स्थानीय स्वशासन

- स्थानीय स्वशासन भारतीय अवधारणा/नवाचार है।
- स्थानीय स्वशासन का अर्थ स्थानीय स्तर की उन संस्थाओं से है जो जनता द्वारा चुनी जाती है तथा जिन्हें राष्ट्रीय या प्रान्तीय शासन के नियंत्रण में रहते हुए नागरिकों की स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अधिकार और दायित्व प्राप्त होते हैं।
- 1882 में लॉर्ड रिपन द्वारा स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ के वित्तीय सशक्तिकरण के लिए एक प्रस्ताव रखा गया था। इस प्रस्ताव को स्थानीय स्वशासन का मेग्नाकार्टा कहा जाता है।
- लॉर्ड रिपन को भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक कहा जाता है।
- गांधीजी की ग्राम स्वराज की अवधारणा स्थानीय स्वशासन से संबंधित है। इस अवधारणा का उल्लेख अपनी पुस्तक My Picture of the free India में किया। गांधी के अनुसार यदि भारत को आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाना है तो गाँव को आत्मनिर्भर बनाना होगा।
-भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 में राज्यों द्वारा ग्राम पंचायतों के गठन किए जाने का उल्लेख है। 
- भारत में स्थानीय स्वशासन ग्रामीण स्थानीय स्वशासन (पंचायती राज) एवं नगरीय स्वायत्त शासन के रूप में विद्यमान है।

ग्रामीण स्थानीय स्वशासन (पंचायती राज)
पंचायती राज का विकास
- K.M. मुंशी के सुझाव पर स्वतंत्र भारत में ग्रामीण जनता के जीवन स्तर में वृद्धि के लिए 1952 में “सामुदायिक विकास कार्यक्रम” एवं 1953 में “राष्ट्रीय सविस्तार सेवा कार्यक्रम” फोर्ड फाउण्डेशन की मदद से लागू किया गया।
- योजना आयोग द्वारा सामुदायिक विकास कार्यक्रम के बेहतर क्रियान्वयन के लिए बलवंत राय मेहता समिति का गठन किया गया जिसने 1958 में सिफारिश की थी। बलवंतराय मेहता ने अपने प्रतिवेदन में प्रशासनिक हस्तक्षेप के कारण इन दोनों कार्यक्रमों को असफल बताया। उन्होंने भारत में लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण लागू करने की अनुशंसा की थी। लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण शब्द बलवन्त राय मेहता ने दिया था इसलिए इनकों लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण का जनक कहा जाता है। 

समिति की अनुशंसा
1. त्रिस्तरीय पंचायती राज की स्थापना की जानी चाहिए।
2.इसके अंतर्गत ग्राम पंचायत का चुनाव प्रत्यक्ष एवं सीधा होगा जबकि पंचायत समिति एवं जिला समिति का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से होगा।
3. नियोजन व विकास की सभी गतिविधियाँ इन संस्थाओं को सौंपी जाए।
4. पंचायत समिति (खंड स्तर) कार्यकारी निकाय के रूप में होगी जबकि जिला परिषद् की भूमिका सलाहकारी समन्वयकारी एवं पर्यवक्षेण की होगी।
5. जिला परिषद् का चैयरमैन जिलाधिकारी होगा।
6. इन संस्थाओं के प्रभावी कार्यकरण के लिए पर्याप्त संसाधन हस्तांतरित किए जाए और भविष्य में शक्तियों का केन्द्रीकरण किया जाए।

- राजस्थान देश का पहला राज्य था जहाँ पंचायती राज की स्थापना 2 अक्टूबर, 1959 को राजस्थान के नागौर जिले के बगदरी गाँव में तात्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू द्वारा की गई। आंध्रप्रदेश पहला राज्य है जहाँ 11 अक्टूबर, 1959 को पहली बार पंचायत राज संस्थाओं के चुनाव हुए।

पंचायती राज संस्थाओं की कार्यप्रणाली के विविध पक्षों का अध्ययन करने के लिए अनेक अध्ययन दल एवं समितियाँ गठित की गई जो निम्न हैं–

1. अशोक मेहता समिति (1977) :- 1978 में अपनी रिपोर्ट दी।
i. द्विस्तरीय पंचायती राज होगा, जिसमें जिला परिषद् एवं मण्डल पंचायत नामक दो स्तर होंगे।
ii. 15 से 20 हजार आबादी के लिए एक मण्डल पंचायत का गठन होगा।
iii. समिति ने जिला स्तर को सर्वाधिक महत्त्व दिया तथा इसे जनपद स्तर पर योजनाओं के निर्माण के लिए उत्तरदायी और कार्यकारी निकाय के रूप में माना।
iv. पंचायतो के चुनाव में सभी स्तरों पर राजनीतिक दलों की भागीदारी को औपचारिक मंजूरी दे दी जानी चाहिए।
v. समिति ने पंचायती राज संस्थाओं को करारोपण की शक्तियाँ एवं अपने संसाधन प्राप्त करने की शक्ति देने की भी अनुशंसा की।
vi. राज्य सरकारों के द्वारा पंचायती राज संस्थाओं के कार्यकरण में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
vii. पंचायतों में SC और ST को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित करने की सिफारिश की।
viii. इस समिति ने “पंचायती राज्य वित्त निगम” की स्थापना का भी सुझाव दिया।
ix. पंचायतों के विघटन के बाद चुनाव 6 महीने की अवधि में ही हो जाने चाहिए।
x. राज्य के निर्वाचन आयोग द्वारा पंचायतों के चुनाव आयोजित होने चाहिए।
xi. विकास पंचायत से अलग एक न्याय पंचायत की भी स्थापना होना चाहिए, जिसका अध्यक्ष एक न्यायाधीश हो।
xii. प्रत्येक राज्य में पंचायत राज विभाग की स्थापना की जानी चाहिए।
xiii. महिलाओं के लिए एक-तिहाई स्थान आरक्षित होने चाहिए।

नोट – अशोक मेहता समिति की अनुशंसा पर कर्नाटक एवं पश्चिमी बंगाल में चुनाव करवाए गए थे। 

2. दाँतेवाला समिति (1978)
- इस समिति ने खण्ड स्तर पर नियोजन की अनुशंसा की।
- गाँव जनपद एवं राष्ट्रीय स्तर पर नियोजन को अंतर्संबंधित करने पर बल दिया।

3. जी.वी. के. राव समिति (1985)
- योजना आयोग ने ग्रामीण विकास एवं गरीबी निवारण कार्यक्रम की समीक्षा के लिए 1985 में इस समिति की स्थापना की गई।
- पंचायती राज संस्थाओं के संदर्भ में जिला स्तर पर “जिला विकास आयुक्त” जैसा नया पद स्थापित करने की अनुशंसा की।
- इस समिति ने चार स्तर पर पंचायती राज संस्थाओं के गठन की सिफारिश की (i) राज्य परिषद्  (ii)जिला परिषद्  (iii) मंडल परिषद्  (iv) ग्राम पंचायत
- इस समिति ने पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल  5 वर्ष से बढाकर 8 वर्ष करने की सिफारिश की  

4. एल. एम. सिंघवी समिति (1986)
- राजीव गांधी सरकार ने लोकतंत्र एवं विकास के लिए पंचायतों के “पुनर्जीवन नामक” समिति की स्थापना की जिसके अध्यक्ष लक्ष्मीमल सिंघवी थे। जिसकी सिफारिशे निम्न है-
1. पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक रूप से मान्यता दी जानी चाहिए।
2. गाँवों के समूह के लिए न्याय पंचायतों की स्थापना की जाए।
3. गाँव की पंचायतों को ज्यादा आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराये जाने चाहिए।
4. ग्राम पंचायतों को ज्यादा व्यावहारिक बनाने के लिए गाँवों का पुनर्गठन किया जाना चाहिए एवं ग्राम सभा की महत्ता पर भी जोर दिया जाए।
5. पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव, उनके विघटन एवं उनके कार्यों से संबंधित जो भी विवाद उत्पन्न होते हैं, उनके निस्तारण के लिए न्यायिक अभिकरणों की स्थापना की जानी चाहिए।

5. थुंगन समिति (1988)
- थुंगन समिति ने भी पंचायती राज को संवैधानिक आधार देने का समर्थन किया परंतु थुंगन समिति के अनुसार भारत में पंचायतों का संबंध सीधा संघ सरकार से होना चाहिए अत: समिति ने पंचायती राज को राज्यों का विषय नहीं माना।

नोट :- सरकारिया आयोग ने भी पंचायती राज संस्थाओं को शक्तिशाली बनाने पर बल दिया था।

6. गाडगिल समिति (1988)
- पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया जाए तथा इनका कार्यकाल 5 वर्ष सुनिश्चित कर दिए जाने की सिफारिश की।
- इसके अतिरिक्त SC/ST एवं महिलाओं के लिए आरक्षण देने की सिफारिश की।

पंचायती राज संस्थाओं का संवैधानिकरण
- एल.एम. सिघंवी समिति की सिफारिश पर जुलाई 1989 राजीव गांधी सरकार ने 64 वाँ संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया तथा पारित करवाया लेकिन राज्यसभा में पारित होने से पहले ही लोकसभा भंग हो गई।
- पी.वी. नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व में कांग्रेस सरकार ने एक बार फिर पंचायती राज के संवैधानिकरण के मामले पर संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया।
- अंतत: यह विधेयक 73वें संविधान संशोधन अधिनियम 1992 के रूप में पारित हुआ और 24 अप्रैल, 1993 को अधिनियमित और प्रभावी हो गया ।
- 24 अप्रैल- पंचायती राज िदवस
- यह संविधान संशोधन लागू होने के बाद पहली बार मध्यप्रदेश राज्य में चुनाव हुए।

73 वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992
- पंचायती राज राज्य सूची का विषय है इसलिए एक वर्ष के भीतर सभी राज्यों को भी 73वें संविधान संशोधन के अनुरूप कानून बनाकर अपने राज्य में लागू करना था।
- 73 वें संविधान संशोधन के द्वारा संविधान में भाग-9 अनुच्छेद 243 से 243 O (कुल 16 अनुच्छेद) तथा 11वीं अनुसूची जोड़ी गई।
- राज्य सूची के 29 विषय पंचायतों को सौंपे गए।
- तीन स्तरीय पंचायती राज की स्थापना (ग्राम स्तर, खण्ड स्तर एवं जिला स्तर) की गई। 
- लेकिन 73 वें संविधान संशोधन के द्वारा यह प्रावधान भी किया गया है कि जिन राज्यों की आबादी 20 लाख से कम है वहाँ दो स्तर के पंचायती राज की स्थापना की जाएगी।
- अनुच्छेद 243 को 9वें भाग के रूप में जोड़ा गया तथा इसे पंचायते नाम से उल्लिखित किया गया।

अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ
1. ग्राम सभा [अनुच्छेद 243 (A)]
- अनुच्छेद 243(A) के तहत प्रत्येक ग्राम पंचायत क्षेत्र के लिए एक ग्राम सभा होगी जिसके सदस्य उस पंचायत की परिधि में आने वाले गाँव या गाँवों से संबंधित मतदाता सूची में सूचीबद्ध व्यक्ति होंगे। ग्राम सभा में ही प्रत्यक्ष जनतंत्र की क्रियांविति होती है।
- सरपंच इसकी अध्यक्षता करता है तथा 1 वर्ष में इसकी 2 बैठक अनिवार्य है।
- अनुच्छेद 243 (A) के अनुसार ग्रामसभा का कोरम 1/10 होता है।

नोट :- पंचायतों की सबसे छोटी इकाई ग्राम सभा होती है।

ग्राम सभा के कार्य
i. वार्षिक लेखा विवरण एवं लेखा परीक्षण प्रतिवेदन की जाँच करना।
ii. नए कर लगाने, वर्तमान करों में वृद्धि के प्रस्ताव पर विचार करना।
iii. योजनाओं, लाभार्थियों और स्थलों का चयन।
iv. सामुदायिक कल्याण के कार्यक्रमों के लिए स्वैच्छिक, श्रमिक या वस्तुओं के रूप में अंशदान देना।
v. विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में सहायता प्रदान करना।
vi. गाँव में वयस्क, शिक्षा एवं परिवार कल्याण कार्यक्रमों का संचालन।
vii. विगत वर्षों के लेखा परीक्षण की जाँच।
viii. पंचायतों की वर्तमान योजनाओं तथा समस्त प्रकार के क्रिया-कलाओं की समीक्षा करना।
ix. ग्राम पंचायतों के क्रिया-कलापों एवं आय-व्यय का स्पष्टीकरण मांगना।

2. पंचायतों का गठन [अनुच्छेद 243 (C)]
- अनुच्छेद 273 (C) के अनुसार प्रत्येक राज्य में ग्राम, मध्यवर्ती पंचायतों का गठन किया जाएगा।
- किसी राज्य की जनसंख्या 20 लाख से अधिक नहीं है तो वह मध्यवर्ती स्तर पर पंचायतों का गठन नहीं किया जा सकेगा।
- त्रिस्तरीय व्यवस्था में ग्राम स्तर पर “ग्राम पंचायत”, मध्यवर्ती या खण्ड पर “पंचायत समिति” तथा जिला स्तर पर “जिला परिषद्” का गठन किया जाएगा। 

3. चुनाव
- ग्राम, मध्यवर्ती व जिला स्तर पर पंचायत के सभी सदस्य प्रत्यक्ष मतदान द्वारा चुने जाऐंगे।
- ग्राम पंचायत के उपाध्यक्ष, पंचायत समिति के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष तथा जिला परिषद् के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चुनाव उनके सदस्य द्वारा किए जाने के कारण अप्रत्यक्ष रूप से होगा जबकि ग्राम पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव प्रत्यक्ष होगा या अप्रत्यक्ष इसका निर्धारण राज्य विधानमंडल द्वारा किया जाएगा।
- किसी भी पंचायती राज संस्था का चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष होगी।

4. सीटों का आरक्षण [अनुच्छेद 243 (D)]
- अनुच्छेद 243 (D) के तहत पंचायतों के चुनाव में महिलाओं व अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति को आरक्षण प्रदान किया गया।
- अन्य पिछड़े वर्ग को आरक्षण प्रदान करना, राज्य विधानमंडल की इच्छा पर है।
-अध्यक्ष पद हेतु महिलाओं व SC तथा ST को आरक्षण भी राज्य विधानमंडल की मर्जी पर है।
- 73 वें संविधान संशोधन के द्वारा महिलाओं को 1/3 आरक्षण प्रदान किया गया है।
- SC/ST को आरक्षण उनके जनसंख्या के अनुपात में प्रदान किया जाएगा।
- पंचायतों में आरक्षण अध्यक्ष पद एवं सदस्य दोनों के लिए होता हैं तथा आरक्षण पंचायत के तीनों स्तरों पर दिया जाएगा।

नोट :- अनुच्छेद 243(D) में स्पष्ट उल्लिखित है कि अनुसूचित जाति का आरक्षण का प्रावधान अरुणाचल प्रदेश में लागू नहीं होगा।

नोट :- अनुच्छेद 243(D) में यह भी उल्लिखित है कि यह आरक्षण अनुच्छेद 334 के अनुरूप लागू होगा।

नोट :- 110 वाँ संविधान संशोधन विधेयक द्वारा इस महिला आरक्षण को 1/3 से बढ़ाकर 1/2 करने का प्रस्तावित किया गया था लेकिन यह विधेयक 2009 में लोकसभा में रखा गया था जो कि समाप्त हो गया। 

5. पंचायतों का कार्यकाल [अनुच्छेद 243 (E)]
- पंचायतीराज संस्थाओं का कार्यकाल प्रथम बैठक के नियत तारीख से 5 वर्ष तक का होगा।
- यदि पंचायतों का विघटन निर्धारित समय के पहले हो तो पंचायतों के विघटन के 6 माह के भीतर चुनाव होने चाहिए तथा चुनाव बचे हुए समय के लिए होगा।
- यदि पंचायतों का कार्यकाल 6 महीने से कम बचा हो तो चुनाव समूचे 5 वर्षों के लिए होंगे।

6. सदस्यता से योग्यता [अनुच्छेद 243 (F)]
- अनुच्छेद 243 (F) के अनुसार इन संस्थाओं के उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष है।
- अनुच्छेद 243 (F) के तहत शेष योग्यताओं का निर्धारण की जिम्मेदारी राज्य विधानमंडल की होगी। 

7. पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार, उत्तरदायित्व [अनुच्छेद 
243(G)]
- अनुच्छेद 243 (G) के तहत इन संस्थाओं के लिए 29 कार्य है। इन 29 कार्यों का उल्लेख 11वीं अनुसूची में है। इनमें से कितने कार्य पंचायत राज संस्थाओं को देना है इसका निर्धारण राज्य विधानमंडल करता है।

8. पंचायतों की करारोपण की शक्ति (अनुच्छेद 243 (H)]
- अनुच्छेद 243 (H) के अनुसार पंचायतों द्वारा ‘कर’ अधिरोपित करने की शक्तियाँ और उनकी निधियों के बारे में प्रावधान किया गया है।

9. राज्य वित्त आयोग [अनुच्छेद 243 (I)]
- पंचायती राज संस्थाओं की वित्तीय स्थिति सुदृढ़ करने तथा पर्याप्त मात्रा में वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने हेतु सुझाव देने के लिए प्रत्येक राज्य के राज्यपाल द्वारा 5 साल में राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाएगा जो अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को देगा।
- इसके अध्यक्ष एवं सदस्यों की संख्या का उल्लेख संविधान में नहीं है।
- अनुच्छेद 243(I) के अनुसार इसके निम्नलिखित कार्य है-

a.       राज्यों के करों में से पंचायत राज संस्थाओं की हिस्सेदारी सुनिश्चित करना।
b.      राज्य की संचित निधि से इन संस्थाओं को दिए जाने वाले अनुदान के सन्दर्भ में अनुशंसा करना।
c.       इन संस्थाओं के वित्तीय सशक्तिकरण के लिए सुझाव देना।
d.      राज्यपाल द्वारा दिया गया कोई अन्य कार्य करना। 

10.  राज्य निर्वाचन आयोग [अनुच्छेद 243 (K)]
- प्रत्येक राज्य में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव निष्पक्ष व समय पर करवाने हेतु पृथक् से राज्य चुनाव आयोग की स्थापना की जाएगी जिसका प्रमुख ‘राज्य निर्वाचन आयुक्त’ होगा।
- राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी।

नोट :- 

1. अनुच्छेद 243 (L) के तहत इस अधिनियम के उपबंध इसी प्रकार संघ-राज्य क्षेत्रों में लागू होंगे जिस प्रकार अन्य राज्यों में लागू होते हैं।  राष्ट्रपति इन क्षेत्रों में अपवादों या संशोधनों के साथ लागू करने के लिए निर्देश दे सकता है। 
2. अनुच्छेद 243 (M) के अनुसार इस अधिनियम के प्रावधान निम्न राज्यों के क्षेत्रों में लागू नहीं होंगे-

i. नागालैण्ड, मेघालय, मिजोरम।
ii. मणिपुर राज्य में पर्वतीय क्षेत्र के अधीन जिला परिषदें

i. पश्चिमी बंगाल के दार्जिलिंग के ऐसे पर्वतीय क्षेत्र जिनमें दार्जिलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद् विद्यमान है।
ii. अरुणाचल प्रदेश में अनुच्छेद 243(D) जो अनुसूचित जाति के लिए पदों के आरक्षण से संबंधित है, में लागू नहीं होंगे।

3. अनुच्छेद 243 (O) के अनुसार संविधान में किसी बात के होते हुए भी अनुच्छेद 243(K) के अधीन बनाई गई किसी ऐसी विधि की विधि मान्यता जो निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन या स्थानों के आवंटन से संबंधित है किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं की जाएगी।  

73वें संविधान संशोधन अधिनियम 1992 के अनिवार्य एवं स्वैच्छिक प्रावधान 
1. अनिवार्य प्रावधान –
i. एक गाँव या गाँवों के समूह में ग्राम सभा का गठन।
ii. गाँव स्तर पर पंचायतों, माध्यमिक स्तर एवं जिला स्तर पर पंचायतों की स्थापना।
iii. तीनों स्तरों पर सभी सीटों के लिए प्रत्यक्ष चुनाव।
iv. माध्यमिक और जिला स्तर के प्रमुखों के लिए अप्रत्यक्ष चुनाव।
v. पंचायतों में चुनाव लड़ने के न्यूनतम आयु 21 वर्ष होनी चाहिए।
vi. सभी स्तरों पर SC/ST के लिए उनके जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण।
vii. सभी स्तरों पर एक-तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित।
viii. ग्राम पंचायतों के साथ ही मध्यवर्ती एवं जिला निकायों का कार्यकाल 5 वर्ष होना चाहिए तथा किसी पंचायत का कार्यकाल समाप्त होने के 6 माह की अवधि के भीतर नए चुनाव हो जाने चाहिए।
ix. पंचायती राज संस्थाओं में चुनाव कराने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना।
x. राज्य वित्त आयोग की स्थापना का प्रावधान ।

2. ऐच्छिक प्रावधान –
i. पंचायत के किसी भी स्तर पर पिछड़े वर्ग के लिए (सदस्य एवं प्रमुख दोनों के लिए) स्थानों का आरक्षण।
ii. पंचायत स्थानीय सरकार के रूप में कार्य कर सकें, इस हेतु इन्हें अधिकार एवं शक्तियाँ देना।
iii. विधानसभाओं एवं संसदीय निर्वाचन क्षेत्र विशेष के अंतर्गत आने वाली सभी पंचायती राज संस्थाओं में संसद और विधानमंडल के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना।
iv. पंचायतों को वित्तीय अधिकार देना अर्थात्, उन्हें उचित कर, पथकर और शुल्क आदि के आरोपण और संग्रहण हेतु अधिकृत करना।

पेसा अधिनियम

अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज का विस्तार अधिनियम 1996
[The Panchayats (Extension to the Scheduled Areas)]

- 1995 में पंचायती राज का अनुसूचित क्षेत्रों में भी विस्तार कर दिया गया।
- दिलीप सिंह भूरिया की अध्यक्षता में एक समिति (1996) ने यह अनुशंसा की, कि पंचायतों का विस्तार अनुसूचित क्षेत्रों में भी हाेना चाहिए। इन पंचायतों में ज्यादातर अनुसूचित जनजाति के लिए ही आरक्षित होने चाहिए।
- यह कानून उन स्थानों हेतु निर्मित किया गया है, जहाँ पंचायती राज अधिनियम 1993 लागू नहीं होता है।
- यह कानून 24 दिसम्बर, 1996 में लागू हुआ। यह मुख्यत: पाँचवी अनुसूची वाले क्षेत्रों के लिए है।
- वर्तमान में दस राज्यों में पाँचवी अनुसूची के क्षेत्र आते हैं- आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान।

अधिनियम का उद्देश्य
i. पंचायतों से जुड़े प्रावधानों को जरूरी संशोधनों के साथ अनुसूचित क्षेत्रांे में विस्तारित करना।
ii. जनजातिय जनसंख्या को स्वशासन प्रदान करना।
iii. पारम्परिक परिपाटियों की सुसुंगतता में उपयुक्त प्रशासनिक ढ़ाँचा विकसित करना।
iv. जनजातीय समुदायों की परम्पराओं एवं रिवाजों की सुरक्षा तथा संरक्षण करना।
v. सहयात्री लोकतंत्र के तहत ग्राम प्रशासन स्थापित करना।

अधिनियम की विशेषताएँ
i. इन क्षेत्रों के ग्राम सभा में कम से कम आधी सीटें जनजातीय के लिए आरक्षित होगी।
ii. खनिज के उत्पादन के लिए लाइसेंस देने से पहले इनकी अनुशंसा ली जाएगी।
iii. इन पंचायती संस्थाओं को ऋण व्यवस्था को नियंत्रित करने की शक्ति दी गई है।
iv. ग्रामीण बाजारों का विनियमन व भूमि बिक्री को रोकने के संदर्भ में इन संस्थाओं को विशेष अधिकार दिए गए है।
v. सभी स्थानीय संस्थाओं के अध्यक्ष का पद जनजातीय लोगों के लिए आरक्षित किया गया तथा भूमि अधिग्रहण व खनन के लिए सरकार द्वारा ग्राम सभा तथा पंचायतों से विचार विमर्श किया जाएगा। 

नोट – “पथ्थलगढ़ी” – पेशा एक्ट 1996 के प्रावधानों को उचित तरीके से लागू नहीं करने पर अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा एक्ट 1996 के प्रावधानों को उकेर कर पत्थर गाढ़ना पथ्थलगढ़ी कहलाता है। यह आंदोलन झारखंड से प्रारम्भ हुआ।

पंचायती राज का महत्त्व
i. पंचायती राज में पहली बार प्रत्यक्ष लोकतंत्र का प्रयोग किया है।
ii. इसमें शासक और जनता दोनों का संवाद सीधे रूप से होता है।
iii. इसमें प्रत्यक्ष लोकतंत्र का आधार खड़ा किया है।
iv. पंचायती राज के माध्यम से सामाजिक न्याय की स्थापना हुई है।
v. पंचायती राज के माध्यम से लैंगिक न्याय की स्थापना हुई है।
vi. पंचायती राज के माध्यम से सामाजिक एवं आर्थिक विकास अधिक प्रभावी हुआ है।

पंचायती राज की कमियाँ
i. भारत के ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्रालय द्वारा भारी मात्रा में वित्तीय सहायता प्रदान किए जाने के बावजूद अभी भी पंचायतों के समक्ष वित्तीय समस्या का अभाव है।
ii. पंचायतों के पास अपने पदाधिकारी भी नहीं है। सामान्यत: अखिल भारतीय सेवक या राज्यों के अधिकारी पंचायतों का प्रशासन करते हैं ।
iii. अधिकांश राज्यों ने अभी भी 29 विषय में वर्णित पंचायती राज की शक्तियों को उन्हें नहीं सौंपा है।
iv. अधिकांश राज्यों में अभी भी जिला नियोजन समिति का गठन नहीं हो सका।
v. राज्य नेतृत्व के द्वारा पंचायतों के स्थानीय नेतृत्व को उभरने को हतोत्साहित किया जाता है, जिससे राज्य और संघ के नेताओं का परंपरागत वर्चस्व कायम रहे।
vi. समाज अभी भी पितृसतात्मक तथा समाज में गरीबी, अभाव एवं निरक्षरता व्याप्त है। इसलिए भारत में पंचायतों के क्रियान्वयन में अनेक बाधाएँ है।

 

 

ग्राम सभा
- इसकी 4 बैठक होती है। (26 जनवरी, 1 मई, 15 अगस्त, 2 अक्टूबर) इन तिथियों के 15 दिन पहले या 15 दिन बाद यह बैठकें कभी भी हो सकती है।
- सरपंच इसकी अध्यक्षता करता है। उनकी अनुपस्थिति में उपसरपंच, अध्यक्षता करता है तथा दोनों की अनुपस्थिति में ग्राम सभा स्वयं अध्यक्षता का निर्धारण करती है।
- ग्राम सभा की गणपूर्ति 1/10 होती है।
- ग्राम सभा दो कार्य करती है।
i. ग्राम पंचायत द्वारा गत वर्ष किए गए कार्यों की जाँच करना।
ii. ग्राम पंचायत द्वारा आगामी वर्ष में किए जाने वाले कार्यों की रूपरेखा तैयार करना।

नोट
i. ग्रामसभा की बैठक में सदस्यों के अलावा प्रशासनिक अधिकारी, जनप्रतिनिधि तथा मीडिया के लोग भी इसमें भाग लेते हैं। इस कारण ग्राम सभा को सामाजिक अंकेक्षण कहा जाता है।
ii. 2 अक्टूबर,2009 को भीलवाड़ा भारत का पहला जिला बना जहाँ नरेगा कार्यों का सामाजिक अंकेक्षण किया गया था।
iii. ग्राम सभा की बैठक भारत में प्रत्यक्ष लोकतंत्र का उदाहरण है। ग्रामसभा को लघु संसद भी कहा जाता है।

ग्राम पंचायत
- इसमें सरपंच, उपसरपंच, वार्डपंच तथा ग्राम विकास अधिकारी (ग्राम सेवक) शामिल होते है।
- किसी गाँव की 3000 जनसंख्या पर ग्राम पंचायत का गठन होता है इस जनसंख्या पर 9 वार्ड होते हैं।

नोट  – 1 हजार जनसंख्या पर 2 अतिरिक्त वार्ड होते हैं।

- वार्ड का अध्यक्ष वार्ड पंच कहलाता है। सभी वार्ड पंच मिलकर अपने में से एक व्यक्ति को उपसरपंच चुनते है जबकि ग्राम पंचायत के सभी मतदाता प्रत्यक्ष रूप से सरपंच का चुनाव करते हैं।
- उपसरपंच के चुनाव में सरपंच भी वोट देता है और उसके एक मत का मूल्य दो होता है।
- प्रत्येक 15 दिन में कम से कम एक बार ग्राम पंचायत की बैठक अनिवार्य है।
- ग्राम पंचायत की गणपूर्ति (कोरम) 1/3 होती है।
- सरपंच एवं उपसरपंच के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाकर इन्हें हटाया जा सकता है। पहले 2 वर्ष तक अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता है। अविश्वास प्रस्ताव लाने हेतु 1/3 वार्ड पंचों का समर्थन आवश्यक है। प्रस्ताव को पारित करने के लिए 3/4 वार्ड पंचों का समर्थन जरूरी है। प्रस्ताव असफल हो जाने पर एक वर्ष तक नहीं लाया जा सकता है।
- वार्डपंच, उपसरपंच तथा सरपंच तीनों अपना इस्तीफा खण्ड विकास अधिकारी (BDO) को देते है।

पंचायत समिति
- इसमें प्रधान, उपप्रधान, निर्वाचित सदस्य, पदेन सदस्य तथा खण्ड विकास अधिकारी शामिल होते हैं।
-एक लाख की न्यूनतम जनसंख्या पर पंचायत समिति स्थापित होती है। इस जनसंख्या को 15 भागों में विभाजित किया गया। प्रत्येक 15000 अतिरिक्त जनसंख्या पर 2 अतिरिक्त भाग होते हैं।
- पंचायत समिति के निर्वाचित सदस्य अपने में से एक प्रधान और एक को उपप्रधान चुनते हैं।
- पंचायत समिति में आने वाली सभी ग्राम पंचायतों के सरपंच, संबंधित विधानसभा सदस्य तथा संबंधित लोकसभा सदस्य इसके पदेन सदस्य होते हैं।
- पदेन सदस्यों को भी मत देने का अधिकार है। लेकिन वे प्रधान एवं उपप्रधान के चुनाव तथा उनके विरुद्ध लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर मत नहीं देते हैं।
- पंचायत समिति की बैठक प्रत्येक माह में एक बार होनी अनिवार्य है।
- पंचायत समिति की गणपूर्ति 1/3 होती है।
- अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया ग्राम पंचायत के समान ही है।
- पंचायत समिति के सदस्य व उपप्रधान अपना इस्तीफा प्रधान को देते है जबकि प्रधान अपना इस्तीफा जिला प्रमुख को देते हैं।

जिला परिषद्
- इसमें जिला प्रमुख, उपजिला प्रमुख, निर्वाचित सदस्य, पदेन सदस्य तथा मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) शामिल होते हैं।
- किसी भी जिले की ग्रामीण जनसंख्या पर जिला परिषद् का गठन होता है। इस जनसंख्या को 17 भागों में विभाजित किया जाता है। 1 लाख अतिरिक्त जनसंख्या पर 2 अतिरिक्त भाग होते हैं।
- निर्वाचित सदस्य अपने में से जिला प्रमुख व उपजिला प्रमुख का चुनाव करते हैं।
- जिला परिषद् के अंतर्गत आने वाली सभी पंचायत समितियों के प्रधान, सभी ग्रामीण विधायक, संबंधित लोकसभा सदस्य तथा राज्यसभा का ऐसा सदस्य जिनका नाम ग्रामीण मतदाता के रूप में पंजीकृत है, इसके पदेन सदस्य होते हैं।
- पदने सदस्यों को भी मत देने का अधिकार होता है लेकिन जिला प्रमुख व उपजिला प्रमुख के चुनाव तथा अविश्वास प्रस्ताव में उन्हें मत देने का अधिकार नहीं होता है।
- जिला परिषद् की बैठक 3 माह में एक बार होनी जरूरी है।
- इसकी गणपूर्ति 1/3 होती है।
- अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया ग्राम पंचायत की भाँति है।
- जिला परिषद् के सदस्य व उपजिला प्रमुख अपना इस्तीफा जिला प्रमुख को देते है। जबकि जिला प्रमुख अपना इस्तीफा संभागीय आयुक्त को देते हैं। 

नोट –
i. पंचायत राज संस्थाओं के सभी जनप्रतिनिधियों को पीठासीन अधिकारी पद तथा संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ दिलाते हैं।  
ii. निर्वाचन 30 दिन के भीतर शपथ लेनी अनिवार्य है नहीं तो पद रिक्त माना जाएगा।
iii. दो बच्चों वाला नियम लागू करने वाला राजस्थान भारत का पहला राज्य है।

 

नगरीय स्वायत्त शासन/नगरपालिका
- 74 वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत संविधान में भाग 9A जोड़ा गया।
- भाग 9A में अनुच्छेद 243P से 243ZG तक नगरीय स्वशासन का उल्लेख है।
- इस संशोधन के तहत 12वीं अनुसूची जोड़ी गई जिसमें 18 विषय उल्लिखित है।
- 74 वाँ संविधान संशोधन 1 जून, 1993 को लागू हुआ। 
- 74वें संविधान संशोधन अधिनियम के अधीन नगर निकाय।

विवरण

नगर पंचायत

नगर परिषद्

नगर निगम

जनसंख्या

20 हजार से एक लाख

एक लाख से पाँच लाख

पाँच लाख से अधिक

अध्यक्ष

अध्यक्ष/सभापति

सभापति

महापौर/मेयर

उपाध्यक्ष

उपाध्यक्ष /उपसभापति

उपसभापति

उपमहापौर (डिप्टी मेयर)

वार्ड

पार्षद

पार्षद

पार्षद

नगरीय स्वशासन की विभिन्न संस्थाओं से संबंधित प्रावधान
- अनुच्छेद 243 (Q) में यह उल्लिखित है कि बड़े शहरों में नगर निगम, छोटे शहरों में नगर परिषद् तथा छोटे कस्बों या संक्रमणशील क्षेत्रों में नगर पंचायतों की स्थापना की जाएगी।
- नगर निगम, नगर परिषद् एवं नगर पंचायतों को सामूहिक रूप से नगरपालिका कहते हैं।
- किसी भी क्षेत्र में नगरपालिका की स्थापना जनसंख्या, जनसंख्या घनत्व, राजस्व की प्राप्ति, गैर-कृषि कार्य करने वाले लोग तथा उस क्षेत्र के महत्त्व के आधार पर की जाती है।

नोट – पंचायत राज संस्थाओं की स्थापना केवल जनसंख्या के आधार पर की जाती है। ग्राम पंचायतों का बजट पंचायत समिति द्वारा जबकि पंचायत समिति का बजट जिला परिषद् द्वारा पारित किया जाता है। पंचायत राज की तीनों संस्थाएँ आपस में जुड़ी होती है। इस कारण से वे तीनों संस्थाएँ पंचायत राज के तीन स्तर है। नगरपालिकाओं की  इन तीनों संस्थाओं का आपस में कोई संबंध नहीं है।  

अध्यक्ष का चुनाव तीनों संस्थाओं के अध्यक्षों का चुनाव प्रत्यक्ष होगा या अप्रत्यक्ष इसका निर्धारण राज्य विधानमंडल द्वारा किया जाएगा।

सदस्यों का निर्वाचन
- वयस्क मताधिकार के आधार पर वार्डों से प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचन किया जाता है।
- शहरी स्थानीय निकाय के प्रत्येक वार्ड से एक पार्षद चुना जाता है।

सदस्यों की संख्या
- नगरपालिका में सदस्यों की न्यूनतम संख्या 13 होगी।

योग्यताएँ
- चुनाव के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष हो।
- उसका नाम उस क्षेत्र की मतदाता सूची में पंजीकृत हो।
- निर्वाचन कानून के तहत निरर्ह घोषित नहीं किया गया हो।

उपाध्यक्ष का चुनाव
- निर्वाचित पार्षदों द्वारा अपने में से ही बहुमत से पारित कर अप्रत्यक्ष चुनाव द्वारा उपाध्यक्ष का चुनाव करेंगे।

कार्यकाल [अनुच्छेद 243 (U)]
- प्रत्येक नगरीय स्थानीय निकाय का कार्यकाल 5 वर्ष होगा। इन संस्थाओं की पहली बैठक से 5 वर्ष अवधी प्रारम्भ होती है। 

विघटन
- किसी निकाय के विघटन की स्थिति में विघटन की तिथि से 6 माह में चुनाव कराने आवश्यक है लेकिन केवल 6 माह की अवधि शेष है तो चुनाव सामान्य चुनाव के साथ होंगे।
- पुनर्गठित निकाय शेष अवधि के लिए ही कार्य करेगा।

आरक्षण [अनुच्छेद 243 (T)]
- सभी पदों पर सभी वर्गों में 1/3 स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित है जो क्रमिक रूप से रोटेशन द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।
- SC/ST के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्थान आरक्षित होंगे।

नोट –  राज्य सरकार ने पिछड़े वर्गों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्थान आरक्षित कर सकते हैं। अनुसूचित जाति का आरक्षण अरुणाचल प्रदेश में लागू नहीं होता है।

निरर्हताएं [अनुच्छेद 243 (V)]
- अनुच्छेद 243(V) के तहत चुने जाने पर या नगरपालिका के चुने हुए सदस्य निम्न स्थितियों में निरर्ह घोषित किए जा सकते हैं-
i. संबंधित राज्य के विधानमंडल के निर्वाचन के प्रयोजन हेतु प्रचलित किसी विधि के अंतर्गत।
ii. राज्य विधान द्वारा बनाए गई किसी विधि के अंतर्गत।

कार्य [अनुच्छेद 243 (W)]
- अनुच्छेद 243 (W) के अन्तर्गत इन संस्थाओं के लिए 18 कार्य निर्धारित किए गए है। इन 18 कार्यों में से कितने कार्य नगरपालिका को देने है। यह राज्यविधान मंडल पर निर्भर है।

नोट – 11वीं अनुसूची में 29 कार्य उल्लिखित है इनमें से 23 कार्य राजस्थान में पंचायती राज संस्थान को दिए जा चुके हैं।

राज्य निर्वाचन आयेाग [अनुच्छेद 243 (ZA)]
- अनुच्छेद 243 (ZA) के अन्तर्गत राज्य निर्वाचन आयोग नगरपालिकाओं के चुनाव करवाने तथा मतदाता सूचियों को तैयार करने का कार्य करता है। 

नोट – अनुच्छेद 243 (X) के तहत नगरपालिकाओं को भी कर लगाने का अधिकार है।

वित्त आयोग [अनुच्छेद 243 (Y)]
- अनुच्छेद 243 (Y) के अधीन गठित वित्त आयोग नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति का भी पुनर्विलोकन करेगा। 

जिला योजना समिति [अनुच्छेद 243 (ZD)]
- इसके तहत प्रत्येक राज्य में जिला स्तर पर जिले में पंचायतों और नगरपालिकाओं द्वारा तैयार की गई योजनाओं के समेकन करने और संपूर्ण जिले के लिए एक विकास योजना प्रारूप तैयार करने के लिए एक जिला योजना समिति का गठन किया जाएगा।
- अनुच्छेद 243 (ZD) के तहत इसकी संरचना का निर्धारण राज्य विधानमंडल द्वारा किया जाएगा।
- संविधान में जिला योजना समिति के सदस्य संख्या का उल्लेख नहीं है।

महानगर योजना समिति [अनुच्छेद 243 (ZE)]
- अनुच्छेद 243(ZE) के अनुसार महानगर क्षेत्र में सम्पूर्ण महानगर क्षेत्र के लिए विकास योजना प्रारूप तैयार करने के लिए एक महानगर योजना समिति का गठन किया जाएगा।