संघ एवं उसका  राज्य क्षेत्र

भारतीय संविधान के भाग – I में अनुच्छेद 01 से लेकर अनुच्छेद-04 तक भारतीय संघ तथा उसके राज्य क्षेत्रों के बारे में उपबन्ध किया गया है।
अनुच्छेद – 1 :- इसमें कहा गया है कि – “India that is Bharat shall be a Union of States”
अर्थात भारत अर्थात इंडिया राज्यों का संघ (युनियन) होगा।
-    इस प्रकार हमारे संविधान निर्माताओं ने भारतीय संघ के लिए फेडरेशन शब्द का प्रयोग नहीं किया है अपितु कनाडा की तरह “युनियन” शब्द का प्रयोग किया है जिसका अभिप्राय है कि – 
1.    भारतीय संघ राज्यों के बीच परस्पर समझौते का परिणाम नहीं है।
2.    भारत में राज्यों को संघ से अलग होने का अधिकार प्राप्त नहीं है।
3.     भारत में राज्यों की प्रकृति नश्वर या विनाशी है, इसलिए भारतीय संघ को विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ की संज्ञा दी जाती है।
4.    अपनी विशालता तथा सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधता के कारण भारत ने संघीय शासन प्रणाली का अनुसरण किया है एवं डॉ. भीमराव अम्बेडकर के द्वारा यूनियन शब्द की अनुशंसा की गई है।

अनुच्छेद – 01 (2) :- इसमें उल्लेख किया गया है कि राज्य तथा क्षेत्र वे होंगे जो कि संविधान की पहली अनुसूची मे निहित है।
अनुच्छेद 01(3) :-  इसके अनुसार भारतीय राज्य क्षेत्र में – 
•    राज्य के राज्य क्षेत्र
•    पहली अनुसूची में विध्यमान संघ राज्य क्षेत्र
•    ऐसे अन्य राज्य क्षेत्र जो कि अर्जित किए जाए वे सभी शामिल होगे।
वर्तमान में भारतीय राज्य क्षेत्र में 28 राज्य तथा 8 संघ शासित प्रदेश विद्यमान है।
अनुच्छेद – 2 :- इसके अन्तर्गत संसद को विधि के माध्यम से नए राज्यों को प्रवेश अथवा उनकी स्थापना की शक्ति प्रदान की गई है।
इसका अभिप्राय है कि संसद के पास दो तरह की शक्तियाँ विद्यमान है-
1.    नए राज्यों को संघ में शामिल करने की शक्ति – इसका सम्बन्ध उन राज्यों से है, जो कि पहले से ही स्थापित है, किन्तु भारतीय संघ में शामिल नहीं है।
2.    नए राज्यों को स्थापित करने की शक्ति- नए राज्यों को स्थापित करने की शक्ति का सम्बन्ध उन राज्यों से है जो अभी स्थापित नही है, किन्तु उन्हें भविष्य मे स्थापित किया जा सकता है।
अनुच्छेद – 03 :- इसके अन्तर्गत संसद को विधि के माध्यम से निम्न शक्तिया प्रदान की गई है।
•    किसी राज्य में से उसका राज्य क्षेत्र अलग करके अथवा दो या दो से अधिक राज्यों या राज्यों के भागो को मिलाकर नए राज्य का गठन करने।
•    किसी राज्य के क्षेत्र मे वृद्धि करने की शक्ति।
•    किसी राज्य की सीमाओं में परिवर्तन करने की शक्ति।
-    ऐसे किसी भी विधेयक को संसद में पेश करने के लिए राष्ट्रपति की अनुमति या सिफारिश आवश्यक होती है।
-    राष्ट्रपति के द्वारा विधेयक को प्रभावित होने वाले राज्य के विधानमंडलों को विचार-विमर्श के लिए भेजा जाएगा तथा इस सन्दर्भ में राष्ट्रपति के द्वारा एक निश्चत समय सीमा का निर्धारण किया जा सकता है।
-    संसद सम्बन्धित राज्य विधानमंडल के विचार को मानने के लिए बाध्य नहीं है।
-    यदि राज्य विधानमंडल के द्वारा निर्धारित समय सीमा के भीतर अपना विचार संसद को नही बताया जाता है तब भी विधेयक संसद में रखा जा सकेगा एवं संसद के द्वारा इस विधेयक को साधारण बहुमत के माध्यम से पारित करना होगा।
इस प्रकार संसद बिना राज्यों की स्वीकृति के उनके क्षेत्र, नाम तथा सीमाओं में परिवर्तन कर सकती है।
अनुच्छेद – 04 :- इसके अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया है कि नए राज्यों का प्रवेश या गठन, निर्माण क्षेत्र, नाम तथा सीमाओ में परिवर्तन को संविधान के अनुच्छेद 368 के अन्तर्गत संविधान संशोधन की श्रेणी में शामिल नहीं माना जाएगा अर्थात उपर्युक्त कार्यों का सम्पादन संसद के द्वारा साधारण बहुमत के माध्यम से किए जाते है तथा अनुच्छेद 368 के अन्तर्गत संविधान संशोधन की श्रेणी में साधारण बहुमत के माध्यम से किए गए कार्यो को नहीं रखा जाता है।


राज्यों का पुनर्गठन 

-    स्वतंत्रता के पश्चात् नए राज्यों के निर्माण के लिए किन मानदंडों को स्वीकारा जाए, यह विवाद का विषय था। जबकि भारत में भाषायी आधार पर राज्यों की मांग हुई।
 -    भारत में भाषायी आधार पर राज्य की मांग के लिए विशाल 'आंध्र आंदोलन' का आयोजन किया गया। इस आंदोलन के द्वारा 'तेलगू भाषा' के आधार पर एक नए राज्य 'आंध्र प्रदेश' की मांग की गई। 
पहले चरण में राज्यों का गठन: 
-    पहले चरण में नये राज्यों का गठन भाषायी आधार पर किया गया। 
-    इस आंदोलन के दौरान एक प्रसिद्ध गांधीवादी नेता पोट्टी श्रीरामुलु ने आंध्र प्रदेश राज्य के निर्माण के लिए अनशन किया एवं उनकी मृत्यु हो गई। 
    परिणाम स्वरूप व्यापक हिंसा हुई और संघ सरकार ने पहली बार भाषायी आधार पर एक नए राज्य का निर्माण कर दिया। 
    राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित आयोग व समितियाँ             

 

नाम

कब

अध्यक्ष सदस्य

सिफारिश

भाषायी प्रांत व आयोग

जून,1948

एस.के.धर

i. भाषाओं के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग ठुकरा दी।

ii राज्यों के पुनर्गठन प्रशासनिक सुविधा के अनुसार होना चाहिए।

भाषायी प्रांत समिति (जे.वी.पी.समिति)

दिसंबर, 1948

1. जवाहरलाल नेहरू

2. वल्लभभाई पटेल

3. पट्‌टाभिसीतारमैया

i औपचारिक रूप से इसने भी राज्यों के पुनर्गठन की मांग को अस्वीकार कर दिया।

राज्य पुनर्गठन आयोग

दिसंबर, 1953

1. फजल अली (अध्यक्ष)

2. के.एम.मणिक्कर

3. एच.एन.कुंजरू

i राज्यों का पुनर्गठन भाषा के आधार पर होना चाहिए लेकिन एक राज्य भाषा के सिद्धांत को अस्वीकार कर लिया। ii चार आयामी राज्यों (A,B,Cव D) के वर्गीकरण को समाप्त किया जाना चाहिए।

 

राज्य की क्र.स.

सन्

राज्य

15 वां

1960

गुजरात

16 वां

1963

नागालैंड

17 वां

1966

हरियाणा

18 वां

1971

हिमाचल प्रदेश

19 वां

1972

मणिपुर

20 वां

1972

त्रिपुरा

21 वां

1972

मेघालय

22 वां

1975

सिक्किम

Note:- 34 वां संविधान संसोधन अधिनियम 1974 के तहत सिक्किम भारत का एक सह- राज्य के रूप में तथा 35 वां संविधान संसोधन अधिनियम 1975 के तहत एक पूर्ण राज्य बना।

23 वां

1987

मिज़ोरम

24 वां

1987

अरुणाचल प्रदेश

25 वां

1987

गोवा

26 वां

2000

छत्तीसगढ़

27 वां

2000

उत्तराखण्ड

28 वां

2000

झारखण्ड

29 वां

2014

तेलंगाना

Note:- जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 के तहत जम्मू कश्मीर राज्य को जम्मू कश्मीर तथा लद्दाख नामक दो संघ शासित प्रदेशों में विभक्त कर दिया। अत: वर्तमान में भारत में 28 राज्य है।
 

संघ शासित क्षेत्र

सन्

अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह

1956

दिल्ली

1956

लक्षद्वीप

1956

दादरा व नगर हवेली

1961

दमन व दीव

1962

पुडुचेरी

1962

चंडीगढ़

1966

जम्मू कश्मीर

2019

लद्दाख

2019

Note:- 31 जनवरी, 2020 में दादरा व नगर हवेली तथा दमन व दीव संघ शासित क्षेत्रों को सम्मिलित कर दिया। अत: वर्तमान में भारत में 8 संघ शासित प्रदेश है।