मुद्रास्फीति (Inflation)
- मुद्रा के मूल्य में कमी होना है, अर्थात् मुद्रा की क्रय शक्ति में कमी को मुद्रास्फीति कहते हैं।
- एक निश्चित समय सीमा में वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतों में वृद्धि तथा मुद्रा की क्रय शक्ति में कमी मुद्रास्फीति (Inflation) कहलाती है।
- वर्ष 2009 में आर्थिक मामलों संबंधी मंत्रिमंडलीय समिति द्वारा मुद्रास्फीति की निम्नलिखित आधारों पर परिभाषित किया गया है-
1. एक महीने में वस्तु एवं सेवाओं के औसत मूल्य में होने वाली लगातार वृद्धि।
2. लगातार एक महीने में मुद्रा के क्रय शक्ति में औसत गिरावट।
यदि यह दोनों स्थितियाँ एक साथ पाई जाती है तो उसे मुद्रास्फीति (Inflation) कहा जाता है।
मुद्रास्फीति के प्रकार
1. मांग प्रेरित (Demand Pull) स्फीति
- जब मुद्रा की आपूर्ति में वृद्धि के साथ-साथ उत्पादन में वृद्धि उसी अनुपात में न हो तो ऐसी स्थिति की मांग प्रेरित मुद्रास्फीति कहते हैं।
- अर्थव्यवस्था में वस्तुओं तथा सेवाओं की मांग में वृद्धि के कारण होने वाली स्फीति मांग प्रेरित स्फीति कहते है।
कारण
1. लोगों की आय में वृद्धि, जिससे मांग का बढ़ना परंतु पूर्ति का उस अनुपात में बढ़ना।
2. बैंकों व R.B.I द्वारा कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराना जिससे आम जनता की मांग का बढ़ना स्वाभाविक है।
3. जनसंख्या वृद्धि भी इसका प्रमुख कारण हो सकता है।
2. लागत प्रेरित (cost pusn):
- जब लागत में वृद्धि हो जाती पर वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होने लगती है तो इस स्थिति को लागत प्रेरित स्फीति कहते हैं।
- इस प्रकार की स्फीति में श्रम की उत्पादनकर्ता की अपेक्षा मजदूरी अधिक तीव्रता से बढ़ने लगती है।
- अर्थात् जब मजदूरी प्रेरित (wagen) और लाभ प्रेरित (profit) के कारण कीमतों में वृद्धि होती है तो उसे लागत प्रेरित स्फीति कहते हैं।
- वस्तु व सेवा में वृद्धि ⇒ उत्पादन कम ⇒ आपूर्ति कम ⇒मांग अधिक ⇒ कीमतों में वृद्धि ⇒ मुद्रा की क्रय शक्ति में कमी ⇒ मुद्रास्फीति की स्थिति।
3. रेंगती मुद्रास्फीति: (Creeping Inflation)
- जब मुद्रास्फीति की वार्षिक दर 2-3 % या इसे भी कम होती तथा ये हर वर्ष निम्नतम स्तर पर हो रहती है तो उसे रेंगती मुद्रास्फीति कहते हैं। यह मुद्रास्फीति का अत्यंत मद रूप है। सामान्यत: ऐसी स्थिति विकसित देशों में होती है।
4. चलती/चलायमानमुद्रास्फीति:(Walking Inflation)- जब मुद्रास्फीति की वार्षिक दर 3-10% के मध्यम स्तर पर हो तो उसे चलायमान मुद्रास्फीति कहा जाता है।
ये अवस्था सरकार के लिए खतरे का सूचक है।
5. दौड़ती मुद्रास्फीति: (Running of Inflation):
- जब मुद्रास्फीति की वार्षिक दर 10-20% के अर्थात दो अंकिए स्तर पर पहुँच जाए तो उसे दौड़ती मुद्रास्फीति कहते हैं।
6. कूदती मुद्रास्फीति (Galloping over Inflation):
- जब मुद्रास्फीति की वार्षिक दर दो अंकों के उच्चतम स्तर और तीन अंकों के न्यूनतम स्तर पर हो तो उसे कूदती मुद्रास्फीति कहते हैं।
इस अवस्था में मुद्रास्फीति की दर 20% से अधिक हो जाती है।
7. अतिस्फीति या हाइपर स्फीति : (Hyper inflation):
- जब मुद्रास्फीति की वार्षिक दर तीन अंकों से भी अधिक हो जाती है तो उसे अतिस्फीति या हाइपर स्फीति कहते हैं।
अर्थात् जब मुद्रास्फीति की दर 100% तक पहुँच जाती है जिसके कारण वस्तुओं का मूल्य कई बार बढ़ता है जिसका मापन असंभव जो जाता है और जनता का मुद्रा पर से विश्वास गिरने लगता है तथा कई बार मुद्रा मे परिवर्तन किया जाता है।
8. खुली मुद्रास्फीति – जब मांग तथा पूर्ति कारकों पर किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं होता है इस स्थिति में होने वाली वृद्धि खुली मुद्रास्फीति कहलाती है।
9. दमित /दबी मुद्रास्फीति – जब सरकार द्वारा मांग तथा पूर्ति को प्रभावित किया जाता है अर्थात् कोटा सिस्टम , लाइसेसिंग रासनिग आदि के द्वारा सरकार अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है उसे दमित /दबी मुद्रास्फीति कहते हैं।
10. व्यापक स्फीति – जब मुद्रास्फीति अर्थव्यवस्था मे सभी वस्तुओं व सेवाओं मे विद्वान हो तो उसे व्यापक स्फीति कहते हैं।
11. खंडीय स्फीति- जब मुद्रास्फीति सभी वस्तुओं व सेवाओं मे न होकर कुछ वस्तुओं व सेवाओं में हो तो उसे खंडीय स्फीति कहते हैं।
12. निस्पंदन मुद्रास्फीति (Stag Flation):-
निस्पंदन मुद्रास्फीति की अवधारणा का प्रतिपादन फ्रेडरिक ए वॉन हयाक द्वारा किया गया था। निस्पंदन मुद्रास्फीति एक ऐसी आर्थिक दशा है जिसमें दो-दो चिन्ताजनक परिस्थितियाँ एक साथ पायी जाती है अर्थात् एक दी हुई समयावधि में मुद्रास्फीति की उच्च व बढ़ती हुई दर तथा बेरोजगारी की उच्च व बढ़ती हुई दर।
Stag Flation की स्थिति उत्पन्न होने कारण:
- निस्पंदन मुद्रास्फीति उत्पन्न होने के कारण निम्नलिखित हैं-
(i) उत्पादन की संभावित क्षमता के सापेक्ष प्रभावी मांग का निम्न स्तर
(ii) उच्च व बढ़ती हुई साधन कीमत के कारण लागत जन्य मुद्रास्फीति
यह मुद्रास्फीति का सबसे घातक रूप है।-इसे अर्थव्यवस्था के लिए सर्पदंश माना जाता है।-1980 के दशक में तेल आयातक देशों को इस संकट का सामना करना पड़ा था।
मुद्रास्फीति पर नियंत्रण के उपाय
- मुद्रास्फीति की समस्या बहुआयामी शक्तियों द्वारा जनित होती है, जिसका संबंध मांग व लागत दोनों पक्षों से होता है। अत: इस पर नियंत्रण के लिए प्रभावशाली उपायों की बहुआयायी समूह को लागू करना चाहिए।
मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने वाले बहुआयामी उपायों को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है।

(A) मौद्रिक उपाय:-
- मौद्रिक नीति का निर्धारण केन्द्रीय मौद्रिक प्राधिकरण या भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा किया जाता है।
- अर्थव्यवस्था में मौद्रिक प्रणाली का संचालन मौद्रिक नीति द्वारा ही किया जाता है।
मौद्रिक प्रणाली में तरलता और साख का कुशल प्रबंधन:-
- भारतीय रिजर्व बैंक मौद्रिक उपकरणों का प्रयोग करके अर्थव्यवस्था में तरलता को वांछित स्तर पर बनाये रखता है जिससे कीमत स्तर को नियंत्रित किया जाता है परिणाम स्वरूप मुद्रास्फीति को नियंत्रित किया जाता है।
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अपनाये जाने वाले मौद्रिक उपकरण:-
- बैंक दर, रेपो दर, रिवर्स रेपो दर, संवैधानिक तरलता अनुपात, नकद आरक्षित अनुपात, सीमांत स्थायी सुविधा इत्यादि
मुद्रा स्फीति का नियंत्रण

नई मुद्रा का निर्गमन:-
- यह मुद्रास्फीति के नियंत्रण का चरम उपाय है। जब मुद्रास्फीति का स्तर उच्च व निरन्तर बढ़ने के कारण मुद्रा का मूल्य लगभग शून्य हो जाता है तो नई मुद्रा का निगर्मन किया जाता है। पुरानी मुद्रा को चलन से बाहर कर दिया जाता है। और नयी मुद्रा को चलन में लाया जाता है।
पुरानी मुद्रा का समायोजन:-
- पुरानी मुद्रा का नयी मुद्रा में निश्चित इकाई निर्धारित कर दी जाती है, और इसी के आधार पर पुरानी मुद्रा धारकों को नयी मुद्रा प्रदान कर दी जाती है।
- इससें अर्थव्यवस्था में कीमत स्तर में कमी आ जाती है तथा जीवन स्तर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
विमुद्रीकरण:-
- यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा उच्च मौद्रिक मूल्य वर्ग के बैंक नोटों की वैधानिकता को समाप्त कर दिया जाता है।
उदाहरण:- 8 नवंबर, 2016 को 500 रु. तथा 1000 रु. मूल्य वर्ग के नोटों की वैधानिकता को समाप्त कर दिया गया था।
प्रयोग

- जब काले धन का प्रसार और मुद्रास्फीति में कथन-कारण का संबंध हो।
(B) वित्तीय उपाय:
- मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने के वित्तीय उपायों के अंतर्गत उन उपायों को शामिल किया जाता है, जो अर्थव्यवस्था में समग्र पूर्ति स्तर का विस्तार करें तथा समग्र मांग के स्तर में कमी लाने का प्रयास करें। मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के वित्तीय उपाय निम्नलिखित हैं-
(i) कर ढाँचे में परिवर्तन करके:-
- मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने के लिए प्रत्यक्ष करों की दरों में वृद्धि की जाती है तथा अप्रत्यक्ष करों की दरों में कमी की जाती है।
(ii) सरकारी व्यय में परिवर्तन करके:-
- सार्वजनिक व्यय को दो भागों में बाँटा जाता है-

(iii) बचतों को प्रोत्साहित करना:-
- सरकार द्वारा बचत पर कर छूट का लाभ प्रदान करके बचत जमा पर ब्याज दरों में वृद्धि बचतों को प्रोत्साहित किया जाता है जिसमें बचत स्तर में वृद्धि होती है।
- बचत स्तर में वृद्धि में प्रयोज्य आय, क्रय शक्ति क्षमता, समग्र मांग स्तर तथा कीमत स्तर में कमी आती है जिसके परिणाम स्वरूप मुद्रास्फीति को नियंत्रित किया जाता है।
(iv) सार्वजनिक भुगतान को टालना:-
- सरकार द्वारा सार्वजनिक ऋण लिये जाते हैं। मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए एक निश्चित समय के लिए टाल दिया जाता है।
(C) प्रशासनिक उपाय:-
- मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए प्रशासनिक उपायों को अलग-अलग स्तर के प्राधिकारियों द्वारा लागू किया जाता है।
(i) एक प्रभावशाली सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा:-
- सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अन्तर्गत जब उपभोग उत्पादों की संख्या बढ़ायी जाती है तो सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दायरे का विस्तार किया जाएगा परिणामस्वरूप अधिकतम जनता को न्यूनतम कीमत पर वस्तुएँ प्रदान की जाएगी।
- जिससे उत्पादों के बाजार मांग में कमी आएगी परिणामस्वरूप कीमत स्तर नीचे जाएगा और मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करना संभव हो पाएगा।
(ii) प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करना:-
- बाजार में एकाधिकारी व अल्पाधिकारी प्रवृत्तियों पर रोक लगानी चाहिए तथा उत्पादकों के बीच में प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करना चाहिए जिससे लागत में कमी आएगी व मूल्य स्तर नीचे गिरेगा।
(iii) भण्डारण की सीमा को तय करना:-
- आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के अंतर्गत अधिसूचित वस्तुओं की उच्चतम सीमा का निर्धारण किया गया है। इसके परिणामस्वरूप जमाखोरी में कमी आएगी जिससे बाजार में आपूर्ति बढ़ेगी और बाजार मूल्य में कमी आएगी।
Note:- वर्ष 2020 में कोविड-19 के लॉकडाउन में सेनेटाइजर को भी आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में शामिल किया गया। तथा एक कानून संशोधन द्वारा खाद्यान्नों को आवश्यक वस्तु अधिनियम अधिनियम की सूची से बाहर कर दिया गया है।
(iv) खुले बाजार की बिक्री योजना:-
- सरकार द्वारा सुरक्षित भंडारों से वस्तुओं को खुले बाजार में बेचा जाता है जिससे आपूर्ति स्तर में वृद्धि होती है तथा कीमत स्तर में कमी आती है परिणाम जिससे मुद्रास्फीति को नियंत्रित किया जाता है।
(v) चुनी हुई वस्तुओं के निर्यात पर रोक लगा दी जाती है:-
- मुद्रास्फीति दबाव वाली वस्तुओं के निर्यात को सरकार समय-समय पर अल्पावधि के निर्यात को प्रतिबंधित कर देती है या कुछ वस्तुओं के निर्यात पर निर्यात शुल्क मूल्य लगा दिया जाता है।
- निर्यात शुल्क लगाने पर निर्यात मूल्य में वृद्धि होगी तथा निर्यात महँगा होगा जिससे निर्यात की विदेशी मांग में कमी आएगी और निर्यात कम होगा परिमाणस्वरूप घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ेगी और मूल्य स्तर में कमी आएगी।
(vi) भावी कारोबार को प्रतिबंधित कर देना:-
- मुद्रा स्फीति दबाव वाले उत्पादों के भावी बाजार में प्रतिबंध लगा देना।
(vii) कालाधन निरोधन उपाय:-
- अर्थव्यवस्था में काले धन के प्रसार पर रोक लगाने से तरलता में कमी आएगी जिससे क्रय शक्ति क्षमता तथा मांग में कमी आएगी।
- मांग में कमी के परिमाणस्वरूप मूल्य स्तर में कमी होगी जिससे मुद्रास्फीति को नियंत्रित किया जा सकेगा
मुद्रास्फीति का माप
- मुद्रास्फीति की माप के लिए सूचकांक का प्रयोग किया जाता है।
सूचकांक:-
- सूचकांक एक सांख्यिकी माप होता है जो कुछ चरों के समूह में समय के साथ होने वाले परिवर्तन को व्यक्त करने के लिए विकसित किया जाता है।
मुद्रास्फीति की गणना
- भारत में थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर मुद्रास्फीति की गणना की जाती है।
- मुद्रास्फीति की गणना केन्द्रीय सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा की जाती है।
- भारत में पहले मुद्रास्फीति की गणना केवल थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर की जाती थी, परन्तु वर्ष 2014 से यह गणना थोक मूल्य सूचकांक एवं उपभोक्ता मूल्य सूचकांक दोनों के आधार पर की जाती है।
- आधार वर्ष का सूचकांक हमेशा 100 माना जाता है।
- भारत में मुद्रास्फीति की गणना के लिए वर्तमान में 2011-12 को आधार वर्ष के रूप में प्रयोग किया जाता है।
मूल्य सूचकांक:-
- इसका प्रयोग एक निश्चित मदों के समूह की बाजार कीमतों में होने वाले परिवर्तन की माप के लिए किया जाता है।
- इसमें मदों की संख्या निर्धारित होती है और सबका एक निश्चित भारांश होता है।

(1) थोक मूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index WPI):-
- यह थोक बाजार की कीमत सूचनाओं पर आधारित है।
- इसका उपयोग भंडारणकर्ता, थोक व्यापारी व सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
पूर्व में मुद्रास्फीति की आधिकारिक माप के लिए WPI का ही प्रयोग किया जाता था, परन्तु वर्तमान में नहीं।
- अगस्त, 1939 में सर्वप्रथम WPI का प्रकाशन किया गया था।
- 19 अगस्त, 1939 को समाप्त हुए सप्ताह की कीमत सूचनाओं पर ये सूचकांक आधारित था।
- अभिजीत सेन कार्यदल की अनुशंसा पर WPI की साप्ताहिक माप के स्थान पर मासिक माप प्रारंभ कर दिया गया था।
- जनवरी, 2012 से सरकार ने साप्ताहिक माप के स्थान पर मासिक माप प्रारम्भ कर दिया था।
थोक मूल्य सूचकांक की संरचना:-
- 12 मई 2017 से प्रभावी आधार वर्ष 2004-05 को बदलकर वर्ष 2011-12 कर दिया गया था।
- WPI के आधार वर्ष को परिवर्तित करने के लिए गठित समिति के अध्यक्ष रमेश चंद थे।
WPI के अंतर्गत सम्मिलित मदों को तीन वर्गों में विभाजित किया जाता हैं। Department of production industry and internal trade(DPIIT) इसके आँकड़े जारी करता है।

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समूह |
मदों की संख्या |
भारांश |
|
प्राथमिक जिंस |
117 |
22.62 |
|
ईंधन व ऊर्जा |
16 |
13.15 |
|
विनिर्माण उत्पाद |
564 |
64.23 |
|
कुल |
697 |
100 |
WPI की नयी संरचना में अप्रत्यक्ष करों शामिल नहीं किया जाता है।
(2) उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) :-
- यह सूचकांक फुटकर बाजार से संबंधित कीमत सूचनाओं पर आधारित होता है। यह सूचकांक उपभोक्ता दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
- CPI को उपभोक्ताओं का जीवन निर्वाह सूचकांक भी कहा जाता है।
- अभिजीत सेन समिति की सिफारिश पर CPI को मुद्रास्फीति का आधिकारिक माप बनाया गया था।
- वर्तमान में CPI का आधार वर्ष 2012 हैं जिसे वर्ष 2015 में अपनाया गया था।
- CPI की माप पूर्व में CSO जो कि वर्तमान में NSO के नाम से जाना जाता है, के द्वारा की जाती है।
- फुटकर बाजारों और उपभोक्ताओं के अलग-अलग समूहों के आधार पर अलग-अलग उपभोक्ता सूचकांक विकसित किये जाते हैं।
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नगर |
गाँव |
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(i) औद्योगिक कागमार (CPI - IW) (आधार वर्ष 2016) |
(i) कृषि मजदूर (CPI - Al) (आधार वर्ष 1986-87) |
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(ii) असंगठित क्षेत्र कामगार (CPI – UNME) |
(ii) ग्रामीण मजदूर (CPI - RL) (आधार वर्ष 1986-87) |
CPI- COMBIND (मिश्रित/संयुक्त)
- इसके अंतर्गत सम्मिलित मदों को 5 वर्गों में वगीकृत किया जाता है-
(i) खाद्य व पेय पदार्थ
(ii) पान व तम्बाकू
(iii) कपड़े, जूते-चप्पल
(iv) आवास
(v) ईंधन
Note:- सर्वाधिक भारांश खाद्य व पेय पदार्थों का होता है।
- CPI की गणना NSO द्वारा की जाती है।
- CPI का आधार वर्ष 2012 है।
- CPI की गणना मासिक आधार पर की जाती है।
- कीमत आधार – बाजार कीमत
WPI के स्थान पर CPI को आधिकारिक माप का आधार क्यों माना गया?
- WPI में सेवा की कीमतों को शामिल नहीं किया जाता है। जबकि अर्थव्यवस्था और लोगों के जीवन में सेवा का महत्वपूर्ण स्थान है।
- WPI से उपभोग स्तर की कीमतों का अनुमान नहीं लग पाता था।
आम जनता सरकारी नीति
↓ ↓
उपभोक्ता मूल्य थोक मूल्य
- इसलिए अभिजीत सेन कार्यदल ने WPI के स्थान पर CPI को मुद्रास्फीति की आधिकारिक माप बनाने की मांग की थी। इसी कार्यदल की सिफारिशों के आधार पर WPI के स्थान पर CPI को आधिकारिक माप का आधार मान लिया गया था।
उत्पादक कीमत सूचकांक (P P I):-
- WPI के संशोधन पर गठित अभिजीत सेन कार्य दल द्वारा उत्पादकों के दृष्टिकोण से एक अलग सूचकांक विकसित करने की अनुशंसा की गयी थी।
- उत्पादन कीमत सूचकांक वस्तु व सेवाओं में एक निश्चित समयावधि के दौरान होने वाले परिवर्तनों की उत्पादकों के दृष्टिकोण से करती है।
- इसमें उत्पादन स्थल से बाहर आने पर वस्तुओं व सेवाओं के कीमत में औसत परिवर्तन की माप की जाती है।
- इसमें वस्तुओं व सेवाओं दोनों को शामिल किया जाता है।
- P P I के लिए केवल आधारभूत मूल्यों के आधार बनाया जाता है।
- परिवहन व कर को इसके अंतर्गत शामिल नहीं किया जाता है।
- P P I इस आधार पर बेहतर है कि इसमें कीमत में होने वाले परिवर्तन को न्यूनतम स्तर से ज्ञात किया जाता है। परिणामत: विनिर्मित उत्पादों में होने वाले अन्तिम मूल्य वृद्धि की माप ज्ञात की जाती है।
- B.N गोलदार समिति का संबंध उत्पादन कीमत सूचकांक की प्रणाली को विकसित करने से है।
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थोक मूल्य सूचकांक व उत्पादन कीमत सूचकांक में अंतर |
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थोक मूल्य सूचकांक (WPI) |
उत्पादन कीमत सूचकांक (PPI) |
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(i) थोक बाजार के मूल्य पर आधारित |
(i) आधारभूत कीमत के आधार पर तैयार किया जाता है। |
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(ii) इसमें सेवाएँ शामिल नहीं |
(ii) सेवाएँ सम्मिलित होती है। |
आवास कीमत सूचकांक (House Price Index):-
- भारत में नगरीकरण की दर तथा आर्थिक संवृद्धि की बढ़ती के कारण भूमि की मांग बढ़ने लगी इसके लिए बैंकों द्वारा लोगों को सस्ती दरों पर ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है।
अंतत: भारत में आवासों की मांग में वृद्धि हुई है।
आधार वर्ष 2017-18
जारी- त्रिमासिक आधार
कीमत आधार – बाजार कीमत
18 राज्यों के 50 शहरों के कीमतों के आधार पर सूचकांक जारी किया जाता है।
राष्ट्रीय आवास बैंक (NHB):- के द्वारा सूचकांक जारी किया जाता है
- आवासीय क्षेत्र के वित्तीयन के लिए राष्ट्रीय आवास बैंक अधिनियम 1987 के अंतर्गत N.H.B की स्थापना की गई थी।
- इस बैंक ने वर्ष 1988 से कार्य करना प्रारंभ किया था।
- वर्ष 2019 में RBI द्वारा इन बैंक के अधिकारों का अधिग्रहण कर लिया गया।
- इसके अन्तर्गत आवास के क्षेत्रफल के आधार पर तीन प्रकार के आवास की कीमत सूचकांक जारी किया जाता है।
(1) 500 वर्ग फीट से कम
(2) 500 – 1000 वर्ग फीट
(3) 1000 वर्ग फीट से ऊपर
मुद्रास्फीति चक्र (Inflation Sprial)
- मजदूरी दरों में वृद्धि के कारण मुद्रा स्फीति में वृद्धि तथा मुद्रास्फीति के कारण मजदूरी में वृद्धि इस चक्र को मुद्रास्फीति Spiral कहा जाता है।

अर्द्धस्फीति या बोटलनेक स्फीति
अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार की अवस्था से पहले प्राप्त होने वाली स्फीति, बोटलनेक स्फीति कहलाती है।
- अपस्फीति (Deflation) – मांग तथा पूर्ति मे असंतुलन के कारण अर्थात मांग कम तथा पूर्ति ज्यादा होने के कारण कीमतों मे होने वाली कमी को अपस्फीति मुद्रास्फीति कहते है -
त्याग अनुपात :- मुद्रास्फीति में 1% की कमी करने पर GDP में होने वाली % कमी त्याग अनुपात कहलाती है।
- विभन्नता सूचकांक :- यह बेरोजगारी तथा मुद्रास्फीति के योग से प्राप्त किया जाता है मुद्रास्फीति व बेरोजगारी के नकारात्मक प्रभावों को प्रदर्शित करता है।
- फिस्कल ड्रेग :- मुद्रास्फीति के कारण मजदूरी में वृद्धि होने से व्यक्ति Tax जाल या कर जाल का शिकार होता है परन्तु वास्तविक आय में वृद्धि नहीं होने से उसकी बचत व निवेश में नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, फिस्कल ड्रेग कहलाता है।
मुद्रास्फीति लक्ष्य भेदन :- जब मुद्रा स्फीति की दरों को निर्धारित करने के लिए एक निश्चित पराश का निर्धारण किया जाता है।
जैसे :- भारत में पराश – 2% से 6% तक है।
व्यापार चक्र :- शीर्ष से गर्त तक गति के दौरान अर्थव्यवस्था उछाल, प्रतिलाभ, प्रतिसार व मंदी की अवस्थाओं से गुजरती है, अर्थव्यवस्था की ये विभिन्न अवस्थाएँ, व्यापार चक्र कहलाती हैं।

A उछाल b तेजी c मंदी d गर्त e सुधार
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(A) AB |
उछाल से तेजी की तरफ |
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(B) BC |
( तेजी से सुस्ती की तरफ [From Peak to Slowdown (Recession)] |
|
(C) CD |
(सुस्ती से मंदी की तरफ [From slowdown (Recession) to Depression])] |
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(D) DE |
(iv) मंदी से सुधार की तरफ (From Depression to Recovery) |
उछाल (Boom):- मांग में तीव्र गति से वृद्धि होती है, कीमतें बढ़ती है।
- रोजगार व उत्पादन उच्च स्तर पर पहुँच जाता है, अर्थव्यवस्था अपनी सीमा स्तर को पार कर जाती है।
तेजी peak – वो अवस्था जहाँ आपूर्ति से अधिक मांग होती है जिससे कीमतों मे निरंतर उछाल आते रहते हैं जिस कारण व्यापारियों का लाभ बढ़ता है जो उन्हें और अधिक निवेश करने के लिए प्रेरित करता है ।
रोजगार बढ़ता है, विकास की दर भी बढ़ती है।
सुस्ती slowdown – इस अवस्था मे मांग गिरने लगती है और वस्तुओं की कीमते घटने लगती है तथा बेरोजगारी दर बढ़ती है और अर्थव्यवस्था मंदी की ओर जाती है।
प्रतिसार :- मांग में धीरे-धीरे कमी आती है जिससे कीमतें में गिरावट होती है मांग में वृद्धि के लिए विक्रेता को Price Cut का सहारा लेना पड़ता है।
- रोजगार में कमी आती है।
- समृद्धि प्रतिसार अर्थव्यवस्था में धीमी गति से वृद्धि परन्तु रोजगार नहीं बढ़ने की अवस्था बनी रहती है ।
अवसाद व मंदी (Depression & recession) – मांग का निम्न स्तर पर पहुँच जाना, कीमतों में लगातार गिरावट होती है रोजगार में कमी आती है तथा कारोबार में बने रहने के लिए छढ़नी प्रक्रिया को अपनाया जाता है।
गर्त trough- इस अवस्था मे मुद्रास्फीति की गिरावट को समाप्त करने के लिए सरकार राजकोषीय व मौद्रिक नीति का पप्रयोग करती है जिससे व्यापार चक्र सुधार की और बढ़े ।
सुधार (recovery) – मंदी से तेजी की ओर जाने के लिए जो भी प्रयास किए जाते उस अवस्था को सुधार कहते हैं।
प्रतिलाभ :- मांग में वृद्धि के साथ उत्पादन स्तर में वृद्धि उत्पादन वृद्धि निवेश को आकर्षित करती है जिससे रोजगार सृजन होता है।
- कीमतों में वृद्धि प्रारंभ होती है।
आधार वर्ष प्रभाव :- मुद्रास्फीति गणना के लिए आधार वर्ष में परिवर्तन के कारण मुद्रास्फीति पर पड़ने वाला प्रभाव, आधार वर्ष प्रभाव कहलाता है।
जीडीपी अपस्फीति कारक
- यह मुद्रास्फीति मापने का सबसे उपयुक्त तरीका है।
- जब सकल घरेलू उत्पाद की गणना बाजार कीमतों अर्थात् प्रचलित मूल्यों पर की जाती है, तो इसे बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद या मौद्रिक जीडीपी कहते हैं।
- जब सकल घरेलू उत्पाद की गणना आधार वर्ष के मूल्यों पर की जाती है तो इसे स्थिर मूल्यों पर भी या वास्तविक जीडीपी कहते हैं।
- मौद्रिक जीडीपी की कीमत में वृद्धि तथा वास्तविक जीडीपी की वृद्धि का अन्तर ही जीडीपी की कीमत में वृद्धि है और इसे ही ‘जीडीपी डिफ्लेटर’ कहते हैं।
जीडीपी डिफ्लेटर= ![]()
अन्य :
- आधार प्रभाव - Base/आधार बढ़ेगा तो मुद्रास्फीति सूचकांक में समान वृद्धि के बावजूद आधार पर अंतर के कारण मुद्रास्फीति में अंतर। इसी ही (अंतर को) आधार प्रभाव नाम से जाना जाता है।
- खाद्य मुद्रा स्फीति (Food Inflation) तथा फ्यूल एण्ड पॉवर इन्फ्लेशन के आँकड़े साप्ताहिक आधार पर प्रत्येक बृहस्पतिवार को जारी किये जाते थे।
- साप्ताहिक आधार पर मुद्रास्फीति के आँकड़ों का प्रकाशन 2 फरवरी, 2012 को बंद हो गया है।
- सरकार CPI एवं WPI की तर्ज पर ही सेवा मूल्य सूचकांक (Service Price Index - SPI) लाने का इरादा है। इसके लिए प्रो. C.P. चन्द्रशेखर की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने अपनी रिपोर्ट 2009 में सरकार को दी है जिसमें 10 सेवा क्षेत्रों की पहचान सूचकांक के लिए की गई है।
भारत में ऊँची मुद्रास्फीति के कारण
1. मांग आधारित कारक-
- जनसंख्या वृद्धि
- रोजगार तथा आय में वृद्धि
- शहरीकरण का बढ़ता स्तर
2. पूर्ति आधारित कारक-
- अनियमित खाद्य आपूर्ति
- आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी
- औद्योगिक उत्पादन में कमी
- आयातों पर नियन्त्रण
3. लागत आधारित कारक-
- खाद्य नीति
- प्रशासनिक मूल्य नीति
मुद्रा स्फीति के प्रभाव (Effect of Inflation)
- मुद्रा स्फीति की प्रारम्भिक अवस्था में आर्थिक प्रगति तथा रोजगार के अवसरों का मार्ग प्रशस्त होता है परंतु इसकी तीव्रता बढ़ने पर विकास की गति कुण्ठित, रोजगारों के अवसरों में कमी, मध्यम वर्ग की कठिनाइयाँ तथा उपभोक्ता की जीविका मुश्किल हो जाती हैं।
- सामाजिक न्याय की घोर उपेक्षा होती है आर्थिक असमानता में वृद्धि से वर्ग संघर्ष बढ़ जाता हैं।
- मुद्रा प्रसार के समय निश्चित आय वाले विनियोग में कमी होती है क्योंकि इस समय विनियोगों की बाजार कीमत घट जाती है।
- ऐसे विनियोगकर्ता जिनकी आय व्यापार और उत्पादन की मात्रा पर निर्भर करती है मुद्रास्फीति के समय व्यापार वस्तुओं की मूल्यवृद्धि से खूब लाभ प्राप्त करते हैं।
- मुद्रास्फीति के समय लोगों की क्रय-शक्ति बढ़ती है तो मांग में वृद्धि होती है जिससे वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होती है तो निवेश को प्रोत्साहन मिलता है औद्योगिक मार्ग प्रशस्त होता हैं।
- मुद्रास्फीति के दौरान बाजार में वस्तुओं की पूर्ति कम एवं मांग अधिक होने से बाजार विक्रेता बाजार (Seller Market) बन जाता है। वस्तुओं की कृत्रिम कभी उत्पन्न करके कीमतों में अधिक वृद्धि की जाती है। कालाबाजारी को प्रोत्साहन मिलता हैं।
- कीमत वृद्धि से आंतरिक बाजार का ही विकास नहीं होना बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार भी बढ़ता है ऊँचे मूल्य के कारण विदेशी भी लाभ अर्जन की इच्छा से निर्यात बढ़ती है। सरकार भी जरूरी वस्तुओं की कीमत कम करने एवं पूर्ति करने के लिए विदेशों से आयात करती हैं।
- मौद्रिक आय वृद्धि से वस्तुओं और सेवाओं का उपभोग बढ़ता है और औद्योगिक वस्तुओं के उत्पादन के लिए कृषिगत कच्चे माल की मांग बढ़ जाती है जिससे कृषकों को भी उनकी उपज का उचित मूल्य तो मिलता ही है साथ ही अधिक उत्पादन का प्रोत्साहन भी मिलता है और कृषि विकास बढ़ता हैं।
- अधिक उत्पादन की मांग रोजगार के अवसरों का सृजन करती है श्रमिकों की मांग में वृद्धि होती है जिससे उनकी मजदूरी में भी वृद्धि होती हैं।
- मुद्रा प्रसार के कारण व्यापार, कृषि, श्रमिकों की गतिशीलता में वृद्धि होती है तो परिवहन एवं संचार व्यवस्था का भी विकास होता हैं।
- सामान्य जनता के उपभोग की सब वस्तुएँ महंगी हो जाती है परिवर्तनशील आय वाले उपभोक्ता को कम हानि उठानी पड़ती है जबकि स्थिर आय वाले उपभोक्ता का उपभोग स्तर नीचे गिर जाता है और उनका जीवन कष्टमय होने लगता हैं।
- ऋणी को ऋण तथा ब्याज चुकाना सरल होता है जबकि ऋणदाता को इस समय हानि होती है।
- बैंक भी इस समय साख निर्माण, पूँजी विनियोग एवं व्यापारिक गतिविधियों से लाभ उठाते हैं।
- मुद्रास्फीति काल में सरकार पर भार बढ़ जाता है। कर्मचारी अधिक वेतन की मांग करते हैं। सरकार नवीन कर लगाने एवं पुराने करों में वृद्धि से जन असंतोष का सामना करना पड़ता है। मूल्य स्थायित्व के लिए आर्थिक नियंत्रण लगाने पड़ते हैं।
- मुद्रास्फीति का अधिकतर लाभ धनी को होता है निर्धनों को नहीं इससे धन का असमान वितरण बढ़ता है।
- वस्तुओं की मूल्य वृद्धि एवं उपभोग व्यय में वृद्धि से बचतों में कमी आती है।
- इस समय लोग स्वर्ण, जमीन में अधिक विनियोग करते है बैंकों में जमा नहीं करते हैं।
- इससे मुनाफाखोरी, मिलावट, घूसखोरी, भ्रष्टाचार में वृद्धि होती हैं।
मुद्रा - स्फीति को रोकने के उपाया/उपचार
Measures & Check Inflation
(Monetary Measures)
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Bराजकोषीय उपचार (Fiscal Measures)
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C भौतिक उपचार (Physical Measure)
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- राजकोषीय घर्षण (Fiscal Drag) – ऐसा कर भार जो मुद्रास्फीति के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है। ऐसी अवस्था में कर की दर में वृद्धि के बिना ही वेतन एवं मजदूरी के बढ़ने के कारण कर दाता उच्च कर श्रेणी में आ जाता है और उस पर कर भार बढ़ जाता है।