विधिक अधिकार
परिभाषा – वह अधिकार या ऐसा हित जो राज्य की विधी द्वारा मान्यता प्राप्त हों और विधी के द्वारा उसे संरक्षित किया जाए। वह विधिक अधिकार कहलाता है।
पंजाब बनाम रामलुभाया वाद (1998) के अनुसार एक व्यक्ति का अधिकार दुसरे व्यक्ति का कर्तव्य।
विधिक अधिकारों के लक्षण –
अधिकार का धारण कर्ता (विधिक अधिकार सदैव जीवित व्यक्ति का होता है।)
अधिकार से आबद्ध व्यक्ति
अधिकार की विषय – वस्तु
अधिकार की अन्तर्वस्तु
अधिकार का हक
विधिक अधिकारों के सिद्धांत
हित सिद्धांत :- इस सिद्धांत के प्रतिपादक जर्मन विधीशास्त्री इहिरग को माना जाता है। सामंड इस सिद्धांत का प्रबल समर्थल माना जाता है। इहरिंग के अनुसार, ‘अधिकार का आधार हित’ है, इच्छा नहीं। विधिक अधिकार विधिक रूप से संरक्षित हित है। विधि का उद्देश्य हितों की संरक्षा करना होता है, व्यक्तियों की इच्छाओं की नहीं। सामंड ने भी इहिर के मतों का समर्थन करते हुए कहा है क ‘विधिक अधिकार राज्य के नियम (विधि) द्वारा मान्य और संरक्षित ऐसा हित है जिसका सम्मान करना कर्तव्य है और जिसकी अवहेलना करना एक दोष’।
इस सिद्धांत की कुछ विधिशास्त्रियों ने आलोचना की, किंतु अप्रत्यक्ष रूप से इसे स्वीकार भी किया कि राज्य की मान्यता व संरक्षण के बिना कोई अधिकार हमेशा के लिए अस्तत्ववान नहीं रहा सकता है। अत: प्रो. एलेन इस संदर्भ में समन्वित दृष्टिकोण अपनाने पर बल देते हैं। उनके अनुसार, ‘विधिक अधिकार का सार न तो स्वयं में पूर्ति के लिए विधित: प्रत्याभूत शक्ति, नही स्वयं विधित: संरक्षित हित प्रतीत होता है अपितु एक हित की पूर्ति के लिए विधित: प्रत्याभूत शक्ति प्रतीत होता है।’
इच्छा-सिद्धांत :- इस सिद्धांत का समर्थन हिगल, काण्ट, ह्युम, हॉलैंड, ऑस्टन, पोलाक आदि ने किया है। इसके अनुसार अधिकार मानव इच्छा से उत्पन्न होता है। इसके अधिकांश समर्थक जर्मनी में थे। ऑस्टिन और हॉलैंड के अनुसार, ‘इच्छा ही अधिकार का मुख्य तत्व है’, जिसका पोलाक और विनोग्रेडाफ भी समर्थन करते हैं। लॉक अन्य संक्राम्य अधिकारों में विश्वास करता था जिन्होंने घोषणा की थी कि व्यक्ति के जीवन के कतिपय क्षत्रों में राजय भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता है, जिन्हें उसने अन्य संक्राम्य अधिकार माना। उसके अनुसार अधिकार का आधार व्यक्ति की इच्छा है।
विधिक अधिकारों का वर्गीकरण :- विधिक अधिकारों का वर्गीकरण निम्नप्रकार से किया जा सकता है।
1.पूर्ण तथा अपूर्ण अधिकार :-
पूर्ण अधिकार उसे कहते है जिसमे हस्तक्षेप या उल्लंघन किये जाने पर न्यायालय में सफलतापूर्वक वाद चलाया जा सकता है।
अपूर्ण अधिकार उसे कहते है जिसे विधि के अन्तर्गत मान्यता तो प्रापत है परनतु विधि द्वारा उसे प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता है
2.सकारात्मक तथा नकारात्मक अधिकार :-
सकारात्मक अधिकार वसतुत: कर्तव्य के समान होते है। यह ऐसा अधिकार जिसके अन्तर्गत वह व्यक्ति जिसके ऊपर कर्तव्य अधिरोपित है अधिकार के धारणकर्ता के लिए कोई कार्य करने के लिए बाध्य होता है।
नकारात्मक अधिकार एक प्रकार से नकारात्मक कतवय के समरूप है अर्थात् इसमें कर्तव्य से आबद्ध व्यक्ति ऐसे कार्य करने से उपरत रहेगा जो अधिकार धारणकर्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
नकारात्मक अधिकार हानि न होने देने के लिए होता है।
सकारात्मक अधिकार निश्चित रूप से लाभ के लिए होता है।
3.साम्पत्तिक तथा वैयक्तिक अधिकार :-
साम्पत्तिक या सम्पत्ति का अधिकार मनुष्य की सम्पत्ति में निहित होता है। इन अधिकारों का वित्तीय महत्व होता है तथा वे व्यक्तिगत प्रतिष्ठा या हैसियत से होता है। ऐसे अधिकार व्यक्ति की मृत्यु के उपरान्त स्वत: समाप्त हो जाते हैं।
4.सर्वसंबधी तथा व्यक्तिबंधी अधिकार :-
व्यक्तिबंधी अधिकार निश्चित व्यक्तियों पर आरोपित कर्तव्यों के साथ चलते हैं।
सर्वसबन्धी अधिकार सामान्यत: व्यक्तियों पर आरोपित कर्तव्यों के साथ चलते है।
सर्वसंबधी अधिकार नकारात्मक प्रकृति के होते है।
व्यक्तिबंधी अधिकार सकारात्मक प्रकृति के होते है।
5.स्व-साम्पत्तिक तथा पर-साम्पत्तिक अधिकार :-
जब किसी व्यक्ति पर उसकी स्वयं की निजी सम्पत्ति पर अधिकार होता है जब वह अधिकार स्व-साम्पत्तिक कहलाता है।
जब कोई व्यक्ति किसी कारणवष किसी दूसरे व्यक्ति की सम्पति पर अधिकार रखता है।
पर-साम्पत्तिक अधिकार को ‘विल्लगम’ भभी कहा जाता है।
6.निहित तथा समाश्रित अधिकार :-
निहित अधिकार का तात्पर्य उस अधिकार प्राप्त करने के लिए आवश्यक सभी घटनाएँ घटित हो चुकी हैं।
समाश्रित अधिकार वह है, जिसके बारे में अधिकार निहित करने के लिए केवल कुछ घटनाएँ घटित होती हैं, और उसका निहित होना नियत है, किन्तु अनिष्चित घटना के घटित होने अथवा न होने पर निर्भर करता है।
7.लोक अधिकार तथा प्राइवेट अधिकार :-
ऐसे अधिकार, जो व्यक्तियों में निहित होते हैं, लोक अधिकार कहलाते हैं।
ऐसे अधिकार, जो राज्य में निहित होते हैं, प्राइवेट अधिकार कहलाते हैं।
नोट –
नागरिकों को वे ही विधिक अधिकार प्राप्त है जो भारतीय संविधान द्वारा समस्त नागरिकों को प्रदत किए गए है।
सरकारे समय-समय पर आवश्यकतानुसार विधिक अधिकार प्रदान करती है।