भारतीय अर्थव्यवस्था - एक परिचय
अर्थव्यवस्था- प्रमुख विशेषताएँ
-अर्थशास्त्र एक ऐसा तंत्र है जिसके अन्तर्गत विभिन्न आर्थिक क्रियाओं, संस्थागत क्रियाओं एवं उसके क्रियात्मक संबंधों का अध्ययन किया जाता है। सामान्य शब्दों में यह अर्थ/वित्त/धन की प्राप्ति से संबंधित मानवीय क्रियाओं के अध्ययन से संबंधित है।
-आर्थिक क्रियाओं के अंतर्गत उत्पादन उपभोग, विनिमय, वितरण, बचत, निवेश शामिल हैं।
-अर्थव्यवस्था अर्थशास्त्र का व्यावहारिक पक्ष है।
-समाज द्वारा दुर्लभ संसाधनों का सर्वोच्चतम उपयोग कैसे किया जाये, अर्थशास्त्र इसका अध्ययन करता है।
अर्थशास्त्र को दो भागों में बाँटा गया है-
1.व्यष्टि (micro) अर्थशास्त्र:- जब अर्थव्यवस्था को व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयों के आधार पर अध्ययन किया जाता है तो उसे व्यष्टि अर्थशास्त्र कहते हैं। अर्थव्यवस्था की छोटी इकाइयाँ का अध्ययन किया जाता हैं जैसे - उपभोक्ता व्यवहार सिद्धांत, उत्पादक व्यवहार सिद्धांत, कीमत सिद्धांत इत्यादि।
2.समष्टि अर्थशास्त्र (macro):- समष्टि अर्थशास्त्र में समस्त आर्थिक क्रियाओं का सम्पूर्ण रूप से अध्ययन किया जाता है। राष्ट्रीय आय, उत्पादन, राजकोषीय नीति, मौद्रिक नीति इत्यादि।
अर्थव्यवस्था के प्रकार :-
1.विकास के आधार पर :-
- विकसित अर्थव्यवस्थाः यह आर्थिक गतिविधियों एवं विकास के एक बेहतर स्तर का प्रतिनिधित्व करता है। यह हमेशा सापेक्षिक एवं तुलनात्मक संदर्भ में प्रयुक्त होता है क्योंकि इसकी किसी सीमा/स्तर/मानदण्ड का निर्धारण कठिन है। उदाहरण के रूप में यू.एस.ए. जापान, पश्चिमी यूरोप जैसे देशों की प्रतिव्यक्ति आय अथवा बेहतर जीवन के आधार पर विकसित देश कहा जा सकता है।
बाजार के लिए दूसरी अर्थव्यवस्था पर निर्भर रहते हैं तथा
सकल घरेलू उत्पाद मे सेवा क्षेत्र का योगदान सर्वाधिक होता है।
-विकासशील अर्थव्यवस्था: यह विकास की ओर अग्रसर अर्थव्यवस्था का सूचक है। वैसे विश्व की सभी अर्थव्यवस्था इस श्रेणी में आती हैं परंतु इसका प्रयोग वैसी अर्थव्यवस्था को सूचित करने के लिये होता है जो पिछड़ी अवस्था से उच्च विकास की ओर प्रयासरत हैं। उदाहरण के रूप में भारत, चीन, ब्राजील आदि विकास की ओर अग्रसर हैं।
इन अर्थव्यवस्था मे विकास की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है परंतु अभी तक संसाधनों का पूर्ण रूप से उपयोग नहीं हुए है ।
निवेश तथा तकनीक के लिए विकसित देशों पर निर्भर रहती है , सकल घरेलू उत्पाद मे सर्वाधिक योगदान कृषि व उद्योग क्षेत्र का होता है ।
- अल्पविकसित अर्थव्यवस्था – अर्थव्यवस्था मे कृषि क्षेत्र का योगदान सर्वाधिक होता है तथा अर्थव्यवस्था की निर्भरता प्राथमिक क्षेत्र पर बनी हुई है।
2.स्वामित्व के आधार पर :-
-पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाः इसमें आर्थिक साधनों पर निजी स्वामित्व होता है। इसके अंतर्गत सरकार आर्थिक साधनों के संगठन में अहस्तक्षेप की नीति अपनाती है। यह बाजार की शक्तियों अर्थात् मांग और आपूर्ति के सिद्धातों के अंतर्गत स्वतंत्र रूप से कार्य करती है। इसे बाजार अर्थव्यवस्था के रूप में जाना जाता है।
-समाजवादी अर्थव्यवस्थाः यह कार्ल मार्क्स के विचारों पर आधारित वैसी व्यवस्था का प्रतिपादन करता है जिसके अंतर्गत उत्पादन के समस्त साधनों पर राज्य/सरकार/समुदाय का नियंत्रण होता है जैसे पूर्व सोवियत अर्थव्यवस्था ।
आवश्यकता अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है तथा लोककल्याण को अर्थव्यवस्था के केंद्र मे रखा जाता है।
-मिश्रित अर्थव्यवस्थाः यह पूँजीवादी एवं समाजवादी अर्थव्यवस्था के तत्त्वों का श्रेष्ठ समायोजन है। इसके अंतर्गत आर्थिक संसाधनों के महत्वपूर्ण भाग पर सरकार अथवा राज्य का नियंत्रण होता है। साथ ही निजी क्षेत्र के विकास का भी उपयुक्त अवसर प्राप्त होता है। इसका व्यावहारिक रूप संयुक्त उपक्रमों के अंतर्गत दृष्टिगोचर होता है। भारतीय अर्थव्यवस्था इसका उदाहरण है।
3.विकास की रणनीति के आधार पर :-
-योजनाबद्ध अर्थव्यवस्थाः यह अर्थव्यवस्था के विकास की एक सुविचारित रणनीति है। यह नियोजित रूप में अर्थव्यवस्था के विकास की दिशा को निर्धारित करता है। इसके अंतर्गत अल्प, मध्य एवं दीर्घ अवधि की योजना हो सकती है। इसमें राज्य की केन्द्रीय भूमिका होती है। इसका उदाहरण मुख्यतः समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं में देखा जा सकता है।
-गैर योजनाबद्ध अर्थव्यवस्थाः जिस अर्थव्यवस्था के विकास के लिये कोई योजना नहीं बनायी जाती वह गैर योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था के अंतर्गत आता है। वर्तमान में विश्व में कोई भी ऐसा देश नहीं है जो योजना की रणनीति न अपनाता हो।
4.विदेशी सम्बन्धों के आधार पर :-
-बंद अर्थव्यवस्थाः बंद अर्थव्यवस्था के अंतर्गत एक अर्थव्यवस्था शेष विश्व के साथ किसी प्रकार की विदेशी व्यापार की क्रिया संपन्न नहीं करता है। इसकी सभी आर्थिक क्रियाएँ एक देश की सीमा के भीतर ही होती है।
-खुली अर्थव्यवस्थाः यह बंद अर्थव्यवस्था के विपरीत नियंत्रण मुक्त अर्थव्यवस्था है, जो प्रतियोगिता को प्रोत्साहित करता है। यह अन्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ निकटतम संबंध, सहयोग एवं संलग्नता पर बल देता है। वर्तमान में वैश्वीकरण की नीति में सभी देश अब मुक्त अर्थव्यवस्था को अपना रहे हैं।
-आश्रित अर्थव्यवस्थाः वैसी अर्थव्यवस्था जो अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिये दूसरी अर्थव्यवस्था पर आधारित हो। वर्तमान भूमण्डलीकरण के युग में सभी अर्थव्यवस्था आश्रित अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर हैं। वर्तमान में नेपाल, भूटान आदि अल्पविकसित देश इस प्रकार की अर्थव्यवस्था के उदाहरण हैं।
-आत्मपूरक अर्थव्यवस्थाः ऐसी अर्थव्यवस्था जिसके अंतर्गत अपनी आवश्यकता के अनुरूप सभी वस्तुओं के उत्पादन की क्षमता विद्यमान है। वर्तमान ऐसी अर्थव्यवस्था कोई नहीं है
परस्पर निर्भर – वे अर्थव्यवस्थाएँ जिनमें आत्मनिर्भर व आक्षित दोनों के गुण मौजूद होते हैं उसे परस्पर निर्भर अर्थव्यवस्था कहते है।
वर्तमान समय में अधिकांश अर्थव्यवस्था इसी क्षेणी में आती है।
अर्थव्यवस्था के क्षेत्र :-
सामान्यतः संपूर्ण अर्थव्यवस्था की आर्थिक गतिविधियों को लेखांकित करने के लिये निम्न क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है-
1.प्राथमिक क्षेत्र (primary sector):- इसके अंतर्गत पाँच क्षेत्रों को सम्मिलित किया जाता है-
a. कृषि व संबंधित क्षेत्र
b.वानिकी
c.मत्स्यन (मछली पकड़ना)
d.खनन (उर्ध्वाधर खुदाई) एवं उत्खनन (क्षैतिज खुदाई)
वस्तुतः इसके अंतर्गत अर्थव्यवस्था के प्राकृतिक क्षेत्रों का लेखांकन किया जाता है।
2.द्वितीयक क्षेत्र (secondary sector):- इसके अंतर्गत निम्न क्षेत्रों को सम्मिलित किया जाता हैं-
-निर्माण: जहाँ किसी स्थायी परिसम्पत्ति का निर्माण किया जाये - जैसे भवन।
-विनिर्माण: जहाँ किसी वस्तु का उत्पादन हो जैसे-कपड़ा, ब्रेड आदि।
- विद्युत, गैस एवं जलापूर्ति इत्यादि से संबंधित कार्य आते हैं। इस क्षेत्रक के अन्तर्गत मुख्यतः अर्थव्यवस्था की विनिर्मित वस्तुओं के उत्पादन का लेखांकन किया जाता है।
3.तृतीयक या सेवा क्षेत्र (Tertiary Sector) : यह क्षेत्र अर्थव्यवस्था के प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रक को अपनी उपयोगी सेवाएँ प्रदान करता है। इसके अंतर्गतः-
i.परिवहन एवं संचार,
ii.बैंकिंग
iii.बीमा
iv.भण्डारण
v.व्यापार
vi.सामुदायिक सेवाएँ व संचार आदि
4. चतुष्क क्षेत्र (Quaternary Sector) :
-शिक्षा-खोज एवं अनुसंधान से जुड़ी गतिविधियों को चतुष्क क्षेत्र में रखा गया है।
-म्यूचुअल फंड प्रबंधन, पोर्ट फोलियो प्रबंधक, कर प्रबंधक सांख्यिकीयविद्, सॉफ्टवेयर डेवलपर्स, शोध इत्यादि।
5.पंचक क्षेत्र (Quinary Sector) :
-उच्च किस्म की सेवाएँ जैसे किसी अर्थव्यवस्था के सभी शीर्ष निर्णयों से जुड़ी गतिविधियाँ, देश के सामाजिक व आर्थिक क्षेत्र से जुड़े निर्णय करने वाली सेवाओं को इस क्षेत्र में रखा गया है।
-गोल्डन कॉलर जॉब – P.M., CEO, C.M. इत्यादि।
-इसके अतिरिक्त अर्थव्यवस्था को कई अन्य आधारों पर भी विभाजित किया जाता है। इसे निम्न प्रकार से रेखांकित किया जा सकता हैं-
-वस्तु क्षेत्रक: प्राथमिक क्षेत्रक और द्वितीयक क्षेत्रक को सम्मिलित रूप में वस्तु क्षेत्रक कहा जाता है। इसके अन्तर्गत भौतिक वस्तुओं के उत्पादन को शामिल किया जाता है।
-गैर वस्तु क्षेत्रक: किसी अर्थव्यवस्था के सेवा क्षेत्रक को गैर वस्तु क्षेत्रक भी कहा जाता है।
-संगठित क्षेत्रक: इसके अंतर्गत वे सभी इकाइयाँ आ जाती हैं जो अपने आर्थिक कार्यकलापों के नियमित लेखांकन करती हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था में लगभग इस क्षेत्र से है।
-असंगठित क्षेत्र : इसके अंतर्गत सभी इकाइयाँ आ जाती हैं जो अपने आर्थिक कार्यकलापों का कोई लेखा जोखा नहीं र खती हैं। जैसे-रेहड़ी, खोमचे, सच्ची की खुदरा दुकानें, दैनिक मजदूर आदि। भारतीय अर्थव्यवस्था इसका लगभग 91% भाग है।
अल्प वि कास बनाम विकास
-विश्व की विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं की जा नका री प्राप्त करने हेतु अर्थशास्त्रियों ने विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं की तुलना करके उ न्हें अल्पविकसित और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में विभाजित किया है। अतः यह एक सापेक्ष शब्द है।
-पूर्व में प्रचलित शब्द पिछड़े और उन्नत के स्थान पर विकासशील और विकसित शब्दों के व्यवहार को श्रेयस्कर समझा जा रहा है, क्योंकि अल्पविकसित शब्द एक स्थिति का सूचक है जबकि विकासशील अर्थव्यवस्था में संभावना पर बल दिया जा रहा है। उदाहरण के लिये भारतीय एवं चीनी अर्थव्यवस्थाओं को अल्पविकसित कहना सही नहीं होगा क्योंकि ये दोनों तीव्रता से विकास कर रही हैं।
-संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रकाशनों में अल्पविकसित देशों को विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के रूप में परिभाषित किया गया है।
अल्प विकास के सूचक
-संयुक्त राष्ट्र संघ ने अल्प विकास के सूचक के रूप में निम्न प्रति व्यक्ति आय को मानक के रूप में स्वीकार किया है।
-इसके अनुसार जिनकी प्रति व्यक्ति वास्तविक आय संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, पश्चिमी यूरोप की तुलना में कम है वे अल्पविकसित देश हैं।
-यद्यपि सभी उच्च आय वाले देश अनिवार्यत: विकसित नहीं कहे जा सकते जैसे, तेल निर्यातक देश। वस्तुत: तेल निर्यातक देशों में आर्थिक संवृद्धि के साथ आधुनिकीकरण के तत्त्व जैसे औद्योगिक संरचना में बदलाव नहीं आया है एवं आय का बढ़ना सिर्फ तेल की कीमतों पर निर्भर करता है।
-अर्थशास्त्री गरीबी, आर्थिक असमानता और बेरोजगारी को इसके सूचक के रूप में स्वीकार करते हैं। इनके अनुसार विकास इन समस्याओं के निवारण की एक प्रक्रिया है।
अल्पविकास की विशेषताएँ
-निम्न प्रति व्यक्ति आय एवं गरीबी: अल्पविकसित देशों के प्रति व्यक्ति आय काफी कम है एवं गरीबी का प्रसार काफी है। जैसे 2019 में भारत में प्रति व्यक्ति आय ($2020)थी एवं 139.1 मिलियन जनसंख्या अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा (1.90 डॉलर प्रतिदिन आय ) के नीचे हैं।
-पूँजी का अभाव: अधिकता अल्पविकसित देशों में गरीबी के कारण पूँजी निर्माण की दर बहुत कम है। जब आय स्तर अधिक होता है तो बचत करने की क्षमता भी अधिक होती है। अल्पविकसित देशों में केवल चीन ही ऐसा देश है जिसमें बचत दर बहुत अधिक है तथा 40 प्रतिशत (राष्ट्रीय आय के अनुपात में ) के स्तर पर सतत रूप में टिकी हुई है।
-जनसंख्या का भार: अल्पविकसित देशों में तीव्र जनसंख्या वृद्धि दर (2 से 4 प्रतिशत वार्षिक ) एवं स्वास्थ्य सुविधाओं की बढ़ती उपलब्धता तथा गिरती मृत्यु दर के कारण जनसंख्या आधिक्य की स्थिति दिखायी देती है। अत: ऐसी स्थिति में 0 - 15 और 64 वर्ष से अधिक की आश्रित जनसंख्या देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ होती है। इस तरह इन देशों. में बचत कम रह जाती है अत: विकास हेतु निवेश कठिन हो जाता है।
आर्थिक समस्याएँ
-कृषि पर निर्भरता: अल्पविकसित देशों में 70 से 90 प्रतिशत तक जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। कृषि पर अत्यधिक निर्भरता होने के बावजूद भी कृषि विकास का स्तर नीचा ही होता है। फलत: कृषि क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली आय इस व्यवसाय में लगी हुई जनसंख्या के अनुपात में नीची होती है। इसके साथ ही अल्पविकसित देशों में अक्सर खेतों की छोटी-छोटी जोतें, कृषि में दूनी का अल्प निवेश, खेती की पिछड़ी हुई रीतियाँ, कृषकों की ऋणग्रस्तता और उनमें कृषि के प्रति लगाव जैसे स्वरूप भी पाया जाता है।
-औद्योगिक पिछड़ापन: अल्पविकसित देशों में उद्योगों की कम संख्या, पिछड़ा औद्योगिक ढाँचा, पुरानी पद्धति के लघु एवं कुटीर उद्योग आदि पाये जाते हैं। इन देशों में बुनियादी एवं भारी उद्योग हैं। जैसे लोहा और इस्पात, भारी इंजीनियरिंग, रसायन, परिवहन आदि अपेक्षाकृत कम कुशल एवं वैश्विक प्रतियोगिता में पिछडते हुए दिखाई पड़ते हैं।
-श्रम उत्पादकता का नीचा स्तर: अल्पविकसित देशों में श्रम उत्पादकता बहुत कम है। यहाँ श्रम उत्पादकता का तात्पर्य कार्य में लगे हुये व्यक्ति द्वारा किये गये कार्य के सापेक्ष हुए उत्पादन की मात्रा से है। इस कारण आय का स्तर नीचा रहता है और यह गरीबी को जन्म देता है। श्रम उत्पादकता निम्न कारकों पर निर्भर करती है-
1. श्रमिक स्वास्थ्य
2. श्रमिक कौशल
3. आगतों की उपलब्धता
4. संस्थागत ढाँचा
5. काम करने की प्रेरणा
-तकनीकी पिछड़ापन: अल्पविकसित देशों में उत्पादन संबंधी तकनीक पिछड़ी हुई है। प्राय: इसका कारण अज्ञानता समझा जाता है। यद्यपि वास्तविकता यह है कि पूँजी के अभाव और श्रम की अधिकता के कारण नयी तकनीकों का प्रयोग प्रचलित नहीं है, जबकि पश्चिमी देश इसे आसानी से अपना लेते हैं।
-बेरोजगारी: अल्पविकसित देशों में बेरोजगारी के विभिन्न स्वरूप दिखायी देते हैं। श्रमिकों की उपलब्धता के बाद भी रोजगार के अवसरों की उपलब्धता नहीं है। कई बार श्रमिकों को उनकी योग्यता से कम पर कार्य मिलता है। कृषि जैसे क्षेत्र में आवश्यकता से अधिक लोगों का संलिप्त होना प्रच्छन बेरोजगारी पैदा करता है।
-द्वैतवादी व्यवस्था: इन देशों में परम्परागत क्षेत्र (प्राथमिक)एवं आधुनिक क्षेत्र (द्वितीयक एवं तृतीयक) साथ-साथ पाये जाते हैं। परम्परागत क्षेत्र में न्यूनतम आवश्यकता के कारण प्रेरणा एवं उद्यमिता का अभाव होता है। इसके साथ ही आधुनिक क्षेत्र में पूँजी, तकनीक एवं कौशल के अभाव में विकास की गुंजाइश नहीं रहती है। अत: इन देशों में अधिकाधिक जनसंख्या कृषि में लगी रहती है।
-मानव कल्याण का नीचा स्तर: अल्पविकसित देशों में मानव कल्याण का स्तर काफी नीचा देखा गया है। किसी देश में मानव कल्याण के तीन सूचक होते हैं- -
1. वास्तविक प्रति व्यक्ति आय:
2. स्वास्थ्य:
3. शिक्षा:
-आर्थिक असमानताएँ: विकसित देशों में की तुलना में अल्पविकसित देशों में आय और सम्पत्ति के वितरण में असमानताएँ अधिक होती हैं। वस्तुतः विकसित देशों में कराधान की प्रगतिशील प्रणाली, सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था, शिक्षा व प्रशिक्षण और रोजगार की दृष्टि से समान अवसरों के कारण आर्थिक असमानताएँ कम हुई हैं, वहीं अल्पविकसित देशों में व्यापक सामाजिक विषमता तथा बेरोजगारी व्याप्त है।
विश्व बैंक द्वारा अर्थव्यस्थाओं का वर्गीकरण
-विश्व बैंक सकल राष्ट्रीय आय (Gross Rational Income- GNI) के आधार पर विश्व के सभी 218 देशों की अर्थव्यवस्था का वर्गीकरण करता हैं।
-इस वर्गीकरण का हर साल 1 जुलाई को अपडेट (संशोधित) किया जाता है।
-वर्ष 2020 का वर्गीकरण 2019 के GNI पर आधारित हैं।
-विश्व बैंक के तय मानकों के अनुसार, यदि किसी देश की प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) 1036 डॉलर से अधिक हो जाती है, तो उसे गरीब देश की श्रेणी से ऊपर माना जाता हैं।
-विश्व बैंक सभी अर्थव्यवस्थाओं को उनके नागरिकों के प्रति व्यक्ति के आधार पर चार वर्गों मं बाँटा गया है।
1. निम्न-आय वर्ग अर्थव्यवस्था - $ 1,036 या उससे कम
2. निम्न–मध्य आय वर्ग अर्थव्यवस्था -$1,036 से $4045
3. उच्च – मध्य आय वर्ग अर्थव्यवस्था - $4,046 से $12535
4. उच्च –आय वर्ग अर्थव्यवस्था - $12,536 या अधिक
भारत और उसके पड़ोसी और ब्रिक्स देश
-मालदीव ($9310) दक्षिण – एशिया में एक मात्र देश है। जो उच्च मध्यम – आय वर्ग में है।
-श्रीलंका ($4020)
-पाकिस्तान ($1,580)
-बांग्लादेश ($1750)
-भारत ($2020)
-भूटान ($3080)
-भारत ($2020)
-ये सारे निम्न – मध्यम वर्ग में है।
-अफगानिस्तान ($550) निम्न आय वर्ग की अर्थवस्थाओं में है।
-ब्रिक्स देशों में निम्न- मध्य- आय वर्ग में भारत एक मात्र हैं। ब्रिक्स के अन्य देशों में - ब्राजील ($9140), रूस ($10230), चीन ($9470) और दक्षिण अफ्रीका ($5,720)उच्च- मध्य आय वर्ग में हैं।
-नेपाल का वर्गीकरण निम्न आय से निम्न मध्य आय में किया है। - प्रति व्यक्ति आय $960 से $1050 हो गया।
भारतीय अर्थव्यवस्था पूँजी के अभाव से ग्रस्त है।
यह दो रूपों मे प्रकट होती है-
1. प्रतिव्यक्ति उपलब्ध पूँजी की निम्न मात्रा
2. पूँजी -निर्माण की प्रचलित निम्न दर
-परिसम्पत्तियों का दोषपूर्ण वितरण: भारत में परिवारों के बीच परिसम्पत्तियों के वितरण में व्यापक असमानता है।
मानव पूँजी का निम्न स्तर :
-भारत में मानव पूँजी का स्तर निम्न पाया गया है। मानवीय पूँजी के आधार पर लगभग 35 प्रतिशत लोग अशिक्षित हैं। इसमें महिलाओं को निरक्षता उनकी कुल जनसंख्या का 47 प्रतिशत है।
विश्व में भारत
-विश्व में जनसंख्या की दृष्टि से भारत दूसरे स्थान पर है।
-विश्व में क्रय शक्ति समता (PPP) के आधार पर भारत तीसरे स्थान पर है।
-विश्व में अधिकतम ऋण ग्रस्त वाले देशों की सूची में भारत 28वें स्थान पर हैं।
आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास
आर्थिक संवृद्धि
-आर्थिक संवृद्धि का तात्पर्य अर्थव्यवस्था में किसी समयावधि में होने वाली वास्तविक आय की वृद्धि से है। अर्थात् किसी अर्थव्यवस्था में यदि सकल राष्ट्रीय उत्पाद, सकल घरेलू उत्पाद एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हो रही है तो यह माना जायेगा कि उस अर्थव्यवस्था की आर्थिक संवृद्धि हो रही है।
आर्थिक विकास
-यह आर्थिक संवृद्धि की तुलना में एक वृहत्तर संकल्पना है। इसमें आर्थिक संवृद्धि के साथ-साथ संरचनात्मक संस्थात्मक एवं गुणात्मक परिवर्तन होना अनिवार्य है। अर्थात् किसी अर्थव्यवस्था में आर्थिक विकास तभी स्वीकार किया जायेगा जब लोगों की आय के साथ-साथ उनके जीवन स्तर में भी गुणात्मक परिवर्तन हो।
1. संरचनात्मक परिवर्तन का तात्पर्य अर्थव्यवस्था की उत्पाद संरचना में परिवर्तन से है अर्थात् प्राथमिक क्षेत्र के सापेक्ष क्रमश: द्वितीय (औद्योगिक) एवं तृतीय क्षेत्र (सेवा) का योगदान कुल राष्ट्रीय आय में अधिक हो साथ ही श्रम संरचना में परिवर्तन से भी है अर्थात् प्राथमिक क्षेत्र के सापेक्ष द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों के श्रमिक नियोजन अधिक हो।
2. संस्थात्मक परिवर्तन का तात्पर्य अर्थव्यवस्था के क्रियाकलापों हेतु औपचारिक संस्थात्मक ढाँचे के विकास मे से है। उदाहरण के लिए मुद्रा हेतु बैंकिंग, शिक्षा हेतु विद्यालय, विश्वविद्यालय, स्वास्थ हेतु कुशल अस्पताल आदि की व्यवस्था हो।
3. गुणात्मक परिवर्तन का तात्पर्य लोगों के रहन-सहन में परिवर्तन से है। अर्थात् जीवन प्रत्याशा, शिक्षा स्वास्थ्य सुविधाओं, प्रति व्यक्ति आय (क्रयशक्ति समता), पोषण के स्तर एवं सामाजिक न्याय की गुणात्मक उपस्थिति हो।
-प्रो. अमर्त्य सेन आर्थिक विकास को दो प्रकार से परिभाषित करते हैं-
(i) अधिकारिता का विस्तार: आर्थिक विकास का आशय पोषण, भूख से मुक्ति, आत्मसम्मान एवं ऐसी दशाएँ उपलब्ध कराने से है, जो व्यक्ति को अपने जीवन को बेहतर बनाने में सामर्थ्यवान बना सके तथा जिससे व्यक्ति में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकारों के प्रति चेतना जाग्रत हो सके।
(ii) क्षमता का विस्तार: यहाँ क्षमता का तात्पर्य व्यक्ति को स्वतंत्रता प्रदान करने से है। अर्थात् मनुष्य सभी प्रकार की आवश्यकताओं, गंदगी तथा अनभिज्ञता के दोषों से मुक्ति है।
उपर्युक्त दोनों परिभाषाओं के आधार पर अमर्त्य सेन यह कहना चाहते हैं कि किसी देश का आर्थिक विकास तभी स्वीकार किया जायेगा जब उसके लोगों में चयन की स्वतंत्रता का विस्तार हो।
आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास में अंतर
-आर्थिक संवृद्धि का अर्थ देश के प्रतिव्यक्ति उत्पादन में एक निश्चित समयावधि हुई वृद्धि से है, जबकि आर्थिक विकास में प्रतिव्यक्ति उत्पादन के साथ यह देखा जाता है कि अर्थव्यवस्था के सामाजिक व आर्थिक ढाँचे में क्या परिवर्तन हुए है।
-जहाँ आर्थिक संवृद्धि का अर्थ उत्पादन में वृद्धि होता है, वहीं आर्थिक विकास का तात्पर्य उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ उत्पादन की तकनीकी और संरचना व्यवस्था में और वितरण प्रणाली में परिवर्तन होता है।
-इस तरह जहाँ आर्थिक संवृद्धि की जाँच करने के लिए राष्ट्रीय आय के आँकड़ों पर गौर करना होता है वहाँ आर्थिक विकास का अनुमान मुख्य रूप से ढाँचागत परिवर्तनों के आधार पर लगाया जाता है।
-आर्थिक संवृद्धि का मापन वस्तुनिष्ठ तरीके से संभव है लेकिन आर्थिक विकास का नहीं।
आर्थिक विकास के मापक
-आर्थिक विकास एक व्यक्तिनिष्ठ अवधारणा है इसलिए इसकी मात्रा का निर्धारण संभव नहीं है फिर भी इसके मापन के संबंध में अनेक प्रयास किये गये हैं। यह किसी परिमाणात्मक चर के आधार पर नहीं बल्कि जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले अनेक चरों से बने सूचकांक के आधार पर विकास की माप करते हैं। यदि किसी देश की वास्तविक प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के साथ-साथ जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो, निर्धनता एवं भुखमरी में कमी हो अथवा साक्षरता तथा जीवन की प्रत्याशा में वृद्धि हो तो ऐसी स्थिति में प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि को आर्थिक विकास का सूचक माना जा सकता है। परंतु सामान्यत: प्रति व्यक्ति वास्तविक आय में वृद्धि गुणात्मक पहलू पर प्रकाश नहीं डालती अत: इसे आर्थिक विकास के मापक के रूप में नहीं लेते हैं।
विकास का मापन - मानव विकास
-यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्ट (1997) के अनुसार मानव विकास वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जनसामान्य के विकल्पों का विस्तार किया जाता है और इनके द्वारा उनके कल्याण के उन्नत स्तर को प्राप्त किया जाता है। ऐसे सिद्धांत न तो सीमाबद्ध होते है और न ही स्थैतिक। परन्तु विकास के स्तर को दृष्टि में रखते हुए जनसामान्य के पास तीन विकल्प हैं-
a. एक लम्बा और स्वास्थ्य जीवन व्यतीत करना
b. ज्ञान प्राप्त करना
c. अच्छा जीवन स्तर प्राप्त करने हेतु आवश्यक संसाधनों तक अपनी पहुँच बढ़ाना।
-इसके अलावा कई और विकल्प हैं जिन्हें बहुत से लोग महत्वपूर्ण मानते हैं। इनमें उल्लेखनीय हैं-राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता से सृजनात्मक और उत्पादक बनने के अवसर और स्वाभिमान एवं गारंटीकृत मानवीय अधिकारों का लाभ उठाना। इस प्रकार निम्न तत्त्व मानव विकास के स्तर को निर्धारित करते हैं:
-जीवन प्रत्याशा: जीवन प्रत्याशा का अर्थ है व्यक्ति के जिन्दा रहने की क्षमता अर्थात् किसी देश में लोगों की औसत आयु क्या है। इसका निर्धारण इससे होगा कि किसी राष्ट्र में खाद्य सुरक्षा का स्तर क्या होगा, स्वास्थ्य सुविधाओं का स्तर किस प्रकार होगा आदि।
-शिक्षा: शिक्षा न केवल व्यक्ति को स्थायी एवं गुणवत्ता परक रोजगार देती है बल्कि उसे राजनीतिक-सामाजिक सांस्कृतिक रूप से उसकी क्षमता का विस्तार भी करती है।
-प्रतिव्यक्ति आय (क्रयशक्ति समता): प्रति व्यक्ति आय (क्रयशक्ति समता) का बढ़ना यह प्रदर्शित करता है कि किसी राष्ट्र में लोगों के वस्तुओं एवं सेवाओं तक पहुँच बढ़ रही है और उनके भौतिक जीवन का विकास हो रहा है।
-तकनीकी विकास: यह किसी देश में औद्योगिक संरचना में होने वाले परिवर्तनों का सूचकांक है।
-तकनीकी प्रगति: तकनीकी प्रगति का आशय उत्पादन क्रिया में उन्नत तकनीक के प्रयोग से जिसमें निम्न तत्त्वों को शामिल किया जाता हैं-
1. मशीनों का प्रयोग
2. मानव कुशलता
3. संगठनात्मक ढाँचा
4. इन्फॉरमेशन अर्थात् तकनीक से संबंधित सूचनाएँ
-इन तत्त्वों के आधार पर तकनीकी विकास निम्न प्रकार से होता हैं-
1. शोध तथा उद्योगों में बहुत अधिक विनियोग
2. कुशल उद्यमी जो नव प्रवर्तित टेक्नोलॉजी की व्यापारिक संभावना तथा जोखिम का अनुमान लगा सकें।
3. विस्तृत बाजार
-तकनीक हस्तांतरण : विकासशील तथा अल्पविकसित देश पूँजी की कमी के कारण नव प्रवर्तन तथा शोध पर बहुत कम व्यय कर पाते हैं, इसलिये वे अपनी स्वयं की उन्नत तकनीकी विकसित नहीं कर पाते हैं। अत: वे अपने आर्थिक विकास के लिए बहुत हद तक विकसित देशों द्वारा किये गये तकनीकी हस्तान्तरण पर निर्भर रहते हैं।
-तकनीकी हस्तांतरण की कुछ विधियाँ इस प्रकार हैं-
1. संयुक्त उद्यम: जिसमें स्वामित्व तथा नियंत्रण में हिस्सेदारी होती है।
2. लाइसेंसिंग: जिसमें स्वामित्व तथा प्रबंधन की जिम्मेदारी तकनीकी प्राप्त करने वाले देश के पास होगी पर लाइसेंस के साथ जुड़ी शर्तों के कारण प्रबंधन तथा स्वामित्व में होने के बावजूद भी तकनीक प्राप्तकर्ता देश के द्वारा स्वतंत्र निर्णय नहीं लिया जा पाता है। यह शर्त तकनीक देने वाला देश ही तय करता है।
3. फ्रेन-चाइजिंग: इसके अंतर्गत तकनीकी हस्तांतरण करने वाला देश अपनी ब्रांड नाम बेचता है तथा साथ में प्रबंधकीय तथा तकनीकी सहायता भी देता है।
4. टर्न की कान्ट्रैक्टसः इसके अंतर्गत पूर्णतया तैयार फैक्ट्री कम्पनी क्रेता को दी जाती है।
-इण्टरमीडिएट टेक्नॅालाजी: प्रसिद्ध पुस्तक स्मॉल इज़ ब्यूटीफुल: के लेखक जर्मन में जन्मे ब्रिटिश अर्थशास्त्री ई. एफ. शूमाकर है।
इस तकनीक की निम्न विशेषताएँ बताते हैं-
1. ऐसी तकनीक जो उन दशाओं के लिए उचित हो जिसमें विश्व के सभी लोग रहते हो।
2. इतनी सरल हो कि जिनके पास उच्च प्रशिक्षण तथा शिक्षा का अभाव है
3. कम लागत वाली तकनीक
4. कुशल तथा कम कठिनाइयाँ उत्पन्न करने वाली हो
5. स्थानीय माल की पूर्ति तथा छोटे स्तर पर विपणन के अनुरूप हो।
मानव विकास के घटक
मानव विकास प्रतिमान के निम्नलिखित घटक स्वीकार किये जाते हैं-
a. संवृद्धि : मानव विकास के प्रतिमान का एक आवश्यक तत्त्व संवृद्धि अर्थात् व्यक्ति की आय में वृद्धि है। इसके द्वारा न केवल मानव की स्वास्थ्य, शिक्षा भोजन जैसी आवश्यकताएँ पूरी होती हैं बल्कि उसका आर्थिक सशक्तीकरण भी होता है। ऐसी संवृद्धि प्राप्त करने हेतु मानव पूँजी के रूप में विकसित करने हेतु उसमें निवेश आवश्यक है। साथ ही एक सहायक समष्टि आर्थिक पर्यावरण जारी है जिससे लोगों की सृजनात्मक क्षमता का अधिकतम उपयोग हो सके।
b. समावेशन: यदि विकास द्वारा लोगों के विकल्पों का विस्तार होना है तो उनकी अवसरों तक न्यायोचित पहुँच होनी चाहिए। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन करने होंगे जैसे -
-उत्पादक परिसंपत्तियों के वितरण में परिवर्तन, मुख्यतः भूमि सुधार हो।
-आय के वितरण में पुनर्गठन अर्थात् आय का प्रवाह अमीरों से गरीबों की ओर होना चाहिये।
-साख प्रणाली में परिवर्तन अर्थात् गरीबों तक ऋण की पहुँच सरल हो।
-राजनीतिक अवसरों में समता तथा मताधिकार में सुधार हो।
-महिलाओं, अल्पसंख्यकों, आदि की आर्थिक एवं राजनीतिक अवसर तक पहुँच में आने वाली सामाजिक एवं वैधानिक बाधाओं को दूर किया जाना चाहिये।
-संपोषणीयताः अगली पीढ़ी को वे सभी अवसर मिलने चाहिए जो हमें प्राप्त हैं। अगली पीढ़ी का यह अधिकार ही संपोषणीयता को मानव विकास प्रतिमान का अनिवार्य घटक बनाता है। इसका तात्पर्य केवल प्राकृतिक नवीकरण से ही नहीं है बल्कि उसका अर्थ भौतिक, मानव, वित्तीय और पर्यावरण संबंधी सभी प्रकार की पूँजी को बनाये रखना है।
-सशक्तीकरण: मानव विकास प्रतिमान लोगों के संपूर्ण सशक्तीकरण की कल्पना करता है। इसका अर्थ लोकतंत्र है जिसमें लोग अपने जीवन के बारे में लिए जाने वाले निर्णयों को प्रभावित कर सकें। इसके लिए व्यक्ति को आर्थिक, शारीरिक एवं राजनीतिक रूप से समर्थ बनाना होगा ताकि उनमें चुनने की क्षमता और स्वयं चुने जाने की स्वतंत्रता दोनों प्राप्त हो सके। ऐसा होने पर ही आर्थिक विकास हेतु उनका मानव पूँजी के रूप में कुशल प्रयोग हो सकेगा।
आर्थिक विकास की रणनीति
-किसी देश के आर्थिक विकास के मार्ग में उनके सामने मुख रूप से तीन समस्याएँ होती है-
i. किस वस्तु का उत्पादन किया जाये तथा किसका उत्पादन नहीं किया जाये?
ii. विभिन्न प्रयोगों में संसाधनों का आवंटन कैसे हो?
iii. उत्पादन की प्रक्रिया किसके द्वारा हो - निजी क्षेत्र द्वारा या सरकार द्वारा अथवा दोनों के द्वारा?
-आर्थिक विकास के मार्ग में आने वाली इन बाधाओं का समाधान करने हेतु तीन झार की सकल्पनाएँ प्राप्त होती हैं-
i.बाजार व्यवस्था: उत्पादन उत्पादक संसाधनों का आवंटन, वितरण आदि आर्थिक क्रियाओं का निर्धारण बाजार शक्तियों द्वारा होता है। राज्य का हस्तक्षेप नहीं होता है।
ii.केंद्रीकृत नियोजन प्रणाली: आर्थिक क्रियाओं अर्थात् साधनों का आवंटन, विनियोग की प्राथमिकताओं तथा उत्पादन के ढाँचे का निर्धारण एक केंद्रीय इकाई या राज्य के द्वारा हो, इस प्रकार की व्यवस्था को हम केंद्रीकृत नियोजन व्यवस्था कहते हैं। इस प्रकार की व्यवस्था में दीर्घकालीन आर्थिक विकास की दृष्टि से प्राथमिकताओं का निर्धारण राज्य द्वारा किया जाता है तथा उसी के अनुसार अर्थव्यवस्था में विनियोग किया जाता है।
iii.मिश्रित प्रणालीः एक ऐसी प्रणाली जिसमें बाजार के साथ-साथ राज्य की भूमिका या नियोजन भी साथ-साथ चले या जिसमें निजी क्षेत्र के साथ सार्वजनिक क्षेत्र भी कार्यशील हो तो उसे हम मिश्रित आर्थिक प्रणाली कहते हैं। इस धारणा का प्रतिपादन जॉन मेनार्ड कीन्स ने किया।
इसके तीन रूप हो सकते हैं-
iv.मिश्रित बाजार प्रणाली: वह प्रणाली है जिसमें बाजार तंत्र की प्रधानता रहती है, संसाधनों का बँटवारा बाजार में प्रचलित मांग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है। इस प्रणाली में राज्य एक कल्याणकारी राज्य के रूप में कार्य करता है, विकास संबंधी क्रियाओं में उसकी भागीदारी नहीं होती।
v.नियोजन मिश्रित प्रणाली: इस व्यवस्था में बाजार के साथ-साथ नियोजित प्रणाली क्रियाशील होती है। योजना आयोग या केंद्रीकृत व्यवस्था के द्वारा लक्ष्य निर्धारित होते हैं तथा सार्वजनिक तथा निजी - उद्यमों के बीच समन्वय स्थापित होता है। इसमें विकास कार्यों पर अधिक बल दिया जाता है।
vi.बाजार प्रधान नियोजित अर्थव्यवस्था या उदारवादी अर्थव्यवस्थाः ऐसी व्यवस्था जिसमें नियोजन तो हो पर बाजार तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी के प्रति अधिक उदारवादी नीति हो। इसमें नियोजन का स्वरूप निर्देशात्मक होता है। भारत में इस समय 1991 से नव आर्थिक सुधारों के बाद, यही प्रणाली प्रचालित है।
-इसे भारत में 1991 की विकास की रणनीति या राव-मनमोहन विकास रणनीति भी कहते हैं, आर्थिक विकास की वैश्वीकरण की अवधारणा पर आधारित है। इसके तीन स्तम्भ हैं-
a.उदारीकरण: यहाँ उदारीकरण से तात्पर्य है कि राज्य का हस्तक्षेप आर्थिक क्रियाओं के निर्धारण में नहीं होगा इस प्रकार अर्थव्यवस्था में इंस्पेक्टर राज, कोटा राज, लाइसेंस राज समाप्त किया जायेगा।
b.निजीकरण: सरकार निजी क्षेत्रों के विकास के लिये बेहतर आर्थिक वातावरण उपलब्ध करायेगी एवं स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का निर्माण करेगी। साथ ही वह स्वयं को आर्थिक क्रियाओं से हटा लेगी (विनिवेश के माध्यम से) तथा स्वयं को वितरण की समस्याओं पर गरीबी-बेरोजगारी आदि तक सीमित कर लेगी।
c.वैश्वीकरण: वैश्वीकरण से तात्पर्य है भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्व अर्थव्यवस्था से एकीकरण अर्थात् वस्तु, सेवा, पूँजी तकनीक आदि का मुक्त प्रवाह हो सके। निर्यात प्रेरित तीव्र विकास की यह रणनीति निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदारी पर बल देती है। जो इस परिकल्पना पर आधारित है कि विकास की मूलधारा में सबको जोड़ा जाये जिससे आर्थिक विकास का लाभ सबको समान रूप से प्राप्त हो। विशेष रूप से गरीब वर्ग को, कोई वृष्टि छाया में न रह जाये। इसे 11वीं पंचवर्षीय योजना के स्वीकृत प्रारूप में समावेशी विकास रणनीति कहा गया है।
सतत् विकास :
-वर्तमान में यह अवधारणा सर्वाधिक लोकप्रिय हुई है। इसके अंतर्गत विकास की एक नवीन अवधारणा विकसित की गई है। अर्थशास्त्र की परम्परागत अवधारणा में संसाधनों के अधिकतम उपयोग पर बल दिया जाता था परंतु इस अवधारणा में संसाधनों के इस प्रकार दोहन पर बल दिया जाता है जिसमें भावी पीढ़ी का विकास प्रतिकूल रूप में प्रभावित न हो। संसाधनों का अधिकतम संभव सदुपयोग सुनिश्चित करना इसकी प्रमुख विशेषता है। 1992 के रियो डी जेनेरियो तथा 2000 में जोहांसबर्ग के सम्मेलन का मुख्य विषय सतत् विकास ही था।
राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग की सिफारिशें
-भारतीय रिजर्व बैक ने भूतपूर्व गवर्नर श्री सी.रगराजन की अध्यक्षता में स्थापित राष्ट्रीय सांख्यिकीय आयोग ने भारतीय सांख्यिकीय प्रणाली में सुधार हेतु निम्न प्रमुख सिफारिशें की हैं-
a.राष्ट्रीय स्तर के साथ राज्य स्तर पर औद्योगिक उत्पादन सूचकांक तैयार किए जाएं।
b.राज्यों में औद्योगिक उत्पादन के आँकड़े एकत्र कर आधार - श्रृखंला तैयार की जायं।
c.थोक कीमत सूचकांक और उपभोक्ता कीमत सूचकांक के राज्य स्तर पर आँकड़े तैयार किए जाएं। इसके अतिरिक्त निगम क्षेत्र के उद्यमों की संदर्भिका सर्वेक्षण भी तैयार करने चाहिए।
d.सेवा क्षेत्र के लिए आयोग ने इस तथ्य का उल्लेख किया है कि निगम क्षेत्र के लिए सकल देशीय उत्पाद तैयार करने हेतु, राज्य सरकारी को कंपनियों के क्षेत्रीय रजिस्ट्रार द्वारा बनाए गए ढाँचे का प्रयोग करना चाहिए।
नीली अर्थव्यवस्था(BlueEconomy)
- नीली अर्थव्यवस्था में वह आर्थिक गतिविधियां शामिल हैं जिसमें समुद्र के संसाधनों का उपयोग इस तरह किया जाता है कि उससे समुद्री पर्यावरण व्यवस्था को कोई नुक़सान ना हो।
-इसमें मछली पालन, समुद्री परिवहन, पर्यटन, एनर्जी और वेस्ट मैनेजमेंट आदि शामिल हैं। इसके अलावा जैव विविधता की रक्षा और तटीय क्षेत्रों का विकास और रक्षा भी इसमें शामिल हैं।
-नीली अर्थव्यवस्था में आर्थिक वृद्धि, रोजगार के अवसर में तेजी लाने की क्षमता है। यह नई औषधियों, कीमती रसायनों और प्रोटीन फुड का पता लगाने में मदद करती है और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की जानकारी देती है।
ब्लू इकोनॉमी के घटक
-ब्लू इकोनॉमी में विविध घटक हैं.जिनमें मत्स्य, पर्यटन, और समुद्री परिवहन जैसे स्थापित पारंपरिक महासागरीय उद्योग शामिल हैं.लेकिन साथ ही नई और उभरती हुई गतिविधियाँ, जैसे अपतटीय नवीकरणीय ऊर्जा, मत्स्य पालन (aquaculture), समुद्री सतह पर प्राप्त गतिविधियाँ (seabed extractive activities),और समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी और जैव-पूर्वेक्षण इत्यादि भी ब्लू इकोनॉमी के महत्वपूर्ण घटक हैं.
-ब्लू इकोनॉमी के घटकों के रूप में अर्हता प्राप्त करने के लिए, निम्न गतिविधियों की आवश्यकता है:
-वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए सामाजिक और आर्थिक लाभ प्रदान करते हैं.
-समुद्री पारिस्थितिक तंत्र की विविधता, उत्पादकता, लचीलापन, मुख्य कार्य और आंतरिक मूल्य को बहाल, संरक्षित और बनाए रखना.
-स्वच्छ प्रौद्योगिकियों, नवीकरणीय ऊर्जा, और वृत्ताकार सामग्री के प्रवाह पर आधारित होना जो अपशिष्ट को कम करेगा और सामग्रियों के पुनर्चक्रण को बढ़ावा देगा.
सागरमाला कार्यक्रम
-यह 2015 में घोषित किया गया था और इसका उद्देश्य व्यापार के लिए क्षेत्रीय और वैश्विक समुद्री संपर्क स्थापित करके तटीय क्षेत्रों को आर्थिक केन्द्रों में परिवर्तित करना. भारत में बंदरगाह के नेतृत्व वाले विकास को बढ़ावा देना इसका व्यापक उद्देश्य है.
सागरमाला कार्यक्रम के घटक
बंदरगाहों का आधुनिकीकरण और नए बंदरगाहों का विकास:
-बंदरगाहों से आतंरिक इलाकों का संपर्क बढ़ाना तथा सामानों के लेकर होने वाली गतिविधियों की लागत और समय को अनुकूलित करने के लिए घरेलू जलमार्गों (अंतर्देशीय जल परिवहन और तटीय पोत परिवहन) सहित विभिन्न साभार तंत्रों से संपर्क स्थापित करना
- बंदरगाहों से जुड़े उद्द्योगों का विकास: तटीय सामुदायिक विकास: मत्स्य विकास, तटीय पर्यटन, कौशल विकास व आजीविका उत्पादन गतिविधियोंआदि के माध्यम से तटीय समुदायों के सतत विकास को बढ़ावा देना.
गिग अर्थव्यवस्था (GIG Economy)
-गिग अर्थव्यवस्था को समझने से पहले गिग वर्कर को समझना जरूरी हैं।
-ऐसे कर्मचारी जिन्हें किसी प्रोजेक्ट विशेष को पूरा करने के लिए नियुक्त किया जाता है उन्हें Gig worker कहा जाता है। इन्हें फ्री-लांसर भी कहा जाता है।
-गिग अर्थव्यवस्था एक ऐसा मॉडल है जिसमें स्थायी कर्मचारियों के बजाय फ्रीलांसर, अस्थायी कर्मचारियों को नियुक्त किया जाता है।
-कंपनियाँ अपने किसी प्रोजेक्ट विशेष के लिए अल्पकालीन तौर पर कर्मचारियों की नियुक्ति करते हैं।
निम्न श्रेणियों में इन कर्मचारियों का विभाजित किया जाता है।
- ठेके पर काम करने वाले कर्मचारी जो स्वतंत्र रूप से अस्थायी कार्य करते हैं।
- आनॅलाइन फोर्म जैसे फ्री-लांसर, ब्लॉगर, एफिलिस्ट, मार्केटिंग इत्यादि गतिविधियाँ करने वाले कर्मचारी।
-भारत में 15 मिलियन से भी ज्यादा कर्मचारी फ्रीलांसर के रूप में काम करते हैं- अधिकांश, फ्री-लांसर र वेब और मोबाइल डेवलमेंट वेब डिजाइनिंग, इंस्टिस्यूशन और डेटा एंट्री पर काम करते हैं।
-फ्रूड प्रोवाइडर एप ई-कॉमर्स कंपनियाँ गिग इकॉनमी में रोजगार बढ़ावा देने के प्रमुख जिम्मेदार है।
चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy)
-चक्रीय अर्थव्यवस्था एक ऐसी अर्थव्यवस्था है जहाँ उत्पादों को इस प्रकार तैयार किया जाता है जिन्हें पुन: उपयोग और पुन:चक्रण किया जा सके।
-इसके अंतर्गत लगभग सभी उत्पादों को पुन: उपयोग, पुन: उत्पादन और कच्चे माल में पुनर्नवीनीकरण या ऊर्जा के स्त्रोत के रूप में उपयोग किया जाता है।
-इसके माध्यम से जिम्मेदार निर्माणकर्ता उत्सर्जन को कम करके, और प्राकृतिक संसाधनों के कुशल उपयोग को बढ़ाकर, नए उद्योगों और नौकरियों के सृजन का समर्थन कर सकते हैं