विधिक अधिकार

परिभाषा – वह अधिकार या ऐसा हित जो राज्य की विधी द्वारा मान्यता प्राप्त हों और विधी के द्वारा उसे संरक्षित किया जाए। वह विधिक अधिकार कहलाता है।

विधिक अधिकारों के लक्षण –

 

विधिक अधिकारों के सिद्धांत

हित सिद्धांत :- इस सिद्धांत के प्रतिपादक जर्मन विधीशास्त्री इहिरग को माना जाता है। सामंड इस सिद्धांत का प्रबल समर्थल माना जाता है। इहरिंग के अनुसार, ‘अधिकार का आधार हित’ है, इच्छा नहीं। विधिक अधिकार विधिक रूप से संरक्षित हित है। विधि का उद्देश्य हितों की संरक्षा करना होता है, व्यक्तियों की इच्छाओं की नहीं। सामंड ने भी इहिर के मतों का समर्थन करते हुए कहा है क ‘विधिक अधिकार राज्य के नियम (विधि) द्वारा मान्य और संरक्षित ऐसा हित है जिसका सम्मान करना कर्तव्य है और जिसकी अवहेलना करना एक दोष’।

इस सिद्धांत की कुछ विधिशास्त्रियों ने आलोचना की, किंतु अप्रत्यक्ष रूप से इसे स्वीकार भी किया कि राज्य की मान्यता व संरक्षण के बिना कोई अधिकार हमेशा के लिए अस्तत्ववान नहीं रहा सकता है। अत: प्रो. एलेन इस संदर्भ में समन्वित दृष्टिकोण अपनाने पर बल देते हैं। उनके अनुसार, ‘विधिक अधिकार का सार न तो स्वयं में पूर्ति के लिए विधित: प्रत्याभूत शक्ति, नही स्वयं विधित: संरक्षित हित प्रतीत होता है अपितु एक हित की पूर्ति के लिए विधित: प्रत्याभूत शक्ति प्रतीत होता है।’

इच्छा-सिद्धांत :- इस सिद्धांत का समर्थन हिगल, काण्ट, ह्युम, हॉलैंड, ऑस्टन, पोलाक आदि ने किया है। इसके अनुसार अधिकार मानव इच्छा से उत्पन्न होता है। इसके अधिकांश समर्थक जर्मनी में थे। ऑस्टिन और हॉलैंड के अनुसार, ‘इच्छा ही अधिकार का मुख्य तत्व है’, जिसका पोलाक और विनोग्रेडाफ भी समर्थन करते हैं। लॉक अन्य संक्राम्य अधिकारों में विश्वास करता था जिन्होंने घोषणा की थी कि व्यक्ति के जीवन के कतिपय क्षत्रों में राजय भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता है, जिन्हें उसने अन्य संक्राम्य अधिकार माना। उसके अनुसार अधिकार का आधार व्यक्ति की इच्छा है।

विधिक अधिकारों का वर्गीकरण :- विधिक अधिकारों का वर्गीकरण निम्नप्रकार से किया जा सकता है।

1.पूर्ण तथा अपूर्ण अधिकार :-

अपूर्ण अधिकार उसे कहते है जिसे विधि के अन्तर्गत मान्यता तो प्रापत है परनतु विधि द्वारा उसे प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता है

2.सकारात्मक तथा नकारात्मक अधिकार :-

3.साम्पत्तिक तथा वैयक्तिक अधिकार :-

4.सर्वसंबधी तथा व्यक्तिबंधी अधिकार :-

5.स्व-साम्पत्तिक तथा पर-साम्पत्तिक अधिकार :-

6.निहित तथा समाश्रित अधिकार :-

7.लोक अधिकार तथा प्राइवेट अधिकार :-

नोट –