भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन
राष्ट्रीय आंदोलन का प्रथम चरण (1885-1905)
- कांग्रेस के इस चरण को उदारवादी चरण के नाम से भी जाना जाता है।
- इस आंदोलन के प्रमुख नेता
1. दादाभाई नौरोजी
2. फिरोजशाह मेहता
3. आर. सी. दत्त
4. एस. एन. बनर्जी
5. रास बिहारी बोस
6. गोपाल कृष्ण गोखले
7. बदरुद्दीन तैय्यबजी
8. बी. डब्ल्यू. सी. बनर्जी
9. पंडित मदन मोहन मालवीय
कांग्रेस के पूर्व स्थापित राजनीतिक संस्थाएँ और उनकी भूमिका
- कांग्रेस की स्थापना से पहले अनेक राष्ट्रीय संगठनों की स्थापना हुई। जैसे-
- बंग भाषा प्रकाशन सभा- 1836 ई.
- इस संस्था ने सरकार की नीतियों की समीक्षा एवं सुधार कार्यों के लिए सरकार को पत्र लिखे।
- लैंड होल्डर्स सोसाइटी- 1838 (कलकत्ता)
- संस्थापक- द्वारिकानाथ टैगोर, अन्य नेता प्रसन्न कुमार ठाकुर, राजा राधाकांत देव ।
- इस संस्था का उद्देश्य जमींदारों के हितों की रक्षा करना था।
- बंगाल ब्रिटिश एसोसिएशन – 1843 (कलकत्ता)
- संस्थापक – द्वारिकानाथ टैगोर, इस संस्था के सदस्य अंग्रेज भी थे।
- उद्देश्य – अंग्रेजी शासन के अन्तर्गत भारतीय जनता की वास्तविक स्थिति को जानना।
- ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन-28 अक्टूबर, 1851 (कलकत्ता)
- संस्थापक सदस्य- राधाकांत देव, देवेन्द्रनाथ टैगोर, राजेन्द्रलाल मित्र तथा हरिशचन्द्र मुखर्जी आदि।
- उद्देश्य – भारतीयों के लिए राजनीतिक अधिकारों की मांग।
- इंडियन एसोसिएशन- 26 जुलाई, 1876 (कलकत्ता)
- संस्थापक- सुरेन्द्रनाथ बनर्जी व आनन्दमोहन बोस इस संस्था ने सिविल सेवा सुधारों की मांग की
- मद्रास महाजन सभा- 1884
- पूना सार्वजनिक सभा- 1877
- इंडिया लीग – 1875
- उद्देश्य – भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना जागृत करना।
- बंबई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन- 1885
- संस्थापक सदस्य- फिरोजशाह मेहता, बदरुद्दीन तैय्यबजी तथा के. टी. तैलंग।
- नेशनल कॉन्फ्रेंस – 1883, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के नेशनल कॉन्फ्रेंस का 1886 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय हुआ।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस – 1885
- संस्थापक- एलन अक्टोवियन ह्यूम
- ह्यूम ने 1884 में भारतीय राष्ट्रीय संघ की स्थापना की। इसका प्रथम अधिवेशन- 28 दिसम्बर, 1885 को बंबई में हुआ। इस सम्मेलन में दादा भाई नौरोजी के सुझाव पर भारतीय राष्ट्रीय संघ का नाम बदलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कर दिया।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष- व्योमेशचन्द्र बनर्जी
- भारतीय राष्ट्रीय संघ को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अग्रदूत माना जाता है।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उद्देश्य
लोकतांत्रिक राष्ट्रवादी आंदोलन चलाना
आंदोलन के लिए मुख्यालय की स्थापना
भारतीय राष्ट्रवादी भावना को प्रोत्साहन
जाति, धर्म से उपर उठकर राष्ट्रव्यापी अनुभव जागृत करना।
उपनिवेशवादी विरोधी विचारधारा को प्रोत्साहन एवं समर्थन देना।
राजनीतिक शिक्षा देना व भारतीयों को राजनीतिक लक्ष्यों के बारे में बताना।
विवादित मुद्दे-
सुरक्षा वाल्व-
- इतिहासकारों के अनुसार डफरिन के निर्देश पर ह्यूम ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की।
- भारतीय जनता में पनपता असंतोष किसी भी रूप में उग्र रूप धारण न करे और असंतोष की उस वाष्प को बिना किसी खतरे के कांग्रेस रूपी ‘सुरक्षा वाल्व’ से बाहर निकाला जा सके।
तड़ित चालक-
- इतिहासकारों के इस तथ्य को अस्वीकृत किए बिना विद्वान कांग्रेस को ‘तड़ित चालक’ के निर्माण की प्रक्रिया बताते है।
कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन की मांगें-
- सैनिक खर्च में कटौती
- केन्द्र और प्रांतों में विधान परिषदों का विस्तार
- उच्च सरकारी नौकरियों में भारतीयों को भी पूरा अवसर
- भारतीय प्रशासन की जाँच हेतु एक रॉयल कमीशन की नियुक्ति।
- उदारवादी नेताओं ने अपनी मांगें मनवाने के लिए दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में ब्रिटेन में 1887 में भारतीय सुधार समिति की स्थापना की।
- 1888 में विलियम डिग्बी की अध्यक्षता में लदंन में ब्रिटिश कमेटी ऑफ इंडिया की स्थापना की।
अधिवेशन-
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स्थान |
वर्ष |
अध्यक्ष |
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बम्बई |
1885 |
व्योमेश चन्द्र बनर्जी |
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कलकत्ता |
1886 |
दादाभाई नौरोजी |
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मद्रास |
1887 |
बदरुद्दीन तैय्यबजी |
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इलाहबाद |
1888 |
जॉर्जयूल |
- कांग्रेस की अध्यक्षता करने वाला प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष- बदरुद्दीन तैय्यबजी
- कांग्रेस अध्यक्षता करने वाला प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष- जॉर्जयूल
- नरमपंथी नेता दादाभाई नौरोजी को ‘ग्रैड ओल्ड मैन ऑफ इण्डिया’ कहा जाता है।
राष्ट्रीय आंदोलन का द्वितीय चरण (1905-1913)
- इस काल को नवराष्ट्रवाद या उग्रवाद के उदय का काल माना जाता है।
- इसी समय स्वदेशी आंदोलन तथा क्रांतिकारी आंतकवाद की शुरुआत हुई।
प्रमुख नेता
- लाला लाजपत राय
- बाल गंगाधर तिलक
- विपिन चन्द्रपाल
- अरविन्द घोष
किताबें
- लेखक - पुस्तक
- अरविन्द घोष - भवानी मंदिर
- लोकमान्य बाल - गीता रहस्य,
गंगाधर तिलक आर्कटिक होम
ऑफ द वेदाज
- महात्मा गांधी - हिन्द स्वराज
(1909)
- सुभाषचन्द्र बोस - दि इंडियन स्ट्रगल
(आत्मकथा)
समाचार पत्र
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लेखक - |
समाचार पत्र |
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बाल गंगाधर तिलक - |
केसरी(मराठी),मराठा (अंग्रेजी) |
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चन्द्रपाल - |
न्यू इडिया |
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लाला लाजपत राय - |
पंजाबी |
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ब्रह्माबान्धव उपाध्याय - |
संध्या |
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अरविन्द घोष - |
वन्देमातरम् |
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भूपेन्द्र सिंह - |
युगान्तर |
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अजीत सिंह - |
भारत माता |
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इंडियन होमरुल सोसाइटी- |
इण्डियन सोसिऑलाजिस्ट |
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रामनाथ पुरी - |
सरकुलर-ए-आजादी |
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तारकनाथदास - |
फ्री हिन्दुस्तान |
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सोहनसिंह भाकना - |
गदर/हिन्दुस्तान गदर |
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एनी बेसेन्ट - |
कामनबील (साप्ताहिक) न्यू इंडिया (दैनिक) |
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कृष्ण कुमार मित्र - |
संजीवनी |
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सुरेन्द्र नाथ बनर्जी - |
बंगाली |
अश्विन कुमार - स्वदेशी
महात्मा गांधी - द इण्डियनओपिनियन (1903)
मुहम्मद अली - कॉमरेड
मौलाना आजाद - अल हिलाल/अल बिलाल
महात्मा गांधी - हरिजन
- क्रांतिकारी आंतकवाद का प्रथम चरण (1905-1917) उग्रवादी आदर्शवाद से प्रेरित होकर अनेक भारतीय युवकों ने क्रांति के मार्ग को चुना।
महाराष्ट्र
- पुणे के चितपावन ब्राह्मणों को भारत में आंतकवाद प्रारंभ करने का श्रेय दिया जाता है।
- दामोदर चापेकर तथा बालकृष्ण चापेकर ने 22 जून, 1897 में प्लेग कमिश्नर रैण्ड तथा एमहर्स्ट की हत्या कर दी। बाद में चापेकर बंधुओं को फांसी दी गई।
- महाराष्ट्र में आर्य बान्धव समिति नामक संस्था स्थापित की गई।
- वि. डी. सावरकर ने 1904 में अभिनव भारत समाज की स्थापना की।
बंगाल
- 1902 में अनुशीलन समिति की स्थापना हुई।
- कलकत्ता में जतीन्द्र नाथ बनर्जी द्वारा व मिदनापुर में ज्ञानेन्द्र नाथ बसु द्वारा।
- हेमचन्द्र कानून गो ने पेरिस में स्थित रूसी सैन्य प्रशिक्षण लेकर भारत में 1908 में बम बनाने का कारखाना (कलकत्ता) में खोला।
- खुदीराम बोस ने 30 अप्रैल, 1908 को मजिस्ट्रेट किंग्स फोर्ड की हत्या कर दी। इन्हें भी फांसी दी गई।
- रास बिहारी बोस ने लॉर्ड हार्डिंग परबम फेंकने की योजना बनाई।
- ब्रह्मबांधोपाध्याय ने रवीन्द्रनाथ टैगोर को सर्वप्रथम ‘गुरुदेव’ कहकर सम्बोधित किया।
पंजाब
- बार-बार पड़ने वाले अकाल तथा भू राजस्व व सिंचाई करों में वृद्धि के कारण पंजाब में क्रांतिकारी आतंकवाद प्रारंभ।
- अजीत सिंह ने लाहौर में ‘अंजुमने-मोहिब्बाने वतन’ नामक एक संस्था की स्थापना की।
भारत के बाहर क्रांतिकारी गतिविधियाँ
- भारत से बाहर जाकर क्रांतिकारी ब्रिटेन, अमरीका फ्रांस, अफगानिस्तान तथा जर्मनी में सक्रिय हुए।
- श्याम जी कृष्ण वर्मा ने लंदन में ‘इंडिया होमरुल सोसाइटी’ की स्थापना 1905 में की। इसके सदस्य हरदलयाल, वी.डी. सावरकर तथा मदन लाल धींगरा थे। इस सोसाइटी ने ‘इण्डिया हाऊस’ की स्थापना की।
- मदनलाल धींगरा ने 1 जुलाई, 1909 को भारत सचिव वाइली की हत्या की। कालांतर में इन्हें फांसी दी गई।
गदर पार्टी (1913 ई.)
- नवम्बर, 1913 में सोहन सिंह भाकना ने ‘हिंद एसोसिएशन ऑफ अमरीका’ की स्थापना की।
- गदर पत्रिका के नाम पर ही ‘हिन्द ऐसोसिएशन ऑफ अमेरिका’ का नाम ‘गदर आंदोलन’ पड़ गया।
- गदर आंदोलन ने सैन फ्रांसिस्को में ‘युगान्तर आश्रम’ की स्थापना की।
- राजा महेन्द्र प्रताप ने काबुल में दिसम्बर, 1915 को ‘अंतरिम भारत सरकार’ की स्थापना की।
- मद्रास में नीलकण्ठ ब्रह्मचारी तथा वंची अय्यर ने ‘भारत माता समिति’ की स्थापना की।
बंगाल विभाजन
19 जुलाई, 1905 – बंगाल विभाजन की घोषणा।
7 अगस्त, 1905 – कलकत्ता के टाउन हॉल में स्वदेशी आन्दोलन की घोषणा व बहिष्कार प्रस्ताव पारित।,
16 अक्टूबर, 1905 – बंगाल विभाजन प्रभावी। इसे ‘शोक दिवस’ के रूप में मनाया गया।
रवीन्द्र नाथ टैगोर के कहने पर हिन्दू व मुस्लिमों ने एक-दूसरे के राखियाँ बाँधी।
टैगोर का ’आमार सोनार बांग्ला’ व बंकिम चन्द्र चटर्जी का ‘वन्दे मातरम’ लोकप्रिय गीत बन गये।
आनन्द मोहन बोस ने ’फेडरेशन हॉल’ की बुनियाद रखी।
आश्विन कुमार – ‘स्वदेशी बान्धव समिति’ की स्थापना।
इस संस्था में मुस्लिमों की संख्या अधिक थी।
अश्विन कुमार दत बारीसाल के अध्यापक थे।
कृष्ण कुमार मित्र –
ब्रह्म समाजी पत्र
सबसे पहले विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की बात कही।
सुरेन्द्रनाथ बनर्जी –
- बंगाल विभाजन को ‘आसमान से गिरा वज्रपात’ कहा।
- P.C. रॉय – बंगाल केमिकल स्वदेशी स्टोर्स
- 15 अगस्त, 1906 ई. – गुरुदास बनर्जी ने राष्ट्रीय शिक्षा परिषद् की स्थापना की।
- कलकता में अरविन्द घोष राष्ट्रीय कॉलेज के प्रधानाचार्य बने।
- अवनीन्द्र नाथ टैगोर – ‘इण्डियन सोसायटी फॉर ओरिएंटल आर्ट्स’
- इस संस्थान की पहली छात्रवृत्ति नन्दलाल बोस को मिली।
- देश के अन्य भागों में स्वदेशी आन्दोलन के नेता
महाराष्ट्र – तिलक
पंजाब – लाला लाजपत राय व अजीत सिंह
मद्रास – चिदम्बरम पिल्लै
आन्ध्रप्रदेश – हरि सर्वोत्तम राव
दिल्ली – सैय्यद हैदर रजा
कांग्रेस के बनारस अधिवेशन में स्वदेशी और बहिष्कार आन्दोलन का अनुमोदन किया गया।
स्वदेशी आन्दोलन के विस्तार को लेकर कांग्रेस के नरम दल व गरम दल में गतिरोध उत्पन्न हुआ।
नरमपंथी जहाँ आन्दोलन को बंगाल तक व विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तक ही सीमित रखना चाहते थे वहीं गरमपंथी इसे देश के विभिन्न भागों में तथा विदेशी वस्तुओं के साथ-साथ विदेशी संस्थाओं व विदेशी पदों के बहिष्कार तक फैलाना चाहते थे।
1906 ई. का कलकत्ता अधिवेशन
गरमपंथी तिलक को अध्यक्ष बनाना चाहते थे परन्तु नरमपंथियों ने दादाभाई नौरोजी को लन्दन से बुलाकर अध्यक्ष बना दिया।
इस सम्मेलन में चार प्रस्ताव पारित किये गये-
1. स्वराज
2. स्वदेशी
3. विदेशी बहिष्कार
4. राष्ट्रीय शिक्षा
इसी अधिवेशन में सर्वप्रथम कांग्रेस के मंच से दादा भाई नौरोजी ने स्वराज की मांग की।
मुस्लिम लीग की स्थापना
1 अक्टूबर, 1906 ई. को एक मुस्लिम प्रतिनिधिमण्डल सर आगा खाँ के नेतृत्व में वायसराय लॉर्ड मिन्टो से शिमला में मिला।
इस प्रतिनिधिमण्डल के जनक अलीगढ़ कॉलेज के प्रिंसीपल आर्चवोल्ड थे।
मिन्टो ने मुस्लिम संगठन बनाने का परामर्श दिया।
30 दिसंबर, 1906 ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना की गई।
मुस्लिम लीग के संस्थापक ढाका के नवाब सलीम उल्लाह खान थे।
प्रथम अध्यक्ष – वकार-उल-मुल्क
1908 में ‘आगा खाँ’ को इसका स्थायी अध्यक्ष बनाया गया।
1909 ई. के अमृतसर अधिवेशन में मुस्लिमों के लिए पृथक् निर्वाचन मण्डल की मांग की जो 1909 के मार्ले मिन्टो सुधारों द्वारा प्रदान किया गया।
1907 ई. का कांग्रेस का सूरत अधिवेशन
यह सम्मेलन पहले नागपुर में होना था परन्तु तिलक अध्यक्ष न बन पाये इसलिये इसे सूरत स्थानान्तरित किया गया।
गरमपंथी लाला लाजपतराय को अध्यक्ष बनाना चाहते थे परन्तु नरमपंथियों ने रासबिहारी घोष को अध्यक्ष बनवा दिया।
- इस घटना के बाद तिलक को गिरफ्तार कर 6 वर्ष की सजा के लिये मांडले (वर्मा) जेल भेज दिया गया। जहाँ से वे 1914 में रिहा हुए।
1909 ई. का मार्ले मिन्टों सुधार
लॉर्ड मार्ले – भारत सचिव
लॉर्ड मिन्टो II – गवर्नर जनरल
अधिनियम के प्रावधान
1. केन्द्रीय विधानमण्डल के सदस्यों की संख्या69 कर दी गई।
2. बंगाल, बम्बई, मद्रास, U.P. प्रान्तों के विधान परिषदों की सदस्य संख्या 50 व पंजाब, बर्मा, असम की सदस्य संख्या 30 निश्चित की गई।
3. विधानपरिषद् के अधिकारों में वृद्धि की गई। पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया, बजट पर बहस का अधिकार दिया गया परन्तु मत विभाजन की व्यवस्था नहीं थी।
विदेशी सम्बन्ध, देशी रियासतें, रेल्वे पर व्यय, ऋण पर ब्याज, कानून के समक्ष निर्णय के लिये आये प्रश्नों को नहीं उठाया जा सकता था।
4. वायसराय की कार्यकारी परिषद् में एक भारतीय सदस्य की नियुक्ति का प्रावधान दिया गया।
S.P. सिन्हा प्रथम भारतीय थे जिन्हें कार्यकारी परिषद् में विधि सदस्य के रूप में लिया गया।
5. भारत परिषद् में भी भारतीय सदस्य की नियुक्ति का प्रावधान किया गया।
- K.G. गुप्ता व सैय्यद हुसैन बिलग्ममी 1907 ई. में
भारत परिषद् के सदस्य थे।
6. मुसलमानों के लिये पृथक् निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था की गई।
1911 ई. का दिल्ली दरबार
- सम्राट जॉर्ज पंचम व उसकी रानी मैरी भारत आये।
- उस समय गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग IIथे।
- इनके स्वागतत में गेटवे ऑफ इण्डिया बनाया गया।
- दो महत्वपूर्ण घोषणाऐं-
1. बंगाल विभाजन रद्द किया गया।
2. राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानान्तरण।
- राजधानी का दिल्ली विधिवत स्थानान्तरण दिसम्बर, 1912 में हुआ। इसी समय वायसराय लॉर्ड हार्डिंग के जुलूस पर दिल्ली के चाँदनी चौक में रासबिहारी बोस के नेतृत्व में बम फेंका गया। इन पर दिल्ली
षड्यन्त्र मुकदमा चलाकर फाँसी दे दी गई।
1.अवध बिहारी
2.अमीर चन्द
3. बाल मुकुन्द
4. बसन्त कुमार
- बंगाल विभाजन के रद्द होने के बाद उड़ीसा और बिहार को बंगाल से अलग कर दिया गया। असम को पुन: 1874 की स्थिति में लाया गया, अब असम में सिलहट भी शामिल था।
1916 ई. का कांग्रेस का लखनऊ अधिवेशन
- अध्यक्ष – अम्बिका चरण मजूमदार
- तिलक व एनी बेसेन्ट के प्रयासों से कांग्रेस के नरम दल व गरल दल में समझौता तथा विलय हुआ।
- तिलक व जिन्ना के प्रयासों से लखनऊ समझौता हुआ।
इसके तहत कांग्रेस ने लीग के पृथक् निर्वाचन व लीग ने कांग्रेस के स्वराज को समर्थन दे दिया।
- मदन मोहन मालवीय इस समझौता के खिलाफ थे।
कामागाटामारू प्रकरण – 1914 ई.
कनाडा में उन भारतीयों के घुसने पर प्रतिबन्ध था जो सीधे भारत से न आये हो। परन्तु 1913 ई.में ऐसे 35 भारतीयों को कनाडा में प्रवेश दिया, अत: सिंगापुर में रहने वाले ठेकेदार गुरदीत सिंह ने जापानी जहाज कामागाटामारू को किराये पर लेकर 376 यात्रियों के साथ वैंकूवर की ओर प्रस्थान किया। कनाडा सरकार ने इन्हें तट पर ही रोक दिया। अत: कनाडा में रह रहे भारतीयों (रहीम हुसैन, बलवत सिंह व सोहनलाल पाठक) की अगुआई में शोर (shore) कमेटी का गठन हुआ।
- U.S.A. में भी सोहन सिंह भाखना, बरकतुल्ला, भगवान सिंह व रामचन्द्र ने इनके पक्ष में आन्दोलन चलाया।
- जहाज के पुन: याकोहामा (जापान) पहुँचने से पहले प्रथम विश्वयुद्ध प्रारम्भ हो गया अत: ब्रिटिश सरकार ने जहाज सीधा कलकत्ता लाने का आदेश दिया।
- जहाज के वजबज बन्दरगाह पहुँचने पर यात्रियों व पुलिस के बीच झड़प में 18 यात्री मारे गये व 202 को जेल भेजा गया।
होमरूल आन्दोलन
- यह आन्दोलन आयरलैण्ड से प्रेरित था।
- इसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रहे हुए संवैधानिक तरीके से स्वशासन को प्राप्त करना था।
- तिलक ने 28 अप्रैल, 1916 को ‘बेलगांव’ में होमरूल लीग की स्थापना की।
- कार्यक्षेत्र – कनार्टक, महाराष्ट्र (बम्बई को छोड़कर), मध्य प्रान्त तथा बरार।
- ‘स्वराज’, ‘स्वेदश’ और ‘बहिष्कार’ कानारा सर्वप्रथम तिलक ने दिया। तिलक ने 1884 में गणपति महोत्सव, 1886 में शिवाजी महोत्सव की शुरुआत की।
- तिलक ने क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा एवं भाषायी आधार पर राज्य की मांग को स्वराज से जोड़ दिया।
- एनी बेसेन्ट ने सितम्बर, 1916 में अडयार (मद्रास) में होमरूल लीग की स्थापना की।
जॉर्ज अरूंडेल को सचिव बनाया गया।
वी.पी. वाडिया, रामास्वामी अय्यर, जवाहरलाल नेहरू, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, मुहम्मद अली जिन्ना भी इससे जुडे़ हुये थे।
- कार्यक्षेत्र- तिलक के होमरूल लीग के प्रभाव क्षेत्र से बाहर का शेष भारत का क्षेत्र शामिल था।
- होमरूल लीग के सर्वाधिक कार्यालय मद्रास में थे।
- गोखले द्वारा स्थापित संस्था ‘सर्वेण्ट ऑफ इंडिया सोसायटी’ के सदस्यों को लीग में प्रवेश की अनुमति नहीं थी।
- लीग के बढ़ते प्रभाव को देखकर सरकार ने एनी बेसेन्ट को गिरफ्तार कर लिया। इसके विरोध में सुब्रह्ण्यम ने अपनी नाइट हुड की उपाधि त्याग दी।
- सरकार को एनी बेसेन्ट को छोड़ना पड़ा।
- एनी बेसेन्ट कलकत्ता (1917) अधिवेशन की प्रथम महिला अध्यक्ष बनी।
- 20 अगस्त, 1917 को भारत सचिव मॉन्टेग्यू ने एक घोषणा के अनुसार भारत में “उत्तरदायी शासन की स्थापना” को लक्ष्य बताया (मॉन्टेग्यू घोषणा/अगस्त घोषणा)
- एनी बेसेन्ट ने होमरूल आन्दोलन समाप्त कर दिया।
- इस प्रकार होमरूल आन्दोलन नेतृत्व विहिन होकर समाप्त हो गया।
राष्ट्रीय आन्दोलन का तीसरा चरण (1919-1947)
महात्मा गांधी
- 1891 ई. - इंग्लैण्ड से बेरीस्टर बनकर लौटे।
- 1893 ई. - अब्दुल्ला भाई का मुकदमा लड़ने द. अफ्रीका गये।
- दक्षिण अफ्रीका में ‘टॉलस्टॉय’ व ‘फीनिक्स’ आश्रम की स्थापना की।
- बोअर (डच किसान) व जुलु विद्रोहों में अंग्रेजी सरकार की मदद की। अत: अंग्रेजों ने बोअर व जुलु पदक दिये।
- द. अफ्रीका में रंगभेद नीति के विरुद्ध सत्याग्रह किया।
- गांधीजी का राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले को मानते थे।
- 1894 - नटाल इण्डियन कांग्रेस
- 1904 - फीनिक्स आश्रम
- 1906 - प्रथम सत्याग्रह प्रयोग (द. अफ्रीका में)
- 9 जनवरी, 1915 को गांधीजी भारत लौटे।
- प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान गांधीजी ने लोगों को सेना में भर्ती होने के लिए प्रोत्साहित किया। फलस्वरूप लोगों ने उन्हें भर्ती करने वाला सार्जेण्ट कहा। अंग्रेजों ने उन्हें 'केसर-ए-हिन्द' की उपाधि दी।
- गांधीजी की प्रथम सार्वजनिक उपस्थिति – फरवरी, 1916 बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय का उद्घाटन समारोह में हुई।
- गांधीजी ने 1916 में अहमदाबाद में 'साबरमती आश्रम' की स्थापना की।
चम्पारण आन्दोलन - 1917 ई.
राजकुमार शुक्ल के कहने पर गांधीजी चम्पारण गये व तिनकठिया प्रथा के विरुद्ध सत्याग्रह प्रारम्भ किया।
- तिनकठिया प्रथा - किसानों को 3/20 भूमि पर नील की खेती करना अनिवार्य था।
- आन्दोलन में गांधीजी के सहायक - राजेन्द्र प्रसार, मजरूल-डल-हक, जे.बी. कृपलानी, नरहरि पारिख, महादेव देसाई।
- किसी अनुचित आदेश की अवज्ञा और उसका शान्तिपूर्ण प्रतिरोध, अंग्रेजों की लिए नई चीज थी।
- मामले की जाँच के लिए गठित सरकारी आयोग में गांधीजी को भी सदस्य बनाना पड़ा। नील बागान मालिकों को अवैध वसूली का 25 % किसानों को वापस लौटाना पड़ा।
- आन्दोलन की सफलता पर टैगोर ने गांधीजी को 'महात्मा' की उपाधि दी।
अहमदाबाद मिल-मजदूर आन्दोलन - 1918 ई.
- मिल-मजदूरों व मालिकों में 'प्लेग-बोनस' को
लेकर विवाद छिड़ा।
- 15 मार्च, 1918 को गांधीजी आमरण-अनशन पर बैठे।
- मिल - मालिक अम्बालाल साराभाई गांधीजी के दोस्त थे तथा इनकी बहन 'अनुसूइया बेन' गांधीजी की सहयोगी थी।
खेड़ा किसान आन्दोलन - 1918 ई.
- गांधीजी को गुजरात किसान सभा का अध्यक्ष बनाया गया।
- गांधीजी ने अकाल के कारण खराब फसल पर भू-राजस्व के खिलाफ आन्दोलन चलाया।
- सर्वेण्ट ऑफ इण्डिया सोसायटी के सदस्यों विट्ठल भाई पटेल व गांधीजी ने पूरी जाँच पड़ताल के बाद किसानों को मालगुजारी देने के लिए मना कर दिया।
- अंग्रेजी सरकार ने चुपचाप उन्हीं किसानों से कर ले लिया, जो देने में सक्षम थे।
- सहायक - इन्दुलाल याग्निक, शंकरलाल बैंकर, वल्लभ भाई पटेल (पटेल पहली बार गांधीजी से यहीं मिले थे), महादेव देसाई
रौलट कानून के विरुद्ध सत्याग्रह आन्दोलन (1919 ई.)
- रौलट एक्ट - सर सिडनी रौलट की अध्यक्षता में 'सेडिशन समिति' का गठन हुआ।
- समिति की संस्तुतियों के आधार पर फरवरी 1919 ई. दो विधेयक पारित किये गये। इन दोनों विधेयकों को रौलेट एक्ट या 'आतंकवादी अपराध अधिनियम' कहा जाता है।
- इसके अनुसार मजिस्ट्रेट को यह अधिकार था कि वह किसी भी संदेहास्पद स्थिति वाले व्यक्ति को गिरफ्तार करके उस पर मुकदमा चला सकता था।
- बिना अपील, बिना वकील, बिना दलील का कानून
रौलेट एक्ट को भारतीयों ने 'काला-कानून' की संज्ञा दी है।
- गांधीजी ने इसके विरोध में बॉम्बे में 'सत्याग्रह सभा' की स्थापना की (फरवरी 1919)
- 6 अप्रैल, 1919 को अखिल भारतीय हड़ताल (प्रथम हड़ताल) का आयोजन किया गया।
- स्वामी श्रद्धानन्द ने गांधीजी को दिल्ली आमंत्रित किया, परन्तु अंग्रेजों ने उन्हें पलवल (हरियाणा) से गिरफ्तार कर बॉम्बे छोड़ दिया।
- अमृतसर में डॉ. सतपाल व सैफूदीन किचलू की गिरफ्तारी के विरोध में आयोजित शान्तिपूर्ण जुलूस को पुलिस द्वारा रोकने पर भीड़ उग्र हो गई तथा 5 श्वेतों की हत्या कर दी।
- सरकार ने 'मार्शल लॉ' लगाकर प्रशासन आर. डायर नामक अधिकारी को सौंप दिया।
जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड
- 13 अप्रैल, 1919
- 13 अप्रैल, 1919 के (बैशाखी का दिन) अमृतसर के जलियाँवाला बाग में गोली काण्ड और नेताओं (किचलू, सत्यपाल) की गिरफ्तारी के विरुद्ध एक शांतिपूर्ण सभा का आयोजन किया गया था। सभा स्थल पर उपस्थित अंग्रेज जनरल ओ डायर ने बिना पूर्व सूचना तथा चेतावनी के भीड़ पर गोली चलवा दी।
- हंसराज नामक भारतीय ने डायर की सहायता की थी।
- हत्याकाण्ड के विरोध में टैगोर ने 'सर' की उपाधि त्याग दी तथा शंकरन नायर ने गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद् से इस्तीफा दे दिया।
- हाउस ऑफ लार्ड्स ने डायर को ब्रिटिश साम्राज्य का शेर कहा तथा ‘Sword of honor’ भेंट की।
- गुरुद्वारा कमेटी ने उसे 'सिंह' की उपाधि व सरोपा भेंट किया। क्योंकि उस समय गुरुद्वारों पर उदासी महन्तों का कब्जा था।
हत्याकाण्ड की जाँच के लिए 8 सदस्यीय हण्टर कमेटी का गठन किया गया जिसमें 3 भारतीय सदस्य (सर चिमन लाल सीतलवाड़, साहबजादा सुल्तान अहमद, जगत नारायण)
- हण्टर कमेटी ने डायर को निर्दोष करार दिया।
- गांधीजी ने हण्टर कमेटी की रिपोर्ट को 'पन्ने दर पन्ने निर्लज्ज लीपापोती' कहा।
- कांग्रेस ने हत्याकाण्ड की जाँच के लिये मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया।
- अन्य सदस्य - मोतीलाल नेहरू, गांधीजी, अब्बास तैय्यब जी, सी. आर. दास, पुपुल जयकर थे।
खिलाफत आन्दोलन (1919-1920)
- प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन व तुर्की के बीच सम्पन्न 'सीवर्स की सन्धि' द्वारा तुर्की के सुल्तान (खलीफा) के अधिकार छिन गये व तुर्की साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया।
- मुहम्मद अली व शौकत अली के नेतृत्व में खलीफा ने न्यायोचित व्यवहार करने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय मुस्लमानों का आन्दोलन था।
मुख्य मांगें
1. पहले के ऑटोमन साम्राज्य के सभी इस्लामी पवित्र स्थानों पर खलीफा का नियन्त्रण बना रहे।
2. जजीरात (अरद, सीरिया, इराक, फिलीस्तीन) इस्लामी सम्प्रभुता के अधीन रहे।
3. खलीफा के पास इतने क्षेत्र हो कि वह इस्लामी विश्वास को सुरक्षित रखने के योग्य बन सके।
खिलाफत आन्दोलन के मुख्य नेता -मुहम्मद अली, शौकत अली, मौलाना आजाद, हकीक अजमल खान तथा हसरत मोहानी थे।
- मुहम्मद अली व डॉ. अन्सारी के रूप में एक प्रतिनिधिमण्डल सरकार तक शिकायत पहुँचाने के लिये इंग्लैण्ड किया।
- नवम्बर,1919 में दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय खिलाफत आन्दोलन की अध्यक्षता गांधीजी ने की थी।
- 9 जून, 1920 को इलाहाबाद में खिलाफत कमेटी ने अहिंसक असहयोग आन्दोलन शुरू किया व गांधीजी को अगुवाई का अधिकार सौंपा।
- 31 अगस्त, 1920 से खिलाफत आन्दोलन असहयोग आन्दोलन का हिस्सा बन गया।
- 1924 ई. में यह आन्दोलन उस समय समाप्त हो गया जब तुर्की में कमाल पाशा के नेतृत्व में बनी सरकार ने खलीफा के पद को समाप्त कर दिया।
अगस्त घोषणा
- भारत सचिव मोंटेग्यू ने 20 अगस्त, 1917 को ब्रिटेन की कॉमन्स सभा में एक प्रस्ताव पढ़ा गया जिसमें भारत में प्रशासन की हर शाखा में भारतीयों को अधिक प्रतिनिधित्व दिये जाने की बात कही।
- मोंटेग्यू ने कहा कि '' शिक्षित भारतीयों की मांग नि:सन्देह उनका अधिकार है तथा उन्हें उत्तरदायित्व संभालने व आत्मनिर्णय का अवसर दिया जाना चाहिए।
1919 ई. का भारत परिषद् अधिनियम
- मॉन्टेग्यू (भारत सचिव) - चेम्सफोर्ड सुधार (गवर्नर जनरल )
- विलियम ड्यूक, भूपेन्द्र नाथ बसु, चार्ल्स राबर्ट (ब्रिटिश संसद सदस्य जिनके प्रश्न के उत्त में मॉन्टेग्यू घोषणा हुई थी।) के नेतृत्व में समिति गठित की गई।
- जिसने इन सुधारों का मसविदा तैयार किया।
एक्ट के प्रावधान
गृह सरकार में परिवर्तन
1. भारत परिषद् में सदस्यों की संख्या 15 से घटाकर (8-12) कर दी गई।
2. भारत परिषद् के सारे खर्चे ब्रिटिश राजकोष पर भारित किये गये।
3. भारतीय उच्च आयुक्त का नया पद सृजित किया गया जो भारतीय सरकार के लिए इंग्लैण्ड से वस्तुओं की आपूर्ति करता था। इसके सारे खर्चे भारतीय राजकोष पर भारित किये गये।
भारत सरकार में परिवर्तन
केन्द्र में परिवर्तन
1. गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद् में 3/8 सदस्य भारतीय होंगे। उन्हें विधि, शिक्षा,श्रम, स्वास्थ्य व उद्योग विभाग सौंपे गये।
केन्द्र में द्विसदनीय व्यवस्था स्थापित की गई।
राज्य परिषद् (60 सदस्य)
केन्द्रीय विधानसभा (145 सदस्य)
- प्रथमतया प्रत्यक्ष मताधिकार दिया गया, हालाँकि यह सार्वभौमिक न होकर सम्पत्ति के आधार पर था। महिलाओं को मताधिकार नहीं था।
- पृथक निर्वाचन को मुस्लिमों के साथ-साथ सिखों तथा ऐंग्लों - इण्डियन के लिये बढ़ा दिया गया।
विषयों को केन्द्र व प्रान्तों के बीच विभाजित किया गया।
- उदाहरणस्वरुप केन्द्रीय विषय- विदेशी मामले, रक्षा, राजनैतिक सम्बन्ध, डाक-तार, सार्वजनिक ऋण, संचार, कानून।
- प्रान्तीय विषय - स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन, शिक्षा, चिकित्सा, भूमि कर, जल संभरण, अकाल सहायता, शान्ति व्यवस्था, कृषि
प्रान्तों में परिवर्तन
- प्रान्तों में दोहरी प्रशासनिक प्रणाली प्रारम्भ की गई। प्रान्तीय विषयों को 'आरक्षित व हस्तान्तरित' दो भागों में बाँट दिया गया।
- आरक्षित विषयों का प्रशासन गवर्नर अपने उन पार्षदों की सहायता से करता था जिन्हें वह मनोनीत करता था और वे विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी नहीं थे।
- हस्तान्तरित विषयों का प्रशासन गवर्नर उन मंत्रियों की सहायता से करता था, जिन्हें वह निर्वाचित सदस्यों में नियुक्त करता था।
- आरक्षित विषय - वित्त, भूमि कर, अकाल सहायता, न्याय, पुलिस, पेन्शन, बिजली, गैस, श्रमिक कल्याण, सार्वजनिक सेवा, सिंचाई तथा जल मार्ग आदि।
- हस्तान्तरित विषय - शिक्षा, कृषि, स्थानीय स्वायत शासन, चिकित्सा सहायता, सार्वजनिक निर्माण विभाग आदि।
- उदारवादियों ने मॉन्टेग्यू घोषणा को भारत के मैग्नाकार्टा की संज्ञा दी।
- लोकमान्य तिलक ने 1919 ई. के अधिनियम को बिना सूरज का सवेरा बताया।
- इन सुधारों के कारण कांग्रेस में दूसरा विभाजन हुआ।
- सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर 'अखिल भारतीय उदारवादी संघ' की स्थापना की।
असहयोग आन्दोलन
- सितम्बर, 1920 के कलकत्ता के विशेष अधिवेशन में गांधीजी ने असहयोग का प्रस्ताव पेश किया।
- कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं के विरोध के बावजूद मोतीलाल नेहरू व अली भाइयों के सहयोग से गांधीजी प्रस्ताव पास करवाने में सफल रहे।
- दिसम्बर, 1920 में नागपुर (वी. राघवाचारी) के नियमित अधिवेशन में सी. आर. दास ने ही प्रस्ताव रखा, जिसका कांगेस द्वारा अनुमोदन कर लिया गया।
- इस अधिवेशन में कांग्रेस के संविधान में परिवर्तन किये गये।
- प्रान्तीय कांग्रेस कमेटियों को अब भाषायी आधार पर पुनर्गठित किया गया।
- कांग्रेस का नेतृत्व 15 सदस्यों की एक वर्किंग कमेटी को सौंपा गया।
- कांग्रेस का सदस्यता शुल्क घटाकर 25 पैसे कर दिया गया। कांग्रेस अब जनसाधारण का संगठन बन गया।
- आन्दोलन चलाने के लिए 'तिलक स्वराज फंड' की स्थापना की गई। (1 अगस्त 1920 को तिलक की मृत्यु हो गई थी।)
- इसी दिन असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ हो गया था।
असहयोग सम्बन्धी प्रस्ताव की मुख्य बातें निम्न थी-
सरकारी उपाधि व अवैतनिक सरकारी पदों को छोड़ दिया जाये।
सरकार द्वारा आयोजित सरकारी व अर्द्धसरकारी उत्सवों का बहिष्कार किया जाये।
सरकारी स्कूलों, कॉलेजों व वकीलों द्वारा न्यायालय का बहिष्कार, आपसी विवाद पंचायती अदालतों द्वारा निपटाया जाए।
असैनिक श्रमिक व कर्मचारी वर्ग मेसोपोटामिया में जाकर नौकरी करने से इन्कार करे।
विदेशी सामानों का पूर्णत: बहिष्कार किया जाये।
- गांधीजी के विधानपरिषदों के बहिष्कार से सी.आर.दास व स्कूलों के बहिष्कार से लाला लाजपतराय सहमत नहीं थे।
असहयोग आन्दोलन की सफलता के लिए गांधीजी द्वारा अपनाये गये रचनात्मक कार्य -
शराब का बहिष्कार
- हिन्दू-मुस्लिम एकता व अहिंसा पर बल
- छुआछूत से परहेज
- स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग
- खादी का प्रयोग
- कड़े कानूनों की सविनय अवज्ञा करना
- गांधीजी ने आश्वासन दिया कि असयोग के तरीके को अपनाते हुए यदि इन कार्यक्रमों पर पूरी तरह अमल हुआ तो एक वर्ष के भीतर ही आजादी मिल जायेगी।
- आन्दोलन की प्रगति - गांधीजी ने केसर-ए-हिन्द की उपाधि व जुलु व बोअर पदक त्याग दिये।
- जमनालाल बजाज ने रायबहादुर की उपाधि त्याग दी।
- अनेक राष्ट्रीय स्कूलों व कॉलेजों की स्थापना जिसमें (जामिया मिलया इस्लामिया (अलीगढ़), बिहार विद्यापीठ, काशी विद्यापीठ, गुजरात विद्यापीठ) प्रमुख थे।
- नरेन्द्र देव, डॉ. जाकिर हुसैन, लाला लाजपतराय - शिक्षक सुभाषचन्द्र बोस - प्रधानाचार्य, नेशनल कॉलेज – कलकता, सी.आर.दास, मोतीलाल नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद, सैफुद्दीन किचलू, सी. राजगोपालाचारी, सरदार पटेल, टी. प्रकाशम, आसफ अली ने वकालत छोड़ दी।
- आन्दोलन के दौरान सबसे पहले मुहम्मद अली को जेल हुई। सी. आर. दास व उनकी पत्नी बसन्ती देवी भी गिरफ्तार हुई।
- अप्रैल, 1921 में 'प्रिन्स ऑफ वेल्स' के भारत आगमन पर उनका बहिष्कार किया गया।
- दिसम्बर, 1921 के अहमदाबाद अधिवेशन (हकीम अजमल खाँ) में इस अहिंसक आन्दोलन को और तेज करने की प्रतिबद्वता दोहराई गई।
- असहयोग आन्दोलन कई जगह हिंसक भी हो गया था।
- मालाबार तट का मोपला विद्रोह 5 फरवरी 1922 को चौरी-चौरा (U.P) नामक स्थान पर उग्र भीड़ ने थाने में आग लगा दी जिसमें एक थानेदार व 21 सिपाहियों की मृत्यु हो गई।
- स्तब्ध व दु:खी गांधीजी ने 12 फरवरी, 1922 को बारदोली से हुई बैठक में असहयोग आन्दोलन को समाप्त करने को निर्णय लिया।
- 13 मार्च, 1922 को गांधीजी को गिरफ्तार कर न्यायाधीश ब्रूमफील्ड ने गांधीजी को 6 वर्ष की सजा सुनाई।
- न्यायाधीश ने कहा कि वह गांधीजी को वही दंड दे रहा है जो 1908 में लोकमान्य तिलक को दिया गया था।
- स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से गांधीजी को 5 फरवरी, 1924 को रिहा कर दिया गया।
स्वराज पार्टी मार्च, 1923
- असहयोग आन्दोलन के बाद कांग्रेस दो भागों में विभक्त हुई।
1. परिवर्तन वादी
2. अपरिवर्तनवादी
1. परिवर्तनवादी - विधान परिषदों में पहुँचकर सरकारी गलत नीतियों को रोकना चाहते थे।
- सी.आर.दास, मोतीलाल नेहरू
2. अपरिवर्तनवादी - विधान परिषदों में भाग लेने के विरुद्ध थे।
- सी. राजगोपालाचारी, राजेन्द्र प्रसाद, वल्लभ भाई पटेल 1922 के गया अधिवेशन में विधानपरिषदों के चुनाव में भाग लेने का प्रस्ताव गिर गया।
- 1 जनवरी 1923 ई. को इलाहाबाद में सी.आर.दास, मोतीलाल नेहरु, विट्ठल भाई पटेल, मदन मोहन मालवीय, जयकर के साथ मिलकर स्वराज पार्टी की स्थापना की। इसमें सी.आर. दास – अध्यक्ष तथा मोतीलाल नेहरू – सचिव बने।
स्वराज पार्टी के उद्देश्य -
1. शीघ्रातिशीघ्र डोमिनियम स्टेटस प्राप्त करना।
2. पूर्ण प्रान्तीय स्वायतता
3. सरकारी कार्यों में बाधा उत्पन्न करना।
- 1923 के चुनावों में स्वराज पार्टी के मध्य प्रान्त में पूर्ण बहुमत, बंगाल, U.P, बम्बई में प्रधानता व केन्द्रीय विधानमण्डल में 101 में से 42 स्थान प्राप्त हुए।
- 1925 में विट्ठलभाई पटेल को केन्द्रीय विधानसभा का अध्यक्ष बनवाया।
- ली कमीशन (सरकारी नौकरियों में जातीय उच्चता को बनाये रखने वाला कमीशन) तथा मुडिमैन कमेटी (द्वैधशासन सम्बन्धी विवादों की समाप्ति के लिए) का समर्थन नहीं दिया।
- जून, 1925 में सी.आर.दास की मृत्यु के बाद धीरे-धीरे स्वराज पार्टी समाप्त हो गई।
- 'साइमन कमीशन' / इंडियन स्टेट्यूटरी कमीशन
- सर जॉन साइमन की अध्यक्षता वाले इस 7 सदस्यीय आयोग में 1 भी भारतीय सदस्य नहीं था (सारे ब्रिटीश सासंद थे) अत: इसे श्वेत कमीशन भी कहा जाता है।
- 3 फरवरी, 1928 को आयोग के भारत आगमन पर उसका पूर्ण बहिष्कार किया गया, काले झण्डे व साइमन वापस जाओ के नारे लगाये गये।
- बहिष्कार का निर्णय 1927 ई. के मद्रास अधिवेशन (डॉ.एम.ए. अंसारी) में लिया गया।
- लखनऊ में जवाहर लाल नेहरू व गोविन्द वल्लभ पंत ने विरोध किया।
- लाहौर में ऐसे ही एक विरोध के दौरान पुलिस की लाठी से लाला लाजपतराय की मृत्यु हो गई।
केवल 3 दलों ने साइमन कमीशन का समर्थन किया था -
1. पंजाब की यूनिनिस्ट पार्टी
2. मद्रास की जस्टिस पार्टी
3. मुस्लिम लीग का शफी गुट
सिफारिशें -
1. प्रान्तों में द्वैध शासन को समाप्त कर उत्तरदायी शासन की स्थापना
2. भारत के लिए संघीय संविधान होना चाहिए।
3. केन्द्र में उत्तरादायी शासन की स्थापना अभी न की जाये।
नेहरू रिपोर्ट – 1928
- साइमन कमीशन के बहिष्कार के बाद भारत सचिव लार्ड बिरकेनहेड ने भारतीयों के सामने चुनौती रखी कि वे ऐसे संविधान का निर्माण कर ब्रिटिश संसद के समक्ष रखे जिसे सभी दलों का समर्थन प्राप्त हो।
- कांग्रेस ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए 28 फरवरी 1928 को दिल्ली में सर्वदलीय सम्मेलन बुलाया। जिसकी अध्यक्षता मोतीलाल नेहरू ने की।
- सदस्य - सर अली इमाम, एम.एम. अणे, तेज बहादुर सप्रु, मंगल सिंह, जी. आर. प्रधान, शोएब कुरेशी, सुभाषचन्द्र बोस, एन.एम.जोशी, जी.पी.प्रधान।
- नेहरू रिपोर्ट में 'डोमिनियन स्टेटस' को पहला लक्ष्य घोषित किया गया परन्तु साथ ही यह दोहराया गया कि यदि सरकार ने 1 वर्ष के भीतर डोमिनियन स्टेट्स न दिया तो कांग्रेस न सिर्फ अपना लक्ष्य पूर्ण स्वराज स्वीकार करेगी बल्कि लक्ष्य प्राप्ति के लिय सविनय अवज्ञा आन्दोलन भी चलायेगी।
- नहेरू रिपोर्ट को अन्तिम रूप से अगस्त, 1928 में आयोजित सर्वदलीय सम्मेलन में अन्तिम रूप दिया गया जिसकी अध्यक्षता डॉ. अन्सारी ने की थी।
- दुर्भाग्य से दिसम्बर, 1928 में कलकत्ता में आयोजित सर्वदलीय सम्मेलन रिपोर्ट को स्वीकार न कर सका।
- मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा व सिख महासभा के नेताओं ने इसे लेकर आपतियाँ की।
नेहरू रिपोर्ट के प्रावधान –
- सभी नागरिकों को मूल अधिकार दिये जाये।
- बर्मा को भारत से अलग किया जाये।
- देशी रियासतों व ब्रिटिश भारत को मिलाकर अखिल भारतीय संघ बनाया जाये।
- पृथक् निर्वाचन को समाप्त कर अल्पसंख्यकों के लिये स्थान सुरक्षित किये जाये।
- केन्द्र में द्विसदनीय व्यवस्था की जाये।
- भारत को डोमिनयन स्टेटस का दर्जा दिया जाये।
- प्रान्तों में द्वैध शासन को समाप्त कर पूर्ण उत्तरदायी शासन की स्थापना।
- भारत में संघात्मक व्यवस्था हो लेकिन अवशिष्ट शक्तियाँ केन्द्र में पास रहे।
- भारत परिषद् को समाप्त किया जाये।
- भारत में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की जाये।
- सिन्ध को बम्बई से अलग किया जाये।
- जिन्ना ने नेहरू रिपोर्ट को अस्वीकार कर मार्च, 1929 में 14 सूत्री मांग पत्र प्रस्तुत किया।
- सुभाषचन्द्र बोस व जवाहरलाल नेहरू ने डोमिनियन स्टे्टस की मांग का विरोध किया व उन्होंने मिलकर Independence for india league का गठन किया।
1929 ई. का लाहौर अधिवेशन
- इसकी अध्यक्षता जवाहर लाल नेहरू ने की।
- इसमें पूर्ण स्वराज को कांग्रेस का उद्देश्य घोषित किया गया।
- 31 दिसम्बर, 1929 को स्वाधीनता का नया-नया स्वीकृत तिरंगा झंडा लहराया गया।
- 26 जनवरी 1930 को प्रथम स्वाधीनता दिवस घोषित किया गया।
- सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करने का निर्णय लिया व इसके कार्यक्रम के लिए गांधीजी को अधिकृत किया।
- 1927 के मद्रास अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित कर लिया गया था।
गांधीजी का 11 सूत्री मांग पत्र
- 31 जनवरी, 1930 गांधीजी ने इरविन (गवर्नर जनरल) व रेम्जे मेकडोनाल्ड के सामने 11 सूत्री प्रस्ताव रखा।
1. नमक कर समाप्त किया जाये।
2. गुप्तचर विभाग को समाप्त किया जाये।
3. सैनिक व्यय में 50 % की कमी हो।
4. राजनैतिक बन्दियों को रिहा किया जाये।
5. रुपये का अवमूल्यन किया जाये।
6. मघ निषेध लागू किया जाये।
7. विदेशी कपड़े पर विशेष आयात कर लगाया जाये।
8. अधिक वेतन वाले सरकारी पदाधिकारियों की संख्या कम की जाये।
9. भू राजस्व 1/2 किया जाये।
10. भारतीयों को आत्मरक्षा के लिये हथियार रखने का अधिकार दिया जाए।
11. नटकर अधिनियम पारित किया जाये।
सविनय अवज्ञा आन्दोलन
- 12 मार्च, 1930 गांधीजी ने साबरमती आश्रम से अपने 78 अनुयायियों के साथ (इनमें वेब मिलर भी था) 375 किमी. दूर दांडी की ओर प्रस्थान किया।
- 6 अप्रैल, 1930 दांडी पहुँचकर नमक कानून तोड़ा।
- सुभाष चन्द्र बोस ने दाण्डी मार्च की तुलना नेपोलियन को 'पेरिस मार्च' व मुसोलिनी के 'रोम मार्च' से की। राजगोपालाचारी ने 'त्रिचलापल्ली से वेदारण्यम' तक की यात्रा की। वायकोम सत्याग्रह के नेताओं ने के. केलप्पन व टी.के.माधवन के साथ कालीकट से पयान्नूर तक की यात्रा की। तथा असम के लोगों ने सिलहट से नोआखली तक की यात्रा की।
- खान अब्दुल गफ्फार खान / सीमान्त गांधी / फख्रे अफगान ने उ.प. सीमा प्रान्त में खुदाई खिदमतगार (लाल कुर्ती दल) की स्थापना।
- इन्होंने पश्तो भाषा में 'पख्तून' नामक पत्रिका निकाली जो बाद में 'दशरोजा' नाम से प्रकाशित हुई।
- पेशावर में चन्द्र सिंह गढ़वाजी ने आन्दोलनकारियों पर गोली चलाने से मना कर दिया।
- नागालैण्ड में मदोनांग के नेतृत्व में जियालरंग आन्दोलन चला। मदोनांग की 13 वर्षीय बहन गोडेनल्यू ने तिरंगा लहराया।
- गोडेनल्यू को नेहरू जी ने रानी की उपाधि दी।
- धरासना में सरोजिनी नायडू व इमाम साहब व मणिलाल के नेतृत्व में आन्दोलन चला। 'इमाम साहब अफ्रीका में गांधीजी के सहायक थे।'
बिहार में चौकीदार कर के खिलाफ आन्दोलन चला।
- मध्य प्रान्त में कड़े वन नियमों के विरुद्ध वन सत्याग्रह चलाया गया।
- असम में 'कनिंघम सर्कुलर' का विरोध किया गया।
- इस आन्दोलन में भारतीय महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
- समाजवादी कार्यकर्ता 'कमलादेवी चट्टोपाध्याय' ने गांधीजी को समझाया कि वे अपने आन्दोलन को पुरुषों तक सीमित न रखे।
- संयुक्त प्रान्त व गुजरात में कर अदायगी का आन्दोलन चला।
- आन्दोलन के दौरान लड़कों की वानर सेना व लड़कियों की 'माजेरी सेना' बनाई गई।
गांधी -इरविन समझौता (5 मार्च 1931)
- इसे दिल्ली समझौता भी कहा जाता है।
- तेज बहादुर सप्रु व जयकर ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई।
- इसमें तेज बहादुर सप्रु व जयकर ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई।
- 17 फरवरी से वार्ता प्रारम्भ हुई तथा 5 मार्च को हस्ताक्षर हुए।
शर्तें -
1. समुद्र के किनारे बसने वाले लोगों को नमक बनाने व उसे एकत्रित करने की छूट दी जाए।
2. हिंसात्मक कार्यों में लिप्त अभियुक्तों के अलावा सभी राजनैतिक बन्दियों को रिहा किया जाए।
3. जब्ती जमीन की वापसी यदि उसे तीसरे पक्ष को न बेचा गया हो।
4. अफीम, शराब व विदेशी वस्त्रों की दुकान पर शान्तिपूर्ण धरने की अनुमति।
5. सरकार द्वारा सभी अपूर्ण अभियोगों व अध्यादेशों को वापस लिया जाए।
- गांधीजी ने कांग्रेस की ओर से निम्न शर्तें स्वीकार कर ली-
1. सविनय अवज्ञा आन्दोलन स्थगित कर दिया जायेगा।
2. द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में कांगेस भाग लेगी।
3. पुलिस की ज्यादतियों के खिलाफ निष्पक्ष न्यायिक जाँच की मांग वापस ले ली।
4. नमक कानून उन्मूलन की मांग व बहिष्कार की मांग को वापस ले लिया जाएगा।
कराची अधिवेशन (मार्च, 1931)
मार्च, 1931 में सरदार वल्लभ भाई पटेल की अध्यक्षता में हुआ।
- गांधी – इरविन समझौते का कांगेस ने अनुमोदन किया।
- कांग्रेस ने अपना आर्थिक घोषणा जारी कर समाजवाद में आस्था व्यक्त की।
- राजनैतिक घोषणा के तहत ‘मौलिक अधिकार व कर्तव्य’ शीर्षक प्रस्ताव भी स्वीकार किया गया।
- नौजवान भारत सभा के कार्यकर्ताओं ने गांधीजी को काले झण्डे दिखाये क्योंकि गांधीजी भगतसिंह को माफी नहीं दिलवा पाये।
गोलमेज सम्मेलन
- प्रथम गोलमेज सम्मेलन –नवम्बर, 1930 से जनवरी, 1931 तक चला।
- द्वितीय गोलमेज सम्मेलन –सितंबर, 1931 से नवंबर, 1931 तक चला।
- एकमात्र सम्मेलन जिसमें कांग्रेस ने भाग लिया।
- कांग्रेस की तरफ से एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में गांधीजी ने भाग लिया।
- गांधीजी ‘राजपूताना’ नाम जहाज से इंग्लैण्ड पहुँचे।
- मदन मोहन मालवीय व एनी बेसेन्ट ने व्यक्तिगत रूप से भाग लिया। सरोजिनी नायडू G.G. की प्रतिनिधि के रूप में गई।
- गांधीजी अपने साथ डॉ. अंसारी को ले जाना चाहते थे, परन्तु अंग्रेजों ने मना कर दिया।
- इस सम्मेलन में अम्बेडकर ने दलितों के लिए पृथक् निर्वाचन की मांग की।
- तृतीय गोलमेज सम्मेलन- नवंबर, 1932 से दिसंबर, 1932
- इस सम्मेलन में भी कांग्रेस ने भाग नहीं लिया।
- भारत सचिव ‘सेमुअल होर’ गोलमेज सम्मेलन के विरोधी थे।
सविनयम अवज्ञा आन्दोलन की पुनरावृती
(4 जनरी, 1932 – 7 अप्रैल, 1934)
- लोगों में उत्साह की कमी देखकर गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन स्थगित कर दिया।
- लॉर्ड विलिंगटन (गवर्नर जनरल) ने कांग्रेस को गैर कानूनी घोषित कर प्रतिबन्ध लगा दिया।
- गांधीजी सक्रिय राजनीति से अलग हो गये।
साम्प्रदायिक निर्णय – 1932 ई.
- ब्रिटिश प्रधानमंत्री ‘रैम्जे मेक्डोनाल्ड’ ने 16 अगस्त 1932 को साम्प्रदायिक निर्णय प्रस्तुत किया। इस निर्णय के प्रमुख प्रावधान इस प्रकार थे-
- प्रान्तीय व्यवस्थापिका सभाओं की सदस्य संख्या को दुगुना करने की योजना।
- मुसलमान, सिखों एवं भारतीय ईसाइयों के साथ हरिजनों के लिए भी हिन्दुओं से अलग निर्वाचन तथा प्रतिनिधित्व की व्यवस्था।
पूना समझौता
26 सितंबर, 1932
- साम्प्रदायिक निर्णय के समय गांधीजी यरवदा जेल में थे।
- गांधीजी ने साम्प्रदायिक निर्णय के विरुद्ध 20 सितंबर, 1932 ई. को जेल में ही आमरण अनशन प्रारम्भ कर दिया।
- मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से पूना में गांधीजी व अम्बेडकर के बीच समझौता हुआ। [राजेन्द्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, पुरुषोत्तम टंडन भी मध्यस्थ थे]
- अम्बेडकर ने समझौते के अन्तर्गत हरिजनों के लिए पृथक् प्रतिनिधित्व की मांग को वापस ले लिया तथा संयुक्त निर्वाचन के सिद्धान्त को स्वीकार किया गया।
- इस समझौते के अन्तर्गत हरिजनों के लिये विधानमंडलों में सुरक्षित स्थान को 71 से बढ़ाकर 148 कर दी गई।
- टैगोर ने इसके लिये गांधीजी का आभार व्यक्त किया।
- इस समझौते के बाद गांधीजी ने खुद को पूरी तरह हरिजनों की सेवा में समर्पित कर दिया। 1932 ई. में गांधीजी ने ‘अखिल भारतीय छुआछूत विरोधी लीग’ की स्थापना की।
भारत सरकार अधिनियम-1935
- साइमन कमीशन, नेहरू समिति व तीनों गोलमेज सम्मेलनों के प्रस्तावों के आधार पर यह अधिनियम पारित किया गया।
- यह बिना प्रस्तावना का व्यापक अधिनियम था जो भारतीय संविधान का आधार बना, लगभग 2/3 अनुच्छेद इसी से लिए गए है।
- श्वेत पत्र, संयुक्त प्रवर समिति रिपोर्ट, लोथयां रिपोर्ट (जिसमें चुनावर सम्बन्धी प्रावधानों का विवरण था) भी इस अधिनियम के मसौदे के आधार थे।
- अधिनियम के प्रावधान:-
- इंग्लैण्ड में सुधार
- भारत परिषद् को समाप्त कर दिया गया व भारत सचिव को सलाह देने के लिये एक सलाहकारी समिति का गठन किया गया। जिसकी सलाह भारत सचिव के लिए बाध्यकारी नहीं होती थी।
भारत में सुधार
केन्द्र में
- ब्रिटिश भारत व देशी रियासतों को मिलाकर एक अखिल भारतीय संघ बनाने का प्रावधान था। रियासतों का इसमें शामिल होना वैकल्पिक था। रियासतों के रुचि न लेने के कारण यह संघ अस्तित्व में नहीं आ सका।
- रियासतों के लिये इसमें निम्न शर्त थी-
1. न्यूनतम आधे प्रतिनिधि चुनने वाली रियासत शामिल हो।
2. आधी जनसंख्या वाली रियासतें सम्मिलित थी।
केन्द्र में द्वैध शासन लागू करने का प्रावधान जिसमें केन्द्रीय विषयों को आरक्षित व हस्तान्तरित विषयों में बाँटा गया।
- गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद् में 3 सदस्य गवर्नर जनरल द्वारा नियुक्त किये जाने थे और 10 सदस्य जन प्रतिनिधियों में से नियुक्त किये जाने थे।
केन्द्र में द्विसदनीय व्यवस्था की गई-
राज्य परिषद् - 260 सदस्य
स्थायी सदन - 156 ब्रिटिश भारत
कार्यकाल - 3 वर्ष
केन्द्रीय विधानसभा - 375 सदस्य
निम्न सदन - 250 ब्रिटिश भारत (अप्रत्यक्ष
निर्वाचन)
कार्यकाल - 5 वर्ष
- गवर्नर जनरल को वीटो व अध्यादेश जारी करने का अधिकार दिया गया।
- विषयों को तीन सूचियाँ में विभक्त किया गया।
1. संघ सूची
2. राज्य सूची
3. समवर्ती सूची
- सिन्ध,उड़ीसा व उ. प. सीमा प्रान्त- तीन नये राज्य बनाये गये।
बर्मा को भारत से अलग किया गया।
- केन्द्रीय बैंक की स्थापना का प्रावधान रखा गया।
- संघीय न्यायालय का प्रावधान था जो केन्द्र-राज्य संबंधों के लिये था।
प्रान्तों में-
- 11 में से 6 प्रान्तों में द्विसदनीय व्यवस्था लागू की गई। बंगाल, बोम्बे मद्रास, उड़ीसा , बिहार, मध्य प्रान्त, सिन्ध संयुक्त प्रान्त, उ.प. सी. प्रान्त, असम, पंजाब में से बंगाल, बिहार, बोम्बे मद्रास, u.p. आसाम में द्विसदनीय व्यवस्था थी।
- प्रान्तों में द्वैध शासन समाप्त कर प्रान्तीय स्वायतता दी गई।
1937 ई. के चुनाव
- भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत भारतीयों को प्रान्तीय शासन का अधिकार मिला, परिणामस्वरूप 1937 ई. में प्रान्तीय विधानसभाओं के चुनाव हुए।
- कांग्रेस ने 11 में से 8 प्रान्तों में अपनी सरकार बनाई।
- मुस्लिम लीग को एक भी प्रान्त में बहुमत नहीं मिला।
- बंगाल में कृषक प्रजा पार्टी ने तथा पंजाब में यूनिनिफ्ट पार्टी (सिकंदर हयात खान / खिज्र हयात खान) ने सरकार बनाई।
- संयुक्त प्रान्त में कांग्रेस व लीग का चुनाव के पूर्व गठबन्धन था परन्तु चुनाव के बाद लीग को सरकार में शामिल नहीं किया गया।
- लीग ने कांग्रेसी शासन की जाँच के लिये पीरपुर समिति का गठन कर कांग्रेस शासित राज्यों में मुसलमनों की स्थिति को बदत्तर बताया।
- 1939 ई. में द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रारम्भ होने पर लॉर्ड लिनलिथगों ने बिना भारतीय विधानमण्डल की सहमति के भारत को युद्ध में शामिल कर लिया तथा देश में आपातकाल लागू कर दिया।
- इसके विरोध में 15 नवंबर, 1939 को सभी कांग्रेसी मंत्रिमण्डलों ने इस्तीफे दे दिये।
- कांग्रेसी मंत्रिमण्डलों के इस्तीफे दिये जाने के बाद मुस्लिम लीग ने 22 दिसम्बर, 1939 को मुक्ति दिवस के रूप में मनाया।
व्यक्तिगत सत्याग्रह [दिल्ली चलो आन्दोलन]
- अक्टूबर, 1940 ई. ब्रिटिश निर्णय के विरुद्ध गांधीजी ने कुछ चुने हुए व्यक्तियों के साथ सीमित पैमाने पर सत्याग्रह चलाया। यह सत्याग्रह पवनार आश्रम से प्रारम्भ हुआ जिसमें प्रथम सत्याग्रही विनोबा भावे व द्वितीय सत्याग्रही जवाहर लाल नेहरू थे।
- सत्याग्रह को सीमित इसलिये रखा गया कि देश में व्यापक उथल-पुथल न हो और ब्रिटेन के युद्ध प्रयासों में बाधा न पडे़।
- गांधीजी ने वायसराय को लिखे पत्र में इस आन्दोलन की व्याख्या इस प्रकार की ।
अगस्त प्रस्ताव
- 8 अगस्त, 1940 को युद्ध में भारतीयों का समर्थन हासिल करने के उद्देश्य से वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने अगस्त प्रस्ताव पेश किया-
1. वायसराय की सलाहकार कौंसिल के विस्तार के साथ ही कार्यकारिणी में भारतीय प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाना।
2. युद्ध सम्बन्धी विषयों पर विचार हेतु युद्ध परामर्शदात्री सभी का गठन करना।
3. युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन स्टेट का दर्जा दिया जायेगा।
4. युद्ध के बाद संविधान निर्माण हेतु भारतीयों को आमंत्रित किया जायेगा।
5. अल्पसंख्यकों को विश्वास में लिये बिना किसी भी संवैधानिक परिवर्तन को लागू नहीं किया जा सकेगा।
6. कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव को ठुकराते हुए ‘व्यक्तिगत सत्याग्रह’ आन्दोलन प्रारम्भ किया था।
7. 9 सितंबर, 1941 – चर्चिल ने कहा कि ‘एटलांटिक चार्टर’ भारत पर लागू नहीं होगा।
मुस्लिम लीग का लाहौर अधिवेशन (1940)
- अध्यक्ष – मुहम्मद अली जिन्ना
- 22 मार्च, 1940 को अपने अध्यक्षयीय भाषण में जिन्ना ने भारत से अलग मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान की मांग की।
- वर्ष 1930 में इकबाल ने मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में पश्चिमोत्तर भारतीय राज्य की आवश्यकता का उल्लेख किया था।
- रहमत अली ने ‘ Now or Never : Are we to Perish Forever ?’ नामक पैम्फलैट जारी किया था जिसमें पंजाब दिया गया था।
- पंजाब, उ.प. सीमा प्रान्त, कश्मीर, सिन्थ व बलूचिस्तान को मिलाकर पाकिस्तान निर्माण का विचार दिया गया था।
- पाकिस्तान की मांग का प्रस्ताव खलीकुज्जमा ने तैयार किया था।
क्रिप्स प्रस्ताव – 1942
- 1942 ई. जापानी फौजो का रंगून पर कब्जा
- भारत के सीमान्तों पर सीधा खतरा
- भारतीय समर्थन पाने के उद्देश्य से कैबिनेट मंत्री स्टेफोर्ड क्रिप्स 23 मार्च, 1942 को भारत आया।
- 30 मार्च, 1942 को क्रिप्स योजना प्रस्तुत
प्रावधान:-
1. युद्ध के बाद भारत को विदेश नीति निर्धारण के सभी अधिकारों से सम्पन्न डोमिनियन स्टेट का दर्जा दिया जायेगा जिसके लिए राष्ट्रकुल की सदस्यता भी स्वैच्छिक होगी।
2. युद्ध के बाद सभी प्रान्तीय विधानमण्डलों के निम्न सदन के सदस्यों के द्वारा संविधान सभा का निर्वाचन किया जायेगा।
3. अल्पसंख्यकों के हितों के लिए एक पृथक् समझौता किया जाएगा।
4. युद्ध के दौरान भारत की सुरक्षा का दायित्व ब्रिटेन पर है, अत: जो कुछ भी किया जायेगा वह युद्ध के बाद किया जायेगा।
- गांधी जी ने क्रिप्स प्रस्ताव को Post Dated Cheque कहा।
- कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने क्रिप्स प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।
भारत छोड़ो आन्दोलन अगस्त क्रान्ति
द्वितीय विश्व युद्ध में जापान का प्रभुत्व बढ़ता जा रहा था। वस्तुओं की कमी व बढ़ती कीमतों ने भारतीय जनता के असंतोष को और गहरा कर दिया।
गांधीजी ने ‘हरिजन’ में लिखा- अंग्रेजों भारत को जापान के लिए मत छोड़ो बल्कि भारत को भारतीयों के लिए व्यवस्थित रूप से छोड़ जाओ।
- वर्धा प्रस्ताव- 14 जुलाई, 1942 में कांग्रेस कार्यसमिति ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो प्रस्ताव’ पारित किया।
- गांधीजी ने कांगेस को अपने प्रस्ताव को स्वीकार न किये जाने की स्थिति में चुनौती देते हुए कहा कि ‘मैं देश की बालू से ही कांग्रेस से भी बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दूंगा।’
आन्दोलन का प्रारम्भ
- 7 अगस्त, 1942 को बम्बई के ग्वालिया टैंक में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ।
- 8 अगस्त को गांधीजी के ‘भारत छोड़ो प्रस्ताव’ को स्वीकार कर लिया ।
- स्वयं गांधीजी ने अपने 70 मिनट के भाषण में ‘करो या मरो’ का मन्त्र दिया।
- डॉ. पट्टाभि सीतारमैया कहते हैं कि ‘गांधीजी उस दिन अवतार और पैगम्बर की प्रेरक शक्ति से प्रेरित होकर भाषण दे रहे थे।’
- 9 अगस्त को तड़के ‘आपरेशन जीरो ऑवर’ के तहत कांग्रेस के सभी बड़े नेता गिरफ्तार कर लिये गये।
- गांधीजी को पूना के आगा खाँ महल में व अन्य नेताओं को अहमदनगर के किले में रखा गया और कांग्रेस को अवैधानिक संस्था घोषित कर दिया गया।
- स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान यह पहला ऐसा आन्दोलन था जो नेतृत्व विहिनता के बावजूद उत्कर्ष तक पहुँचा।
- कांग्रेस के द्वितीय पंक्ति के नेताओं ने भूमिगत रहकर आन्दोलन चलाया।
- जय प्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, उषा मेहता, अरुणा आसफ अली, अच्युत पटवर्धन।
- उषा मेहता ने बम्बई में भूमिगत रेडियो स्टेशन स्थापित किया राम मनोहर लोहिया इस पर नियमित रूप से बोलते थे।
- अनेक स्थानों पर समानान्तर सरकारों (प्रति सरकार) का गठन हुआ।
1.बलिया- पहली समानान्तर सरकार
- मुख्य नेता- चितू पाण्डेय (बलिया और गाजीपुर क्षेत्र)
2. सतारा - सबसे लम्बे समय तक चलने वाली प्रति सरकार (1946 तक)
मुख्य नेता- नानाजी पाटिल
वाई. बी. चव्हाण
3. तामलूक - इसे जातीय सरकार भी कहा जाता है।
मुख्य नेता- सतीश सावंत-इन्होंने ‘विद्युत वाहिनी’ नामक रमैन्य संगठन भी बनाया।
- ‘मानंगिनी हानरा’ नामक महिला भी इसमें जुड़ी हुई थी।
- अनेक स्थानों पर आन्दोलन हिंसक हो गया था।
- बड़े स्तर पर सार्वजनिक सम्पत्ति को नष्ट किया गया।
- गांधीजी ने सरकारी आरोपों के विरुद्ध 21 दिन का उपवास रखा। (10 फरवरी 1943)
- मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा,भीमराव अम्बेडकर, उदारवादी नेता, अकालीदल आदि राजनीतिक दल व व्यक्तियों ने भारत छोड़ो आन्दोलन का विरोध किया था।
- 9 मई, 1944 को गांधीजी को जेल से रिहा किया गया।
आन्दोलन प्रारम्भ करते समय गाँधीजी के निर्देश-
- सरकारी कर्मचारी नौकरी न छोड़े लेकिन कांग्रेस के प्रति अपनी निष्ठा की घोषणा कर दें।
- सैनिक अपने देशवासियों पर गोली चलाने से इन्कार कर दें।
- राजा-महाराजा जनता की प्रभुसता स्वीकार करें और उनकी रियासतों में रहने वाली जनता अपने आप को भारतीय राष्ट्र का अंग घोषित कर दें तथा राजाओं का नेतृत्व तभी स्वीकार करें, जब वे अपना भविष्य जनता के साथ जोड़ लें।
- छात्र पढ़ाई तभी छोड़े, जब आजादी प्राप्त हो जाने तक वे अपने इस निर्णय पर दृढ़ रह सकें।
- किसानों, जन में साहस हो तथा जो अपना सब कुछ दाँव पर लगाने को तैयार हो, उन्हें मालगुजारी देने से इन्कार कर देना चाहिए।
सी. आर. फार्मूला
- 10 जुलाई, 1944 चक्रवती राजगोपालाचारी द्वारा गांधीजी की स्वीकृति से कांग्रेस व मुस्लिम लीग के बीच देश की साम्प्रदायिक समस्या सुलझाने के उद्देश्य से प्रस्तुत योजना।
- मुस्लिम लीग भारतीय स्वतन्त्रता की मांग का समर्थन करे व अस्थायी सरकार के गठन के समय सहयोग की भूमिका अदा करे।
- द्वितीय विश्व युद्ध खत्म हो जाने के बाद भारत के उ. प. व पूर्वी भागों में स्थित मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों की सीमा निर्धारण के लिये कमीशन का गठन हो, फिर वयस्क मताधिकार प्रणाली के आधार पर इन क्षेत्रों के निवासियों की मतगणना करके भारत से उनके सम्बन्ध विच्छेद के प्रश्न का निर्णय किया जाये।
- मतगणना के पूर्व सभी राजनीतिक दलों को अपने दृष्टिकोण के प्रचार की पूरी स्वतन्त्रता हो।
- देश विभाजन की स्थित में रक्षा, यातायात व संचार को साझा रखकर भारत व पाकिस्तान मिलकर संघ बनाये।
- उपर्युक्त शर्तें तभी मानी जा सकती है, जब ब्रिटेन भारत को पूर्ण रूप से स्वतन्त्रता प्रदान करें।
- जिन्ना ने इस CR फॉर्मूले को पूरी तरह से नकार दिया जिन्ना ने मांग रखी कि-
- अंग्रेजों के जाने से पहले विभाजन हो।
- जनमत संग्रह में केवल मुस्लिमों की राय पूछी जाये।
- पश्चिमी तथा पूर्वी पाकिस्तान को मिलाने के लिये गलियारा दिया जाये।
- साझा रक्षा, यातायात, संचार के प्रस्ताव को भी जिन्ना ने नकार दिया।
- गांधीजी ने जिन्ना को मनाने की कोशिश की व उन्हें कायदे आजम (महान नेता) कहा, पर जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग पर अटल रहकर वार्ता को विफल कर दिया।
वेवेल योजना
- मार्च, 1945 में वायसराय लॉर्ड वेवेल इंग्लैण्ड गये तथा ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल एवं भारत मन्त्री एमरी से भारत के बारे में सलाह मशविरा किया।
- 14 जून, 1945 को उन्होंने भारत आकर वेवेल योजना प्रस्तुत की।
- वायसराय की कार्यकारी परिषद् में सभी दलों को प्रतिनिधित्व देते हुए वायसराय व मुख्य सेनापति को छोड़कर सभी पद भारतीयों को दिये जायेंगे।
- गवर्नर जनरल यथा सम्भव वीटो का प्रयोग नहीं करेगा।
- कार्यकारी परिषद् में मुस्लिम व स्वर्ण हिन्दू सदस्यों की संख्या समान होगी।
- युद्ध समाप्ति के बाद भारतीय अपना संविधान स्वयं बनायेगें।
- कांग्रेस के नेता रिहा किये जायेंगे तथा शीघ्र ही शिमला में एक सर्वदलीय सम्मेलन बुलाया जायेगा।
शिमला सम्मेलन 1945 ई.
- 25 जून, 1945 प्रारम्भ 14 जुलाई, 1945 तक
22 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। (सर्वदलीय सम्मेलन)
कांग्रेस प्रतिनिधिमण्डल का नेतृत्व अब्दुल कलाम आजाद ने किया।
- मुस्लिम लीग ने सभी मुस्लिम सदस्यों के चयन की शर्त रखी, कांग्रेस ने इसे स्वीकार नहीं किया।
- मुस्लिम लीग के अडियल रवैये के कारण सम्मेलन असफल रहा।
शाही नौ सेना विद्रोह
- 18 फरवरी, 1946 को ‘एन. एस. तलवार’ नामक जहाज के कर्मचारियों ने ब्रिटिश सरकार के सामने खराब खाना मिलने की शिकायत की।
- ब्रिटिश अधिकारियों का जवाब था- ‘भिखमंगों को चुनने की छूट नहीं दी जा सकती’।
- इसके खिलाफ नाविकों ने विद्रोह कर दिया, बॉम्बे से प्रारम्भ होकर यह आन्देालन कराची तक फैल गया।
- जहाज पर से यूनियन जैक उतार दिया गया। उनकी एक मांग यह भी थी कि नाविक ‘बी. सी. दत’ जिसे जहाज पर अंग्रेजों भारत छोड़ो लिखने के लिये गिरफ्तार किया गया था, रिहा किया जाये।
- विद्रोहियों ने एम. एस. खान के नेतृत्व में नौ सेना केन्द्रीय हड़ताल की।
- जिन्ना व पटेल के समझाने पर सेनिकों ने समर्पण कर दिया।
कैबिनेट मिशन
- प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने तत्कालीन ज्वलन्त समस्या पर विचार विमर्श के लिये ‘कैबिनेट मिशन’ भारत भेजा।
- 3 सदस्यीय आयोग था।
पैथिक लॉरेन्स (भारत सचिव), स्टेफोर्ड क्रिप्स (व्यापार मण्डल अध्यक्ष) एवं ए. बी. एलेक्जेन्डर (नौ सेना मंत्री) ।
- 24 मार्च, 1946 को दिल्ली पहुँचा व 16 मई, 1946 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
- एक भारतीय संघ (ब्रिटिश प्रान्त + देशी राज्य) स्थापित होगा जो विदेश, रक्षा व संचार की व्यवस्था करेगा। अन्य विषयों पर राज्यों को स्वतन्त्रता होगी।
- केन्द्रीय विधानमण्डल में धार्मिक मुद्दे पर अधिनियम पारित करने से पहले दोनों सम्प्रदायों के प्रतिनिधियों से पृथक-पृथक सहमति ली जायेगी।
- भारतीय प्रान्तों को तीन वर्गो में विभाजित किया जायेगा।
- वर्ग A – मद्रास, बॉम्बे, UP, बिहार, मध्य प्रान्त, उड़ीसा
वर्ग B - पंजाब, NWFP, सिन्ध
वर्ग C - बंगाल, असम
- तीनों वर्गो के प्रान्तों को अपने-अपने प्रतिनिधि चुनने एवं अपने प्रांत के लिए संविधान बनाने का अधिकार होगा।
- संविधान सभा का गठन प्रान्तीय विधानसभा के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर होगा।
- पाकिस्तान की मांग को अस्वीकार कर दिया गया।
अन्तरिम सरकार का गठन किया जायेगा।
पाकिस्तान की मांग को अस्वीकार करने के कारण-
1. अल्पसंख्यकों की संख्या यथावत बनी रहेगी।
2. भौगोलिक कारणों से भी पाकिस्तान सम्भव नहीं हैं क्योंकि पूर्वी व पश्चिमी भाग में दूरी अधिक है।
3. रियासतों की समस्याएँ।
4. सेना व संसाधनों का बंटवारा भी अव्यावहारिक होगा।
- कैबिनेट मिशन के बारे में गांधीजी ने कहा कि “यह योजना उस समय की परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में सबसे उत्कृष्ट योजना थी, उसमें ऐसे बीज थे जिससे दु:ख की मारी भारत भूमि यातना से मुक्त हो सकती थी।”
- जुलाई, 1946 में कैबिनेट मिशन के आधार पर संविधान सभा के चुनाव हुए। 296 सदस्यों के लिये चुनाव हुआ।
- 214 सामान्य सदस्यों में कांग्रेस को 201 सीटें प्राप्त हुई तथा 4 सिख सदस्यों का समर्थन भी मिला। मुस्लिम लीग को आरक्षित 78 में से 73 सीटें प्राप्त हुई।
- लीग ने संविधान सभा का बहिष्कार कर दिया व 16 अगस्त को प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस के रूप में मनाया।
- पूरे देश में साम्प्रदायिक दंगे हो गये।
- 2 सितंबर, 1946 को नेहरूजी की अध्यक्षता में अंतरिम सरकार का गठन (12 सदस्यीय) हुआ, वेवेल के अनुरोध पर मुस्लिम लीग के 5 सदस्य अन्तरिम सरकार सरकार में शामिल तो हुए, परन्तु उनका रूम हठधर्मिता का रहा। इसलिये किसी समझौते पर निर्णय न हो सका।
एटली घोषणा
- ब्रिटिश प्रधानमन्त्री एटली ने घोषणा की।
1. ब्रिटिश सरकार जून, 1948 तक भारतीयों को सत्ता सौंप देगी।
2. माउंटबेटन को वायसराय बनाकर भारत भेजा जायेगा।
माउण्टबेटन योजना
- मार्च, 1947 में माउण्टबेटन भारत आया।
- 3 जून, 1947 को माउण्टबेटन योजना प्रस्तुत की-
1. भारत को दो भागों, भारत व पाकिस्तान में बाँट दिया जायेगा।
2. बंगाल, पंजाब विधानमण्डलों के अधिवेशन दो भागों में किये जायेंगे। एक भाग में उन जिलों के प्रतिनिधि भाग लेंगे जहाँ मुस्लिम बहुलता है और दूसरे में उन जिलों के प्रतिनिध भाग लेंगे जहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यक है। दोनों यह निर्णय स्वयं लेंगे कि उन्हें भारत या पाकिस्तान में से किसके साथ रहना है।
3. असम के सिलहट जिले व NWFP में जनमत संग्रह करवाया जायेगा।
4. पंजाब, बंगाल, असम के लिये सीमा आयोग का गठन किया जायेगा। [रेडक्लिफ आयोग]
5. देशी रियासतों से ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त कर उन्हें भारत या पाक में मिलने की पूर्ण स्वतंन्त्रता होगी।
भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम - 1947
- 4 जुलाई को ब्रिटिश संसद में पेश व 18 जुलाई को स्वीकृत –
1. 15 अगस्त, 1947 को भारत व पाक दो डोमिनियम राज्य अस्तित्व में आ जायेंगे।
2. भारत व पाकिस्तान के पास राष्ट्रमण्डल में अलग होने का पूर्ण अधिकार होगा।
3. दोनों डोमिनियन स्टेट अपनी-अपनी संविधान सभा का गठन करेंगे व दोनों के लिये अलग-अलग गवर्नर जनरल होगा।
4. नया संविधान बनने तक संविधान सभा ही 1935 ई. के अधिनियम के अनुसार विधानमण्डल के रूप में कार्य करेगी।
5. सभी रियासतें ब्रिटिश सन्धियों से मुक्त है। वे स्वतन्त्र रह सकती है या किसी देश के साथ मिल सकती है।
6. ब्रिटिश सम्राट के टाइटल से ‘केसर-ए-हिन्द’ की उपाधि समाप्त।
7. विभाजन के प्रश्न पर पटेल ने कहा कि “यदि कांग्रेस विभाजन स्वीकार न करती तो एक पाकिस्तान के स्थान पर कई पाकिस्तान बनते।”
8. 2 अप्रैल को गांधीजी ने माउण्टबेटन से मुलाकात कर जिन्ना को सरकार बनाने के लिये आमंत्रण देने को कहा ताकि विभाजन रुक सके। नेहरू व पटेल ने इसका जमकर विरोध किया।
9. गांधी जी ने इसके बाद साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई लड़ी, उनके इन प्रयासों की प्रशंसा में ‘माउण्टबेटन ने उन्हें ‘वन मैन बाउंडरी फोर्स’ कहा।
10. खान अब्दुल गफ्फार खान ने NWFP के पाकिस्तान में मिलाने पर कहा था “कांग्रेस ने हमें भेड़ियों के आगे डाल दिया है।”