विधानसभा
- अनुच्छेद 170 के अनुसार प्रत्येक राज्य की एक विधानसभा होगी।
- विधानसभा को निम्न सदन/पहला सदन भी कहा जाता है।
विधानसभा सदस्यों की संख्या (अनुच्छेद 170)
- विधानसभा के प्रतिनिधियों को प्रत्यक्ष मतदान से वयस्क मताधिकार के द्वारा निर्वाचित किया जाता है। (फर्स्ट पास्ट द पोस्ट/अग्रता ही विजेता )
- इसकी अधिकतम संख्या 500 और न्यूनतम 60 तय की गई है तथा इनके बीच की संख्या राज्य की जनसंख्या एवं इसके आकार पर निर्भर है।
अपवाद :- सिक्किम (32), गोवा (40), मिजोरम (40) पुडुचेरी (30)
नोट – संसद कानून बनाकर विधानसभा की सीटों में वृद्धि कर सकती है। इसके लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता नहीं होती है।
- राज्यपाल आंग्ल-भारतीय समुदाय से एक सदस्य को नामित कर सकता है। यदि इस समुदाय का प्रतिनिधि विधानसभा में पर्याप्त नहीं हो। यह उपबंध 95वें संविधान संशोधन 2009 के तहत 2020 तक के लिए बढ़ा दिया गया है। (अनुच्छेद 333)
नोट :- 104वें सविधान संशोधन अधिनियम 2020 के तहत लोकसभा व विधानसभा में आंग्ल भारतीयों के मनोनयन का प्रावधान निष्प्रभावी हो गया है।
वर्तमान में सर्वाधिक विधानसभा सीटों वाले राज्य-
1. उत्तरप्रदेश (403 + 1 आंग्ल भारतीय)
2. पश्चिम बंगाल (294 + 1 आंग्ल भारतीय)
3. महाराष्ट्र (288)
4. बिहार (243)
नोट :- 104वें सविधान संशोधन अधिनियम 2020 के तहत आंग्ल भारतीयों का लोकसभा वह विधानसभा में मनोनयन निष्प्रभावी हो गया है।
नोट :- दो केन्द्रशासित प्रदेश दिल्ली एवं पुडुचेरी में विधानसभा है जहाँ क्रमश: 70 एवं 30 सदस्यों की संख्या है।
- हालांकि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 व 35A समाप्त करने के बाद जम्मू-कश्मीर को दो केन्द्रशासित प्रदेशों (जम्मू-कश्मीर व लद्दाख) में विभाजित कर दिया गया है।
- जम्मू-कश्मीर केन्द्रशासित प्रदेश में भी विधानसभा के गठन का प्रावधान किया गया है।
प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र
- अनुच्छेद 170 के अनुसार राज्य के भीतर प्रत्येक प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्या के अनुसार आनुपातिक रूप से समान प्रतिनिधित्व होगा। जनसंख्या का अभिप्राय वह पिछली जनगणना है जिसकी सूची प्रकाशित की गई है।
प्रत्येक जनगणना के बाद पुननिर्धारण
1. प्रत्येक राज्य के विधानसभा के हिसाब से सीटों का निर्धारण होगा।
2. हर राज्य का निर्वाचन क्षेत्रों के हिसाब से िवभाजन होगा।
- संसद को इस बात का अधिकार है कि वह संबंधित मामले का निर्धारण करे।
- इसी उद्देश्य के तहत 1952, 1962, 1972 और 2002 में संसद ने परिसीमन आयोग अधिनियम पारित किया।
- 42 वें संविधान संशोधन 1976 के तहत विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्रों को 1971 की जनसंख्या के आधार पर वर्ष 2000 तक के लिए निश्चित कर दिया गया। जिसे 84 वें संविधान संशोधन 2001 के तहत 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया।
परिसीमन आयोग
- अब तक चार बार परिसीमन आयोग गठित किया गया।
- प्रथम- 1952, द्वितीय- 1962, तृतीय- 1972, चतुर्थ-2002
- चतुर्थ परिसीमन आयोग के अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश कुलदीप सिंह को बनाया गया।
- परिसीमन आयोग का गठन संसद द्वारा किया जाता है।
अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए स्थानों का आरक्षण(अनुच्छेद 332)
- संविधान में राज्य की जनसंख्या के अनुपात के आधार पर प्रत्येक राज्य की विधानसभा के लिए अनुसूचित जाति/जनजाति की सीटों की व्यवस्था की गई है।
आंग्ल-भारतीय समुदाय के लिए स्थानों का आरक्षण (अनुच्छेद 333)
- राज्यपाल अनुच्छेद 333 के तहत आंग्ल-भारतीय समुदाय से एक सदस्य को नामित कर सकता है। यदि इस समुदाय का पर्याप्त प्रतिनिधित्व विधानसभा में नहीं हो तो। (104वें सविधान संशोधन अधिनियम 2020 के तहत निष्प्रभावी)
विधानसभा का कार्यकाल [अनुच्छेद 172 (1)]
- चुनाव के बाद पहली बैठक से लेकर इसका सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। इसके पश्चात विधानसभा स्वत: ही विघटित हो जाती है।
नोट :- राष्ट्रीय आपातकाल के समय में संसद द्वारा विधानसभा का कार्यकाल एक समय में एक वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है, हालांकि यह विस्तार आपातकाल खत्म होने के बाद छह महीनों से अधिक का नहीं हो सकता है।
विधानसभा सदस्यों के लिए अर्हताएं/योग्यताएँ (अनुच्छेद 173)
- भारत का नागरिक हो।
- उसे चुनाव आयोग द्वारा अधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष शपथ लेनी पड़ती है।
नोट :- विधानमंडल के प्रत्येक सदन का प्रत्येक सदस्य सदन में सीट ग्रहण करने से पहले राज्यपाल या उसके द्वारा इस कार्य के लिए नियुक्त व्यक्ति के समक्ष शपथ या प्रतिज्ञान लेगा। (अनुसूची 3)
- 25 वर्ष की आयु होनी चाहिए।
इसके अतिरिक्त जन-प्रतिनिधत्व अधिनियम 1951 के तहत संसद द्वारा निश्चित अर्हताएं –
- विधानसभा सदस्य बनने वाला व्यक्ति संबंधित राज्य के निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता होना चाहिए।
- SC/ST का सदस्य होना चाहिए यदि वह SC/ST की सीट के लिए चुनाव लड़ता है। हालांकि SC/ST का सदस्य उस सीट के लिए भी चुनाव लड़ सकता है, जो उसके लिए आरक्षित न हो।
विधानसभा सदस्यों के लिए निरर्हताएं (अनुच्छेद 191)
- यदि वह लाभ का पद धारण करता हो।
- वह दिवालिया घोषित किया गया हो।
- न्यायालय द्वारा विकृत्तचित्त घोषित करने पर।
- वह भारत का नागरिक न हो या उसने विदेश में कही नागरिकता स्वेच्छा से अर्जित कर ली है।
- संसद द्वारा निर्मित किसी विधि द्वारा या उसके अधीन अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।
- अनुच्छेद 192 में यह स्पष्ट उल्लिखित है कि पहली 4 स्थितियों में (लाभ का पद ले लेने पर, विकृत्तचित्त, दिवालिया तथा नागरिक नहीं रहने पर) विधानमंडल की सदस्यता भारत के निर्वाचन आयोग के परामर्श पर राज्यपाल समाप्त करते हैं। राज्यपाल को इस संदर्भ में चुनाव आयोग के परामर्श के आधार पर ही निर्णय लेना होता है।
इसके अतिरिक्त जन-प्रतिनिधित्व एक्ट 1951 के तहत संसद द्वारा निश्चित निरर्हताएँ–
- चुनाव में किसी प्रकार के भ्रष्ट आचरण या चुनावी अपराध का दोषी पाया गया हो।
- निर्धारित समय सीमा के अन्दर चुनावी खर्च संबंधित विवरण प्रस्तुत करने में असफल रहा हो।
- उसका किसी सरकारी ठेके कार्य अथवा सेवाओं में कोई रूचि हो।
- दल-बदल के आधार पर व्यक्ति अयोग्य हो (दसवीं अनुसूची के उपबंधों के तहत)
- दल-बदल के आधार पर संबंधित सदन का अध्यक्ष सदस्यता को समाप्त करता है।
नोट :- संविधान में लाभ के पद का उल्लेख नहीं है।
शपथ
-अनुच्छेद 188 के अनुसार विधानमंडल के सभी सदस्यों को राज्यपाल अथवा उनके द्वारा अधिकृत किए गए व्यक्ति द्वारा शपथ दिलाई जाती है।
- विधानमंडल के सभी सदस्य अनुसूची 3 में दिये गए प्रारूप के अनुरूप संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं।
विधानसभा सचिवालय
- अनुच्छेद 187 में यह उल्लिखित है कि प्रत्येक राज्य विधानमंडल के लिए एक सचिवालय होगा।
- सचिवालय के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भर्ती तथा सेवा-शर्तों का निर्धारण विधानसभा अध्यक्ष के परामर्श से राज्यपाल द्वारा किया जाता है।
- यह सचिवालय विधानसभा के प्रशासनिक कार्यों की देखभाल करता है।
- राजस्थान सन्दर्भ में विधानसभा सचिव इस सचिवालय का प्रशासनिक प्रमुख होता है। भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी को इस पद पर विधानसभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया जाता है।
स्थानों का रिक्त होना
- विधानमंडल का सदस्य निम्न मामलों में अपना पद छोड़ता है।
a. दोहरी सदस्यता :- संविधान के अनुच्छेद 190(1) के अनुसार कोई व्यक्ति राज्य के विधानमंडल के दोनों सदनों का सदस्य नहीं होगा। यदि कोई व्यक्ति दोनों सदनों के लिए निर्वाचित होता है तो राज्य विधानमंडल द्वारा निर्मित विधि के उपबंधों के तहत एक सदन से उसकी सीट रिक्त हो जाएगी।
b. निरर्हता :- राज्य विधानमण्डल का कोई सदस्य यदि अयोग्य पाया जाता है तो उसका पद रिक्त हो जाएगा।
c.त्यागपत्र :- कोई सदस्य अपना लिखित इस्तीफा विधान परिषद् के मामले में सभापति और विधानसभा के मामले में अध्यक्ष को दे सकता है। स्वीकृति की स्थिति में पद रिक्त माना जाएगा।
d. अनुपस्थिति :- यदि कोई सदस्य बिना पूर्व अनुमति के 60 दिन तक बैठकों से अनुपस्थित रहता है तो सदन उसके पद को रिक्त घोषित कर सकता है।
e. अन्य मामले :-
i. न्यायालय द्वारा उसके निर्वाचन को अमान्य ठहरा दिया जाए।
ii. सदन से निष्काषित कर दिया जाए।
iii. राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के पद पर निर्वाचित हो जाए।
iv. राज्यपाल पद पर नियुक्त हो जाए।
विधानमंडल के पीठासीन अधिकारी

विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष
- अनुच्छेद 178 के तहत प्रत्येक राज्य की विधानसभा अपने दो सदस्यों को अपना अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनेगी।
- अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का पद विधानसभा के कार्यकाल तक होता है।
अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना (अनुच्छेद 179)
- अनुच्छेद 179 के अनुसार तीन मामलों में अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष अपना पद रिक्त करते है-
1. यदि उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त हो जाए।
2. यदि वह सदस्य अध्यक्ष है तो उपाध्यक्ष को संबोधित करके अपना लिखित त्यागपत्र दे।
3. विधानसभा के समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जाए। इस तरह का कोई प्रस्ताव केवल 14 दिन की पूर्व सूचना के बाद ही लाया जा सकता है।
अध्यक्ष के पद के कर्तव्यों का पालन करने या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्यक्ष या अन्य व्यक्ति की शक्ति- (अनुच्छेद 180)
- अनुच्छेद 180 के अनुसार जब अध्यक्ष का पद रिक्त हो तब उपाध्यक्ष या यदि वह भी अनुपस्थित है तो ऐसा व्यक्ति जिसको राज्यपाल इस उद्देश्य के लिए नियुक्त करे उस पद के कर्तव्यों का पालन करेगा।
जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के पद से हटाने का कोई संकल्प विचारधीन है तब उसका पीठासीन न होना (अनुच्छेद-181)
- अनुच्छेद 181 के तहत विधानसभा की किसी बैठक में जब अध्यक्ष को इसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब अध्यक्ष या जब उपाध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचारधीन है तब उपाध्यक्ष, उपस्थित रहने पर भी पीठासीन नहीं होगा।
विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियाँ
- अध्यक्ष विधानसभा में व्यवस्था एवं मर्यादा को बनाए रखते हुए विधानसभा बैठकों की अध्यक्षता करता है।
- विधानसभा में इसकी अनुमति के बिना कोई प्रस्ताव नहीं रखा जा सकता है।
- वह सदन में संविधान तथा प्रक्रिया संबंधित का अन्तिम व्याख्याकार होता है।
- वह सदन में अव्यवस्था की स्थिति में सभा की कार्यवाही को स्थगित, सभा की कार्यवाही के दौरान प्रयुक्त अशिष्ट एवं असंसदीय शब्दों को कार्यवाही से निष्कासित कर सकता है।
- कोई विधेयक वित्त विधेयक है या नहीं इसका निर्णय अध्यक्ष ही करता है।
- प्रथम मामलें में वह मत नहीं देता लेकिन बराबर मत होने की स्थिति में वह निर्णायक मत दे सकता है।
- कोरम की अनुपस्थिति में वह विधानसभा की बैठक को स्थगित या निलंबित कर सकता है।
- विधानसभा की सभी समितियों के अध्यक्ष की नियुक्ति और उनके कार्यों का पर्यवेक्षण अध्यक्ष ही करता है।
- 10 वीं अनुसूची के उपबंधों के आधार पर किसी सदस्य की निरर्हता को लेकर उठे किसी विवाद पर फैसला देता है।
- सदन के नेता के आग्रह पर वह गुप्त बैठक को अनुमति प्रदान कर सकता है।
अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष तथा सभापति और उपसभापति के वेतन और भत्ते- (अनुच्छेद 186)
- अनुच्छेद 186 के तहत अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति एवं उपसभापति का वेतन एवं भत्तों का विधानमण्डल विधि द्वारा नियत करे और जब तक इस प्रकार का उपबन्ध नहीं किया जाता है तब तक ऐसे वेतन और भत्तो का जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट है, संदाय किया जाएगा।
राज्य विधानमंडल सत्र
- अनुच्छेद 174 में राज्य विधायिका के सत्र, सत्रावसान एव उनका भंग होने का उल्लेख है।
1. आहूत करना :- राज्य विधानसभा के प्रत्येक सदन को राज्यपाल समय-समय पर बैठक का बुलावा भेजता है।
- दोनों सत्रों के बीच 6 माह से अधिक का समय नहीं होना चाहिए।
- राज्य विधानमंडल को एक वर्ष में कम से कम दो बार मिलना चाहिए।
- एक सत्र में विधानमंडल की कई बैठकें हो सकती है।
2. स्थगन :- बैठक को किसी समय विशेष के लिए स्थगित भी किया जा सकता है। यह समय घंटों, दिनों या हफ्तों का भी हो सकता है। अनिश्चित काल स्थगन का अर्थ है कि चालू सत्र को अनिश्चित काल तक के लिए समाप्त कर देना। इन दोनों तरह के स्थगन का अधिकार सदन के पीठासीन अधिकारी को हो।
3. सत्रावसान :- पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष या सभापति) कार्य सम्पन्न होने पर सत्र को अनिश्चित काल के लिए स्थगन की घोषणा करते है। इसके कुछ दिन बाद राष्ट्रपति सत्रावसान की अधिसूचना जारी करता है। स्थगन के विपरीत सत्रावसान सदन के सत्र को समाप्त करता है।
4. विघटन :- एक स्थायी सदन के तहत विधानपरिषद् कभी विघटित नहीं होती है। सिर्फ विधानसभा ही विघटित हो सकती है। सत्रावसान के विपरीत विघटन से वर्तमान सदन का कार्यकाल समाप्त हो जाता है और चुनाव के बाद नए सदन का गठन होता है।
विधानसभा के विघटित होने पर विधेयकों के खारिज होने की स्थिति :-
- विधानसभा में लंबित विधेयक समाप्त हो जाता है। चाहे मूल रूप से यह विधानसभा द्वारा प्रारंभ किया गया हो या फिर उसे विधानपरिषद् द्वारा भेजा गया हो।
- विधानसभा द्वारा पारित विधेयक लेकिन विधानपरिषद् में है तो खारिज हो जाएगा।
- ऐसा विधेयक जो विधानपरिषद् में लंबित हो लेकिन विधानसभा द्वारा पारित न हो, को खारिज नहीं किया जा सकता।
- ऐसा विधेयक जो विधानसभा द्वारा पारित हो (एक सदनीय विधानमंडल वाले राज्यों में) या दोनों सदनों द्वारा पारित हो (द्वि-सदनीय राज्यों में) लेकिन राज्यपाल या राष्ट्रपति की स्वीकृति के कारण रूका हुआ हो तो खारिज नहीं किया जा सकता।
- ऐसा विधेयक जो विधानसभा द्वारा पारित हो (एक सदनीय) या दोनों सदनों द्वारा पारित हो (द्वि-सदनीय) लेकिन राष्ट्रपति द्वारा सदन के पास पुनर्विचार हेतु लौटाया गया हो को समाप्त नहीं किया जा सकता है।
कोरम/गणपूर्ति (अनुच्छेद 189)
- किसी भी कार्य को करने के लिए सदन में उपस्थित सदस्यों की न्यूनतम संख्या को कोरम कहते हैं।
- यह सदन में कुल सदस्यों का दसवां हिस्सा (पीठासीन अधिकारी सहित) या 10 (जो भी अधिक हो) होते हैं।
- यदि कोरम पूरा नहीं हो तो पीठासीन अधिकारी सदन को स्थगित करता है।
मंत्रियों एवं महाधिवक्ता के अधिकार (अनुच्छेद 177)
- प्रत्येक मंत्री एवं महाधिवक्ता को यह अधिकार है कि वह सदन की कार्यवाही में भाग ले, बोले तथा सदन से संबंधित समिति जिसके वह सदस्य के रूप में नामित है भाग ले सकता है लेकिन वोट नहीं दे सकता है।
विधानमण्डल की विधायी प्रकिया
1. साधारण विधेयक के संबंध में
A. विधेयक का प्रारंभिक सदन :-
- एक साधारण विधेयक विधानमंडल के किसी भी सदन में प्रारंभ हो सकता है।
- ऐसा कोई भी विधेयक, मंत्री या किसी भी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।
- विधेयक प्रारंभिक सदन में तीन स्तरों (प्रथम पाठन, द्वितीय पाठन, तृतीय पाठन) से गुजरता है।
- प्रारंभिक सदन से विधेयक के पारित होने के बाद दूसरे सदन में विचारार्थ और पारित करने हेतु भेजा जाता है।
- एक सदनीय व्यवस्था वाले विधानमण्डल में इसे पारित कर सीधे राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है।
B. दूसरे सदन में विधेयक :-
- दूसरे सदन में भी विधेयक प्रथम पाठन, द्वितीय पाठन एवं तृतीय पाठन स्तरों के बाद पारित होता है।
- विधानसभा से पारित होने के बाद कोई भी विधेयक विधानपरिषद् में भेजा जाता है, तो वहाँ निम्न विकल्प होते है-
1. स्वीकृत कर दिया जाए।
2. अस्वीकृत कर दे।
3. संशोधन सहित पारित कर विचारार्थ हेतु विधानसभा को भेज दिया जाए।
4. कोई भी कार्यवाही नहीं की जाए और विधेयक को लंबित रखा जाए।
- साधारण विधेयक पारित करने के संदर्भ में विधानसभा को विशेष शक्ति प्राप्त है।
- विधानपरिषद् किसी विधयेक को अधिकतम चार माह के लिए रोक सकती है। पहली बार में तीन माह के लिए और दूसरी बार में एक माह के लिए।
- किसी विधेयक पर असहमति होने पर दोनों सदनों की संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है।
- यदि कोई विधेयक विधान परिषद् में निर्मित हो और उसे विधानसभा अस्वीकृत कर दे तो विधेयक समाप्त हो जाता है।
नोट :- किसी साधारण विधयेक को पास कराने के लिए लोकसभा एवं राज्यसभा की संयुक्त बैठक का प्रावधान है।
C. राज्यपाल की स्वीकृति :-
- विधानसभा या द्विसदनीय व्यवस्था में दोनों सदनों द्वारा पारित होने के बाद प्रत्येक विधेयक राज्यपाल के समक्ष स्वीकृति के लिए भेजा जाता है।
- राज्यपाल के पास निम्न चार विकल्प होते हैं-
1. स्वीकृति प्रदान करे।
2. विधेयक को अपनी स्वीकृति देने से रोके रखे।
3. सदन के पास विधेयक को पुनर्विचार के लिए भेज दे।
4. राष्ट्रपति के विचारार्थ विधेयक को सुरक्षित रख ले।
- यदि राज्यपाल द्वारा स्वीकृति दे दी जाती है तो विधेयक अधिनियम बन जाता है।
- राज्यपाल विधेयक को पुनर्विचार के लिए भेजता है और दोबारा सदन या सदनों द्वारा इसे पारित कर दिया जाता है और पुन: राज्यपाल के पास भेजा जाता है तो राज्यपाल को उसे मंजूरी देना अनिवार्य हो जाता है।
- यदि राज्यपाल विधेयक को रोक लेता है तो विधेयक समाप्त हो जाता है और अधिनियम नहीं बनता।
- यदि कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रखा जाता है तो राष्ट्रपति या तो अपनी स्वीकृति दे देते हैं उसे रोक सकते या विधानमंडल के सदन या सदनों को पुनर्विचार हेतु भेज सकते हैं। 6 माह के भीतर इस विधेयक पर पुनर्विचार अनिवार्य है।
- यदि विधेयक को उसके मूल रूप में या संशोधित कर दोबारा राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है तो संविधान में इस बात का उल्लेख नहीं है कि राष्ट्रपति इस विधेयक को मंजूरी दे या नहीं।
2. धन विधेयक के संबंध में (अनुच्छेद 198)
- धन विधेयक विधानपरिषद् में पेश नहीं किया जा सकता है।
- धन विधेयक राज्यपाल की पूर्व स्वीकृति से ही विधानसभा में प्रस्तुत किया जाता है।
- धन विधेयक को सरकारी विधेयक कहा जाता है क्योंकि यह केवल मंत्री द्वारा ही प्रस्तुत किया जाता है।
- विधानसभा में पारित होने के बाद धन विधेयक को विधानपरिषद् को विचारार्थ हेतु भेजा जाता है।
- विधानपरिषद् न तो इसे अस्वीकार कर सकती है, न ही इसमें संशोधन कर सकती है।
- विधानपरिषद् केवल सिफारिश कर सकती है और 14 दिनों में विधेयक को लौटाना भी होता है।
- विधानसभा विधान परिषद् के सुझावों को स्वीकार भी कर सकती है और अस्वीकार भी।
- यदि विधान परिषद् 14 दिनों के भीतर विधानसभा को विधेयक न लौटाए तो इसे दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है।
- धन विधेयक को विधानपरिषद् अधिकतम 14 दिन तक रोक सकती है।
- राज्यपाल धन विधेयक को राज्य विधानमंडल के पास पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता। सामान्यत: राज्यपाल स्वीकृति दे देता है क्योंकि इसे राज्यपाल की पूर्व सहमति से ही लाया जाता है।
नोट :-
1. राज्य विधानमंडल द्वारा प्रस्तुत किसी विधेयक को अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित स्थानों की शक्ति राज्यपाल के स्वविवेक के अधीन है।
2. अनुच्छेद 200 में यह स्पष्ट उल्लेख है कि उच्च न्यायालय की शक्तियों में कमी करने वाला विधेयक अनिवार्य रूप से राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा। उदा. के लिए राजस्थान में 1973 में लोकायुक्त एवं 2009 में ग्राम न्यायालय से संबंधित विधेयक राज्यपाल के द्वारा राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजे गए थे।
3. संविधान के अनुच्छेद 201 के अनुसार जब कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रख लिया जाता है जब राष्ट्रपति घोषित करेगा कि वह विधेयक पर अनुमति देता है या अनुमति रोक लेता है।
राज्य विधानमंडल के विशेषाधिकार (अनुच्छेद 194)
- राज्य विधानमण्डल के विशेषाधिकार राज्यपाल को प्राप्त नहीं होते हैं जो राज्य विधानमण्डल का अंग है।
- विशेषाधिकारों को दो श्रेणियों में बाँटा जाता है एक जिन्हें राज्य विधानमंडल के प्रत्येक सदन द्वारा संयुक्त रूप से प्राप्त किया जाता है दूसरा जिन्हें सदस्य व्यक्तिगत रूप से प्राप्त करते हैं।
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सामूहिक विशेषाधिकार |
व्यक्तिगत विशेषाधिकार |
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सदन को अपने प्रतिवेदनों, वाद-विवादों और कार्यवाहियों को प्रकाशन करें या अन्यों को इसके प्रकाशन से प्रतिबंधित करे। |
उन्हें सदन चलने के 40 दिन पहले और 40 दिन बाद तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। |
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यह कुछ महत्वपूर्ण मामलों में गुप्त बैठक कर सकते हैं। |
राज्य विधानमंडल में बोलने की स्वतंत्रता है। उसके द्वारा किसी कार्यवाही या समिति में दिए गए मत या विचार को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है। |
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न्यायालय सभा या इसकी समितियों की जाँच नहीं कर सकती। |
जब सदन चल रहा हो, वे साक्ष्य देने या किसी मामले में गवाह उपस्थित होने से इनकार कर सकते है। |
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पीठासीन अधिकारी की अनुमति के बिना किसी व्यक्ति (सदस्य या बाह्य) को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। |
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यह फटकार या कारावास द्वारा विशेषाधिकारों के उल्लंघन या सभा की अवमानना के लिए सदस्यों सहित बाह्य व्यक्तियों को दण्डित कर सकती है। |
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नोट :-
1. अनुच्छेद 210 के अनुसार राज्य विधानमंडल की भाषा हिंदी एवं अंग्रेजी होगी। सदन के अध्यक्ष द्वारा अनुमति दिए जाने पर मातृभाषा में विचार अभिव्यक्त किए जा सकते हैं।
2. अनुच्छेद 211 के अनुसार राज्य विधानमंडल न्यायपालिका पर कोई टिका-टिप्पणी नहीं करेगा।
3. अनुच्छेद 212 के अनुसार न्यायपालिका राज्य विधानमंडल में होने वाली किसी भी व्यवहार पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगी।
विधानसभा की समितियाँ
विधानसभा की मुख्यत: चार वित्तीय समितियाँ होती है-
i. लोक लेखा समिति
ii. लोक उद्यम समिति
iii. अनुमान समिति ‘क’
iv. अनुमान समिति ‘ख’
- विधानसभा की सभी समितियों में 15-15 सदस्य होते हैं। केवल पुस्तकालय समिति में ही 10 सदस्य होते हैं।
i. लोक लेखा समिति
- राज्य सरकार पर वित्तीय नियंत्रण एवं निगरानी हेतु विधानसभा की लोक लेखा समिति का प्रथम बार गठन 10 अप्रैल, 1952 को किया गया था।
- इसके सदस्यों को विधानसभा सदस्यों द्वारा अपने में से एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा प्रतिवर्ष चुनाव किया जाता है।
- इसके सदस्यों की संख्या 15 होती है।
- इसका अध्यक्ष विरोधी दल का सदस्य होता है। जिसका चुनाव विधानसभा अध्यक्ष द्वारा किया जाता है।
- कोई मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं हो सकता ।
- इस समिति का कार्यकाल 1 वर्ष का होता है।
ii. लोक उद्यम समिति
- सरकारी उपक्रमों पर वित्तीय नियंत्रण स्थापित करने हेतु विधानसभा द्वारा इस समिति का गठन किया जाता है।
- लोक उपक्रम समिति का गठन विधानसभा के 15 सदस्यों को मिलाकर किया जाता है।
- सभी 15 सदस्यों का चुनाव एक वर्ष के लिए होता है।
- समिति के अध्यक्ष का चुनाव विधानसभा अध्यक्ष द्वारा किया जाता है।
iii. प्राक्कलन (अनुमान) समिति
- विधानसभा द्वारा इस समिति का गठन भी अपने सदस्यों में से एकल संक्रमणीय मत पद्धति द्वारा प्रतिवर्ष किया जाता है।
- सदस्य संख्या - 15
- इन समितियों के अध्यक्ष का चुनाव विधानसभा अध्यक्ष द्वारा किया जाता है।
विधानसभा और विधानमंडल में अंतर
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आधार |
विधानसभा |
विधान परिषद |
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अन्य नाम, उपनाम |
प्रथम सदन निम्न सदन लोक सदन अस्थायी सदन जनता का सदन शक्तिशाली सदन लोकप्रिय सदन |
द्वितीय सदन उच्च सदन बुद्धिजीवियों का सदन स्थायी सदन कमजोर सदन अलोकप्रिय सदन
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संरचना |
अनुच्छेद:- 170 |
अनुच्छेद:- 171 में |
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अधिकतम सदस्य संख्या |
500 से अधिक नहीं |
विधानसभा सदस्य संख्या के 1/3 से अधिक नहीं |
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न्यूनतम सदस्य संख्या |
60 |
40 |
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चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु |
25 वर्ष पूर्ण प्रत्यक्ष, गुप्त मतदान फर्स्ट पास्ट द पोस्ट प्रणाली जनता द्वारा वयस्क मताधिकार के आधार पर |
30 वर्ष पूर्ण अप्रत्यक्ष, खुला मतदान आनुपातिक प्रणाली की एकल संक्रमण मत प्रणाली
एक निर्वाचक मण्डल द्वारा 1. विधानसभा द्वारा निर्वाचित:- \(\frac{1}{3}\) 2. स्थानीय संस्थाओं द्वारा निर्वाचित \(\frac{1}{3}\) 3. राज्यपाल द्वारा मनोनीत 4. अध्यापकों द्वारा निर्वाचित:- \(\frac{1}{12}\) 5. स्नातकों द्वारा निर्वाचित:- \(\frac{1}{12}\) Note:- विधानपरिषद में - कुल निर्वाचित सदस्य \(\frac{5}{6}\) - कुल मनोनित सदस्य \(\frac{1}{6}\) |
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कार्यकाल |
5 वर्ष सामान्यत: परन्तु अनुच्छेद-174 के तहत मुख्यमंत्री की सिफारिश पर राज्यपाल इसे पहले भी भंग कर सकता है। आपातकाल में इसके कार्यकाल को बढ़ाया भी जा सकता है। परन्तु 1 बार में 1 वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता। |
कोई कार्यकाल नहीं होता यह एक स्थायी सदन है। प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। निर्वाचित सदस्य:- प्रति 2 वर्ष बाद 1/3 कार्यकाल समाप्त 1/3 नये निर्वाचित-मनोनीत सदस्य:- प्रति 3 वर्ष बाद 1/2 कार्यकाल समाप्त ½ नये मनोनीत |
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शपथ |
राज्यपाल या राज्यपाल द्वारा नामित सदस्य व्यवहार में गठित नई विधानसभा में चुनाव में निर्वाचित वरिष्ठ सदस्य को राज्यपाल विधान सभा सदस्य पद की शपथ दिलाता है तथा इसे अन्य सदस्यों को पद की शपथ दिलाने व स्थायी अध्यक्ष का चुनाव करवाने हेतु नामित करता है। प्रोटेमस्पीकर या अस्थाई अध्यक्ष कहा जाता है। |
राज्यपाल या राज्यपाल द्वारा नामित सदस्य व्यवहार में गठित नई विधान परिषद् में चुनाव में निर्वाचित वरिष्ठ सदस्य को राज्यपाल विधान सभा सदस्य पद की शपथ दिलाता है तथा इसे अन्य सदस्यों को पद की शपथ दिलाने व स्थायी अध्यक्ष का चुनाव करवाने हेतु नामित करता है। या अस्थाई अध्यक्ष कहा जाता है। प्रोटेमस्पीकर
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पदाधिकारी |
अध्यक्ष:- प्रथम अध्यक्ष नरोत्तमलाल जोशी वर्तमान अध्यक्ष C.P. जोशी उपाध्यक्ष:- प्रथम उपाध्यक्ष लाल सिंह शक्तावत वर्तमान में उपाध्यक्ष का पद रिक्त है। |
सभापति उपसभापति |
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पदाधिकारियों का चुनाव |
अध्यक्ष व उपाध्यक्ष दोनों का चुनाव विधानसभा सदस्य अपने में से करते है। |
सभापति व उपसभापति दोनों का चुनाव विधानपरिषद के सदस्य अपने में से करते है। |
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पदाधिकारियों की शपथ |
अध्यक्ष, उपाध्यक्ष पद की शपथ नहीं दिलायी जाती |
सभापति, उपसभापति पद की शपथ नहीं दिलायी जाती |
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पदाधिकारियों द्वारा त्यागपत्र |
अध्यक्ष → उपाध्यक्ष को उपाध्यक्ष → अध्यक्ष को |
सभापति → उपसभापति के उप-सभापति → सभापति को |
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पदाधिकारियों की अनुपस्थिति |
अध्यक्ष → उपाध्यक्ष → विधानसभा सदस्यों द्वारा निर्धारित सदस्य |
सभापति → उपसभापति विधानपरिषद सदस्यों द्वारा निर्धारित सदस्य |
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पदाधिकारियों का पद रिक्त/खाली |
अध्यक्ष → उपाध्यक्ष → राज्यपाल द्वारा निर्धारित सदस्य |
सभापति → उपसभापति → राज्यपाल द्वारा नामित सदस्य |
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पदाधिकारियों का कार्यकाल |
सदन का सदस्य रहने तक परन्तु अपने उत्तराधिकारी के पद ग्रहण करने तक पद खाली नहीं करेगा। |
सदन का सदस्य रहने तक परन्तु अपने उत्तराधिकारी के पद ग्रहण करने तक पद खाली नही करेगा। |
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पदाधिकारियों का पदमुक्तों करना |
विधानसभा सदस्य अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत से संकल्प प्रस्ताव पारित कर पदमुक्त करते है। सूचना:- 14 दिन पहले |
विधानपरिषद सदस्य अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत से संकल्प प्रस्ताव पारित कर पदमुक्त करते है। सूचना:- 14 दिन पहले |
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पदाधिकारियों द्वारा दिये जाने वाले मत |
अध्यक्ष पीठासीन अधिकारी के रूप में मत बराबर रहने की स्थिति में निर्णायक मत देता है। जब अध्यक्ष के विरूद्ध पदमुक्ति प्रस्ताव विचाराधीन होते। यह पीठासीन अधिकारी के रूप में नहीं करेगा। ऐसी परिस्थिती में यह सदस्य के रूप में सामान्य मत दे सकता है। |
सभापति पीठासीन अधिकारी के रूप में मत बराबर रहने की स्थिति में निर्णायक मत देता है। जब सभापति के विरूद्ध पदमुक्ति प्रस्ताव विचाराधीन होते। यह पीठासीन अधिकारी के रूप में नहीं करेगा। ऐसी परिस्थिति में यह सदस्य के रूप में सामन्य मत दे सकता है। |
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गणपूर्ति |
1/10 परन्तु कम से कम 10 जो भी अधिक हो |
1/10 परन्तु कम से कम 10 जो भी अधिक हो |