रक्षा प्रौद्योगिकी

राष्ट्रीय हितों की रक्षा संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए प्रत्येक देश के पास एक उन्न्त सैन्य क्षमता के साथ-साथ विकसित रक्षा प्रौद्योगिकी का होना आवश्यक है। भारत तथा इसके प्रत्येक हिस्से की रक्षा  करने का उत्तरदायित्व भारत सरकार का है। भारत इस जिम्मेदारी को रक्षा मंत्रालय के माध्यम से बखूबी निभा रहा है।

भारतीय प्रतिरक्षा (Indian Defence) -
भारतीय प्रतिरक्षा प्रणाली का सर्वोच्च अधिकारी भारत का राष्ट्रपति होता है। सशस्त्र सेना का संपूर्ण प्रशासनिक नियंत्रण रक्षा मंत्रालय के पास होता है। भारतीय प्रतिरक्षा तंत्र को तीन सेवाओं में विभाजित किया गया है: -
1. थल सेना
2. वायु सेना
3. नौ सेना

भारतीय थल सेना (Indian Army) -
भारतीय सेना भारतीय क्षेत्र की रक्षा करती है तथा अन्य देश के हमले का प्रतिरोध करती है। चीन तथा यू.एस.ए. के बाद विश्व की तीसरी सबसे बड़ी सेना हैं। इसमें 1.3 मिलियन (लगभग 13 लाख) मानव शक्ति है। भारतीय थल सेना 6 संचालन (Operational) कमांड तथा एक प्रशिक्षण कमांड का संचालन करती है:-
1. उत्तरी कमांड - ऊधमपुर
2. पश्चिमी कमांड -चंडीगढ़
3. मध्य कमांड - लखनऊ
4. पूर्वी कमांड - कोलकाता
5. दक्षिणी कमांड-पुणे
6. दक्षिणी पश्चिमी कमांड - जयपुर
7. प्रशिक्षण कमांड - शिमला

भारतीय वायु सेना (Indian AirForce) -
भारतीय वायु सेना भारत के वायु क्षेत्र की रक्षा करती है तथा वायु मार्ग से किसी भी हमले या घुसपैठ को रोकती है। भारतीय वायु सेना में 1,27,000 से अधिक सक्रिय कर्मचारी है। इसकी 5 संचालन (Operational) कमांड, एक प्रशिक्षण कमांड तथा एक अनुरक्षण (Maintaining) कमांड है: -
1. पूर्वी कमांड - शिलांग
2. पश्चिमी कमांड - नई दिल्ली
3. मध्य कमांड- इलाहाबाद
4. दक्षिणी कमांड-तिरुवनंतपुरम
5. दक्षिणी-पश्चिमी कमांड - गांधी नगर
6. प्रशिक्षण कमांड - बंगलुरु
7. अनुरक्षण (Maintaining) कमांड-नागपुर

भारतीय नौ सेना- भारत के जल क्षेत्र,तटीय रेखा तथा विभिन्न समुद्रों तथा महासागरों में देश के भू-राजनीतिक हितों की रक्षा करती है। इसमें 58,000 से अधिक सक्रिय कर्मचारी है तथा इसे ब्ल्यू वॉटर नेवी (Blue Water Navy) का तमगा (Status) प्राप्त है। इसकी तीन ऑपरेशनल कमांड है -
1. पूर्वी कमांड - विशाखापत्तनम
2. पश्चिमी कमांड - मुंबई
3. दक्षिणी कमांड-कोच्चि

रक्षा मंत्रालय की संरचना-
इसके अंतर्गत 4 विभाग आते है-
1. रक्षा विभाग
2. रक्षा उत्पादन विभाग
3. रक्षा अनुसंधान तथा विकास विभाग
4. पूर्व सैनिक कल्याण विभाग

रक्षा विभाग (Department of Defence) -
समन्वित रक्षा स्टाफ तथा उनकी सेवाएं तथा विभिन्न अंत:सेवा (Inter Service) संगठन अपने रक्षा बजट, स्थापित क्षमताओं, रक्षा नीतियों तथा संसद से जुड़े मामलों के साथ रक्षा-विभाग के अंतर्गत आते हैं। इसके अलावा यह अन्य देशों के साथ रक्षा सहयोगी-गतिविधियों - की देखभाल तथा रक्षा संबंधी गतिविधियों के समन्वयन का कार्य भी करता है।

रक्षा उत्पादन विभाग (DOD)-
इसका प्रमुख एक सचिव होता है। यह रक्षा सामग्री उत्पादन, आयातित सामग्री तथा उपकरण का स्वदेशीकरण,आयुद्ध डिपो बोर्ड उत्पादन ईकाई विभाग तथा रक्षा नीति के कायों का संचालन व नियंत्रण करता है।

भूतपूर्व सैनिक कल्याण विभाग (DESW)-
इसका प्रमुख भी एक सचिव होता है। यह भूतपूर्व सैनिकों के पुनर्वास, कल्याण तथा पेंशन से जुड़े कायों को देखता है।

रक्षा अनुसंधान विकास संगठन (DRDO) -
इसका सचिव तथा प्रमुख रक्षा मंत्रालय का वैज्ञानिक सलाहकार होता है। इसकी स्थापना 1958 में की गई।

            DRDO प्रतिरक्षा तकनीकों के विकास के कार्य करता है, जिसमें विभिन्न क्षेत्र शामिल है; जैसे- वैमानिकी, आयुद्ध, इलेक्ट्रॉनिक्स, भूमि युद्ध तकनीक, जीव विज्ञान, पदार्थ, मिसाइल कृषि, संचार तंत्र तथा नौसेना प्रणाली आदि। हमारे प्रतिरक्षा की लगभग 50  अधिक प्रतिशत से अधिक सामग्री की आपूर्ति DRDO द्वारा होती है। DRDO का उद्देश्य भारत को विश्वस्तरीय विज्ञान व तकनीकी से संपन्न करता है। यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्द्धा प्रणाली तथा समाधान प्रदान कर भारतीय प्रतिरक्षा तंत्र को निर्णायक स्थिति प्रदान करता है। 1980 में DRDO का एक पृथक विभाग बनाया गया जो बाद में DRDO तथा इसकी 52 प्रयोगशालाओं/प्रतिष्ठानों का प्रशासनिक कार्य देखने लगा। DRDO का प्रथम प्रोजेक्ट 'इंडिगो' नाम 1960 में आरंभ हुआ। इसमें सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल (SAM) का निर्माण आरंभ हुआ। बाद में 'इंडिगो' प्रोजेक्ट को बंद कर दिया गया। यद्यपि यह सफल नहीं हुआ। इसके बाद कम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल के निर्माण हेतु प्रोजेक्ट 'डेविल' तथा प्रोजेक्ट 'वेलिएंट' (Valiant) आरंभ किए गए। IGMDP, 1983 से 2007 के मध्य चलने वाला भारतीय रक्षा मंत्रालय द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम था। इसे व्यापक दूरी तक मार करने वाली मिसाइल के विकास हेतु शुरू किया गया था। इसमें अग्नि मिसाइल, पृथ्वी बेलिस्टिक मिसाइल, त्रिशूल मिसाइल, आकाश मिसाइल तथा नाग मिसाइल शामिल है।

DRDO, भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा इस्तेमाल की जा रही तकनीकी के विकास हेतु भी जिम्मेदार है। इसके बावजूद प्रोजेक्ट में देरी तथा अधिक लागत के आरोप लगते थे, क्योंकि देश को अभी भी अधिकांश रक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है। आलोचनाओं से परे DRDO दो मुख्य कार्यक्रमों से भी संबंधित है:-
1. मिसाइल कार्यक्रम (Missile Programme)
2. हथियार कार्यक्रम (Weapons Programme)

प्रतिरक्षा अभिग्रहण परिषद् (DAC) -

सैन्य खरीद के संबंध में भ्रष्टाचार का सामना करने तथा निर्णय-निर्माण को त्वरित करने हेतु केंद्र सरकार ने वर्ष 2010 में, रक्षा मंत्री की अध्यक्षता में एक व्यापक प्रतिरक्षा अभिग्रहण परिषद् (DAC) के निर्माण का निर्णय किया। इसका उद्देश्य, क्षमताओं तथा निर्धारित समय सीमा को ध्यान में रखते हुए, आवंटित बजटीय स्रोतों के प्रभावी उपयोग के जरिए सशस्त्र बलों की स्वीकृत आवश्यकताओं की त्वरित खरीद सुनिश्चित करना है। DAC, दीर्घकालीन खरीद योजनाओं के आधार पर अभिग्रहण हेतु नीतिगत दिशा-निर्देश प्रदान करते हेतु उत्तरदायी है। यह सभी अभिग्रहणों को भी स्पष्ट या पूर्ण करता है, जिसमें आयतित व स्वदेश निर्मित या किसी विदेशी लाइसेंस के अन्तर्गत दोनों को शामिल किया जाता है।

हाल ही में DAC ने 9100 करोड़ मूल्य के उपकरण खरीद को स्वीकृति प्रदान की है। DAC ने अक्षय मिसाइल प्रणाली तथा IUWBI खरीद को स्वीकृति प्रदान की है।  

एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) -
भारत सरकार ने लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल के विकास में आत्मनिर्भर होने तथा उत्पादन के लिए सन् 1983 में IGMDP लॉन्च किया। भारतीय रक्षा मंत्रालय के प्रोग्राम के रूप में IGMDP ने 1983 से 2007 के मध्य तक लंबी दूरी की मिसाइल के विकास हेतु कार्य किया। इसमें मध्य से लंबी दूरी की मिसाइल-अग्नि (सतह से सतह), कम दूरी की मिसाइलें-पृथ्वी मिसाइल (सतह से सतह), आकाश मिसाइल ( सतह से वायु), त्रिशूल मिसाइल ( सतह से आकाश ) तथा नाग मिसाइल (एंटी टैंक) का विकास किया गया। DRDO ने इस कार्यक्रम का प्रबंधन, भारत की अन्य प्रयोगशालाओं तथा अनुसंधान केंद्रों की सहभागिता से किया। 7 मई,2008 को भारत ने इस रणनीतिक समन्वित निर्देशित मिसाइल कार्यक्रम के समापन की घोषणा कर दी।

इसके तहत पाँच मिसाइल प्रणालियों का निर्माण किया गया। यथा- पृथ्वी, अग्नि, त्रिशूल, नाग तथा आकाश।

मिसाइलों का वर्गीकरण-
1. प्रेक्षेपण मार्ग के आधार पर- मिसाइलों के वर्गीकरण के संदर्भ में यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। इसके अंतर्गत मिसाइलों को दो भागों में बाँटा जाता है-

A. क्रूज मिसाइल- यह मिसाइल पायलट रहित, स्वचालित तथा निर्देशित यान है। यह पृथ्वी सतह से बहुत कम ऊँचाई पर लंबी दूरी तक उड़ सकता है। इसी विशेषता के कारण यह शत्रु राडार की पकड़ में नहीं आता है। इसमें जेट इंजन का प्रयोग किया जाता है। यह वायुमंडलीय ऑक्सीजन का उपयोग करता है। दागने के पश्चात् इसकी दिशा परिवर्तित की जा सकती है। गति के आधार पर क्रूज मिसाइलों को तीन वर्गों – सब-सोनिक , सुपरसोनिक तथा हाइपरसोनिक में विभाजित किया जाता है।

B. बैलिस्टिक मिसाइल:- इस मिसाइल प्रणाली में रॉकेट इंजन आरंभिक चरण में प्रणोद करता है, इसके बाद मिसाइल का प्रक्षेपण मार्ग गुरूत्वाकर्षण द्वारा निर्धारित होता है। एक बार ईंधन समाप्त हो जाने के बाद इस मिसाइल के प्रक्षेपण मार्ग में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। इस मिसाइल का प्रक्षेपण मार्ग परवलयिक होता है। अधिकतम दूरी तय करने के लिए इसे  45° के कोण पर छोड़ा जाता है।  प्रेक्षेपण बिंदु से लेकर पेलोड के अंतिम हिस्से द्वारा प्रभावित किए गए बिंदु को ध्यान में रखते हुए बैलिस्टिक मिसाइलों को उनकी रेंज के आधार पर शॉर्ट रेंज, मीडियम रेंज , इंटरमीडियट रेंज और इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

पृथ्वी (Prithvi)
IGMDP प्रोग्राम के अंतर्गत सर्वप्रथम "पृथ्वी" मिसाइल का विकास किया गया। इससे पूर्व DRDO ने 'प्रोजेक्ट डेविल' के अंतर्गत सतह से हवा में मार करने वाली SA-2 की प्रति अभियांत्रिकी (Reverse Engineering) का प्रयास किया। भारत की तीनों सेनाओं, थल सेना. वायु सेना तथा नौसेना के उपयोग हेतु पृथ्वी मिसाइल के तीन संस्करणों का विकास किया गया। भारतीय सेना द्वारा इन संस्करणों को 1994 में अपनाया गया।

पृथ्वी-1:- एक चरण वाली तरल ईंधनआधारित मिसाइल है। इसकी मार क्षमता 150 किमी. तथा आयुद्ध ले। जाने की क्षमता 1000 किलोग्राम है। प्रहार: प्रहार DRDO द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित, ठोस-ईधन आधारित 'सतह से सतह पर मार करने वाली मध्यम दूरी की निर्देशित बैलिस्टिक मिसाइल है। यह रणनीतिक तथा सामारिक (Strategic and Tactical) दोनों प्रकार के लक्ष्यों को भेद सकती है। इसकी मार क्षमता 150 किमी. तथा सभी दिशाओं में मार करने में सक्षम है। 21 जुलाई, 2011 को समन्वित परीक्षण रेंज (ITR), चांदीपर सेवा सफल परीक्षण किया गया। इसे जल्दी ही पृथ्वी मिसाइल के स्थान प्रति स्थापित कर दिया जाएगा।

पृथ्वी-II: यह वायु सेना का संस्करण है। इसकी मारक क्षमता 250 किमी. है तथा विस्फोटक ले जाने की क्षमता 500 किलोग्राम इसमें तरल ईंधन से युक्त दो चरण हैं।

"प्रद्युम्न बैलिस्टिक मिसाइल' - यह पृथ्वी मिसाइल के वायु सेना संस्करण का विकसित किया गया 'एंटी बैलिस्टिक मिसाइल प्रणाली' है।

पृथ्वी-III: यह पृथ्वी मिसाइल का नौ सेना संस्करण है इसकी मारक क्षमता 350 किमी. तथा विस्फोटक वहन क्षमता 1000 किलोग्राम है।

भारतीय नौ सेना के लिए सतह से सतह या पोत से पोत पर वार करने में सक्षम पृथ्वी III मिसाइल का एक प्रकार' धनुष' विकसित किया गया है। यह 500 किलोग्राम से 1000 किलोग्राम तक पंरपरागत तथा परमाणु दोनों प्रकार के हथियार ले जा सकता है तथा 350 किमी. की दूरी तक लक्ष्य भेद सकता है। इसके भारतीय नौ सेना के पोत INS सुभद्रा से बंगाल की खाड़ी में ओडिशा तट के पास क्रमश: के सफल परीक्षण किए गए। दूरी के अनुसार 'धनुष मिसाइल का उपयोग एंटी-शिप हथियार के साथ-साथ भूमि पर स्थित लक्ष्यों को भेदने में भी किया जा सकता है।

त्रिशूल मिसाइल प्रणाली (TrishulMissile System) -
समन्वित निर्देशित मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IGMDP) के तहत भारत ने कम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली त्रिशूल मिसाइल का विकास किया। इसकी दूरी सीमा 9-12 किमी. तथा गोला-बारूद ले जाने की क्षमता 130 कि.ग्रा. तक है। 27 फरवरी, 2008 को त्रिशूल मिसाइल प्रोजेक्ट को आधिकारिक तौर पर बंद कर दिया गया।

नाग मिसाइल प्रणाली (Nag Missile System)- 
नाग स्वदेशी रूप से विकसित तीसरी पीढ़ी की 'दागो और भूल जाओ' (Fire and Forget) के सिद्धांत पर आधारित एंटी-टैंक मिसाइल है। नाग मिसाइल में तीन विभिन प्रकार के निर्देशों के संस्करण शामिल है- तार निर्देशित संस्करण (Wire Guided Version), इन्फ्रा-रेड संस्करण (Infra-red Version) तथा मिलीमेट्रिक वेब संस्करण (Millimetric Wave Version) इसकी क्षमता 42 किग्रा. है तथा 4-5 किमी. की दूरी तक लक्ष्य को भेद सकती है। पूर्णतया फाइबर ग्लास की संरचना के साथ प्रथम  मिसाइल के रूप में, भारत में मिसाइल प्रणाली के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस संस्करण को हेलिना (HELINA-Helicopter Nag) कहा जाता है। 8 अगस्त 2008 को राजस्थान के पोखरण में लगातार दूसरे दिन इसका सफल परीक्षण किया गया।

MPATGM-MAN PORTABLEANIT TANK GUIDED MISSILE
यह सेना के लिए प्रमुख अभिवर्धन (प्रोत्साहन) है। DRDO ने स्वदेश निर्मित हल्की, दागो और भूल जाओ, मानव वहनीय एंटी-टेक गाइडेड मिसाइल (MPATGM) का सफल परीक्षण किया है।
MPATGM के बारे में:-

• यह भारत द्वारा निर्मित स्वदेशी,तीसरी पीढ़ी की एंटी-टैक गाइडेड मिसाइल (ATGM) है। इसकी मारक क्षमता 2.5 किलोमीटर है और वजन लगभग 15.5 किलो है जिसे एक आदमी आसानी से संचालित कर सकता है। इसे कोई व्यक्ति कंधे पर रखकर भी दाग सकता है और दिन व रात्रि किसी भी समय इसे दागा जा सकता है। इसमें न्यूनतम पार्श्व केंद्र (lateral centre) तथा गुरुत्वाकर्षण ऑफसेट (Gravity offset) है। यह 'दागों और भूलों' के सिद्धान्त पर कार्य करती है। यह टैंक पर हमले की क्षमता के लिए जानी जाती है। यह स्थिर व गतिशील दोनों प्रकार के लक्ष्यों हेतु उपयोगी है और इसे भारतीय सेना (Infantry) तथा पैराशूट बटालियन में शामिल किया जाएगा।

अग्नि मिसाइल (AGNI Missile)
अग्नि मिसाइल, महाद्वीपीय रेंज तक की स्वदेशी रूप से विकसित बैलिस्टिक मिसाइल है। सतह से सतह पर मार करने वाली यह मिसाइल परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है। समन्वित निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) के अंतर्गत अग्नि श्रेणी की प्रथम मिसाइल का विकास तथा परीक्षण 1989 में किया गया-

1. अग्नि-I: इसका प्रथम परीक्षण 25 जनवरी 2002 को चांदीपुर ओडिशा में किया गया। यह 700-1200 किमी. की दूरी तक वार करने में सक्षम है। यह 1000 किग्रा. तक पारंपरिक या परमाणु हथियार 2.5 किमी. प्रति सेकण्ड की गति ले जा सकती है। इसमें कम दूरी के लिए एक चरण जबकि मध्यम दूरी के लिए दो चरण होते हैं।

2- अग्नि-II: यह 2000-2500 किमी. दूरी तक मार करने में सक्षम है। यह 3.9 किमी. प्रति सेकण्ड या 12 मैक की गति से पारंपरिक या परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है। इसके दोनों चरणों में ठोस प्रणोदक का प्रयोग किया गया है।

3. अग्नि-III: इसकी मारक क्षमता 2500-3500 किमी. है। यह 13 मैक की गति से 1.5 टन विस्फोटक ले जाने में सक्षम है। इसके भी दोनों चरणों में ठोस प्रणोदक का प्रयोग किया गया है।

4. अग्नि-IV: इसे पहले अग्नि-II प्राइम नाम से जाना जाता था। इसकी मारक क्षमता 3000-4000 किमी. है तथा यह 1.7 टन से अधिक विस्फोटक ले जाने में सक्षम है। इसमें भी दो चरणों वाले ठोस प्रणोदक का प्रयोग किया गया है।

5. अग्नि-V: यह ठोस प्रणोदक वाली अंतर्महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) है। इसकी मारक क्षमता 5000-8000 किमी. है। यह तीन मिश्रित चरण वाली मिसाइल है, जिसके तीसरे चरण में अर्द्ध-क्रायोजेनिक (Semi-cryogenic) इंजन का प्रयोग किया गया है। यह 1500 किग्रा. से अधिक का विस्फोटक 24 मैक की गति से ले जाने में सक्षम है।

आकाश मिसाइल प्रणाली (Akash Missile System)-
सतह से वायु में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए सतह से वायु में मार करने वाली आकाश मिसाइल का विकास समन्वित निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) के अंतर्गत किया गया। यह भारत सरकार का 20वीं शताब्दी का सर्वाधिक खर्चीला मिसाइल प्रोजेक्ट है। इसकी मारक क्षमता (Intercept Range) 30 किमी. है। इसका व्यास 35 सेमी. लंबाई 5.8 मीटर तथा वजन 720 किग्रा. है।

यह मिसाइल सुपरसोनिक गति से 2.5 मैक की गति से उड़ सकती है। यह 18 किमी. की ऊंचाई तक पहुंच सकती है।

आकाश प्रणाली कई लक्ष्यों को एक साथ निशाना बना सकती है। अन्य स्वदेशी मिसाइलों से परे इसमें रैमजेट प्रणोदन प्रणाली (Ramjet Propulsion System) का उपयोग किया गया है। जो इसकी गति में कमी किए बगैर इसको गमन करने में सक्षम बनाता है। इसमें बहुकार्यात्मक तथा बहुलक्ष्यों वाले Phased Arroy Fire Control Radar का उपयोग किया गया है, जिसे 'राजेंद्र' नाम से जाना जाता है। यह 80 किमी. की दूरी तक लक्ष्य की पहचान/निर्धारण कर सकती है।

त्वरित प्रतिक्रिया सतह से हवा में मारक मिसाइल (ORSAM) -
भारत ने ओडिशा तट से दूर एक परीक्षण रेंज से दो स्वदेशी रूप से विकसित त्वरित प्रतिक्रिया सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल (QRSAM) का सफल परीक्षण किया है।

इसे 'आकाश मिसाइल रक्षा प्रणाली' को प्रतिस्थापित करने के लिए विकसित किया गया है, और इसमें 360 डिग्री कवरेज है।

इसमें ठोस ईंधन प्रणोदक का उपयोग किया जाता है और कई लक्ष्यों को भेदने की क्षमता के साथ 25-30 किमी की सीमा तक मार करती है। यह निम्न ऊँचाई पर उड़ने वाली वस्तुओं को भेदने की क्षमता रखती है।

शौर्य मिसाइल प्रणाली (SMS)-
भारत की सुपरसोनिक शौर्य मिसाइल लघु दूरी की सतह से सतह पर मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल है जो भारतीय सेना द्वारा उपयोग की जाती है। इसका विकास DRDO द्वारा किया गया। यह 600 किमी. की दूरी तक 1 टन परंपरागत या परमाणु विस्फोटक ले जा सकती है। इस मिसाइल का प्रथम परीक्षण 2008 में किया गया। इस मिसाइल के द्वारा भारत की महत्वपूर्ण द्वितीय स्ट्राइक क्षमता (Second Strike Capability) प्राप्त हुई है। यह पानी के अंदर लांच होने वाली सागरिका मिसाइल का भूमि संस्करण है। यह 40 किमी. की ऊंचाई तक अंतरिक्ष/आकाश में जा सकती है तथा लंबी दूरी में 800 किमी. की दूरी तक ध्वनि की गति से 7.5 गुना की गति से वार करने में सक्षम है।

एंटीबैलिस्टिक मिसाइल (Anti-BallisticMissile system)
भारत में बैलिस्टिक मिसाइल के हमले से प्रतिरक्षा के लिए इंडियन बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस प्रोग्राम की एक महत्वपूर्ण पहल बहुस्तरीय बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस प्रणाली का विकास तथा उनकी तैनाती है।

पृथ्वी एयर डिफेंस (PAD)/प्रद्युम्न बैलिस्टिक मिसाइल -
आक्रमणकारी बैलिस्टिक मिसाइल को वातावरण से बाहर ही (Endo atmospheric) रोकने/नष्ट करने के लिए पृथ्वी एयर डिफेंस (PADI) का विकास किया गया। PAD एक एंटी बैलिस्टिक मिसाइल प्रणाली है। यह पृथ्वी मिसाइल पर आधारित दो चरण वाली मिसाइल है, जो अधिकतम 80 किमी. की ऊंचाई पर आने वाली मिसाइल को रोक सकती है। इसका प्रथम चरण ठोस ईधन से तथा द्वितीय चरण तरल ईंधन से बना होता है। PAD, 300-2000 किमी. वर्ग की बैलिस्टिक मिसाइल को 5 मैक की गति से रोकने में सक्षम है। इसमें 'एक्टिव फेज अरे रडार' (ActivePhaseArray Radar) होता है. जो 600 किमी. की परिधि में 200 लक्ष्यों की पहचान (Track) कर सकता है। PAD मिसाइल को 'प्रद्युम्न' भी कहा जाता है। इसकी अवरोधन क्षमता (Interception) का 50 किमी. से 80 किमी. तक बढ़ाया जा सकता है।

अश्विन मिसाइल -
एडवांस्ड एयर डिफेंस (AAD), एंटी बैलिस्टिक मिसाइल का निर्माण 30 किमी. की ऊंचाई पर वातावरण के भीतर (Endo-atmosphere) आक्रमणकारी मिसाइल को रोकने के लिए किया गया। AAD एक चरण वाली, ठोस ईंधन से युक्त मिसाइल है। इसका निर्देशन PAD की ही तरह होता है। इसमें Intertial नेविगेशन प्रणाली का प्रयोग किया गया है। इसमें भूमि पर स्थित रडार से मिडकोर्स (Midcourse) अपडेट होता है तथा टर्मिनल फेज पर सक्रिय रडार उपस्थित होता है।

निर्भय (Nirbhay) -
सभी मौसम में कार्य करने वाली लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल है, जिसकी लागत बहुत कम होती है। यह सबसोनिक गति (0.8 मैक) से परंपरागत व परमाणु दोनों प्रकार के हथियार ले जा सकती है। उसकी मारक क्षमता 1000 किमी., वजन 1500 किग्रा. तथा लंबाई मीटर है। इसका विकास 'एडवांस्ड सिस्टम्स लेबोरेटरी (ASL)' नारा किया गया है। इस मिसाइल का प्रयोग थल सेना, वायु सेना तथा नौ सेना तीनों सेनाओं द्वारा किया जाएगा।

ब्रह्मोस (BrahMos) -
1998 में सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल प्रणाली के डिजायन, विकास, निर्माण तथा बेचने के लिए भारत का रूस के साथ एक समझौता हुआ। 2006 में इस प्रणाली का सफलतापूर्वक विकास कर लिया गया। यह विश्व की सर्वाधिक तीव्र गति वाली क्रूज मिसाइल थी, जिसकी गति 2.5-2.8 मैक थी। गति के संदर्भ में यह अमेरिका की हारपून क्रूज मिसाइल से साढ़े तीन गुना अधिक थी।

            इस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का नाम ब्रह्मोस (Brahmos) रखा गया जिसे पनडुब्बी, जहाज, विमान या भूमि कहीं से भी दागा जा सकता है। यह भारत के DRDO तथा रूस के NPO Mashinostroeyenio का संयुक्त उपक्रम है। 'ब्रह्मोस' संक्षिप्त नाम दो नदियों के आधार पर रखा गया है- भारत की ब्रह्मपुत्र तथा रूस की मॉस्कोवा (Moskwa)। यह भूमि तथा जहाज से दागी जा सकने वाली मिसाइल 200 किग्रा. तक विस्फोटक ले जाने में सक्षम है। विमान से दागी जाने पर यह 300 किग्रा. तक विस्फोटक वहन कर सकती है। प्रारम्भ में निर्मित ब्रह्मोस की अधिकतम दूरी 290 किमी. थी।

            ब्रह्मोस में दो चरण वाली प्रणोदक प्रणाली का उपयोग किया गया है। इसके प्रारंभिक त्वरण के लिए ठोस प्रणोदक रॉकेट तथा सुपरसोनिक गति के लिए तरल ईंधन वाले रैमजेट का उपयोग किया गया है। दक्षता की दृष्टि से रॉकेट प्रणोदक के स्थान पर वायु से ऑक्सीजन ग्रहण करने वाला रैमजेट प्रणोदक प्रणाली ज्यादा दक्ष है। यह रॉकेट प्रणाली के बजाय इसे लंबी दूरी तय करने में सक्षम बनाती है। ब्रह्मोस II, प्रथम हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल जल्द ही तैयार होने वाली है।

भारत के 2016 में MTCR का सदस्य बनने के बाद, भारत और रूस 600 किमी. से अधिक दूरी तय करने वाली ब्रह्मोस मिसाइल को नई पीढ़ी के संयुक्त रूप से विकास पर विचार कर रहे हैं। यह अपने लक्ष्यों को सटीक रूप से  (Pinpoint Accurity) भेदने में सक्षम होगी।

मिशन शक्ति (Mission Shakti)

भारत ने अंतरिक्ष में अपनी प्रथम एंटी-सैटेलाइट (ASAT) मिसाइल का सफल परीक्षण कर लिया है। परीक्षण के दौरान निम्न पृथ्वी कक्षा में स्थित एक उपग्रह को मिसाइल के जरिए नष्ट किया गया। यह मिसाइल लक्ष्य को भेदने हेतु 300 किमी. की दूरी को कवर करती है।

            इस परीक्षण के साथ ही भारत एंटी सैटेलाइट क्षमता प्रदर्शन वाले कुछ चुनिंदा देशों के समूह में शामिल हो गया। इस समूह में यू.एन.ए.. रूस व चीन पहले से ही शामिल हैं। यह परीक्षण किसी भी प्रकार के अन्तर्राष्ट्रीय नियमों या संधि की शर्तों का उल्लंघन नहीं करता है और यह चीन द्वारा वर्ष 2007 में किए गए इसी प्रकार के परीक्षण ASAT से कम हानिकारक रहा है। उल्लेखनीय है कि, चीन द्वारा किए गए परीक्षण में व्यापक स्तर पर अंतरिक्ष में, उपग्रह का मलबा फैल गया जिससे अन्य उपग्रहों को भी खतरा उत्पन्न हो गया था। यह परीक्षण निचले वायुमण्डल में किया गया। यह मिसाइल प्रणाली वर्ष, 2016 से ही निर्माणाधीन थी। DRDO ने कहा कि 'मिशन शक्ति' नामक यह परीक्षण, APJ अब्दुल कलाम द्वीप, ओडिशा से किया गया और इस इंटरसेप्टर में दो ठोस रॉकेट बूस्टरों के साथ एक त्रि-स्तरीय ईंधन युक्त मिसाइल थी।"

सुदर्शन
यह नवीनतम हथियार प्रणाली है। इसमें 1000 पौंड गुरुत्व के बम को स्थापित किया जा सकता है। इसमें 10 मीटर तक Circular Error Probability (CEP) के लक्ष्य हेतु निर्देशित करने के लिए लेजर का उपयोग किया जाता है।

भारत का परमाणु परीक्षण (NuclearTestof India) -
जन 1946 को पंडित जवाहर लाल नेहरू यह घोषणा की  जिसके आधार पर भारत का प्रथम परमाणु परीक्षण 18 मई, 1974 को हुआ। तब से राजस्थान के पोखरण परमाणु परीक्षणों की श्रृंखला 1998 में आरंभ की गई। भारत के पास सैन्य के साथ-साथ नागरिक उपयोग के नाभिकीय कार्यक्रम है। इनमें 10 परमाणु रिएक्टर, यूरनियम खनिज (Mining) तथा पिसाई स्थल (Miling Sates) है। इसके अलावा देश में भारी जल उत्पादन क्षमता, एक यूरेनियम संवर्द्धन स्थल, इंधन संरचना सुविधा के साथ व्यापक प्रमाण अनसंधान क्षमता है। भारत के द्वारा लगातार किए गए परमाण परीक्षणों के कारण 1998 में भारत पर अमेरिका तथा जापान द्वारा अस्थायी आर्थिक प्रतिबंध आरोपित किए गए।

एटम बम की कमांड तथा नियंत्रण (CCAB)-
2003 में भारत की 'रणनीतिक न्युक्लियर कमांड' (Strategic Nuclear Command) की औपचारिक स्थापना की गई, जिसमें एक एयर फोर्स अधिकारी को कमांडर-इन-चीफ बनाया गया। SNC की संयुक्त सेवा, भारत के सभी परमाणु हथियारों, मिसाइलों तथा परमाणु सामग्री के संरक्षण का कार्य करती है। यह भारत की परमाणु नीति के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार है तथापि सिविल लीडरशिप के संदर्भ में सुरक्षा पर कैबिनेट समिति (CCS) एकमात्र आधिकारिक निकाय है जो किसी अन्य आक्रमण के विरुद्ध परमाणु हमले का आदेश दे सकता है। वास्तविकता में इस संदर्भ में प्रधानमंत्री आधिकारिक रूप से अंतिम निर्णायक होता है जो परमाणु हमले की अनुमति/आदेश देता है।

भारत (India) का नाभिकीय कार्यक्रम-

नाभिकीय कार्यक्रम की शुरूआत तिथि

1967

प्रथम नाभिकीय आयुध परीक्षण

18 मई, 1974 (स्माईलिंग बुद्धा)

प्रथम संलयन आयुध परीक्षण

13 मई, 1998

कुल परीक्षण

6

अधिकतम मिसाइल सीमा

35 किमी. (अग्नि - III)

विख्यात बम (Popular Bombs) -
विश्वभर में दो प्रकार के बमों का प्रयोग किया जाता हैं-परंपरागत हथियार (वॉरहेड) तथा नाभिकीय हथियार।

परमाणु बम (AtomicBombs) -
परमाणु बम विखण्डनीय बम होते हैं। ये अपनी ऊर्जा, भारी अस्थाय नाभिकों (रेडियोधर्मी तत्वों).जैसे-युरेनियम तथा प्लुटोनियम से प्राप्त करते हैं। ये रेडियोधर्मी नाभिक विखण्डन के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा व नागासाकी पर गिराए गए दो परमाणु बमों के नाम क्रमश: लिटल बॉय तथा फैट मैन थे। इनमें से एक यूरेनियम आधारित था और दूसरा प्लूटोनियम आधारित था। ये बमवर्षक विमान B-29 द्वारा गिराए गए थे।

हाइड्रोजन बम (Hydrogen Bombs)
हाइड्रोजन बम, हाइड्रोजन समस्थानिकों के संलयन अभिक्रिया के सिद्धांत पर कार्य करता है। यह परमाणु बम की तुलना में कहीं अधिक विस्फोटक होता है। संलयन अभिक्रिया आरंभ करने के लिए विखण्डन आवश्यक होता है क्योंकि दो हाइड्रोजन समस्थानिकों के संलयन हेतु लाखों डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है, जिसे विखण्डन द्वारा प्राप्त किया जाता है। मिसाइलों में हाइड्रोजन बम का इस्तेमाल करना आसान होता है क्योंकि हाइड्रोजन बम छोटे आकार के होते हैं।

थर्माबेरिक बम (Thermobari Bomb)
यू.एस.ए. ने अफगानिस्तान पर G-43 MOAB (Massive Ordnance Air Blast) बम गिराया जिसे "मदर ऑफ ऑल बम" के नाम से जाना जाता है। यह एक तीव्र उच्च तापमान युक्त विस्फोट तरंगें उत्पन्न करने के लिए आसपास की वायु से ऑक्सीजन का उपयोग करता है। ये विस्फोट तरंगे एक छोटे से स्थानबद्ध क्षेत्र में बहुत अधिक ऊर्जा उत्पन्न करती है। GBU-43 में 8,000 किलोग्राम विस्फोटक है। रूस के पास भी थर्मोबेरिक बम है, जिसे 'फादर ऑफ ऑल बम' के नाम से जाना जाता है और यह अमेरिका के बम से चार गुना अधिक शक्तिशाली है।

आधुनिक हथियार प्रणाली (Modern Weapon System) -
आधुनिक हथियार प्रणाली का विकास आसान कार्य नहीं है। इसके लिए अनुसंधान तथा विकास, परीक्षण,कर्मचारियों को प्रशिक्षण सर्विसिंग तथा मरम्मत में बड़े निवेश की आवश्यकता होती है। इसमें से प्रत्येक कार्य के लिए समय तथा धन की बड़ी मात्रा में निवेश की आवश्यकता होती है। जिसके लिए बाजार में उपलब्ध संसाधनों तथा कर्मियों में अनुभव विकसित करने के लिए 5 वर्ष के कार्यक्रम की जरूरत होती है। इस प्रक्रिया तथा प्रणाली का निर्माण कठिन कार्य है। इसलिए भारत अधिकांश हथियारों का आयात करता है। कुछ हथियारों का स्वयं उत्पादन करता है. कुछ का अन्य देशों के साथ संयुक्त उत्पादन करता है तथा अन्य को बाजार से खरीदता है। कुछ महत्वपूर्ण तथा प्रमुख हथियार, जिनका निर्माण DRDO तथा HAL ने किया है, निम्न है:-

ध्रुव हेलीकॉप्टर:- इसका निर्माण तथा विकास हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स मिलिटेड (HAL) द्वारा किया गया। बाद में इसका डिजायन जर्मनी की सहायता से तैयार किया गया। इसका निर्माण सैन्य तथा नागरिक दोनों प्रकार के कार्यों को पूरा करने के लिए किया गया। इनका सर्वप्रथम निर्यात नेपाल तथा इजराइल को किया गया। कई अन्य देशों द्वारा सैन्य तथा वाणिज्यिक उद्देश्यों हेत इसकी मांग की गई है।

हल्के युद्धक हेलीकॉप्टर:- इसका विकास हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के द्वारा किया जा रहा है और हाल ही में इसने अंतिम परीक्षण तथा उच्च-तुंगता परीक्षण (High altitude Trials) पूरा किया है। सभी परीक्षण पूरे हो जाने के बाद इसका उपयोग भारतीय थल सेना तथा वायु सेना द्वारा किया जाएगा। इसका उपयोग विभिन्न मिशनों में किया जा सकेगा, जैसे- मानव रहित डोन (UAV) से वाय क्षेत्र की सुरक्षा युद्ध क्षेत्र की निगरानी के साथ-साथ देश में विद्रोह की निगरानी, युद्ध में खोज कार्य तथा बचाव अभियानों में उपयोग आदि।

स्टॉलिन टूकः- अशोक लीलैण्ड द्वारा निर्मित स्टॉलिन ट्रक चरणबद्ध तरीके से शक्तियों का स्थान लेंगे। स्टॉलिन ट्रक भारतीय सशस्त्र सेना के परिवहन तथा माल दुलाई का प्रमुख आधार है। भारतीय सेना द्वारा 60,000 स्टॉलिन ट्रकों का उपयोग किया जा रहा है। 

पिनाक:- पिनाक भारत की मल्टी बैरल रॉकेट लांचर (MBRL) प्रणाली है, जिसे विटेज BN-21 ग्रेड MLKS की जगह प्रतिस्थापित किया गया था। यह 40 किमी. की दूरी तक मार करने वाली प्रणाली के रूप में 1998 में सेवा में लाई गई। इसमें 12 रॉकेट ट्रक पर स्थापित होते हैं। यह प्रणाली परमाणु, जैविक तथा रासायनिक हथियारों के प्रति सुरक्षा प्रदान करती है। हाल ही में DRDO ने पिनाक के उन्नत संस्करण पिनाक मार्क-II का सफल परीक्षण किया है जो मिसाइल-कम-मल्टी-बैरल रॉकेट लांचर सिस्टम है। इसके रॉकेट 65 किमी की दूरी तक मार करने में सक्षम है। इसमें 12 रॉकेटों को 44 सेकण्ड में दागा जा सकता है। इसका विकास DRDO द्वारा दुश्मन के सैन्य दल वाले क्षेत्रों उनके संचार केंद्रों, एयर टर्मिनल कॉम्पलैक्स गन/रॉकेट लोकेशन तथा बारूदी सुरंगों (Laying Mines) को नष्ट करने के लिए किया गया।

आई.एन.एस. अरिहंतः- यह परमाणु ऊर्जा चालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी है। अरिहंत वर्ग के पोत में भारत की स्वदेशी रूप से डिजाइन की गई तथा निर्मित परमाणु पनडुब्बी है। विश्व के केवल 4-5 देशों के पास परमाणु शक्ति चालित पनडुब्बी बनाने की तकनीक है। अरिहंत में चार ऊर्ध्वाधर प्रक्षेपण है, जो 12 छोटी k-15 मिसाइल या 4 बड़ी k-4 मिसाइल को ले जाने में सक्षम है। इस पनडुब्बी में USHUS सोनार (DRDO लैब द्वारा विकसित) को स्थापित किया जाएगा, जो दुश्मन की पनडुब्बी तारपीडो तथा सतह से वेनल (Venal) की खोज तथा उसे टैक करने का कार्य करता है, जिससे बाधाओं से बचा जा सकता है। इसके साथ इससे संचार Comimurlication) स्थापना भी की जा सकती है। इस सोनार-स्थापना का कार्य- 2023 तक किया जाएगा।

रूस्तम-II - यह मानवरहित युद्धक वायु वाहन (UAV) है जो मध्यम ऊंचाई तक लंबे समय तक रह सकता है। इसका विकास देश की तीनों सेनाओं के लिए बंगलुरु स्थित 'वैमानिकी विकास प्रतिष्ठान' (Aeronautical Development Establishment) द्वारा किया जा रहा है। इसका विकास भारत द्वारा अमेरिका प्रीडेटर (Predator) ड्रोन की तर्ज पर किया जा रहा है। इसमें लक्ष्य को भेदने के लिए वायु से जमीन पर मार करने वाली मिसाइल लगी होगी। इसमें विभिन्न उन्नत तकनीकों तथा प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाएगा, जिसमें डिजिटल फ्लाइट कंट्रोल, नेवीगेशन सिस्टम, स्वतः टेक-ऑफ तथा लैंडिंग की तकनीक होगी।

परमाणु पनडुब्बी (Nuclear Submarines) -

ये ऐसे पनडुब्बी हैं जो एक न्यूक्लियर रिएक्टर द्वारा उत्पन्न ऊर्जा से संचालित होती हैं। ये परंपरागत पनडुब्बी (जो डीजल-बिजली से चालित होती है) से बड़े पैमाने पर बेहतर प्रदर्शन करती है। परमाणु शक्ति द्वारा संचालन में वायु की आवश्यकता नहीं होती है जिससे पनडुब्बी को बार-बार सतह पर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती जबकि परंपरागत पनडुब्बी को सतह पर जाने की आवश्यकता पड़ती है। न्यक्लियर रिएक्टर बड़ी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न करता है, जो परमाणु पनडुब्बी को लंबे समय तक तेज गति से संचालन में सक्षम बनाता है। पुन: इंधन भरने की आवश्यकता किसी भी पनडुब्बी की सीमा का निर्धारण कर देती है। जिससे उसे पुनः ईंधन भरने के लिए निर्धारित स्थल पर आना पड़ता है, परंतु परमाणु पनडुब्बी में ऐसी कोई समस्या नहीं होती और वह 25 वर्ष तक लगातार बिना ईंधन भरवाए कार्यरत रह सकती है।

युद्धपोत
पनडुब्बी के अलावा भारत डिस्ट्रॉयर जैसे-पोत उन्नत पेट्रोल क्राफ्ट तथा युद्धपोत का भी प्रबंधन करता है। ये न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल तथा क्रूज मिसाइल दागने में भी सक्षम होते हैं।

डिस्ट्रॉयर (Destroyer)
समुद्र की सतह पर सबसे बड़ा लड़ाकू पोत डिस्ट्रॉयर है। उनके आकार तथा क्षमता में धीरे-धीरे क्रमश: वृद्धि की गई जो वर्तमान में 500-1000 टन है। सामान्यत: डिस्ट्रॉयर से आशय एक जहाज से है जिसमें सेंसर (परिष्कृत Phased Array Radar), युद्ध प्रणाली तथा हथियार लगे होते है, जिनका उपयोग युद्ध-परिस्थितियों में कर सकते है। विश्व के बहुत से देशों की नौसेनाएं युद्धपोत (Frigates) जैसे जहाज बनाती हैं जिन्हें आकार व क्षमता के अनुसार डिस्ट्रॉयर कहा जाता है।

युद्धपोत (Frigates)
यह मध्यम आकार का (2000-5000 टन) समुद्र की सतह पर लड़ने वाला पोत होता है। इसका उपयोग विशेष रूप से एंटी-सबमेरिन (Anti-submarine) युद्धक तथा एंटी-एयर वारफेयर (Anti-air warfare) के रूप में किया जाता है। यह लगभग डिस्ट्रॉयर की तरह की क्षमताएं परंतु डिस्ट्रॉयर से थोड़ी कम क्षमताएं रखता है। तथापि यह तुलनात्मक रूप से परिष्कृत प्लेटफॉर्म होता है और बहुत महंगा होता है। युद्धपोत प्रायः सबसे छोटा, सतह पर लड़ने वाला पोत होता है जिसे खतरनाक परिस्थितियों में 'ब्ल्यू वॉटर मिशन' (Blue Water Mission) में भेजा जा सकता है।

विमान वाहक पोत (Aircraft Carrier)
यह समुद्र में एयरबेस की सुविधा उपलब्ध कराने वाला युद्धक जहाज होता है। इसमें हवाई जहाज को ड़ान भरने के लिए आवश्यक इन्फ्रास्ट्रक्चर होता है। यह हवाई जहाज को ले जाने, युद्धक उपकरणों से लैस करने, तैनात करने तथा रिकवरी की सुविधा उपलब्ध कराता है। जहाजों के बेड़े प्रमुख जहाज होने के कारण यह नौसेना को विश्वस्तरीय वायु शक्ति से संपन्न करता है जिसमें किसी क्षेत्र के स्थानीय प्लेटफॉर्म पर निर्भर हुए बिना महत्वपूर्ण ऑपरेशन को सफल किया जा सकता है। इनको बनाने में अत्यधिक खर्च होता है 20वीं शताब्दी में लकड़ी के पोत बनने आरंभ हुए थे इसके बाद इनका लगातार विकास किया जाता रहा है। इसी दौरान बहुसंख्यक लड़ाकू विमान, मारक क्षमता युक्त हवाई जहाज, हेलीकॉप्टर तथा अन्य प्रकार के हवाई जहाज को ले जाने वाले परमाणु शक्ति संपन्न पोतों में गुब्बारे तैनात किए जाते थे।

INS विक्रमादित्य (INS Vikramaditya): क्षमता 45400 टन, उन्नत किव क्लास (Kiev Class) का पोत है। 20 जनवरी,2004 को रूस के साथ एडमिरल गॉर्शकोव को उन्नत करके भारत को बेचने का समझौता हुआ। 16 नवंबर, 2013 को यह पोत INS विक्रमादित्य के नाम से भारतीय नौसेना में शामिल हुआ। हाल ही में रॉयल नेवी के HMS Hermes के नाम से जाना जाने वाला पोत 'INS विराट' (INS Virat) सेवानिवृत्त हो गया। वर्तमान में भारत के पास केवल एक विमानवाहक पोत है।

            भारत ने वर्ष 2009 में, 40,000 टन वजनी, 260 मीटर लंबे, विक्रांत क्लास वायुयान वाहक पोत्त का निर्माण आरभ किया यह नया पोत्त भारत निर्मित हेलीकॉप्टर ध्रुव के साथ MiG-29K तथा नेवल तेजस वायुयान को धारण करने में सक्षम होगा। एक द्वितीय विक्रांत क्लास के पोत, INS विशाल के निर्माण की योजना भी है जो 65,000 टन वजनी होगा और यह पूर्णत: नाभिकीय ऊर्जा से संचालित होगा, इसमें भारी वायुयानों तथा मानवरहित युद्धक विमानों की लांचिग तथा रिकवरी हेतु CATOBAR प्रणाली होगी। अप्रैल, 2015 तक यह प्रोजेक्ट डिजाइन के चरण में था

आईएनएस (RecentINS innews)आई.एन.एस. अस्त्रधारिणी
(INS.Astradharini) गह भारतीय नौसेना द्वारा निर्मित 'प्रथम स्वदेशी युद्धपोत' है। यह एक टारपीड़ो लांच तथा रिकवरी वेसल (TLRV) है। इसने आई.एन. एस. अस्त्रवाहिनी को प्रतिस्थापित किया जिसे जुलाई, 2015 में सेवानिवृत्त कर दिया गया था।

इसकी प्रमुख विशेषताएं-
• इसका डिजायन 'नेवल साइंस एण्ड टेक्नोलॉजिकल लेबोरेटरी (NSTL), आई.आई.टी. खड़गपुर एवं शॉर्ट शिपयार्ड द्वारा किया गया।
• यह एक 50 एम केटामरन हुल पोत (Catamaran Hull Vessel) है जो ऊर्जा की जरूरतों को कम कर देता है ताकि जहाज 12 नॉट (Knots) की गति प्राप्त कर सके।
• यह दो अधिकारी, 27 नाविक तथा 13 वैज्ञानिकों को आसानी से ले जा सकती है।

INS करंज (स्कॉपीयन श्रेणी की पनडुब्बी)-
INS करंज भारतीय नौसेना के कार्यक्रम प्रोजेक्ट 75 के तहत 6 स्कॉर्पियन श्रेणी की पनडुब्बियों में से तीसरी है। प्रथम , INS कलवरी (टाइगर शॉर्क के बाद दिया गया नाम) की नियुक्ति दिसंबर, 2017 में की गई। द्वितीय, INS खांदेरी समुद्री परीक्षणों से गुजर रही है। बची हुई तीन पनडुब्बियां, वेला, वागीर तथा वागशीर तैयार के विभिन्न चरणों में है। स्कॉर्पियन पनडुब्बी विभिन्न प्रकार के मिशन पूरे करने में सक्षम है, जैसे-एंटी-सर्फेस हथियार, एंटी-सबमरीन हथियार, इंटेलीजेंस संग्रहण, माइन लेयरिंग तथा क्षेत्र की निगरानी।

INS अरिदमन (अरिहंत-क्लास पनडुब्बी)-
अरिदमन, द्वितीय अरिहंत-वर्ग की नाभिकीय ऊर्जा संचालित बैलेस्टिक मिसाइल पनडुब्बी है। यह विशाखापत्तनम स्थित प्रोजेक्ट ATV (Advanced Technology Vessel) के अन्तर्गत स्वदेश-निर्मित, नाभिकीय ऊर्जा संचालित बैलेस्टिक मिसाइल सबमरीन है और एक दाषित जल रिएक्टर से ऊर्जा प्राप्त करती है। INS अरिहंत तथा INS अरिदमन को सेवा में लाने के बाद भारत यू.एस.ए.. यू.के., चीन, रूस व फ्रास के बाद विश्व का छठा देश बन गया है, जिसके पास नाभिकीय ऊर्जा संचालित पनडुब्बी है।

INS किल्तान (प्रोजेक्ट 28)-
 INS किल्तान, एक कमोर्टा-वर्ग की एंटी सबमरीन वारफेयर (ASW) स्टील्थ युद्धपोत है, जिसे हाल ही में भारतीय नौसेना द्वारा सेवा में लाया गया है और नौसेना के प्रोजेक्ट P-28 के अन्तर्गत निर्मित किया गया है। यह भारत का प्रथम प्रमुख युद्धपोत है जिसका विकास स्टील्थ विशेषताओं के लिए कार्बन-मिश्रित पदार्थ से किया गया है। इसका डिजाइन नौसेना डिजाइन निदेशालय द्वारा किया गया और इसका निर्माण गार्डेन रिच शिपबिल्डरस एण्ड इंजीनियस लिमिटेड, कोलकाता द्वारा किया गया।

विमानों की विभिन्न पीढ़ियां - (Different Generation of Aircraft)
प्रथम पीढ़ी -
 इनकी विशेषताएं सबसोनिक गति, सीधे पंख, रडार से रहित, प्राथमिक हथियार के रूप में मशीन गन तथा अनिर्देशित बम हैं। उदाहरण

द्वितीय पीढ़ी- (1950 के मध्य से 1960 के प्रारंभ तक): उदाहरण: मिग-21, Su-9 तथा F-106, मिग-19 तथा सुखोई-7 आदि। इनमें बनिंग टबोजेट इंजन लगे होते थे जो इन्हें लड़ाई के एक स्तर तक साउंड बैरियर (Sound Barrier) को दूर करने में सक्षम बनाते हैं। इनमें एयरोड़ानेमिक्स इंजन के द्वारा सुपरसोनिक गति को प्राप्त करना तथा बनाए रखना संभव होता है।

तीसरी पीढ़ी:- उदाहरण: मिराज F1, मिग-23, मिग-25, F-4 तथा F-5 थे। इस पीढ़ी में तकनीकियों तथा एयरोडाइनेमिक्स विशेषताओं से युक्त होते हैं। इसके साथ ये वायु निर्देशित मिसाइल, एयर-टू-एयर मिसाइल तथा रडार प्रणाली से युक्त होते हैं। हथियारों की सटीकता में कमी तथा विद्युत प्रतिमापकों की कमी (Electronics Countermeasure) के कारण इनके द्वारा हवा में जीत प्राप्त करना आसान नहीं होता। विद्युत प्रतिमापक वे होते हैं, जो Trick Detection System से युक्त होते हैं।

चौथी पीढ़ी के विमान - उदाहरण मिग-29, मिग-27, मिराज-2000,Su-27,F-16,F-181 इसमें प्राय: 1980 से वर्तमान तक के विमानों को शामिल किया जाता है तथा इनमें 1970 की डिजायन अवधारणा प्रयुक्त होती है। ये लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल से युक्त पुराने तरीके से आमने सामने की लड़ाई के लिए प्रयुक्त होते थे। ये उम्मीद के अनुसार प्रभावशाली नहीं थे।

चौथी पीढ़ी - जेट फाइटर को Fly-by-wire (FBW) के रूप में परिभाषित किया जाता था क्योंकि उड़ान का नियंत्रण तार (Wire) के द्वारा पारेषित विद्युत संकेतों से किया जाता था। FBW में पायलट के बिना ऑपरेट करने के लिए विमान को कम्प्यूटर द्वारा स्वतः संकेत भेजे जा सकते हैं, जो ठीक उसी प्रकार की प्रणाली है, जिसमें विमान के स्थायीकरण में तथा विमान की क्षमता से परे ऑपरेशन को रोकने में मदद मिलती है। थ्रष्ट वेक्टरिंग तकनीक सोवियत फाइटर्स में फाइटर की क्षमता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की गई। थ्रष्ट वेक्टर तकनीक' (TVT) किसी विमान या रॉकेट की क्षमता को प्रदर्शित करती है जिसमें कोणीय संवेग के अनुसार इसके इंजन/मोटर से दिशा का परिवर्तन तथा नियंत्रण किया जा सकता है। रॉकेट या बैलिस्टिक मिसाइल जो वातावरण से बाहर गमन करती हैं, जिससे इनमें एयरोडाइनेमिक्स कंट्रोल प्रणाली प्रभावी नहीं होती इसलिए इनके नियंत्रण के लिए TVT प्रणाली उपयुक्त होती है।

इस पीढ़ी में Active Electronically Scanned Array (AESA) रडार लगे होते हैं जो विमान को युद्ध में पासा पलटने में सक्षम बनाते हैं। इस वर्ग में रडार की तरंगों को सोखने वाला पदार्थ, थ्रष्ट वेक्टर कंट्रोल इंजन, अधिक घातक हथियार ले जाने की क्षमता ( सुपर क्रूज) आदि विशेषताएं होती हैं। Low Observable तकनीक के रूप में स्टील्थ तकनीक तथा निष्क्रिम विद्युत प्रतिमापक (Passive Electronic Countermeasures) इन विमानों, मिसाइलों तथा कर्मचारियों की क्षमता को बढ़ा देते हैं क्योंकि इनके कारण ये रडार, इन्फ्रारेड, सोनार तथा अन्य डिटेक्शन प्रणालियों की पकड़ में नहीं आते हैं। कुछ विनिर्मिताओं ने नए प्लेटफॉर्म डिजायन किए हैं, जैसे-यूरोफाइटर टारफून।

            'उन्नत कम्प्यूटर प्रोद्योगिकी' तथा 'डाटा लिंक' भी इस पीढ़ी के फाइटर को युद्ध क्षेत्र के केंद्रीय नेटवर्क से समन्वित करने में सक्षम बनाते हैं, जिसमें लड़ाकू विमान बहुकार्यात्मक मिशनों में कार्य करने में सक्षम होते हैं। उदाहरण के लिए AESA रडार नियंत्रण कार्यों के साथ लड़ाकू विमान को लिमिटेड एयरबोर्न अरली वॉर्निंग सिस्टम' (Air bome Early warning System) से युक्त करते हैं।

पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानः- इस श्रेणी में 2015 तक के सर्वाधिक उन्नत जेट फाइटर शामिल होते हैं। पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की कुछ विशेषताएं (Stealth technology) Low Probability of Intercept Radar (LPIR), High Performance Airframes, Advanced Avionics Features and Highly Integrated Computer System से युक्त कर दिया जाता है।

            F-22 रेप्टर (F-22 Raptor) पांचवीं पीढ़ी का तैयार लडाकू विमान है। यह अमेरिका की वायुसेना में 2005 में सेवा में आया। लॉकहीड मार्टिन अमेरिकन F-35 Lightining II, Sukhoi PAK FA, Chengdu-20  जैसे विमान अभी परीक्षण तथा विकास के दौर से गुजर रहे हैं।

भारत के प्रमुख लड़ाकू विमान (Fighter Planes of India)
इनका निर्माण मुख्यतः अन्य दुश्मन के विमानों, बमवर्षक विमानों तथा हवाई हमलों के विरुद्ध वायु-से-वायु में युद्ध के लिए किया गया, जहां इनका मुख्य उद्देश्य जमीन पर स्थित लक्ष्यों पर हमला करने का होता है। इनकी मुख्य विशेषताएं गति, सक्रियता तथा अन्य विमानों की तुलना में आकार का छोटा होना है। कुछ का निर्माण दो उद्देश्यों वाले फाइटर बमवर्षक के रूप में होता है। कुछ महत्वपूर्ण लड़ाकू विमान निम्न हैं:-

1. सुखोई Su-30MKI:- भारतीय वायु सेना के लिए हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के लाइसेंस के अंतर्गत रूस द्वारा निर्मित लंबी दूरी का लड़ाकू विमान है। यह एक अत्यधिक गतिशील लड़ाकू विमान है। यह बहुत सक्रियता से अपनी गति व दिशा बदल सकता है जो शुद्ध एयरोडाइनेमिक्स के द्वारा संभव नहीं है। इसमें दो इंजन होते हैं जो इसे अधिकतम 2 मैक की गति प्रदान कर सकते हैं। इसके नवीनतम संस्करणों को ब्रह्मोस तथा निर्भय क्रूज मिसाइल से लैस किया गया है।

2. मिराज 2000:- एक इंजन आधारित चौथी पीढ़ी का फ्रांस द्वारा निर्मित मल्टी रोल यद्धक विमान है। भारतीय वायुसेना ने इसका उपयोग पाकिस्तान के खिलाफ कारगिल युद्ध में किया। यह क्रूज मिसाइलों को ले जाने तथा दागने में सक्षम है। यह तरल ईंधन आधारित रैमजेट इंजन से युक्त है। इसकी अधिकतम दूरी 300 किमी. तथा अधिकतम गति 2300  किमी. प्रति घण्टा की होती है।

3. मिग 21: यह रूस द्वारा निर्मित एक सुपरसोनिक जेट फाइटर विमान हैं। 1964 में मिग 21 पहला सुपरसोनिक जेट फाइटर था, जो भारतीय वायु सेना में शामिल हुआ। मिग 21 की उच्चतम गति 2,175 किमी. प्रति घण्टा (मैक 20) है।

4. मिग-27:- यह एक विभिन्न ज्यामिति ग्राउण्ट-अटैक (Variable Geometry Ground Attack) विमान है, जो मूल रूप से सोवियत यूनियन में Mikoyan Design Buearu द्वारा और बाद में भारत में लाइसेंस मिलने से हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स के द्वारा निर्मित किया गया। वर्तमान में श्रीलंका की वायुसेना मिग-27 का उपयोग भूमि पर आक्रमण के लिए कर रही है। इसकी अधिकतम गति 200 मीटर/सेकण्ड होती है।

5. मिग 29: यह दो इंजन वाला जेट फाइटर विमान है, जो रूस की कंपनी Mikoyan द्वारा निर्मित किया गया है। यह अमेरिका के फाइटर F-15 तथा F-16 के प्रतिद्वन्द्वी के रूप में निर्मित किया  गया है।  यह बहुकार्यात्मक फाइटर विमान है जो विभिन्न कार्यों को संपन्न करने में सक्षम है। इसे सामान्यतः वायु से सतह पर हमला करने वाले उपकरणों तथा PrecisionAircraft से लैस किया गया है। इसकी अधिकतम तथा क्रूज गति क्रमश: 2400 किमी. प्रति घण्टा तथा 1500 किमी. प्रति घण्टा होती है।

6 किरण (Kiran):- यह हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स द्वारा निर्मित दो सीट वाला जेट हैं। इसका उपयोग भारतीय वायुसेना द्वारा F-16 के पायलटों को प्रशिक्षण देने के लिए किया जाता है। इसका इस्तेमाल भारतीय वायुसेना की एयरोबेटिक टीम सूर्य किरण तथा भारतीय नौसेना की सागर पवन टीम द्वारा किया जाता है।

7. Hawker Siddeley HS 748:- डिजायन किया गया मध्यम आकार का टर्बोप्रोप एयरलाइनर है। यह सैन्य के साथ नागरिक उपयोग में भी लाया जाता है। 2012 में भारतीय वायु सेना ने इन विमानों को प्रचलन से बाहर करने तथा प्रतिस्थापित करने की घोषणा की।

8. C-130JSuper Hercules: -

यह C-130 विमान का उन्नत संस्करण है। लॉकहीड मार्टिन C-130 J. सुपर हरक्यूलस, चार इंजन वाला टर्बोप्रोप मिलिटरी एयरक्राफ्ट है। जनवरी 2014 में एक 1301-305 विमान भारतीय वायुसेना में आया। यह अमेरिका की फर्म लॉकहीड कॉर्पोरेशन तथा लॉकहीड मार्टिन द्वारा निर्मित किया गया। इसकी अधिकतम गति 593 किमी. प्रति घण्टा है।

9. SEPECAT.Jaguar: यह एक एंग्लो -जेट एयरक्राफ्ट है। यह नजदीकी वायु सहायता तथा न्यूक्लियर स्ट्राइक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारतीय वायु सेना इसका उपयोग कर रही है। इसकी अधिकतम गति 1700 किमी./घण्टा तथा रेंज 3524 किमी. है।

10. Tu-140: Tupolev (Tu-142) एक समुद्री जासूसी तथा एंटी-सबमेरिन युद्धक विमान है। यह रूस द्वारा विकसित, उन्नत तथा अत्यधिक मात्रा में पेलोड से युक्त युद्धक विमान है। भारतीय नौ सेना के वायु दस्ते में आठ Tu-142 सेवा में है। इनकी कार्यान्वित गति 442 mph तथा अधिकतम गति 574-576 mph।

11. BAE Sea Harrier:- यह नौ सेना का 'शॉर्ट टेक ऑफ एण्ड वर्टिकल लेंडिंग जेट फाइटर',जासूसी तथा हमलावर विमान है। इसका विकास ब्रिटिश फर्म Hawker Siddeley Harrier द्वारा विकसित किया गया। इसकी अधिकतम गति 1176 किमी. प्रति घण्टा है।

12.Mig-29K:- यह रूस द्वारा निर्मित सभी मौसम में कार्य करने में सक्षम, केरियर आधारित (Carrier Based) मल्टी-रोल एयरक्राफ्ट है। यह मिग-29 से अलग है। इसमें एंटी-शिप तथा एटा रडार ऑपरेशन मिसाइल के साथ एयर-टू-एयर मिसाइल हा भारतीय नौ सेना के पास 45 Mig-29K/KUB एयरक्राफ्ट है। इसकी अधिकतम गति 2200 किमी. प्रति घण्टा तथा रेंज 2000 किमी. है।

13. भविष्य के विमान:- भारतीय वायु सेना 1990 के बाद से पूराने तथा प्रचलन से बाहर हो चुके उपकरणों वाले विमानों के आधुनिकीकरण तथा प्रतिस्थापन का कार्य कर रही है। इसका मुख्य उद्देश्य सोवियत यूनियन से खरीदे गए विमानों को उन्नत करना, आधुनिकीकरण तथा प्रतिस्थापन करना है, जो वर्तमान में भारतीय वायु सेना का प्रमुख आधार है।

(a) Mig-29 UPG:- भारत ने अपने Mig-29 को मल्टी रोल Mig-29 UPG उन्नत विमानों से परिवर्तित करने के लिए रूस को 865 मिलियन अमेरिकी डॉलर का भुगतान किया है। अब इन्हें बढ़ी हुई ईधन क्षमता, नवीनतम वैमानिकी प्रणाली तथा एयर-टू-एयर मिसाइल से सुसज्जित किया जाएगा। यह आधुनिकीकरण 66 फाइटर फ्लीट (Fleet) को उन्नत करने के 900 मिलियन डॉलर के समझौते का एक भाग है।

(b) Su-30MKL:- प्रारंभ में इनका डिजायन रणनीतिक हथियार ले जाने वाले विमान के रूप में नहीं किया गया था परंतु इन्हें उन्नत करके 40Su-30MKLS को भारतीय वायु सेना द्वारा 2020 तक अपनाये जाने की संभावना है। उन्नत करने के बाद में ब्रह्मोस मिसाइल ले जाने में सक्षम होंगे। इसके उन्नत संस्करण में नई, सक्रिय विद्युत रूप से स्कैन करने वाली Array रडार प्रणाली होगी तथा इनमें विद्युत युद्धक तथा ब्रह्मोस मिसाइल ले जाने की क्षमता होगी।

(c) Mirage 2000-5Mk2:- यह मिराज 2000 का उन्नत संस्करण है। इसमें रडार प्रणाली, एक नया हथियार समूह तथा मिसाइल इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर प्रणाली है। इसे अगली पीढ़ी (पांचवीं पीढ़ी) तक उन्नत करके इसकी बहुकार्यात्मक ऑपरेशनल लाइफ को लगभग 20 वर्षों तक बढ़ाया जाएगा।

(d) Sepecat Jaguar:- जगुआर के उन्नत संस्करण में बहुत से बदलाव करके रडार, ऑटो पायलट जैसी विशेषताएं शामिल की जाएगी।

(e) HAL तेजसः- यह भारत का ड्रीम प्रोजेक्ट था, जिसके माध्यम से भारतीय वायु सेना में पुराने हो चुके मिग-21 विमानों को प्रतिस्थापित किया गया। तेजस DRDO द्वारा निर्मित भारत का प्रथम हल्का लड़ाकू विमान (Light Combat Aircraft) है। इसके चार संस्करणों का विकास किया गया है- भारतीय वायु सेना के लिए LCA, भारतीय वायु सेना में प्रशिक्षण के लिए LCA, नौ सेना के लिए LCA तथा नौ सेना में प्रशिक्षण के लिए LCAI यह भारतीय वायु सेना में मध्यम भूमिका वाले युद्धक मिशन में अतिरिक्त विमान होगा। इसकी अधिकतम गति 1920 किमी. प्रति घण्टा तथा रेंज 850 किमी. है। इसमें एयर-टू-एयर तथा एंटी शिप हथियार निर्देशित होते हैं।

 Dassault Rafale:- यह फ्रांस के Dassault Aviotion द्वारा निर्मित है। इसकी विशेषताएं इस प्रकार हैं- दो इंजन युक्त, Canard Delta Wind, Multy-role Fighter Aircraft इसका उद्देश्य-वायु में प्रभुत्व हासिल करना तथा नियंत्रण प्राप्त करना, हवा में जासूसी करना तथा न्यूक्लियर स्ट्राइक मिशन। भारतीय वायु सेना ने फ्रांस से 36 राफेल खरीदने का समझौता किया है। इसका चयन इसके अन्य प्रतिद्वन्द्रियों में से प्रदर्शन तथा कीमत के आधार पर किया गया था। राफेल की अधिकतम गति मैक 1.8 तथा रेंज 3700 किमी. है। यह हवा में ईधन भरने में सक्षम है।

भारतीय तटरक्षक दल

प्रकार

उत्पत्ति

भूमिका

Dornier Do 228

भारत, जर्मनी

जासूसी

HAL Dhruv

भारत

Utility

HAL Chetak

भारत

Utility

भारत के हेलीकॉप्टर (Helicoptersof India) -
भारतीय वायु सेना में HAL ध्रव हेलीकॉप्टर का प्राथमिक उपयोग जनोपयोगी कार्यों में होता था। परिवहन तथा जनसेवा के अतिरिक्त नए ध्रुव हेलीकॉप्टर हमला करने में भी सक्षम हैं। भारतीय वायु सेना की सारंग हलीकॉप्टर डिस्पले टीम ध्रुव को भी ऑपरेट करती है।

मल्टीरोल फाइटर पेट्रोल पेट्रोल पेट्रोल उपयोगिता (Utility) उपयोगिता (Utility) प्रशिक्षण प्रशिक्षण प्रशिक्षण Airbome Early Warning Anti-submarine Warfare Anti-submarine Warfare परिवहन HAL चेतक भी हल्का जनोपयोगी (Utility) हेलीकॉप्टर है। प्राथमिक रूप से इसकी भूमिका प्रशिक्षण, बचाव कार्य तथा हल्के उपकरणों के परिवहन में होती है। हाल धीरे-धीरे चेतक का स्थान ले रहा है। HAL चीता भी हल्का जनोपयोगी हेलीकॉप्टर है जो अधिक ऊंचाई पर ऑपरेशन करने में उपयोगी है। इसका उपयोग भारतीय वायु सेना द्वारा दोनों उद्देश्यों में होता है- परिवहन तथा खोज व बचाव कार्य में।

            भारतीय वायुसेना मध्यम स्तर के रणनीतिक उपकरणों को ले जाने तथा जनोपयोगी कार्यों के लिए Mi-8,MiIMi-17,Mi-17Lv तथा Mi-1775 का प्रयोग करती है। Mi-17 श्रेणी के हेलीकॉप्टर, Mi-8 को प्रतिस्थापित कर रहे हैं। भारतीय वायु सेना ने 22 बोइंग AH-64E अपने अटैक हेलीकॉप्टर, 68 HAL लाइट कॉम्बेट हेलीकॉप्टर (LCH), 35 HAL रूद्र अटैक हेलीकॉप्टर, 15 CH-47 E चिनूक हेली लिफ्ट हेलीकॉप्टर तथा 150Mi-17V-5s हेलीकॉप्टर का ऑर्डर दिया है।

            Mil-Mi-35 का वायु सेना में मुख्य उपयोग हमलावर हेलीकॉप्टर के रूप में किया जाता है। यह सैन्य टुकड़ी के परिवहन में भी सहायक है परंतु इसकी क्षमता कम है। Mi-25/35s की दो स्क्नाड्रन (नम्बर 104 फायरबर्डस तथा नम्बर 125 ग्लेडिएटर्स) भारतीय वायु सेना द्वारा संचालित की जा रही है।

            भारत में DRDO ने स्वयं का देशी UAV प्रोग्राम विकसित किया है। इसका उद्देश्य घरेलू स्तर पर ड्रोन का विकास करना है ताकि वर्तमान के IAI वाहन की जगह उन्हें प्रतिस्थापित किया जा सके।

भारत में नागरिक ड्रोन (Civilian Drones in India) -
कुछ नागरिक विमानों का विकास किया गया है, जैसे-Airpix, गकड़ रोबोटिक्स, Edall system आदि। Social Drones: एक स्टार्टअप जो सामाजिक तथा गैर-पारंपरिक उपयोग हेतु उच्च क्षमता वाले यूजर फ्रेंडली ड्रोन की डिजायनिंग तथा विनिर्माण करता है। उत्तराखण्ड में 2013 में बाढ़ आने के दौरान इन सोशल ड्रोन का इस्तेमाल किया गया था। ऐसे क्षेत्र जहां पर पारंपरिक तरीके से राहत सामग्री नहीं पहुंचाई जा सकती वहां इनके द्वारा प्राथमिक उपचार सामग्री तथा खाद्य सामग्री पहुंचाई जा सकती है।

रडार (Radio Detection and Ranging) -
रडार किसी वस्तु की पहचान करने (Detection) की प्रणाली है जिसमें वस्तु की दूरी तथा वस्तु का कोण या वेग का पता लगाने के लिए रेडियो तरंगों का प्रयोग किया जाता है। इसका उपयोग विमान, पोत, अंतरिक्षयान, मौसम, मोटरवाहन, निर्देशित मिसाइल तथा किसी स्थान का पता लगाने में किया जाता है। भारतीय सशस्त्र सेना में वर्तमान में रडार प्रणाली

Indian Doppler Radar (Indra-I):- यह निम्न स्तर के लक्ष्यों का पता लगाने के लिए उपयोग किया जाने वाला 2D मोबाइल रडार

2. Indra-II PCRadar:- यह इंद्र रडार का ही एक प्रकार है जिसमें भारतीय वायु सेना के लिए लक्ष्य को भूमि से नियंत्रित कर रोका जा सकता है।

3. Battle Field SurveillanceRadar:- शॉर्ट रेंज (BFSR-SR) यह मनुष्य के द्वारा ले जाने योग्य बैटरी चालित निगरानी रडार है।

4. Maritime Patrol Airborne Radar xv-2004:- यह एक बहुमुखी मेरीटाइम सर्विलांस एयरबोर्न रडार है, जो मेरीटाइम सर्विलांस.खोज तथा बचाव अभियानों में अत्यंत उपयोगी है। यह विभिन्न प्लेटफॉर्म पर आसानी से स्थापित हो जाता है।

5. 3D मीडियम-रेंज सर्विलांस रडार रोहिणी:- यह एक ग्राउंड बेसड मेकेनिकली स्कैनिंग 5-बैण्ड पल्स डोलर रडार है जो एयर स्पेस सर्विलांस में प्रयुक्त होता है। यह भारतीय वायुसेना के लिए विश्वसनीय रूप से लक्ष्य को डिटेक्ट तथा ट्रेक करता है। इसके साथ यह इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर की ऑपरेशनल क्षमता भी रखता

6. 3D सर्विलांस रडार: Revathi:- इसकी विशेषताएं - इंटरसेप्शन के लिए मिडियम रेंज 3D टारगेट ट्रेकिंग तथा इंडिकेशन, प्राथमिक सेंसर के द्वारा समुद्री सतह की निगरानी।

A जैविक हथियार अभिसमय
(Biological Weapons Convention-BWC)

बहरूपीय नि:शस्त्रीकरण संधि है जो सभी प्रकार के हथियारों उत्पादन पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के प्रयासों द्वारा रोक लगाती है। यह जिनेवा प्रोटोकॉल' के पूरक के रूप में है। यह अभिसमय जैविक तथा जहरीले हथियारों के विकास, उत्पादन तथा संग्रहण पर पाबंदी लगाता है। यह अपनी तरह का पहला अभिसमय है। इसे सामान्यत: Biological Weapons Convention - BWC  Biological and Toxin Weapons Convention- BTWC कहा जाता है।

            जेनेवा प्रोटोकॉल के अनुसार जैविक तथा रासायनिक हथियारों का विकास या उनका रख-रखाव प्रतिबंधित नहीं है बल्कि उनका प्रयोग करना प्रतिबंधित है। ब्रिटेन ने BWC का ड्राफ्ट जमा करवाया, जिसे 10 अप्रैल, 1972 को हस्ताक्षर के लिए खोला गया। 22 सरकारों के अनुसमर्थन के बाद यह 26 मार्च, 1975 को प्रभाव में आया।

            अनुच्छेद 1 (तथाकथित General Purpose Criterion) BWC के प्रतिबंध को विस्तार से परिभाषित करता है। इसमें सभी माइक्रोबियल तथा अन्य जैविक ऐजेंट या विषाक्त पदार्थ, उनका परिवहन तथा बेचना (अपवाद - चिकित्सा तथा बहुत कम मात्रा में रक्षा उद्देश्यों हेतु) शामिल किया जाता है। बाद में पुनर्समीक्षा कांफ्रेंस में इस बात को भी स्पष्ट कर दिया गया था कि GeneralPurpose Criterion में इस अभिसमय से संबंधित भविष्य के सभी वैज्ञानिक तथा तकनीकी विकास गतिविधियां शामिल होंगी। ये अपने आप में ऐजेंट (जैविक या विषैले) नहीं होते परंतु विभिन्न उद्देश्यों में इसका उपयोग भी प्रतिबंधित है, जो रासायनिक हथियार अभिसमय (CWC) के अनुच्छेद II, 1 से मेल खाते हों। BWC में अनुमति प्राप्त उद्देश्यों, जैसे रोग-निरोधक, संरक्षणात्मक तथा अन्य शांतिपूर्ण उद्देश्यों को परिभाषित किया गया है। जहां इनकी मात्रा उचित न हो या जो अनुमति प्राप्त उद्देश्यों के संगत न हो वहां इन्हें शामिल नहीं किया गया। भारत ने जैविक हथियार अभिसमय (BWC) को अनुमोदित कर दिया है।

रासायनिक हथियार अभिसमय
(Chemical Weapons Convention-CWC)
 यह अभिसमय एक बह-पक्षीय संधि है जो रासायनिक हथियारों पर बघ आरोपित करता है तथा एक निर्धारित समयावधि में उपलब्ध सायानक हथियारों को नष्ट करने की आवश्यकता जताता है। इस साध काई निर्धारित समय सीमा नहीं है। इस प्रकार यह असीमित के लिए है। यह 1925 के जिनेवा प्रोटोकॉल की तुलना में अधिक पक है। जिसमें इन हथियारों के उपयोग को प्रतिबंधित किया गया है न कि उनके रख-रखाव को। 1980 में CWC न

-रखाव को। 1980 में CWC ने संयुक्त राष्ट्र सभा में ण का प्रस्ताव रखा, जिसे 13 जनवरी, 1993 को हस्ताक्षर खाला गया। यह संधि 29 अप्रैल, 1997 को प्रभावी हुई।

CWC का कार्यान्वयन 'ऑर्गेनाइजेशन फॉर द प्रोहिबिशन ऑफ केमिकल वेपन (OPCW)' द्वारा किया जाता है। इसका मुख्यालय 'हेग' में है। यह संगठन सदस्य राष्ट्रों की रासायनिक हथियारों संबंधी गतिविधियों या पदार्थों तथा संबंधित औद्योगिक गतिविधियों की घोषणा की समीक्षा करता है। सभी राष्ट्र CWC के सदस्य बन सकते है। वर्तमान में 192 देश इसके सदस्य है। इजराइल ने इस पर हस्ताक्षर तो कर दिए परंतु इसे अनुमोदित नहीं किया। उत्तरी कोरिया इस पर हस्ताक्षर नहीं करने वाला प्रमुख राष्ट्र है और माना जा रहा है कि इसके पास रासायनिक हथियार हैं। सीरिया ने 2012 में रासायनिक हथियार होने को स्वीकार किया तथा उनका कई बार इस्तेमाल भी किया। मिस्र ने भी इस समझौते पर अब तक हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

प्रतिबंध (Prohibitions)
 रासायनिक हथियार अभिसमय निम्न प्रकार के प्रतिबंध आरोपित करता है:
• रासायनिक हथियारों का उत्पादन, विकास, उन्हें प्राप्त करना, संचय करना बनाए रखना प्रतिबंधित है। रासायनिक हथियारों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आदान-प्रदान प्रतिबंधित है। सैन्य दृष्टिकोण से रासायनिक हथियार तैयार करना प्रतिबंधित है। किसी अन्य राष्ट्र को रासायनिक हथियारों की गतिविधियों के संबंध में सहायता करना या प्रोत्साहित करना भी प्रतिबंधित है।

            भारत ने 1992 में CWC पर हस्ताक्षर किए तथा रासायनिक हथियार नहीं होने व इन्हें बनाने की क्षमता नहीं होने की घोषणा की। इससे भारत 1993 में CWC पर मूल हस्ताक्षरकर्ता राष्ट्र बना तथा इसने 2 सितंबर 1996 को इसे अनुमोदित भी कर दिया। रासायनिक हथियारों पर प्रतिबंध हेतु संगठन (Organisation for the Prohibition of Chemical Weapons - OPCW) इसकी स्थापना 1997 में की गई, यह एक स्वतंत्र स्वशासी संगठन है। इसका मुख्यालय 'नीदरलैण्ड' स्थित 'हेग' में है। यह CWC का कार्यकारी निकाय है। भारत समेत इसके 192 राष्ट्र सदस्य है, जो विश्व जनसंख्या का 98% भाग तथा वैश्विक रासायनिक उद्योगों का भी 98% भाग का प्रतिनिधित्व करता है।

ओ.पी.सी.डब्ल्यू. का संगठनात्मक ढांचा
(Organisational Structure of OPCW)

1. सदस्य राष्ट्रों की कांफ्रेंस:- यह प्रमुख अंग है जिसमें सभी सदस्य राष्ट्र भाग लेते हैं तथा समान मताधिकार साझा करते हैं।

2. कार्यकारी काउंसिल: - यह 41 सदस्य राष्ट्रों से बना निकाय होता है जिसमें वर्ष की समयावधि के आधार पर राष्ट्रों की नियुक्ति की जाती है। इसका कार्य बजट की देख-भाल करना तथा अभिसमय से संबंधित मामलों में जनरल सेक्रेटरिएट को देना होता है।

3. टेक्निकल सेक्रेटरिएटः- यह काउंसिल द्वारा निर्धारित अधिकांश गतिविधियों को संपन्न करता है और इस प्रकार यह संगठन के अधिकांश कर्मियों की नियुक्ति भी करता है।

सत्र तथा बैठकें (Sessions and Meetings) -
विशेष शक्ति तथा कार्यों को पूरा करने के लिए नियमित सत्रों के बीच में विशेष बैठक भी बुलाई जा सकती है।

ओ.पी.सी.डब्ल्यू. के उद्देश्य (Aims of oPCW) OPCW के सदस्य राष्ट्र युद्ध के दौरान रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल को रोकने के लिए साझा लक्ष्य निर्धारित करते है और इस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा से मजबूत करते हैं। इस उद्देश्य के लिए OPCW के लक्ष्य हैं:-

1. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर OPCW की निगरानी में उपलब्ध सभी रासायनिक हथियारों को नष्ट करना।
2. रासायनिक उद्योगों की निगरानी ताकि नए रासायनिक हथियारों का निर्माण न हो सके।
3. यह सभी प्रकार के रासायनिक हमलों के विरुद्ध सदस्य राष्ट्रों को सहायता व सुरक्षा प्रदान करता है।
4. अभिसमय के अनुपालन तथा रसायन के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है।

भारतीय टैंक (Indian Tanks)

 टैंक एक बड़ा तथा भारी हथियारों से लैस युद्धक वाहन होता है इसमें ट्रेक (Tracks) के साथ एक बड़ी टैंक गन होती है, जो आमने-सामने की लड़ाई के लिए बनी होती है। आधुनिक टैंक मोबाइल लैण्ड वेपन प्लेटफॉर्म होते हैं, जिसमें घूमने वाले गन टार्गेट में एक बड़ी केलीबर केनन (Large Calibre Cannon) होती हैं। पैदल सेना की सहायता के लिए टैंक अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। भारतीय सेना द्वारा इस्तेमाल किए जा चुके इस्तेमाल किए जा रहे टैंक (तालिका 15.12) निम्न हैं:-

1. AMX-13:- इस टैंक का निर्माण 1953 से 1985 में किया गया था। भारत सहित 25 देशों द्वारा इसका उपयोग किया जा चुका है। 1965 के भारत-पाक युद्ध में भारतीय सेना ने इसका इस्तेमाल किया था। यह फ्रांस का हल्का टैंक है।

2. विजयान्त (Vijaynta):- यह भारत का मुख्य युद्धक टैंक था जो भारत में बना था। इसका लाइसेंस युक्त डिजायन Vickers NK-1 द्वारा किया गया। यह भारतीय सेना का प्रथम स्वदेश निर्मित टैंक था। यह 1965 से 2008 में सेवा में रहा।

3. T-72:- यह रूस द्वारा निर्मित मुख्य युद्धक टैंक है। इसके दो प्रकार है- T-72N तथा T-752MI, इसका उपयोग भारतीय सेना द्वारा 1990 के बाद में 2000 के तक किया गया।

4. T-90:- इसका स्वदेशी नाम 'भीष्म' है। सन् 2002 में करीब 310 T-90s टैंकों का रूस से आयात किया गया। वर्तमान में भारतीय वैज्ञानिक T-92 से उन्नत तथा अनुकूलित संस्करण का निर्माण कर रहे हैं। ।

5. Tank Ex या NBTEx:- यह MBT अर्जुन के बाद युद्धक टैंक बनाने का भारत का महत्वाकांक्षी रक्षा प्रोजेक्ट है। DRDO सन 2000 से ही इस पर कार्य कर रहा है। यह T-90 MI का उन्नत रूप होगा तथा इसका नाम 'कर्ण' होगा। यह परमाणु, जैविक तथा रासायनिक (NBT) हमलों के दौरान भी कार्य करने में सक्षम होगा। यह अर्जुन NBT से अधिक हल्का तथा उन्नत होगा।

6. Arjun Tank NK-2: अर्जुन तीसरी पीढ़ी का मुख्य युद्धक टैंक है इसका विकास DRDO द्वारा भारतीय सेना के लिए किया गया है। यह मल्टी-फ्यूल डीजल इंजन से चालित होता है तथा इसकी गति अधिकतम 67 किमी. प्रति घण्टा तथा फ्रांस कंट्री स्पीड 40 किमी. प्रति घंटा हो सकती है। अर्जुन MK-I भारतीय सेना में 2004 में शामिल हुआ परंतु यह अधिक कारगर साबित नहीं हुआ तथा इसमें बहुत-से सुधारों की आवश्यकता उत्पन्न हो गई। अर्जुन MK-2 एक नया उन्नत संस्करण है।

मानवरहित हवाई विमान -
(Unmanned Aerial Vehicles- UAV) UAV एक 'मानवरहित निर्देशित विमान' है. यह Remotely Piloted Vehicle (RPV) है जो विशेष रूप से कई कार्यात्मक वर्गों में विभाजित है। यद्यपि, मल्टीरोल एयरफ्रेम प्लेटफॉर्म अधिक प्रचलित है-
• युद्ध क्षेत्र में निगरानी या जासूसी वाले UAV
• उच्च जोखिम वाले मिशनों में हमला करने की क्षमता वाले
• समान पहुंचाने वाले
• UAV तकनीकों में खोज तथा विकास
• नागरिक तथा वाणिज्यिक UAV - कृषि में,

हवा से फोटोग्राफी तथा सूचना संग्रहण

DRDO द्वारा कई प्रकार के UAV का विकास किया गया।निशांत, सामरिक क्षेत्र में उपयोगी तथा लक्ष्य UAV । लक्ष्यः- पायलटरहित लक्ष्यित एयरक्राफ्ट (Pilotless Targeted Aircraft) के विकास के प्रयास किए गए जिसमें सभी 'डिजिटल फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम' तथा बेहतर टर्बोजेट इंजन हो।

निशांत:- सामरिक क्षेत्र में सेवा प्रदान करने वाला हाइड्रोलिकली लांच्ड शॉर्ट-रेंजड (UAV) ।

DRDO नए प्रकार के UAV के विकास के लिए प्रयासरत है। इसमें निशांत कार्यक्रम के अनुभव से अधिक उन्नत UAV का निर्माण किया जाएगा। इन्हें सामान्यत: High Altitude Long Endurance (HALE) a21 Medium Altitude Long Endurance (MALE) से जाना जाता है। MALE UAV को 'रूस्तम' नाम दिया गया है।

भारत कई प्रकार के ड्रोन का विकास कर चुका है ये हैं: अभ्यास. AURA, Fluffy, Imperial Eagle. Kapothaka, HET. FEIT. निशांत, पवन UAV, रूस्तम, Ulka.

ड्रोन (Drone) -

ड्रोन का सामान्य नाम “मानवरहित वायुयान' (UAV) होता है। वास्तव में ड्रोन एक उड़ता हुआ रोबोट होता है। इसे दूर से ही इसमें अंत:स्थापित 'सॉफ्टवेयर कंट्रोल्ड फ्लाइट प्लान' के द्वारा नियंत्रित या स्वतः चालन मोड पर किया जा सकता है। यह प्रणाली GPS के साथ जुड़कर कार्य करता है। वर्तमान में कानूनी तौर पर भारत में ड्रोन का वाणिज्यिक उपयोग प्रतिबंधित है।

भारत के सैन्य ड्रोन (India'sMilitary Drones)-

इसके बाद भारत ने इजराइल से 'IAI हेरोन' तथा खोजी ड्रोन को चुपचाप खरीदा तथा सावधानीपूर्वक इनका उपयोग किया गया। इन्होंने लाइन ऑफ कंट्रोल पर अपनी दक्षता व उपयोगिता साबित की।

 कारगिल युद्ध के बाद से ही भारत ने बड़ी संख्या में इन मानवरहित विमानों की खरीद की। वर्तमान में भारत के पास इजराइल के ‘IAI’ सर्चर तथा Heron मानवरहित हवाई वाहन के साथ एयरोस्पेस Harpy तथा Harop मानवरहित युद्धक वायुयान हैं।

3D टेक्टिक ल कंट्रोल रडार (3DTCR):- इसमें मोबाइल स्टैंड-अलोन मीडियम रेंज, सभी मौसम में कार्य करने वाला 3D सर्विलांस रडार होता है। जो हवा में लक्ष्य की पहचान करने के लिए उपयोग किया जाता है। यह टारगेट डाटा रिसीवर (TDR) पर 20 किमी. दूर के उचित आंकड़ों का संग्रहण करने की क्षमता रखता है। रडार में, बैण्ड के ऑपरेशनल बैण्ड होते हैं तथा यह लड़ाकू विमान को 90 किमी. की सीमा तक तथा UAVs को 65 किमी. की सीमा तक के लक्ष्यों को ट्रेक करने की क्षमता रखता है।

8. लो-लेवल लाइट-वेट 2D रडार-Bharani:- यह लाइट वेट तथा कॉम्पेक्ट सेंसर को प्रदर्शित करता है,जो बैटरी से चालित होता है। यह-2D सर्विलांस सॉल्यूशन के द्वारा आर्मी के एयर डिफेंस सिस्टम को अलर्ट कर सकता है। विशेष रूप से यह पर्वतीय क्षेत्रों में निम्न तथा मध्यम ऊँचाई तक उड़ते हुए लक्ष्यों, जैसे-UAVs. RPV, हेलीकॉप्टर तथा फिक्सड विंग एयरक्राफ्ट की पहचान कर सकता है।

9.लो-लेवल लाइट-वेट 3D रडार-Aslesha: यह बहुमुखी ग्राउंड बेसड - बैण्ड 3D लो-लेवल तथा लाइट-वेट सर्विलास रडार होता है जिसे विभिन्न क्षेत्रों, जैसे-मैदान, पर्वतीय चोटियों, रेगिस्तान तथा उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात किया जा सकता है। यह बहुजातीय हवाई लक्ष्यों को डिटेक्ट तथा ट्रैक कर सकता है, जिसमें हेलीकॉप्टर लड़ाकू विमान, निम्न तथा मध्यम ऊंचाई पर UAVs शामिल होते हैं।

10. FLR- फ्लाइट लेवल रडार फॉर एयर फोर्स: राजेंद्रः- यह बहुकार्यात्मक इलेक्ट्रॉनिकली स्कैड फेज्ड अरे रडार है इसके कार्य 'आकाश वेपन सिस्टम के लिए फ्लाइट लेवल पर प्राथमिक सेंसर की तरह है। 'आकाश वेपन सिस्टम' सैन्य सेवाओं के लिए एक एयर डिफेंस सिस्टम है। यह रडार विस्तृत खोज, मल्टीपल टारगेट तथा मिसाइल को ट्रैक करने में सक्षम है। वर्तमान में यह स्वयं ही मल्टीपल फंक्शन मिसाइलों को निर्देशित तथा नियंत्रित कर सकता है।

इस प्रकार राजेंद्र रडार के बर्हिमुखी कार्यों को करने में सक्षम है, जैसे निगरानी. ट्रैकिंग तथा निर्देश।

11. वार लोकेटिंग रडार (WLR) को उन्नत करना: Swathi:- यह इलेक्ट्रॉनिक स्केनड C-बैण्ड पल्स डोप्लर रडार है। यह दुश्मन की तोपो तथा रॉकेट लांचर का स्वत: पता लगाने में सक्षम है। यह फ्रेंडली फायर की स्थिति का पता लगाने इसके प्रभाव क्षेत्र का पता लगाने तथा आवश्यक सुधारों के साथ लक्ष्य भेदन में सहायता करते हैं।

13. लो-लेवल ट्रांसपोर्टबल रडार (Ashwini):- LLTR, आर्ट 4D एक्टिव अरे टेक्नोलॉजी बेसड रडार की एक स्थिति है जो बहुकार्यों को संपन्न करती है। इसका विकास LRDE द्वारा उच्च कार्यसाधक लक्ष्यों के संबंध में एयरस्पेस अवेयरनेस प्रदान करने के लिए किया गया है।

15. डेवलपमेंट ऑफ मिडियम पॉवर रडार (MPR) Arudhra:- इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य 4D मिडियम पॉवर रडार का विकास करना है, जिसे मल्टीपल-फंक्शन सेंसर की सुविधा हो तथा जो उन्नत सक्रिय अरे टेक्नोलॉजी से युक्त हो।

AWACS 9

AEW&C प्रणाली एक एयरबोर्न रडार पिकेट (Picket) सिस्टम है। इसका निर्माण विमान, पोत तथा वाहनों; जो लंबी दूरी पर हो, की पहचान करने के लिए तथा युद्ध के दौरान लड़ाकू विमानों को डिटेक्ट करते हुए अपने विमानों को हमला करने के लिए कमांड देने तथा कंट्रोल करने के लिए किया गया।

फाल्कन (Phalcorn)-

 यह एक एयरबोर्न अरली वॉर्निग, कमाण्ड एण्ड कंट्रोल (AEWC&C) सिस्टम है, जो इजराइल द्वारा निर्मित है। यह विश्व में अपनी तरह की सर्वाधिक शक्तिशाली प्रणाली है जो सैकड़ों किमी. तक के क्षेत्र में निगरानी की सुविधा प्रदान कर सकती है तथा कमांड तथा कंट्रोल की सुविधा भी उपलब्ध कराती है। फाल्कन निम्न ऊंचाई पर उड़ते विमान, मिसाइल का पता लगा सकता है और इस प्रकार पूर्व चेतावनी दे सकता है। यह भारतीय वायु सेना को युद्ध के दौरान वायु में बढ़त प्रदान करने में सहायक होगा। यह लगभग 300 मील की दूरी तक आने वाली वस्तु का किसी भी मौसम में पता लगाने में सक्षम है। इसके अलावा वायु, समुद्र तथा जमीन पर सभी प्रकार के संचार तंत्रों की भी पहचान कर सकता है। ये सभी सूचनाएं हैडक्वार्टर के नियंत्रण केंद्र पर आसानी से लाइव पहुंचाई जा सकती है। इस प्रणाली में परस्पर समन्वय के लिए चार सेंसर लगे होते हैं। यदि कोई भी एक सेंसर दुश्मन की किसी वस्तु या संचार की पहचान करता है तो अन्य सेंसर स्वतः ही इसकी पहचान सुनिश्चित करते हुए इससे समन्वय बना लेते हैं।

अधिकांश अन्य AEWS में विमान पर एक घूमने वाला एंटीना या Rotodomes लगा होता है, जबकि फाल्कन में विमान पर एक स्थायी गुंबद लगा होता है, जो 'एक्टिव फेजड अरे इलेक्ट्रॉनिक स्कैनिंग टेक्नोलॉजी' पर आधारित होता है। यह घूमने वाली अवॉक्स प्रणाली (AWACS) की तुलना में उच्च गतिशील वस्तु को भी त्वरित रूप से कम समय में ट्रैक कर सकती है। एक विकसित कमांड तथा कंट्रोल सेंटर होने के कारण इसे विमान को निर्देशित करने के लिए मिड-एयर में ही तैनात किया जा सकता है, जो युद्ध क्षेत्र की तस्वीरें उपलब्ध कराता है।

नेत्र:-

हाल ही में भारत ने नेत्र से सुसज्जित एंब्रेडअर ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट में वायु से वायु में पुनः ईंधन भरने का परीक्षण किया। नेत्र देश की प्रथम स्वदेश निर्मित हवाई. पूर्व चेतावनी तथा नियंत्रण प्रणाली (AEW&C) है। इसका विकास DRDO द्वारा किया गया है। AEW&C को इसकी लंबी दूरी तक सर्विलांस क्षमता के कारण 'आकाश में नेत्र' (eye-in the-sky) के नाम से भी जानी जाती है। आने वाले विमानों तथा मिसाइलों के हवाई खतरों की पहचान हेतु 240 डिग्री कवरेज के साथ नेत्र की रेंज 200 किलोमीटर है। इसे अत्याधुनिक सक्रिय इलेक्ट्रॉनिकली स्कैनड राडार तथा द्वितीयक सर्विलांस राडार से सुसज्जित किया गया है। इसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक तथा कम्यूनिकेशन काउंटर उपायों और लाइन ऑफ साइट तथा लाइन ऑफ साइट डाटा लिंक से परे संयोजन हेतु किया जाएगा। इसे एक वॉयस कम्युनिकेशन सिस्टम तथा सर्वेक्षण सूट (suit) से भी सुसज्जित किया गया है। इस प्रकार की तकनीक रखने के मामले में यू.ए.एस तथा इजराइल के बाद भारत का चौथा स्थान है।

स्टील्थ तकनीक (Stealth Technology)-

यह तकनीक 'सब-डिसिप्लिन ऑफ मिलिटरी टेक्टिक्स एण्ड पेसिव इलेक्ट्रॉनिक काउंटर मेजरस' को प्रदर्शित करती है। इस प्रकार यह कार्मिकों, विमानों, पोत, पनडुब्बी तथा मिसाइल को ऐसी तकनीक से युक्त कर देता है जिससे वे दुश्मन के रडार, इन्फ्रारेड, सोनार तथा अन्य डिटेक्शन प्रणालियों की पकड़ में नहीं आ सकते। इसे LO तकनीक (Low Observable Tech.) भी कहा जाता है।

रडार अवशोषी पदार्थ (Radar Absorbing Material) -

ये विशेष प्रकार के रसायनिक पदार्थ होते हैं जिनका बाहरी लेप, रडार तरंगों को अवशोषित कर लेता है जिससे वो तरंगे पुनः रडार स्टेशन तक लौट कर नहीं जा पाती हैं। अत: वायु में इनकी प्राप्ति का पता नहीं चल पाता है।

गैर-धात्विक एयरफ्रेम (Non-Metallic Airframe)

अचालक मिश्रण रडार के लिए अधिक पारदर्शी होता है जबकि विद्युत सुचालक पदार्थ (धातु या कार्बन फाइबर) पदार्थ की सतह पर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक ऊर्जा घटना की प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। मिश्रित पदार्थ फेराइट (Ferrites) का गुण धारण करते हैं ताकि अचालकता तथा मैग्नेटिक गुणों को अनुकूलित किया जा सके।

एंटी-सेटेलाइट वेपन (Anti-Satellite Weapon)

भारत ने एंटी सेटेलाइट वेपन (A SAT Weapons) के विकास की पहचान की है। DRDO के अंतर्गत दोनों कक्षाओं-LEO तथा HEO उच्च जियोसिंक्रोनस कक्षा में स्थित सेटेलाइट को नष्ट करने की क्षमता निर्माण का कार्यक्रम चल रहा है। यह DRDO का लांग-टर्म इंटीग्रेटेड प्रस्पेक्टिव प्लान (2012-2027) है।

 इंटरसेप्टर विमान या इंटरसेप्टर सामान्यत: एक लड़ाकू विमान होता है जिसका निर्माण विशेष रूप से दुश्मन के विमान (बमवर्षक विमान) को रोकने तथा नष्ट करने के लिए किया जाता है। यह सामान्यतः अत्यधिक गति वाला होता है। ऐसे विमानों का निर्माण द्वितीय विश्व युद्ध के ठीक पहले से लेकर 1960 के अंत तक हुआ था। इसके बाद सामरिक रूप से अंतर-महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBMs) की भूमिका बढ़ने के बाद इनका महत्व कम हो गया।

सोनार (Sound Navigation and Ranging) -

सोनार प्रणाली में अल्ट्रासोनिक ध्वनि तरंगों की सहायता से जल में स्थित वस्तु को डिटेक्ट किया जाता है। भारतीय नौसेना के अग्रिम युद्धक पोनों में सेवा देने के लिए सोनार तथा सोनार प्रणाली का विकास DRDO भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) तथा भारतीय नौसेना ने किया है।  कुछ प्रमुख सोनार-

• APSOH (Advanced Panoramic Sonar Hull Mounted)

 HUMVAD (Hull Mounted Variable Depth Sonar)

HUMSA (Follow on of the APSOH Series: - The Acronym HUMSA Represents Hull Mounted Sonar Anay)

• Panchendriya (Submarine Sonar and Fire Contr System)

तारपीडो (Torpedoes)- तारपीड़ो, सिगार आकृति की (Cigar-Shaped) अण्डरवॉटर मिसाइल है जो स्वयं प्रणोदन की सुविधा से युक्त है। इसका डिजाइन, किसी पोत या पनडुब्बी से किसी लक्ष्य की तरफ निशाना दागने के लिए किया गया है। इसे किसी विमान से पानी में गिराकर भी लक्ष्य की तरफ दागा जा सकता है।

            DRDO वर्तमान में हलके-वजन वाले तारपीड़ो सहित कई प्रकार के तारपीडो डिजायन के विकास पर कार्य कर रहा है। हलके वजन वाले तारपीड़ो को नौसेना ने स्वीकार करते हुए इसके उत्पादन की स्वीकृति दे दी है। भारी वजन वाला तार निर्देशित तारपीडो वरुणास्त्र किसी  (Varunastra) पनडुब्बी के विरुद्ध इस्तेमाल करने के लिए उपयुक्त है। विद्युत ऊर्जा चालित वरुणास्त्र का उत्पादन किया जा रहा है। माइक्रोप्रोसेसर से नियंत्रित टिपल ट्युब टारपीडो लांचर का विकास तथा उत्पादन भी DRDO द्वारा भारतीय नौसेना के लिए किया जा रहा है।

इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली-

इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (EW) में वे सभी गतिविधियां शामिल मानी जाती हैं, जिसमें स्पेक्ट्रम के नियंत्रण, दुश्मन पर हमला करने या दुश्मन के हमले को रोकने के लिए इलेक्ट्रॉमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम या निर्देशित ऊर्जा का उपयोग किया जाता है। के लक्ष्य मानव, संचार, रडार या अन्य हो सकते है।

भारत के मोबाइल-इंटिग्रेटेड सुरक्षा सलाहक इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम का नाम 'संयुक्त' (Samyukta) है। इसका विकास DRDO, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, क्रिप्टोलॉजी रिसर्च इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड तथा कॉर्पस ऑफ सिग्नलस ऑफ इण्डियन आर्मी ने संयुक्त रूप से किया गया है।