्तर में सेन ने अल्पायु पुत्री का विवाह कूच बिहार के राजा के साथ कर दिया था।
• सेन के अनुयायियों ने आनन्द मोहन बोस के नेतृत्व में ‘साधारण ब्रह्म समाज’ की स्थापना 1878 ई. में की थी।
• सुरेन्द्र नाथ बनर्जी व द्वारिकानाथ गांगुली भी इसके सदस्य थे।
• ब्रह्म समाज ने कर्म सिद्धान्त व पुनर्जन्म के विषय में निश्चित मत प्रकट नहीं किए थे।
वेद समाज
• केशवचन्द्र सेन के कहने पर श्री धरलू नायडू ने वेद समाज की स्थापना की थी।
• इसे दक्षिण भारत का ब्रह्म समाज कहते है।
• विश्वनाथ मुदालियर भी इसके प्रमुख नेता थे।
प्रार्थना समाज
• 1867 ई. को बॉम्बे में केशवचन्द्र सेन के प्रयासों से इसकी स्थापना हुई थी।
• संस्थापक – महादेव गोविन्द रानाडे, आत्माराम पाण्डुरंग, आर. जी. भण्डारकर, एन. जी. चन्द्रावरकर
• इन्होंने महिला शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह तथा जातिवाद का समर्थन किया।
महादेव गोविन्द रानाडे
• इन्हें ‘महाराष्ट्र का सुकरात’ कहते हैं।
• ये बॉम्बे हाइकोर्ट में जज थे।
• 1867 ई. में इन्होंने विधवा विवाह संघ की स्थापना की थी।
• 1871 ई. में पूना सार्वजनिक सभा तथा 1884 ई. में दक्कन एजुकेशनल सोसायटी की स्थापना की थी।
महादेव गोविन्द रानाडे गोपाल कृष्ण गोखले के राजनीतिक गुरु थे, जो महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु थे।
• 1887 ई. में इण्डियन नेशनल सोशल कॉन्फ्रेंस की स्थापना की थी।
2. आर्य समाज
• आर्य समाज की स्थापना 1875 ई. को बॉम्बे में दयानन्द सरस्वती द्वारा की गई।
• दयानन्द सरस्वती का जन्म 1824 ई. में गुजरात के मौरवी जिला में हुआ। इनका वास्तविक नाम मूलशंकर था।
• मूलशंकर के प्रथम गुरु पूर्णानन्द थे जिन्होंने इनको ‘दयानन्द सरस्वती’ नाम दिया, जबकि इनके द्वितीय गुरु विरजानन्द जी थे जिन्होंने इनको वेदों का ज्ञान दिया।
• ये ऋग्वेद को प्रामाणिक ग्रन्थ मानते थे।
• ‘वेदो की ओर लौटो’ का नारा दिया था।
• दयानन्द सरस्वती प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने ‘स्वदेशी’ का नारा दिया।
• दयानन्द सरस्वती ने शुद्धि आंदोलन चलाया जिसके तहत धर्मान्तरित मुसलमानों को पुन: हिन्दू बनाया गया। इससे साम्प्रदायिकता को बल मिला।
• 1877 ई. को लाहौर में तथा 1878 ई. में दिल्ली में आर्य समाज की स्थापना की गई।
• दयानन्द सरस्वती की पुस्तकें –
1. सत्यार्थ प्रकाश (1874)
2. अद्वैतमत का खण्डन (1877)
3. वेदभाष्य भूमिका (1876)
4. ऋग्वेद भाष्य (1877)
5. पंच मद्य यज्ञ विधि (1875)
6. बल्लभाचार्य मत खण्डन (1875)
• जोधपुर में नन्ही जान नामक महिला ने दयानन्द सरस्वती को जहर दिया। अत: 1883 ई. में अजमेर में इनकी मृत्यु हो गई।
• वेलेन्टाइन शिरोल ने ‘आर्य समाज’ को भारतीय अशान्ति का जनक कहा था।
• दयानन्द सरस्वती की मृत्यु के बाद आर्य समाज दो भागों में विभक्त हो गया।
1. लाला लाजपतराय व हंसराज अंग्रेजी शिक्षा के समर्थक थे। अत: दयानन्द एंग्लो वैदिक स्कूल व कॉलेज खोले गए।
2. स्वामी श्रद्धानन्द, लेखराम व मुंशीराम संस्कृत शिक्षा के समर्थक थे तथा इन्होंने वर्ष 1902 में हरिद्वार में ‘गुरुकुल कांगडी’ की स्थापना की।
• आर्य समाज मूर्तिपूजा, अवतारवाद, तीर्थयात्रा, पशुबलि, सामाजिक असमानता, जातिवाद, अस्पृश्यता, सतीप्रथा, बाल-विवाह, पर्दा-प्रथा आदि का विरोध करता है, जबकि यज्ञानुष्ठान, पुनर्विवाह, महिला व दलितों का उपनयन संस्कार आदि का समर्थन करता है।
3. रामकृष्ण मिशन
• रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1897 ई. में कलकत्ता के समीप वैल्लुर में रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी विवेकानन्द द्वारा की गई थी।
• स्वामी विवेकानन्द का बचपन का नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था।
• ‘विवेकानन्द’ नाम खेतड़ी महाराजा अजीतसिंह ने दिया तथा वित्तीय सहायता देकर शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन (1893 ई.) में भेजा था।
• इन्होंने 1836 ई. में न्यूयॉर्क में ‘वेदान्त सोसायटी’ की स्थापना की थी।
• स्वामी विवेकानन्द की पत्रिकाएँ –
1. प्रबुद्ध भारत (अंग्रेजी)
2. उद्बोधन (बांग्ला)
• आयरलैण्ड की मार्गेट एलिजाबेथ इनकी प्रमुख शिष्या थी जिसे ‘भगिनी निवेदिता’ के नाम से भी जाना जाता है।
• सुभाषचन्द्र बोस ने विवेकानंद को आधुनिक राष्ट्रीय आंदोलन का आध्यात्मिक पिता कहा है।
• रामकृष्ण मिशन की शिक्षाओं, उपनिषदों एवं गीता के दर्शन, बुद्ध एवं यीशु के उपदेशों को आधार बनाकर विवेकानन्द ने विश्व को मानव मूल्यों की शिक्षा दी।
4. थियोसोफिकल सोसायटी
• इसकी स्थापना 1875 ई. को न्यूयॉर्क में मैडम ब्लावत्सकी व कर्नल अल्कॉट ने की थी।
• 1882 ई. में भारत में मद्रास के समीप अड्यार में इसका मुख्यालय स्थापित किया गया।
• एनी बेसेन्ट इसकी सदस्य के रूप में 1893 ई. में भारत आई तथा वर्ष 1907 में थियोसोफिकल सोसायटी की अध्यक्ष बनी थी।
• 1898 ई. में बनारस में हिन्दू कॉलेज की स्थापना की, जो वर्ष 1916 में मदन मोहन मालवीय जी के प्रयासों से बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में तब्दील हो गया।
• एनी बिसेन्ट आयरिश महिला थी परन्तु उनका मानना था कि उनका पिछला जन्म भारत में हुआ था इसलिए भारतीय वेशभूषा व खान-पान का अनुसरण किया करती थी।
• एनी बेसेन्ट ने अपने दत्तक पुत्र जनाकृष्ण मूर्ति को ‘कृष्ण का अवतार’ घोषित कर दिया था।
• एनी बेसेन्ट के समाचार पत्र
1. कॉमन वील
2. न्यू इण्डिया
- वह अखिल भारतीय कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गई।
• थियोसोफिकल सोसायटी हिन्दू, पारसी, बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों में विश्वास करती थी तथा उपनिषदीय ज्ञान, आत्मा की अमरता व पुनर्जन्म में विश्वास करते थे।
5. यंग बंगाल आंदोलन
• यंग बंगाल आंदोलन के प्रवर्तक हेनरी विवियन डेराजिओ थे।
• हेनरी विवियन डेराजिओ की संस्थाएँ–
1. एकेडेमिक एसोसिएशन
2. सोसायटी फॉर द एक्वीजिशन ऑफ जनरल नॉलेज
3. एंग्लो-इण्डियन हिन्दू एसोसिएशन
4. बंगहित सभा
5. डिबेटिंग क्लब
• हेनरी विवियन डेराजिओ के समाचार पत्र
1. ईस्ट इण्डिया
2. इण्डिया गजट
3. कलकत्ता साहित्य गजट
• डेराजिओ को ‘आधुनिक भारत का प्रथम राष्ट्रवादी कवि’ कहा जाता है।
• ये फ्रांसीसी क्रान्ति से प्रभावित थे तथा स्वतंत्र चिन्तन व वैज्ञानिक तर्कशक्ति को बल देते थे।
• परम्पराओं पर आधारित अन्धविश्वासों, आडम्बरों का विरोध करते थे, जबकि नारी शिक्षा, प्रेस की स्वतंत्रता, कम्पनी चार्टर में संशोधन, उच्चतर सेवाओं में भारतीयों की नियुक्ति को समर्थन करते थे।
• अत्याचारी जमींदारों से रैय्यत की सुरक्षा, ज्युरी द्वारा मुकदमों की सुनवाई, विदेशी ब्रिटिश उपनिवेशों में भारतीय मजदूरों के साथ बेहतर व्यवहार के लिए आंदोलन चलाए।
• इन्होंने राजा राममोहन राय की परम्परा को आगे बढ़ाया।
• 1831 ई. में मात्र 22 वर्ष की आयु में डेराजिओ की हैजे से मृत्यु हो गई थी।
• सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने डेराजिओ के अनुयायियों को बंगाल में आधुनिक सभ्यता के अग्रदूत एवं हमारी जाति के पिता कहा है।
6. अलीगढ़ आंदोलन
• अलीगढ़ आंदोलन के प्रवर्तक सर सैय्यद अहमद खाँ थे।
• ये 1857 ई. के विद्रोह के समय कम्पनी की न्यायिक सेवा में थे।
• इन्होंने 1857 ई. के बाद अंग्रेजों के मन में मुसलमानों के प्रति उत्पन्न अविश्वास को कम करने का प्रयास किया था।
• ये मुस्लिम समाज के आधुनिकीकरण पर बल देते थे और इसके लिए अंग्रेजी शिक्षा को अनिवार्य मानते थे।
• इन्होंने कुरान की वैज्ञानिक दृष्टि से व्याख्या की तथा बाइबिल पर टीका लिखी थी।
• पीर- मुरीदी प्रथा को समाप्त करने का प्रयत्न किया था।
• सर सैय्यद अहमद खाँ की संस्थाएँ –
1. मुहम्मडन लिटरेरी सोसायटी (कलकत्ता) (1863 ई.)
2. साइन्टिफिक सोसायटी (1864 ई.)
3. मुस्लिम ऐंग्लो ओरिएन्टल स्कूल (1875 ई.)
वर्ष 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में तब्दील हो गया।
4. 1888 ई. में यूनाइटेड इण्डियन पैट्रियाटिक एसोसिएशन (बनारस के राजा शिवप्रसाद के साथ मिलकर) कांग्रेस की विरोधी संस्था थी।
• सर सैय्यद अहमद खाँ की पत्रिकाएँ –
1. तहजीब उल अखलाक (सभ्यता और नैतिकता)
2. राजभक्त मुसलमान
• सैय्यद अहमद खान प्रारम्भ में हिन्दू-मुस्लिम एकता के कट्टर समर्थक थे (हिन्दू व मुस्लिम एक सुन्दर वधू (भारत) की दो आँखें हैं) लेकिन कालान्तर में मुस्लिम हितों के अधिक पक्षपाती हो गए।(हिन्दू व मुस्लिम न केवल दो राष्ट्र है अपितु विरोधी राष्ट्र है)
• अलीगढ़ कॉलेज के पहले तीन प्रिंसीपल थियोडोर बैक, मॉरिसन व आर्चबोल्ड तीनों ने अलीगढ़ आंदोलन को अंग्रेजों के पक्ष में तथा हिन्दू विरोध का रूप दिया था।
• चिराग अली, अल्ताफ हुसैन हाली (उर्दू शायर) व नजीर अहमद भी अलीगढ़ आंदोलन से जुड़े हुए थे।
7. देवबन्द आंदोलन
• 1867 ई. को देवबन्द, सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) में इसकी स्थापना की गई थी।
• संस्थापक –
1. रशीद अहमद गंगोही
2. मुहम्मद कासिम ननौतवी
• 1857 ई. की क्रान्ति के विद्रोही सैनिक इसमें शामिल हुए थे।
• इसे ‘दार-उल-उलूम’ आंदोलन भी कहा जाता है।
• इसका प्रमुख उद्देश्य धार्मिक शिक्षक तैयार करना, विद्यालयों से अंग्रेजी शिक्षा पर प्रतिबंध, अंग्रेजी सरकार के साथ असहयोग, इस्लाम का नैतिक व धार्मिक पुनरुद्धार कर मूल स्वरूप में स्थापित करना था।
• महमूद उल हसन ने इस आंदोलन को राजनैतिक स्वरूप दिया था।
• शिबली नुमानी पहले अलीगढ़ आंदोलन से जुड़े हुए थे परन्तु सैय्यद अहमद खाँ का पाश्चात्य संस्कृति से अधिक झुकाव देखकर देवबन्द आंदोलन में शामिल हो गए थे।
• यह आंदोलन अलीगढ़ आंदोलन का विरोधी व कांग्रेस का समर्थक था।
8. वहाबी आंदोलन / वली उल्लाह आंदोलन
• यह आंदोलन ईरान में अब्दुल वहाब ने शुरू किया था।
• इसे सैय्यद अहमद बरेलवी ने भारत में लोकप्रिय किया था। इसका मुख्यालय पटना था।
• यह एक हिंसक आंदोलन था तथा ‘दार उल हर्ब’ को ‘दार उल इस्लाम’ में बदलने का नारा दिया था।
• प्रारम्भ में ये पंजाब के सिखों के विरुद्ध था, बाद में अंग्रेजों के विरुद्ध हो गया।
• पूर्वी भारत में इसके नेता करामात अली व हाजी शरीयत उल्ला थे।
• 1870 ई. के बाद इस आंदोलन का दमन कर दिया गया।
9. अहमदिया आंदोलन
• 1889 ई. को गुरुदासपुर (पंजाब) के कादिया नामक स्थान पर मिर्जा गुलाम अहमद द्वारा इसकी शुरुआत की गई थी।
• मिर्जा गुलाम अहमद ने स्वयं को मुहम्मद साहब एवं कृष्ण का अवतार घोषित कर दिया।
• इनकी पुस्तक बहरीन-ए-अहमदिया थी।
10. रहनुमा-ए-माज्दा-ए-सभा
• ये पारसी धर्म सुधार आंदोलन से संबंधित है।
• इसकी स्थापना 1851 ई. में की गई थी।
• संस्थापक –
1. नौरोजी फरदोन जी
2. दादा भाई नौरोजी
3. एस. एस. बंगाली
• इन्होंने महिला सशक्तीकरण के प्रयास किए थे।
11. परमहंस मण्डली
• इसकी स्थापना 1849 ई. में गोपाल हरि देशमुख ने की थी।
• ये ‘लोकहितवादी’ नामक मराठी पत्रिका निकालते थे अत: इनका उपनाम ‘लोकहितवादी’ पड़ गया।
12. सत्य शोधक समाज
• इसकी स्थापना निम्न जातियों के कल्याण के लिए 1873 ई. में ज्योतिराव गोविंदराव फुले (ज्योतिबा फुले) ने की थी।
• इनकी पुस्तक गुलाम गिरि, सार्वजनिक सत्य धर्म थी।
• इन्होंने दलित जाति के लड़के-लड़कियों के लिए स्कूल खोले थे।
13. शारदा सदन
• संस्थापक – पण्डिता रमाबाई
14. आत्मसम्मान आंदोलन
• वर्ष 1920 के दशक में वी. रामास्वामी नायंकर उर्फ पेरियार ने इस आंदोलन को प्रारंभ किया।
• आत्मसम्मान आंदोलन में ब्राह्मणों की सर्वोच्चता को चुनौती दी गई तथा लोगों से ब्राह्मणवाद का विरोध करने के लिए आगे आने को कहा गया।
• ब्राह्मणों की सहायता के बिना विवाह, मंदिरों में जबरन प्रवेश तथा मनुस्मृति को जलाने आदि के लिए आंदोलन किए गए।
• पेरियार द्वारा तमिल भाषा में रामायण की रचना की गई जिसे ‘सच्ची रामायण’ कहा गया।
15. सिख धर्म सुधार आंदोलन
• पश्चिमी तर्कसंगत विचारों का प्रभाव सिख अनुयायियों पर भी पड़ा।
• इससे पूर्व में सिख धर्म में सुधार हेतु बाबा दयाल दास द्वारा ‘निरंकारी आंदोलन’ चलाया गया।
- बाबा राम सिंह द्वारा ‘नामधारी आंदोलन’ चलाया गया।
• 1870 ई. में अमृतसर में सिंह सभा आंदोलन प्रारंभ हुआ।
• सिंह सभा द्वारा अमृतसर में खालसा कॉलेज की स्थापना में सहायता की गई और बहुत से गुरुद्वारे व विद्यालय स्थापित किए गए।
• गुरुमुखी और पंजाबी साहित्य को विशेष प्रोत्साहन दिया गया लेकिन इस दिशा में वास्तविक और अधिक प्रतिक्रियावादी गतिविधियाँ वर्ष 1920 में अकाली आंदोलन के साथ प्रारंभ हुई।
• अकालियों का मुख्य उद्देश्य गुरुद्वारों का प्रबंधन सुधारना था।
• अकालियों के नेतृत्व में वर्ष 1921 में सिख जनता ने इसका विरोध किया और महंतों के विरुद्ध अहिंसात्मक असहयोग सत्याग्रह आंदोलन प्रारंभ किया।
- बाध्य होकर सरकार को वर्ष 1922 में सिख गुरुद्वारा अधिनियम पास करना पड़ा।
16. वायकोम सत्याग्रह
• वायमोम सत्याग्रह एक प्रकार का गांधीवादी आंदोलन था।
• यह आंदोलन ब्राह्मणवाद के विरुद्ध तथा मंदिर प्रवेश को लेकर चलाया गया था।
• यह एझवा वर्ग के उत्थान की बात करता था।
• 19वीं सदी के अंत तक केरल में नारायण गुरु, एन. कुमारन, टी. के. माधवन जैसे बुद्धिजीवियों ने छुआछूत के खिलाफ आवाज उठाई।
• श्री नारायण धर्म परिपालन योगम संगठन ने श्री नारायण गुरु के नेतृत्व में मंदिर में निम्न वर्ग के प्रवेश का समर्थन किया। मंदिरों में निम्न वर्ग के मंदिर प्रवेश को लेकर सवर्णों के संगठन नायर सर्विस सोसायटी, नायर समाज व केरल हिन्दू सभा ने आंदोलन का समर्थन किया।
• नंबूदरियों (उच्च ब्राह्मण) के संगठन ‘योगक्षेम सभा’ ने भी इस आंदोलन को समर्थन दिया।
• मार्च, 1925 में गांधीजी की मध्यस्थता में त्रावणकोर की महारानी से मंदिर में प्रवेश के बारे में आंदोलनकारियों से समझौता हुआ।
विधवा पुनर्विवाह
• ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के प्रयासों से लॉर्ड कैनिंग के समय पारित हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 की धारा-15 के तहत विधवा विवाह को कानूनी मान्यता मिली थी।
• 7 दिसम्बर, 1856 ई. को कलकत्ता में पहला कानूनी हिन्दू पुनर्विवाह सम्पन्न हुआ था।
• डी. के. कर्वे ने 1899 ई. में पूना में विधवा आश्रम की स्थापना की थी। कर्वे विधवा पुनर्विवाह संघ के सचिव थे।
• 1850 ई. में विष्णु शास्त्री पंडित ने ‘विधवा विवाह समाज’ की स्थापना की।
• 1852 ई. में करसोनदास मलजी ने विधवा विवाह के समर्थन के लिए गुजराती भाषा में ‘सत्यप्रकाश’ नाम से एक पत्रिका निकाली।
• वीरशैलिंगम ने 1878 ई. में ‘राजा मुन्द्री सोशल रिफॉर्म’ की स्थापना की। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य भी विधवा विवाह को बढ़ावा देना था।
महिला शिक्षा
• ईसाई मिशनरीज ने 1819 ई. में कलकत्ता में तरुण स्त्री सभा की स्थापना की थी।
• जे. डी. बेटन ने 1849 ई. में कलकत्ता में बालिका विद्यालय की स्थापना की।
• ईश्वरचन्द्र विद्यासागर भी 35 से अधिक बालिका विद्यालयों की स्थापना से जुड़े थे।
• 1906 ई. में डी. के. कर्वे ने बम्बई में भारतीय महिला विश्वविद्यालय की स्थापना की।
बाल विवाह
• 1872 ई. में केशवचन्द्र सेन के प्रयासों से सिविल मैरिज एक्ट पारित किया गया जिसके तहत लड़के एवं लड़की के विवाह की आयु क्रमश: 18 एवं 14 वर्ष तय की गई। इस अधिनियम द्वारा बहुपत्नी प्रथा को समाप्त किया गया।
• बहराम जी मालाबारी व एस. एस. बंगाली के प्रयासों से 1891 ई. में एज ऑफ कंसेट एक्ट (सम्मति आयु अधिनियम) पारित किया गया जिसके तहत लड़की के लिए विवाह योग्य आयु 12 वर्ष तय की गई।
• वर्ष 1930 में हरविलास शारदा के प्रयासों से शारदा एक्ट पारित किया गया जिसके तहत लड़के एवं लड़की के विवाह की आयु क्रमश: 18 एवं 14 वर्ष तय की गई।
सती प्रथा
• लॉर्ड विलियम बेंटिक के समय में 1829 ई. में सती प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया।
• प्रारंभ में इसे बंगाल में लागू किया गया। इस अधिनियम को पारित कराने में राजा राममोहन राय की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
ठगी प्रथा
• लॉर्ड विलियम बेंटिक ने ठगी प्रथा का उन्मूलन किया। इसके लिए उन्होंने एक अधिकारी ‘कर्नल स्लीमैन’ की नियुक्ति की।
- 1837 ई. तक ठगों का दमन कर दिया गया।
शिशु वध
• शिशु वध सामान्यत: राजपूतों में प्रचलित था, जो कन्याओं के जन्म लेते ही उन्हें मार देते थे।
• गवर्नर जनरल जॉनशोर के समय में 1795 ई. में तथा वेलेजली के समय 1804 के नियम 3 से शिशु वध को साधारण हत्या के रूप में माना जाने लगा। इस प्रकर शिशु वध धीरे-धीरे समाप्त हो गया।
नरबलि प्रथा
• इस प्रथा को समाप्त करने का श्रेय हॉर्डिंग प्रथम को जाता है, इसके लिए उसने कैंपबेल की नियुक्ति की।
• 1844-45 ई. तक यह प्रथा समाप्त हो गई।
• नरबलि प्रथा मुख्यत: खोंड जनजाति में प्रचलित थी।
दास प्रथा
• गवर्नर जनरल लॉर्ड एलनबरो ने 1843 ई. में भारत में दास प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया।
• 1833 के अधिनियम में निर्देश था कि दास प्रथा को समाप्त कर दिया जाएगा।