राजकोषीय नीति
- राजकोषीय नीति :- राजकोषीय नीति भारत सरकार की आर्थिक नीति का एक प्रमुख घटक है, इसके द्वारा एक सरकार आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय मूल्य स्थिरता, पूर्ण रोजगार सृजन एवं संसाधनों की गतिशीलता जैसे लक्ष्यों की पूर्ति करती है।
- राजकोषीय नीति हर वर्ष बजट के माध्यम से प्रयुक्त की जाती है।
- सरकारी आय तथा व्यय की वह प्रक्रिया जिसके माध्यम से सरकार अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है वह राजकोषीय नीति कहलाती है।
लोक वित्त :- ये दो प्रकार के होते हैं।
राजस्व बजट :-
- बजट का वह भाग जिसका संबंध राजस्व व्यय तथा आय से हो। इस बजट में कुल राजस्व प्राप्ति तथा कुल राजस्व व्यय का वार्षिक वित्तीय ब्यौरा प्रस्तुत किया जाता है। यह अतिरेक (Surpus) या घाटे (Deficit) दोनों ही तरह का हो सकता हैं।
1. राजस्व आय की प्राप्तियाँ :- ऐसी प्राप्तियाँ जिनके लौटाने का दायित्व व जिनके कारण सरकार पर किसी भी प्रकार का वित्तीय भार न हो या जिसके साथ किसी संपत्ति की बिक्री न जुड़ी हो उसे राजस्व प्राप्तियाँ कहते हैं। ये दो प्रकार की होती है।
I. कर राजस्व प्राप्तियाँ – विभिन्न करों को लाकर सरकार द्वारा किया गया पैसों का अर्जन, कर राजस्व प्राप्ति कहलाता है। जैसे – आयकर, निगमकर, ब्रिकी कर।
ये भी दो प्रकार की होती है-
1. प्रत्यक्ष कर तथा 2. अप्रत्यक्ष कर।
II. गैर राजस्व प्राप्तियाँ – सरकार द्वारा कर के अतिरिक्त अन्य स्त्रोतों से उपार्जित पैसों को गैर-कर राजस्व प्राप्ति कहते हैं।
लाभ और लाभांश जो सरकार को इसके सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से मिलते है।
i. सरकार द्वारा आगे दिए गए सभी ऋणों, चाहे ये देश के अंदर दिए गए हों (आंतरिक ऋण) या देश के बाहर (बाहरी ऋण) पर मिलने वाला ब्याज। इसका अर्थ यह हुआ कि यह आय दोनों घरेलू और विदेशी मुद्रा में हो सकती है।
ii. वित्तीय सेवाओं (Fiscal Services) से भी सरकार को आय की प्राप्ति होती है; जैसे-मुद्रा को छापने, डाक-टिकट को छापने इत्यादि।
iii. सामान्य सेवाओं से भी सरकार को आय की प्राप्ति होती है; जैसे- विद्युत वितरण सिंचाई, बैंकिंग, बीमा, सामुदायिक सेवाएँ इत्यादि।
iv. फीस तथा जुर्माना से सरकार को हुई आय की प्राप्ति।
vi. सरकार द्वारा प्राप्त अनुदान केंद्र सरकार के संदर्भ में यह हमेशा बाह्य होता है तथा राज्य सरकार के संदर्भ में यह हमेशा आंतरिक होता है।
2. राजस्व व्यय (Revenue Expenditure) :- वे खर्चें जिससे सरकार की न तो उत्पादन क्षमता का विस्तार होता है और नहीं भविष्य के अतिरिक्त आय सृजित होती है।
- सरकार द्वारा उठाये गये वैसे सभी व्यय, जो राजस्व किस्म अथवा बाध्यकारी किस्म के हो।
- इस प्रकार के व्यय उपभोगात्मक होते हैं तथा इनमें उत्पादक परिसम्पत्ति सृजन करना शामिल नहीं है।
- इसका उपयोग सरकार को चलाने अथवा एक उत्पादक प्रक्रिया को चालू रखने के लिए किया जाता है, यह दो प्रकार के होते हैं।
- विकास के आधार पर
A. विकासात्मक – जो प्रकृति से उत्पादनकारी होते हैं या वो जो उत्पादन के बढ़ाने वाले सभी व्यय विकासात्मक होते हैं। - निवेश
B. गैर विकासात्मक – वैसा सरकारी खर्च जो प्रकृति से उपभोगात्मक होते हैं तथा जिसमें किसी प्रकार उत्पादन शामिल नहीं होते हैं वो गैर विकासात्मक व्यय कहलाता है। - पेंशन, ब्याज अदायगी, छूट, रक्षा इत्यादि।
- योजना के आधार पर
C. योजनागत व्यय :- सरकार के द्वारा विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत किया जाने वाला व्यय योजनागत व्यय कहलाता है।
- सामान्यत: सरकारे अपने कल्याणकारी उद्धेश्यों को ध्यान में रखते हुए अनेक प्रकार की योजनाएँ क्रियान्वित करती है –
D. गैर योजनागत व्यय – ऐसा सार्वजनिक व्यय जिससे कि कोई विकास का काम नहीं होता।
पूँजीगत बजट :- यह बजट का वह भाग है, जिसका संबंध पूँजी की प्राप्ति तथा व्यय से है यह उन साधनों को दर्शाता है जिसके द्वारा पूँजी का प्रबंधन किया जाता है तथा उन क्षेत्रों को दर्शाता है जहाँ पूँजी का व्यय होता है।
पूँजी प्राप्तियाँ (Capital Receipts)
- किसी भी सरकार की सभी गैर-राजस्व प्राप्तियों को पूँजी प्राप्ति कहा जाता है। इस प्रकार की पूँजी का उद्देश्य निवेश करना होता है तथा सरकार इसका उपयोग योजना विकास के लिए करती है। भारत में पूँजी प्राप्ति में निम्नलिखित को शामिल किया जाता है:-
(i) ऋण की वसूली :- यह पूँजी प्राप्ति का एक स्रोत है। इसके अंतर्गत सरकार द्वारा दिए गए ऋण (भारत में तथा विदेश में) की अदायगी से पूँजी प्राप्ति होती है तथा सरकार को इन ऋणों पर ब्याज भी प्राप्त होता है, जिन्हें राजस्व प्राप्तियों में शामिल किया जाता है।
(ii) सरकार द्वारा लिया गया कर्ज
सरकार द्वारा लिए गए कर्ज से भी पूँजी की प्राप्ति होती है। इसमें दोनों किस्म के कर्ज शामिल हैं - आंतरिक कर्ज तथा बाह्य कर्ज। आंतरिक कर्ज में सरकार द्वारा भारतीय रिज़र्व बैंक, अन्य भारतीय बैंक तथा वित्तीय संस्थानों से लिया गया कर्ज शामिल होता है। इसी तरह बाह्य कर्ज में सरकार द्वारा विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विदेशी बैंक, दूसरे देश की सरकारों, विदेशी वित्तीय संस्थानों इत्यादि से लिया गया ऋण शामिल होता है।
(iii) सरकार की अन्य प्राप्तियाँ
इसमें लम्बी अवधि के पूँजी उपचय शामिल होते हैं, जो सरकार को भविष्य निधि, लघु बचत योजना, इंदिरा विकास पत्र, किसान विकास-पत्र इत्यादि से प्राप्त होते हैं।
पूँजी व्यय (Capital Expenditure)
- वैसे सभी क्षेत्र, जिन्हें सरकार से पूँजी उपचय (accruals) शामिल होते हैं जो सरकार को भविष्य निधि, लघु बचत योजना, इंदिरा विकास-पत्र, किसान विकास-पत्र, इत्यादि से प्राप्त होते हैं। वैसे सभी क्षेत्र जिन्हें सरकार से पूँजी प्राप्त होती है पूँजी व्यय का भाग होते हैं। भारत में इसमें निम्नलिखित शामिल हैं:-
(i) सरकार द्वारा वितरित ऋण
- इसमें सरकार द्वारा दिए गए आंतरिक ऋण (राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों, सार्वजनिक क्षेत्र उद्यमों इत्यादि को) तथा बाह्य ऋण (अन्य देशों, विदेशी बैंकों इत्यादि) शामिल हैं।
(ii) सरकार द्वारा पूर्व में लिए गए ऋणों की अदायगी इसमें सरकार द्वारा लिए गए आंतरिक तथा बाह्य ऋणों की अदायगी शामिल है। इन ऋणों पर दिया जाने वाला ब्याज राजस्व व्यय के अंतर्गत आता है।
(iii) सरकार का योजनागत व्यय इसके अंतर्गत वे सभी व्यय आते हैं, जिनका उपयोग केंद्र सरकार योजनागत विकास तथा राज्यों के योजनागत विकास को समर्थन देने के लिए करती है।
(iv) सरकार द्वारा रक्षा पर किया जाने वाला पूँजी व्यय इसमें वे सभी पूँजी खर्च शामिल हैं जो सरकार सेना के लिए करती है। यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि रक्षा व्यय एक गैर-योजनागत व्यय है, जिसमें पूँजी तथा राजस्व व्यय शामिल होते हैं।
(v) सामान्य सेवाओं के लिए मान्य सेवा; जैसे-रेलवे, डाक विभाग, जलापूर्ति, शिक्षा, ग्रामीण विस्तार इत्यादि के लिए भी पूँजी व्यय की आवश्यकता है।
(vi) सरकार की अन्य अभिदेयताएँ
सरकार की अन्य अभिदेयताएँ:- जैसे- पेंशन का भुगतान, लघु बचत योजनाओं की अदायगी तथा भविष्य निधि के भुगतान के लिए भी पूँजी व्यय की आवश्यकता होती है।
(vii) सरकार की अन्य देनदारियाँ
मूलत: इसके अंतर्गत अन्य प्राप्तियों के पद पर सरकार की सभी पुनर्भुगतान देनदारियाँ अथवा दायित्व आते हैं। देनदारियों का स्तर इस तथ्य पर निर्भर होता है कि सरकार द्वारा विगत में कितनी प्राप्तियाँ हासिल की गई हैं। किस साल में कितना भुगतान दायित्व -यह इस बात पर निर्भर करता है कि विगत में किस वर्ष सरकार के पास कितनी परिपक्वता अवधि की प्राप्तियाँ उपलब्ध कीं। उदाहरण के लिए, भविष्य निधि (PF) देनदारी ऐसी देनदारियों का हिस्सा आजादी के बाद के तीन दशकों तक नहीं रही थी, लेकिन जब सरकारी कार्यकारी सेनानिवृत्ति होने लगे, यह देनदारी लगातार बढ़ती चली गई। बाद में (विशेषकर 1960 एवं 1970 के दशकों में) भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) का विस्तार हुआ और इनमें अत्यधिक रोजगार सृजित हुए (श्रम की आवश्यकता के तर्क को अनदेखा कर)। हम 1990 के दशक में जीएफ देनदारियों को भारी मात्रा में बढ़ता देखते हैं। इस दबाव का मुकाबला करने के लिए सरकार ने पीएफ पर ब्याज में कटौती का रास्ता अपनाया या फिर जैसाकि अभी इसे आधार अर्थव्यवस्था के ऊपर छोड़ देने का प्रयास करती दिख रही है। यही हाल पेंशन का हुआ और इसके लिए हम एक बाजार आधारित प्रणाली अपनाने में सफल हुए जबकि पेंशन सुधार की चुनौती सामने आई और इसकी के साथ इस क्षेत्र के लिए पेंशन नियामक प्राधिकार भी अस्तित्व में आया।
राजकोषीय नीति का उद्देश्य-
- राजकोषीय नीति राष्ट्रीय सरकार के हाथों में एक महत्वपूर्ण नीति के रूप में जो है, विभिन्न प्रकार के उद्देश्यों को पूरा करती हैं।
- आर्थिक संवृद्धि व विकास को बल प्रदान करना है। कर नीति का उद्देश्य राजस्व सृजन व निवेश प्रक्रियाओं को बल प्रदान करना। सार्वजनिक ऋण नीति व सार्वजनिक व्यय नीति के माध्यम से विशेष क्षेत्रों व विशेष प्राथमिकताओं वाले निवेश के द्वारा विकास प्रक्रियाओं को बल प्रदान करना तथा आर्थिक संवृद्धि व विकास को बलप्रदान करना है।
- आर्थिक स्थायित्व को बल प्रदान करना। राजकोषीय नीति विभिन्न माध्यमों से कीमतों की मूल्य वृद्धि व ह्रास दोनों ही स्थिति में यह आर्थिक स्थिरता को बनाये रखने में अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करती है। यह अप्रत्यक्ष करों को तर्क संगत आधार प्रदान कर, प्रत्यक्ष करों को संतुलित कर, सार्वजनिक व्यय नीति को तर्कसंगत आधार देकर, मुद्रास्फीति विकास करों को लगाकर उपभोग की प्रवृत्ति कम करके अनिवार्य बचत की नीति के माध्यम से मूल्य ह्यस की स्थिति में निवेश को प्रोत्साहन देकर विभिन्न तरीके से अर्थव्यवस्था में आर्थिक स्थायित्व लाता है।
- विशेष क्षेत्रों में निवेश के द्वारा रोजगार सृजन को बल प्रदान करता है। इससे मानव संसाधन विकास, आधारभूत संरचना क्षेत्र, उद्योग क्षेत्र में निवेश प्रदान कर रोजगार सृजन को बल प्रदान किया जाता है।
- आर्थिक विकास की प्रक्रिया को इस प्रकार त्वरित करना कि पूर्ण रोजगार का लक्ष्य प्राप्त हो जायें।
- आयगत, क्षेत्रगत, लैंगिक असमानता को दूर करना।
- भुगतान संतुलन के संकट को दूर करना।
- कीमतों पर नियंत्रण रखना।
राजकोषीय नीति की प्रकृति-
- प्रकृति के आधार पर चार प्रकार की राजकोषीय नीति देखी जाती है-
1. तटस्थ राजकोषीय नीति: बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में जहाँ आर्थिक क्रियाएँ (उत्पादन, उपभोग, विनिमय, निवेश आदि) बाजार द्वारा सम्पन्न की जाती है।
2. क्षति पूरक राजकोषीय नीति: बाजार शक्तियाँ कार्य करती रहेंगी लेकिन अर्थव्यवस्था में किन्हीं कारणों से होने वाली क्षति को पूरा करने के लिए राज्य हस्तक्षेप करता है।
3. सक्रिय राजकोषीय नीति: आयोजन आधारित अर्थव्यवस्था में, जहाँ आर्थिक क्रियाएँ राज्य द्वारा संपन्न की जाती है।
4. पहलकारी राजकोषीय नीति: आयोजन मिश्रित प्रणाली की अर्थव्यवस्था में जहाँ निजी क्षेत्रों को प्रोत्साहन के साथ-साथ सामाजिक न्याय के प्रश्न, आधारभूत संरचना के विकास आर्थिक क्रियाओं की परिस्थिति आदि का निर्माण राज्य द्वारा किया जाता है।
विभिन्न प्रकार के घाटे :-
1. राजस्व घाटा (Revenue Deficit)
- सरकारी बजट के राजस्व खाते की कुल व्यय यदि कुल आय से अधिक हो तो घाटे की मात्रा राजस्व घाटा कहलाता है। राजस्व व्यय अनिवार्य है तथा तात्कालिक होता है। ऐसे व्यय उपभोगात्मक तथा अनुत्पादक होते हैं। इस प्रकार के व्यय को वित्तीय नीति के क्षेत्र में अपराध माना जाता है। इस घाटे को कम करने के लिए खर्च किए जाने वाले पैसे का उपयोग किसी भी विकासात्मक कार्य के लिए किया जा सकता है।
2. राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) :-
- यदि सरकार की कुल प्राप्ति(उधारी को छोड़कर ) तथा कुल व्यय का संतुलन नकारात्मक हो तो वह राजकोषीय घाटा कहलाता है।
- राजकोषीय घाटा वह घाटा है जो कि वास्तव में सरकार की समस्त बजटरी आय तथा समग्र बजटरी व्यय से उत्पन्न कुल देयता दिखाता हैं।
- भारत में इसे शुरू करने का श्रेय मनमोहन सिंह को जाता है।
राजकोषीय घाटा = सम्पूर्ण व्यय–(सम्पूर्ण प्राप्तियाँ - सरकारी दायित्व)
3. प्रभावी राजस्व घाटा (Effective Revenue Deficit) :-
- राजस्व व्यय के रूप में सरकार कुछ धनराशि, पूँजीगत परिसंपत्तियों को सृजित करने के लिए अनुदान के रूप में खर्च करती है, जब इस राशि को राजस्व घाटे से घटा दिया जाता है तो उसे प्रभावी राजस्व घाटा कहते हैं।
(राजस्व घाटा – राजस्व खर्च से किया पूंजीगत खर्च)
- राजस्व घाटे के वृद्धि का आँकड़ा सरकार के लिए चेतावनी होता हैं। सरकार अपना खर्च कम करे या फिर आय को बढ़ाए।
4. प्राथमिक घाटा (Primary Deficit) :-
- जब हम राजकोषीय घाटे में से ब्याज अदायगी को निकाल देते है तो प्राथमिक घाटा बचता है।
प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा – ब्याज दायित्व
5. मौद्रिक घाटा :-
- राजकोषीय घाटे का वह हिस्सा जो सरकार नोट छापकर पूरा करती है। उसे मौद्रिक घाटा कहा जाता है।
- राजकोषीय घाटे का वह भाग, जिसकी आपूर्ति सरकार RBI के द्वारा की जाती है, उसे मौद्रिकृत घाटा कहते हैं।- आय का स्त्रोत :2020-21
- (रुपया कहाँ से आता है)
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आयकर |
14% |
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नॉन डेट कैपिटल प्राप्ति |
5% |
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गैर कर राजस्व (Non Tax Revenue) |
6% |
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सीमा शुल्क |
3% |
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GST |
15% |
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कॉर्पोरेट कर |
13% |
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केन्द्रीय उत्पाद शुल्क |
8% |
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कर्ज व अन्य देयताएँ |
36% |
- व्यय
- (रुपया कहाँ से जाता है)
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केन्द्रीय प्रायोजित योजनाएँ |
9% |
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सब्सिडी |
8% |
|
रक्षा |
8% |
|
ब्याज भुगतान |
20% |
|
पेंशन |
5% |
|
केन्द्र की क्षेत्रीय योजनाएँ |
14% |
|
वित्त आयोग और अन्य अंतरण |
10% |
|
कर और शुल्कों का राज्यों का हिस्सा |
16% |
|
अन्य व्यय |
10% |