कर व कर सिद्धांत

कर का अर्थ

- प्रो. सेलिगमेन, “कर सरकार को दिये जाने वाले उस अनिवार्य अंशदान को कहते हैं जो सबसे सामान्य हित के लिए किए जाने वाले खर्च़ों के भुगतान में अदा किया जाता है और जिसके बदले में कोई विशेष लाभ नहीं दिया जाता है।

 कर या करारोपण का उद्देश्य (Objectives of Taxitation) –

 1.राजकीय आय में वृद्धि करना।

 2.अनावश्यक उपभोग वस्तुएँ (विशेष कर नशीले पदार्थ) पर रोक लगाना।

 3.संरक्षण एवं प्रशुल्क नीति की सफलता हेतु स्वदेशी उद्योगों पर कम कर लगाना एवं विदेशी आयातों पर ऊँचे कर लगाना।

 4.अतिरिक्त उपभोग पर कर लगाकर विनियोग और बचतों को प्रोत्साहन देती है जिससे पूँजी निर्माण एवं राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि होती है।

 5.धन के वितरण की विषमताओं को कम करना।

 6.साधनों के प्रयोग में स्थानांतरण।

 7.मुद्रा प्रसार की रोकथाम।

भारत में कर संरचना :-

- भारत में कर के अधिकारों का केन्द्रीय और राज्य सरकारों के बीच स्पष्ट विभाजन किया गया है।

- केन्द्र सरकार द्वारा लगाये जाने वाले महत्वपूर्ण कर निम्नलिखित हैं-

 (i)  आयकर 

 (ii) निगम कर

 (iii)  सीमा शुल्क 

 (iv) केन्द्रीय उत्पादन शुल्क

 (v) सेवाकर

- वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच कर राजस्व का विभाजन किया जाता है।

- कुछ करों को लगाने का अधिकार राज्य सरकारों को है और उनसे प्राप्त समस्त राजस्व को राज्य सरकार अपनी इच्छाओं के अनुसार उपयोग कर सकती है। जैसे – मनोरंजन कर, राज्य मूल्य वर्धित कर, कृषि आय पर कर

- कुछ करों को लगाने का अधिकार केन्द्र सरकारों को है उनके प्राप्त समस्त राजस्व को राज्यों के बीच बाँट दिया जाता है, जैसे विज्ञापन पर कर आदि।

- कुछ कर एवं शुल्क केन्द्र सरकार द्वारा लगाये जाते हैं, लेकिन  उनको एकत्र एवं खर्च राज्य  सरकारों द्वारा किया जाता है। जैसे स्टांप शुल्क

- कर एक प्रकार का अनिवार्य भुगतान है जो कर आधार से संबंधित व्यक्ति या समूह द्वारा सरकार को बिना किसी प्रतिफल के देना होता है।

- कर को ना चुकाना या कर की चोरी करना कानूनन दण्डनीय अपराध है।

- कर एक अनैच्छिक शुल्क होता है, जिसे सरकार की गतिविधियों को संचालित करने के लिए स्थानीय, क्षेत्रीय या राष्ट्रीय सरकार द्वारा लागू किया जाता है।

करों के प्रकार  :

- कर दो प्रकार के होते हैं-

 (1) प्रत्यक्ष कर

 (2) अप्रत्यक्ष कर

(1)  प्रत्यक्ष कर :-

- प्रत्यक्ष कर वह कर है, जिसे जिस व्यक्ति पर आरोपित किया जाता है, उसी से वसूल किया जाता है।

- इसे किसी भी स्थिति में अन्य व्यक्ति को स्थानान्तरित नहीं किया जा सकता है।

(i) निगम कर :-

- यह एक प्रत्यक्ष कर है, जो कंपनियों के लाभ पर लगाया जाता है।

- इसी कारण इसे कंपनी लाभ कर भी कहा जाता है।

- यह कर केन्द्र सरकार द्वारा लगाया एकत्रित किया जाता है।

- यह कर राज्यों के मध्य विभाजित नहीं किया जाता है।

- वर्तमान में यह कर भारत सरकार के राजस्व प्राप्त करने का सबसे बड़ा स्त्रोत बना हुआ है।

- भारत में वर्ष 1960-61 से पहले कंपनियों पर उनके लाभ पर जो कर लगाया जाता था, उसे सुपर-टैक्स कहा जाता था।

- इसे वर्ष 1960-61 में समाप्त कर दिया गया और उसके स्थान पर इसे निगम कर कहा जाने लगा।

(ii) संपत्ति कर :-

- संपत्ति से कमाए हुए लाभ पर लगने वाला कर संपत्ति कर कहलाता है।

- संपत्ति कर अधिनियम, 1957 के तहत भारत में संपत्ति कर सर्वप्रथम 1 अप्रैल,1957 को लगाया गया।

- भारत में संपत्ति कर राज्य सरकारों का कर है।

- इसके तहत प्रत्येक वर्ष संपत्ति का मूल्यांकन करके कर लगाया जाता है।

- इस कर को वर्ष 2015-2016 के बजट से तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली द्वारा समाप्त कर दिया गया।

(iii) व्यक्तिगत आयकर :-

- यह कर  उन विभिन्न स्त्रोतों पर लगाया जाता है, जिनसे विभिन्न व्यक्तियों को आय प्राप्त होती है।

- आयकर की वसूली करने का कार्य केन्द्र सरकार के आयकर विभाग का है, जो कि केन्द्रीय वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के अधीन केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड द्वारा शासित किया जाता है।

(iv) उपहार कर :-

- भारत में आयकर अधिनियम के तहत किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति को बिना किसी प्रतिफल के और स्वेच्छा से हस्तांतरित की गई चल या अचल परिसपंत्ति उपहार कहलाती है, इस पर आयकर अधिनियम के तहत लगने वाला कर उपहार कर कहलाता है।

- भारत में सर्वप्रथम उपहार कर 1 अप्रैल, 1958 को लगाया गया।

- वर्ष 1998 के बाद इसे समाप्त कर दिया गया।

(v)  पूँजी लाभ कर :-

- जब कोई संपत्ति अपने क्रय लागत या  निर्माण लागत से अधिक पर बिकती है तो इस पर होने वाला लाभ पूँजी लाभ कहलाता है।

- पूँजी लाभ कर समय अवधि के आधार दो प्रकार के होते हैं।

अल्पकालीन पूँजी लाभ कर

- जब कोई वित्तीय परिसंपत्ति विक्रेता के पास तीन साल से कम अवधि के लिए रही हो, तो उस परिसंपत्ति के विक्रय से होने वाले पूँजी लाभ पर कर को अल्पकालीन पूँजी लाभ कहते हैं।

दीर्घकालीन पूँजी लाभ कर:-

- जब कोई वित्तीय परिसंपत्ति 3 साल  से अधिक अवधि के लिए विक्रेता के पास रही हो, तो उस परिसंपत्ति के विक्रय से होने वाले पूँजी लाभ पर कर को दीर्घकालीन पूँजी लाभ कहते हैं।

(vi)  प्रतिभूति विनिमय कर :-

- यह कर घरेलू स्टॉक एक्सचेंज में हुए लेन-देन पर लगाया जाता है।

- इस कर की शुरुआत 1 अक्टूबर, 2004 को की गई।

- इस कर की दरें केन्द्र सरकार द्वारा प्रस्तावित की जाती है एवं यह कर स्टॉक एक्सचेंज से वसूला जाता है।

(vii)  फ्रिंज लाभ कर :-

- इस कर की शुरुआत वित्तीय वर्ष 2005-06 से की गई।

- एक नियोक्ता अपने कार्यालय में कार्यरत कर्मचारियों को वेतन के अतिरिक्त मनोरंजन, यातायात सुविधा, स्वास्थ्य सुविधाएँ एवं रिटायरमेंट के समय एक मुश्त अंशदान के रूप में प्रदान करता है, उसे फ्रिंज लाभ कहते हैं।

- फ्रिंज लाभ कर को 1 अप्रैल, 2009 से समाप्त कर दिया गया है।

(2) अप्रत्यक्ष कर :-

- इस कर में मौद्रिक भार दूसरों पर डाला जाता है।

- इस कर की स्थिति में करापात किसी अन्य व्यक्ति पर होता है और कराघात किसी अन्य व्यक्ति पर पड़ता है।

- अप्रत्यक्ष कर निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

(i) सीमा शुल्क :-

- यह कर देश की सीमा से बाहर जाने वाली तथा देश में बाहर से आने वाली वस्तुओं पर लगाया जाता है।

- यह कर निर्यात आयात पर लगाया जाता है।

- आयात की जाने वाली वस्तुओं पर लगा कर आयात कर कहलाता है।

- निर्यात की जाने वाली वस्तुओं लगा कर निर्यात कर कहलाता है।

- यह कर केन्द्र सरकार द्वारा लगाया एकत्र किया जाता है, परन्तु वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर इसे केन्द्र तथा राज्यों के मध्य विभाजित किया जाता है।

(ii) सेवा कर:-

- यह वह कर है जो किसी सेवा प्रदाता द्वारा प्रदान की गई सेवाओं के बदले में लगाया जाता है।

- इस कर का भुगतान का सेवा प्रदाता द्वारा किया जाता है।

- यह कर केन्द्र सरकार द्वारा लगाया एकत्र किया जाता है, परन्तु वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर इसे केन्द्र एवं राज्यों में बाँटा जाता है।

- राजा जे. चैलेया समिति की सिफारिश के आधार पर  भारत में सर्वप्रथम 1 जुलाई, 1994 से तीन सेवाओं टेलीफोन, स्टॉक ब्रोकर एवं सामान्य बीमा पर 5 प्रतिशत की दर से सेवा कर लगाया जाता है।

- सेवा कर अवशिष्ट मद था और इस पर केन्द्र एवं राज्यों के बीच हमेशा विवाद बना रहता था।

- इस विवाद को समाप्त करने के लिए वर्ष 2003 में 88वाँ संविधान संशोधन करके सेवा कर को केन्द्रीय सूची का विषय बना दिया गया।

(iii) उत्पाद शुल्क :-

- किसी वस्तु का उत्पादन देश के भीतर करने पर केन्द्र सरकार द्वारा जो कर लगाया जाता है उसे उत्पाद शुल्क कहते हैं।

- शराब, गाँजा, तम्बाकू आदि मादक वस्तुएँ जो मानवीय उपभोग में आती है, के उत्पादन पर उत्पादन शुल्क राज्य सरकार द्वारा लगाया जाता है।

- केन्द्रीय उत्पादन शुल्क से प्राप्त राजस्व का विभाजन वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार राज्य तथा केन्द्र सरकारों के बीच होता है।

- तम्बाकू से निर्मित वस्तुओं पर केन्द्र सरकार कर लगाती है।

कर शमन Tax Mitigation

- सरकार द्वारा तैयार किए नियमों कानूनों छूटों की सहायता से कर दायित्व में कमी करके कर भरना।

कर चोरी /कर वंचन Tax Evasion

- गैर कानूनी प्रक्रिया जिसमें आय के स्त्रोतों को छिपाकर तथा उत्पादन मात्रा को कम बताकर कर देयता में कमी की जाती है।

टोबिनटैक्स

- सन् 1970 में टोबिन द्वारा विदेशी मुद्रा के लेन-देन से जो आय प्राप्त होती है, उस पर आरोपित किया जाने वाला कर।

दोहरा कर बचाव समझौता (DTAA)

-   जब किसी आय वित्तीय लेन-देन पर दो या दो से अधिक प्राधिकार द्वारा कर आरोपित किया जाता है तो यह प्रक्रिया दोहरा कर कहलाती है अर्थात् जहाँ से आय अर्जित की गई उस देश में कर तथा जिस देश का नागरिक है वहाँ कर।

-   इस समस्या से बचने के लिए जो समझौता दो देशों के मध्य किया जाता है- DTAA कहलाता है।

कर आतंकवाद (Tax Terrorism)

-    सरकार द्वारा अपने राजस्व संग्रह के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कर की दरों में वृद्धि की जाती है, परन्तु कुछ करदाता चोरी करते हैं। अत: सरकार द्वारा अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए ईमानदार करदाताओं से अवैध तरीकों से कर भुगतान हेतु दबाव डाला जाता है। यह प्रक्रिया कर आतंकवाद कहलाती है।

कर उत्पादकता ⁄ कर उछाल (Tax Buoyancy)

-   किसी वित्त वर्ष में सांकेतिक जी.डी.पी. के अनुपात में कर राजस्व में होने वाली वृद्धि कर उछाल उत्पादकता कहलाती है।

- करदान क्षमता (Taxable Capacity) - करदान क्षमता देश के नागरिकों के कर चुका पाने की उस सीमा से है जो वे आर्थिक क्षेत्र में बिना अस्त-व्यस्तता के सार्वजनिक व्यय के लिए दे सकते हैं। कर आय के साधन हैं पर साध्य सार्वजनिक व्यय द्वारा जनकल्याण है। अतः कर दान क्षमता को केवल आय के परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिये।

  भारत में करदान क्षमता अभी राष्ट्रीय आय का 16% है।

- कर प्रभाव (Tax Effects) - कर प्रभाव के तहत करारोपण से उत्पन्न होने वाले समस्त प्रकार के आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक परिणामों एवं प्रक्रियाओं का अध्ययन है। जैसे- बचत पर प्रभाव उत्पादन पर प्रभाव।

- सार्वजनिक ऋण का अर्थ (Meaning of Public Debt) - जब सरकार देश अथवा विदेशों से उधार लेकर आय जुटाती है तो उसे सार्वजनिक ऋण कहा जाता है।

   सार्वजनिक ऋण एवं कर में अंतर

 (Difference in Public Debt and Tax) –

प्रकृति

सार्वजनिक ऋण

कर

1. प्रकृति

सार्वजनिक ऋण ऐच्छिक  हैं।

कर एक अनिवार्य वसूली है।

2. दायित्व

सरकार पर ब्याज तथा मूलधन के पुनर्भुगतान का दायित्व होता है।

करों के संबंध में सरकार पुनर्भुगतान का दायित्व नहीं होता।

3.क्षेत्र

व्यापक क्षेत्र, सरकार देश-विदेशी से ऋण लेकर आय जुटाती है।

सीमित क्षेत्र करों का क्षेत्र देश की राजनीतिक सीमाओं तक ही सीमित रहता है।

4.नियमितता

सार्वजनिक ऋण नियमित रूप से नहीं लिये जाते हैं।

कर दिन-प्रतिदिन के व्ययों पर नियमित रूप से लिये जाते हैं।

5. लाभ भार

इसका लाभ भार दोनों वर्तमान एवं भावी पीढ़ी पर पड़ता है।

करों का लाभ भार वर्तमान पीढ़ी पर ही पड़ता  है।

 

6. भुगतान

सार्वजनिक ऋणों का भुगतान पूँजीगत बचतों से किया जाता है।

करों का भुगतान वर्तमान आय से किया जाता है।

7.मितव्ययता

सार्वजनिक ऋण से प्राप्त राशि को सरकार सावधानी पूर्वक खर्च नहीं करती हैं।

करों से प्राप्त आय को सरकार सावधानी पूर्व खर्च करती है।

भारत में सार्वजनिक ऋण के प्रमुख स्त्रोत :

1.  आंतरिक ऋण स्त्रोत

- बाजार ऋण

- अन्य ऋणक्षतिपूरक अन्य ब्रांड

- ट्रेजरी बिल

- ट्रेजरी बिलों के बदलें में RBI को जारी विशेष प्रतिभूतियाँ

- विशेष फ्लोटिंग एवं अन्य ऋण

- RBI द्वारा जारी विशेष प्रतिभूतियाँ

- लघु बचतेंअल्प  बचत योजनाएँ, भविष्य निधिगैरसरकारी भविष्य निधि जमाएँ

2.  बाह्य या विदेशी ऋण स्त्रोत

- बहुपक्षीय ऋण स्त्रोत

- द्विपक्षीय ऋण स्त्रोत

- अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से ऋण

- विभिन्न देशों से व्यापारिक ऋण

- NRI  (प्रवासी  भारतीयों) से प्राप्त जमाएँ एवं ऋण

 वित्तीय प्रशासन (Financial Administration) – वित्तीय प्रशासन के अंतर्गत बजट का निर्माण, आवंटन, क्रियान्वयन, मूल्यांकन, आय-व्यय, अंकेक्षण, राजस्व आदि कार्य शामिल हैं। प्रभावी वित्त प्रशासन के द्वारा ही सरकार वित्तीय प्रवाह, व्यय की उपयोगिता एवं सार्वजनिक क्षेत्र की कुशलता सुनिश्चित कर सकती है।

 आर्थिक संतुलन (Economic Stabilisation) – सार्वजनिक वित्त के इस अंग के अन्तर्गत आर्थिक स्थायित्व लाने के लिए राजकोषीय नीति (Fiscal Policy) के प्रयोगों का अध्ययन होता है। मूल्यों तथा विनिमय दर में स्थायित्व वितरण में न्याय और पूर्ण रोजगार से अर्थव्यवस्था में स्थिरता का प्रयत्न किया जाता है।

 संघीय वित्त (Federal Finance) - भारतीय संविधान ने केन्द्रीय/भारत सरकार को सर्वाधिक वित्तीय अधिकार दिये हैं। संघीय वित्त के तहत ही केन्द्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों का अध्ययन करेंगे। संविधान की 7वीं अनुसूची में केन्द्र-राज्य वित्तीय स्रोत किया गया है। विषयों को 3 सूची में बाँटा है -

1.  संघ सूची (Federal Dist) - प्रथम सूची को संघ सूची कहा जाता है। इसमें मद संख्या 82 से 92 तक के कर संघीय कर कहलाते हैं।

2.  राज्य सूची (State List) - द्वितीय सूची को राज्य सूची कहा जाता है, सूची की मद संख्या 45 से 63 तक में राज्य सरकार करों के कर अधिकारों का वर्णन है।

3.  समवर्ती सूची - तीसरी सूची समवर्ती सूची कहते हैं, इसमें 52 विषय शामिल हैं।

4.  अवशिष्ट सूची (Residual Power) - वे विषय जो उपर्युक्त तीनों सूची में शामिल नहीं है। अवशिष्ट विषय माने जाते हैं और अवशिष्ट सूची के विषय पर कर लगाने का अधिकार केन्द्र सरकार को है।

केन्द्र सरकार द्वारा लगाए गए करों का विभाजन -

 केन्द्र सरकार द्वारा लगाए गए करों को 4 भागों में बाँटा गया है-

1. वे कर जो केन्द्र द्वारा लगाए जाते हैं और पूर्णतया केन्द्र सरकार द्वारा ही रखे जाते हैं।

2. वे कर जो केन्द्र द्वारा लगाए तथा एकत्र किए जाते हैं परन्तु जिनसे प्राप्त राजस्व का कुछ भाग राज्यीय सरकारों के साथ बाँटा जाता है। (अनु. 270)

3. वे कर जो केन्द्र द्वारा लगाए तथा एकत्र किए जाते हैं परन्तु जिनसे प्राप्त समस्त राजस्व राज्यों को सौंप दिया जाता है। (अनुच्छेद 269)

4. वे कर जो केन्द्र द्वारा लगाए जाते हैं परन्तु जो राज्य सरकारों द्वारा एकत्र तथा प्रयुक्त किए जाते हैं। (अनुच्छेद 268)

संघीय कर (Federal Tax) -

1. आयकर (कृषि आय के अतिरिक्त)

2. निगम कर

3. सेवा कर

4. सीमा शुल्क (Custom Duties) जिसमें आयात-निर्यात शुल्क शामिल हैं।

5. अफीम शराब पेय पदार्थ़ों को छोड़कर शेष वस्तुओं के संबंध में उत्पादन शुल्क

6. कृषि भूमि से भिन्न अन्य संपदा तथा उत्तराधिकार शुल्क (Estate and Succession Duty)

7. व्यक्तियों तथा कम्पनियों की संपत्ति के पूँजी मूल्य पर कर

8. प्रपत्रों पर स्टाम्प शुल्क

9. शेयर बाजारों तथा सट्टे बाजार के व्यवहारों पर स्टाम्प शुल्क के अतिरिक्त अन्य कर

10. समाचार-पत्रों के क्रय-विक्रय एवं विज्ञापनों पर कर

11. रेलयात्री किराए एवं मालभाड़े पर कर

12. टर्मिनल टैक्स

13. अन्तर्राज्यीय व्यापार तथा वाणिज्य के दौरान माल के क्रय-विक्रय पर कर (कुछ मदों को छोड़कर)

राज्य कर (State Tax) -

1. लगान/भूमिकर

2. माल के क्रय-विक्रय पर कर (समाचार-पत्रों के अतिरिक्त)

3. कृषि आय पर कर

4. भूमि तथा भवन कर

5. कृषि भूमि पर सम्पदा शुल्क तथा उत्तराधिकार के संबंध में शुल्क

6. एल्कोहॉल, मदिरा, नारकोटिक्स आदि पर उत्पादन शुल्क

7. स्थानीय क्षेत्रों में माल पर प्रवेश कर

8. खनिज अधिकारों पर कर (संसद द्वारा निर्धारित सीमाओं के अधीन)

9. विद्युत उपयोग तथा विक्रय कर

10. गाड़ियों, पशुओं तथा नावों पर कर

11. सड़कों तथा आंतरिक जलमार्ग़ों द्वारा यात्रियों तथा माल के आवागमन पर कर

12. विलासिताओं (मनोरंजन, जुआ आदि) पर कर

13. पथ कर (Toll Tax)

14. पेशे, व्यापार, आजीविका तथा रोजगार पर कर

15. विज्ञापनों पर कर (समाचार-पत्रों, रेडियो दूरदर्शन के विज्ञापनों के अतिरिक्त)

 केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों में गैर-कर राजस्व का वितरण

 केन्द्र सरकार को प्राप्त गैर-कर राजस्व आय 

 1. रेलवे    

 2. पोस्ट एण्ड टेलीग्राम 

 3. प्रसारण  

 4. अफीम

 5. चलन एवं टकसाल

 6. केन्द्रीय औद्योगिक एवं वाणिज्यिक उपक्रम जो केन्द्र सरकार के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत आते हैं।

 राज्य सरकारों के गैर-कर राजस्व आय

 1. वन  

 2. सिंचाई

 3. वाणिज्यिक एवं औद्योगिक उपक्रम जो राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार के तहत आते हैं।

 4. गहरे समुद्री क्षेत्रों में मत्स्यपालन तथा सिल्क

 केन्द्र एवं राज्य सरकारों के ऋण प्राप्ति संबंधी संवैधानिक प्रावधान।

- अनुच्छेद 292 के अनुसार केन्द्रीय सरकार भारत सरकार की संचित निधि की प्रतिभूति पर संसद द्वारा निर्धारित सीमाओं की परिधि में ही ऋण ले सकती है तथा इन सीमाओं के तहत ही किसी ऋण की जमानत दे सकती है।

- अनुच्छेद 293 में राज्य सरकार द्वारा राज्य की समेकित निधि की गारंटी से राज्य विधानसभा द्वारा निर्धारित सीमाओं के अन्तर्गत ही धन उधार लिए जाने की व्यवस्था निर्धारित की गई है। इसी के तहत वह ऋण की प्रतिभूति दे सकती है।

- राज्य सरकार के ऋण के संबंध में निम्न प्रतिबंध हैं-

1.  राज्य सरकारों द्वारा विदेशी सरकारों से ऋण लेना पूर्णतः निषेध है।

2.  भारत सरकार द्वारा प्रदत्त ऋण की राज्य सरकार द्वारा अदायगी होने पर, आगामी ऋण प्रार्थना-पत्र को केन्द्र सरकार नामंजूर कर सकती है।

3.  ऋण भुगतान करने वाले राज्य पर भी केन्द्र सरकार द्वारा आरोपित शर्तों को राज्य विशेष द्वारा मान लिये जाने पर केन्द्र द्वारा ऋण स्वीकृति दे दी जाती है।

- केन्द्रीय अनुदान - संविधान में केन्द्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों को वित्तीय सहायता दिए जाने के प्रावधान हैं। ये अनुदान राज्यों की आय की कमी को दूर करने, वित्तीय व्यवस्था संतुलित करना, आर्थिक एवं वित्तीय असमानताओं को दूर करते हैं साथ ही जनकल्याण के कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक कार्यान्वित करते हैं।

वित्त आयोग (Finance Commission) –

- संविधान के अनुच्छेद 280(1) में व्यवस्था है कि राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक 5 वर्ष पश्चात् एक वित्त आयोग (Finance Commission) का गठन करेगा।

- वित्त आयोग में एक अध्यक्ष व 4 अन्य सदस्य होंगे।

- वित्त आयोग के प्रमुख कर्तव्य निम्न हैं-

1. केन्द्र और राज्यों के बीच करों से राजस्व की बाँटना और फिर विभिन्न राज्यों में राजस्व बाँटना।

2. वे सिद्धान्त निर्धारित करना जिनके अधीन राज्यों को सहायता अनुदान (Grants-in-aid) उपलब्ध कराना।

3. केन्द्र और राज्यों के वित्तीय संबंधों के बारे में किसी अन्य मामले की जाँच करना आदि मामलों पर वित्त आयोग अपनी संस्तुतियाँ राष्ट्रपति को सौंपता है।

- वर्ष 2015-20 के लिए चौदहवें वित्त आयोग का गठन किया गया था। अध्यक्ष Y.V. रेड्डी। सदस्य- 1. सुषमानाथ 2. एम. गोविंद 3. अभिजीत सेन 4. सुदीप्तो मुंडले

- वित्त आयोगों की सिफारिशों को 3 शीर्षक में बाँटा जा सकता है।

 a. आय कर तथा अन्य करों का विभाजन तथा वितरण

 b. अनुदान एवं

 c. संघ द्वारा राज्यों को दिए गए ऋण।

15वें वित्त आयोग की रिपोर्ट

15वें वित्त आयोग की अंतरिम रिपोर्ट वित्तीय वर्ष 2020-21 (1 वर्ष में जारी हो गई है)

15वें वित्त आयोग की अंतरिम रिपोर्ट को प्रस्तुत करना पड़ा, क्योंकि जम्मू-कश्मीर व लद्दाख का विघटन किया गया और इसके लिए विशेष प्रावधान करने के लिए अंतरिम रिपोर्ट को प्रस्तुत किया गया।

इसकी सिफारिशें निम्न हैं –

-कर विभाज्य पुल से राज्यों को हस्तांतरित किए जाने वाले राजस्व का प्रतिशत 42% से घटाकर 41% कर दिया गया व उस अतिरिक्त 1% का उपयोग जम्मू व कश्मीर और लद्दाख के पुनर्गठन हेतु किया जाएगा।

- कर विभाज्य पुल से राज्यों को हस्तांतरित 41% राजस्व को राज्यों के बीच विभाजित करने का फॉर्मूला।

- राजस्व के क्षैतिज वितरण का फॉर्मूला कर राजस्व को 59% संघ व 41% राजस्व को राज्यों में बाँटना है।

-15वें वित्त आयोग द्वारा क्षैतिज अंतरण का आधार वर्ष 2011 की जनसंख्या आय दूरी, क्षेत्रफल, वनावरण, वन व पारिस्थितिकी, जनसांख्यिकी की निष्पादन व कर प्रयास को माना गया।

15वें वित्त आयोग द्वारा दिया गया अनुदान निम्नानुसार है -

(1) राजस्व घाटा अनुदान

(2) विशेष अनुदान

(3) क्षेत्र विशिष्ट अनुदान

(4) स्थानीय निकायों के लिए अनुदान

(5) आपदा जोखिम अनुदान

(6) निष्पादन आधारित अनुदान

1.  राजस्व घाटा अनुदान इसके अंतर्गत 14 राज्यों का चयन किया गया व 74340 करोड़ रु. का राजस्व अनुदान दिया गया।

2.  विशेष अनुदान इसके अंतर्गत चयनित राज्यों की संख्या 3 थी - कर्नाटक, तेलंगाना, मिजोरम को विशेष अनुदान के रूप में 6764 करोड़ रु. दिए गए।

3.  क्षेत्र विशिष्ट अनुदान इसके अंतर्गत ऐसे राज्य आएंगे, जिनका पोषण, शिक्षा, न्याय, ग्राम, सड़क, पुलिस व स्वास्थ्य का विकास पूरी तरह नहीं हो पाया है उन्हें 7375 करोड़ रु. अनुदान दिया गया।

4.  स्थानीय निकायों के लिए अनुदान – 73 व 74th संविधान संशोधन के अंतर्गत यह अनुदान दिया जाता है, जिससे कि स्थानीय निकायों का विकास हो सके। यह अनुदान 90,000 करोड़ रु. दिया गया। इसमें ग्रामीण क्षेत्र को 67.5% व नगरीय क्षेत्र को 32.5% हिस्सा दिया गया।

5.  आपदा प्रबन्धन अनुदान –

      (a) वर्तमान में : NDRF (National Disaster Response Fund)

      (b) नया बनेगा : NDMF (National Disaster Management Fund)

      (c) वर्तमान में : SDRF (State Disaster Response Force)

      (d) नया बनेगा : SDMF (State Disaster Management Fund)

 भारत में आपदा प्रबंधन अधिनियम वर्ष 2005 में बना।

 NDMA : The National Disaster Management Authority ने इसकी सिफारिश की।

 इनकी लागत वितरण दो भागों में होगी -

(i) विशेष राज्यों में यह अनुपात (90 : 10) होगा व

(ii) सामान्य राज्यों के लिए यह अनुपात (75 : 25) होगा।

 28983 करोड़ रु. की मांग की गई।

6.  निष्पादन आधारित अनुदान इस अनुदान के अंतर्गत प्रोत्साहन के लिए अनुदान दिया जाता है। इसमें कृषि सुधारों, कार्यान्वयन, आकांक्षी जिला कार्यक्रम, विद्युत, शिक्षा, निर्यात, पर्यटन आदि का विकास करना व इनको प्रोत्साहित करना।

 राजकोषीय समेकन मार्ग को लेकर सुझाव दिया गया। इसमें FBRM अधिनियम के अनुसार राजकोषीय प्रबंधन को क्रियान्वित करें।

आयकर दरें

सामान्य कर दाता (व्यक्तिगत आय) (वित्त वर्ष 2020-21)

वार्षिक आय

दर

0 से 2,50,000

0%

2,50,000 – 5 लाख

5%

5 लाख से 7.5 लाख

10%

7.5 लाख से 10 लाख

15%

10 लाख से 12.5 लाख

20%

12.5 लाख से 15 लाख

25%

15 लाख से अधिक

30%

- नई कर व्यवस्था के तहत आयकर स्लैब जो सभी व्यक्तियों और वरिष्ठ नागरिकों अति वरिष्ठ नागरिकों पर लागू होगी।

- नई कर व्यवस्था के तहत आयकर स्लैब 2020-21 में वृद्धि कोई छूट उपलब्ध नहीं है। जो पिछले वर्ष 3 लाख तक उपलब्ध थी।

वरिष्ठ नागरिकों को राहत –

-  75 साल या उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिक पेंशन भोगियों जिनके पास पेंशनआमदनी के सिवाए सिर्फ ब्याज की आमदनी है, उन्हें आयकर भरने की अपेक्षा से मुक्त कर दिया जाएगा बशर्ते देयकर की पूर्ण राशि की भुगतानकर्ता बैंक द्वारा कटौती कर ली जाएगी।

सरचार्ज :

वार्षिक आय

दर

0 से 50 लाख

0%

50 लाख से 1 करोड़

10%

1करोड़ से 2 करोड़

15%

2 करोड़ से 5 करोड़ तक

25%

5 करोड़ से 10 करोड़

37%

10 करोड़ से अधिक वाले

37%

अप्रत्यक्ष कर (Indirect tax)

 वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) (Goods and Service Tax – GST)

- वस्तु एवं सेवा कर (GST)  1 जुलाई, 2017 से लागू हुआ।

- कर सुधारों के बारे में वर्ष 2002 में दो समितियाँ बनाई गई, जिनके अध्यक्ष श्री विजय केलकर थे। ये समितियाँ–

 (i) प्रत्यक्ष करों पर केलकर कार्यबल तथा

 (ii) अप्रत्यक्ष करों पर केलकर कार्यबल थी।

- वर्ष 2003 में केलकर कार्यबल ने अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें उन्होंने जीएसटी व्यवस्था को अपनाने की सिफारिश की थी।

-      वर्ष 2011 में तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी द्वारा 115वाँ संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में लाया गया था, जिसे वित्तीय मामलों से संबंधित संसदीय स्थायी समिति को भेज दिया था। मार्च , 2014 में इसे पुन: लोकसभा में प्रस्तुत किया गया, लेकिन लोकसभा भंग होने के कारण यह विधेयक निरस्त हो गया। 19 दिसंबर, 2014 को पुन: जीएसटी पर 122 वाँ संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में लाया गया जिसे मई, 2015 में लोकसभा द्वारा कुछ संशोधनों के साथ इसे पारित कर दिया गया तथा राज्यसभा को भेज दिया गया तथा 14 मई,  2015 को राज्यसभा और लोकसभा की संयुक्त प्रवर समिति को भेज दिया गया। इस समिति में 22 जुलाई, 2015 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। 3 अगस्त, 2016 को राज्यसभा द्वारा कुछ संशोधनों सहित इस विधेयक को पारित कर दिया। तत्पश्चात् 8 अगस्त, 2016 को लोकसभा द्वारा इसे पुन: पारित कर दिया गया।  8 सितंबर, 2016 को राष्ट्रपति द्वारा इस पर हस्ताक्षर किये गए तत्पश्चात् यह '101वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2016' बन गया। इस अधिनियम के द्वारा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 279 (A) के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि इस अधिनियम के लागू होने के 60 दिनों के भीतर राष्ट्रपति जीएसटी परिषद् का गठन करेगा। 16 सिंतबर, 2016 को भारत सरकार द्वारा अधिसूचना जारी कर इस अधिनियम के सभी खंडों को लागू कर दिया गया।

- 101 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 के द्वारा अनुच्छेद 366 में एक नया खंड (12A) जोड़ा गया, जिसके अनुसार ‘वस्तु एवं सेवा कर’ का अर्थ है – मानव उपभोग के लिये मादक पेय पदार्थों की आपूर्ति पर लगने वाले कर को छोड़कर वस्तुओं या सेवाओं या दोनों की आपूर्ति पर लगने वाला कर।

- यह कर केंद्र और राज्यों के द्वारा एक साथ, सामान्य कर आधार पर आरोपित दोहरा कर है। कर का प्रशासन केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा किया गया है। एक राज्य के भीतर होने वाले लेन-देन पर केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए कर को केंद्रीय जीएसटी (CGST) कहा जाता है एवं सीजीएसटी केंद्र सरकार के खाते में जमा किया जाता है। राज्यों द्वारा लगाए करों को राज्य जीएसटी (SGST) कहा गया है और एसजीएसटी संबंधित राज्य सरकार के खाते में जमा किया जाता है। इसी प्रकार केंद्र द्वारा प्रत्येक अंतर-राज्य वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति पर एकीकृत जीएसटी (आईजीएसजी) लगाने और प्रशासित करने की व्यवस्था है।भुगतान प्रक्रिया :

-  जीएसटी के अंतर्गत निम्नलिखित तरीके से क्रेडिट का उपयोग करने की अनुमति है-

- सीजीएसटी और आईजीएसटी के भुगतान के लिये सीजीएसटी के इनपुट टैक्स क्रेडिट की अनुमति है।

- एसजीएसटी और आईजीएसटी के भुगतान के लिये एसजीएसटी के इनपुट टैक्स क्रेडिट की अनुमति है।

- यूटीजीएसटी और आईजीएसटी के भुगतान के लिये यूटीजीएसटी के इनपुट टैक्स क्रेडिट की अनुमति है।

- आईजीएसटी, सीजीएसटी और एसजीएसटी,यूटीजीएसटी के भुगतान के लिये आईजीएसटी के इनपुट टैक्स क्रेडिट की अनुमति है।

- एसजीएसटी/यूटीजीएसटी के भुगतान के लिये सीजीएसटी के इनपुट टैक्स क्रेडिट का उपयोग नहीं किया जाता और न ही सीजीएसटी के भुगतान के लिये एसजीएसटी/यूटीजीएसटी के इनपुट टैक्स क्रेडिट का उपयोग किया जाता है।

- 101वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 (101st Constitution Amendment Act, 2016) नए प्रावधान-

- जीएसटी आने के पश्चात्  कुछ अनुच्छेदों को, जो संविधान में निर्दिष्ट है, संशोधित किया गया और कुछ नए अनुच्छेद जोड़े भी गए।

- अनुच्छेद 246: इस अनुच्छेद के तहत यह व्यवस्था की गई है कि संसद को सीजीएसटी और आईजीएसटी लगाने का अधिकार होगा और राज्यों को एसजीएसटी लगाने का अधिकार होगा।

- अनुच्छेद 248 : यह अनुच्छेद  बताता है कि कौन-से विधानमंडल के पास कौन-से अधिकार होंगे।

- अनुच्छेद 246-248 तीनों सूचियों से संबंधित हैं- संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची।

- अनुच्छेद 268A: इस अनुच्छेद का पहले सेवा कर का प्रावधान करता था। अब यह अनुच्छेद संविधान से समाप्त कर दिया गया है।

- अनुच्छेद 269: इसके तहत पहले जो अंतर्राज्यीय लेन-देन होता था, उस पर कर केंद्र लेता था, परंतु उसे राज्यों में बाँट दिया जाता था। अनुच्छेद 269 में अब एक नया अनुच्छेद 269A आईजीएसटी का प्रावधान किया गया है। यह अंतर्राज्यीय लेन-देन पर लगता है। अब अगर वस्तु का बाहर से आयात होगा तो वहाँ सीमा शुल्क के साथ-साथ आईजीएसटी भी लगेगा। 1 जुलाई, 2017 के बाद से जो भी वस्तुएँ आयातित होंगी, वे अंततः जिस राज्य में उपभोग होंगी, उस राज्य को उसके आयात पर आईजीएसटी का आधा हिस्सा भी मिलेगा। इस प्रकार पहली बार राज्यों को आयात में से कुछ हिस्सा मिलेगा। विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) पर भी आईजीएसटी लगेगा।

- अनुच्छेद 270 : इस अनुच्छेद के तहत जो कर केंद्र लगाता और वसूलता था, उसके बाद इसे राज्यों में बाँट दिया जाता था। अब साथ में जीएसटी से जो राजस्व एकत्र होगा, उसमें अर्थात् सीजीएसटी और आईजीएसटी में केंद्र का जो आधा हिस्सा है, यह कर भी विभाज्य पूल का हिस्सा बनेगा और वित्त आयोग की अनुशंसाओं के अनुसार केंद्र और राज्यों के बीच बाँटा जाएगा।

- अनुच्छेद 271: इस अनुच्छेद  में दो बातें समाहित हैं- अधिभार और उपकर। इससे संबंधित केंद्र सरकार के पास विशेष उपाय थे। केंद्र का कर संग्रह कम होने पर केंद्र अनुच्छेद 269 और अनुच्छेद 270 में जो कर का प्रावधान था, उन पर अधिभार या उपकर लगा सकता था, जिसमें जो भी कर केंद्र लगाता था, उसका सारा पैसा केंद्र को मिलता था तथा राज्यों को कोई पैसा नहीं मिलता था। लेकिन अब इससे जो भी कर राजस्व प्राप्त होगा, वह वित्त आयोग के सुझाव के अनुसार राज्यों तथा केंद्र में बाँट दिया जाएगा।

- जीएसटी एक व्यापक अप्रत्यक्ष कर है। जिसमें केंद्र सरकार राज्य सरकारों द्वारा उद्‌गृहीत एवं एकत्र किये जाने वाले कई अप्रत्यक्ष  करों को सम्मिलित (Subsumed) किया गया है। केंद्र सरकार द्वारा उद्‌गृहीत एवं एकत्र किये जाने वाले निम्नलिखित करों को जीएसटी में सम्मिलित किया गया है –

- केंद्रीय उत्पाद शुल्क

- उत्पाद शुल्क (औषधिक एवं प्रसाधन उत्पाद)

- अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (विशेष महत्त्व की वस्तुएँ)

- अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (टेक्सटाइल एवं टेक्सटाइल उत्पाद)

- अतिरिक्त सीमा शुल्क (Countervailing Duty) 

- सेवा कर 

- केंद्रीय अधिभार एवं उपकर, जहाँ तक ये वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति से संबंधित हैं।

- राज्य सरकार द्वारा उद्गृहीत एवं एकत्र किये जाने वाले निम्नलिखित करों को जीएसटी में सम्मिलित किया गया है-

- राज्य वैट केंद्रीय बिक्री कर

- विलासिता कर नया क्रय कर

- प्रवेश कर (Entry Tax)

- मनोरंजन कर

- विज्ञापनों पर कर

- लॉटरी, सट्टेबाज़ी एवं जुएँ पर कर

- राज्य अधिभार एवं उपकर, जहाँ तक ये वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्ति से संबंधित हैं।

 इस प्रकार जीएसटी में केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार के उपर्युक्त अप्रत्यक्ष करों को सम्मिलित करके एक एकीकृत कर

 (वस्तु एवं सेवा कर) का निर्माण   किया गया है।

- जीएसटी परिषद् -

- 101वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 के द्वारा अनुच्छेद 279A(1) में यह प्रावधान किया गया है कि 101वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 की शुरुआत की तारीख से 60 दिनों के भीतर राष्ट्रपति द्वारा जीएसटी परिषद् (GST Council) का गठन किया जाएगा। वस्तु एवं सेवा कर परिषद् का गठन 12 सितंबर, 2016 को किया गया। जीएसटी परिषद् की सहायता के लिये इसका एक सचिवालय भी स्थापित किया गया है। देश में वस्तुओं एवं सेवाओं के लिये राष्ट्रव्यापी बाजार विकसित करने की दृष्टि से जीएसटी परिषद् का मार्गदर्शी सिद्धांत केंद्र और राज्य एवं विभिन्न राज्य सरकारों के बीच जीएसटी के विभिन्न आयामों की सुसंगतता को सुनिश्चित करना है। जीएसटी परिषद् केंद्रीय जीएसटी, राज्य जीएसटी, संघ राज्य क्षेत्र जीएसटी, एकीकृत जीएसटी और राज्यों को क्षतिपूर्ति से संबंधित प्रारूप विधानों की अनुशंसा करने और जीएसटी से संबंधित अनेक नियम, लगभग 1200 वस्तुओं पर जीएसटी की विभिन्न 4 दरें आदि को प्रस्तुत करने में सफल रही है।

 जीएसटी परिषद् का कार्य (Functions of GST Council) निम्नलिखित विषयों पर केंद्र और राज्यों की सिफारिश करना है-

- GST परिषद् का उल्लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 279(A) में किया गया है।

- केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों द्वारा वसूले जाने वाले कर, उपकर और अधिशुल्क जिन्हें जीएसटी के अंतर्गत समाहित किया जा सके।

- ऐसी वस्तुएँ और सेवाएँ, जिन्हें जीएसटी के अधीन या पर प्रदान की जा सकती है।

- वह तिथि, जब से कच्चे तेल, हाई स्पीड डीजल, मोटर (पेट्रोल), प्राकृतिक गैस और एविएशन टरबाइन फ्यूल पर GST वसूला जा सके।

- आदर्श जीएसटी कानून, उद्ग्रहण के सिद्धांत, आईजीएसटी का बँटवारा और आपूर्ति के स्थान को प्रशासित करने वाले सिद्धांत;

- वह सीमा रेखा, जिसके नीचे वस्तु एवं सेवा के टर्नओवर को जीएसटी से छूट प्रदान की जा सके।

- किसी भी प्राकृतिक आपदा या विपदा के दौरान अतिरिक्त संसाधन इकट्ठा करने हेतु किसी विशेष अवधि के लिये कोई विशेष दर / दरें;

- उत्तर-पूर्वी एवं पर्वतीय राज्यों- अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम, जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के संबंध में विशेष प्रावधान;

- जीएसटी परिषद् द्वारा यथा निर्णय एवं जीएसटी से संबंधित कोई अन्य मामला, जिस पर परिषद् निर्णय ले सकती है।

GST परिषद् की संरचना–

- जीएसटी परिषद् में केंद्र सरकार के दो प्रतिनिधि है-

- अध्यक्षकेंद्रीय वित्त मंत्री

- सदस्यकेंद्रीय वित्त राज्य मंत्री

- सदस्य –28 राज्यों एव 3 संघ राज्य क्षेत्रों (दिल्ली, पुंडुचेरी एवं जम्मू और कश्मीर) के वित्त मंत्री / कराधान मंत्री या राज्य सरकार द्वारा निर्वाचित कोई अन्य मंत्री,

- इस प्रकार जीएसटी परिषद् में केंद्र और राज्यों से कुल मिलाकर 33 सदस्य हैं।

- उपाध्यक्ष – राज्य सरकारों के मंत्रियों के बीच से निर्वाचित।

- गणपूर्ति  (कोरम)- कुल सदस्यों का 50 प्रतिशत।

- निर्णय – जीएसटी परिषद् का प्रत्येक निर्णय उपस्थित एवं मतदान के 75 % भारित बहुमत होने के बाद ही लिया जाएगा।

- भारित बहुमत सिद्धांत – केंद्र सरकार का मान एक –तिहाई (1/3) वोट माना जाएगा। सभी राज्य सरकारों का एक साथ मिलाकर कुल मान दो-तिहाई (2/3) वोट माना जाएगा।

- इस प्रकार केंद्र सरकार और अधिकतम राज्य सरकारों की सहमति से ही कोई निर्णय लिया जा सकेगा।

- जीएसटी परिषद् से संबंधित सभी मद्दों, यथा- विधि, नियम, दर, वस्तुओं का वर्गीकरण आदि पर निर्णय करेगी।

 जीएसटी के दायरे से बाहर की वस्तुएंअनुच्छेद 366 (12A) में जीएसटी की परिभाषा के माध्यम से मानव उपभोग के लिये अल्कोहल को जीएसटी से बाहर रखा गया है। अस्थायी रूप  से पाँच पेट्रोलियम उत्पाद, पेट्रोलियम क्रूड, पेट्रोल, हाई स्पीड डीजल, प्राकृतिक गैस  और विमानन टरबाइन ईंधन तथा विद्युत को जीएसटी से बाहर रखा गया है।

- जीएसटी कर की विभिन्न दरें – इसके तहत प्रत्येक वस्तु या सेवा पर चार दरों का स्लैब लागू होगा यथा – 5 प्रतिशित, 12 प्रतिशत, 18 प्रतिशत तथा 28 प्रतिशत। इसके अलावा कुछ वस्तुओं इस कर से छूट प्रदान की गई है, उनके लिए जीएसटी का स्लैब शून्य प्रतिशत अथवा शून्य होगा।

- जीएसटी  नेटवर्क – इसकी कल्पना जीएसटी के आईटी अवसंरचना के रूप में की गई। यह संघटन नई प्रणाली के लिए आईटी ढाँचे की समूचित व्यवस्था करेगा और करदाताओं को विविध प्रणालियों से एकल प्रणाली में लाने में सहायक होगा। केंद्र तथा राज्य सरकारों ने एक साथ मिलकर इस उद्देश्य विशेष की प्राप्ति हेतु गैर –सरकारी और गैर-लाभकारी संघटन के रूप में       GSTN को विकसित किया है, जिसमें केंद्र कि हिस्सेदारी 24.5 प्रतिशत तथा राज्य की हिस्सेदारी 24.5 प्रतिशत है। शेष 51 प्रतिशत गैर-सरकारी वित्तीय संस्थाओं की हिस्सेदारी है।

वस्तु एवं सेवा कर नेटवर्क (GSTN) की भूमिका-

- बैंकिंग नेटवर्क के साथ कर भुगतान वितरणों का मिलान करना।

- केंद्र और राज्य सरकारों को करदाताओं के रिटर्न की जानकारी के आधार पर विभिन्न MIS सूचना प्रदान करना।

- पंजीकरण की सुविधा प्रदान करना।

- करदाताओं के प्रोफाइल का विश्लेषण करना।

- IGST की गणना और निपटान करना।

- केंद्रीय एवं राज्य के अधिकारियों को रिटर्न भेजना।

जीएसटी के लाभ –

- इसके द्वारा  'कर पर कर' की समस्या से छुटकारा मिला।

- भारत के लिये एकीकृत राष्ट्रीय बाजार बनने में मदद मिली (एक राष्ट्र - एक कर- एक बाजार)।

- इस व्यवस्था में करापात अंतिम उपभोक्ता पर होने के कारण वस्तु एवं सेवाओं के मूल्यों में कमी आएगी जिससे उपभोक्ताओं को लाभ होगा।

- प्रत्येक राज्य में कर की दर एक समान होने से अर्तराज्यीय व्यापार आसान होगा।

- जीएसटी प्रधानत: प्रौद्योगिकी संचालित प्रक्रिया होने के कारण कर प्रशासन सरल तथा सुगम होगा जिससे अंतत: भ्रष्टाचार में कमी आएगी।

  महत्वपूर्ण बिंदु

- थ्रेशोल्ड सीमा -  इसका अर्थ है कि कितने मूल्य के कारोबार के बाद कोई व्यक्ति जीएसटी के दायरे में शामिल होगा। किसी व्यक्ति का कारोबार यदि (वर्तमान में)  40 लाख रु. से कम है, तो उसे GSTN में रजिस्ट्रेशन करवाने की बाध्यता नहीं है (अगर वह चाहे तो रजिस्ट्रेशन करवा सकता है)। पूर्वोत्तर के लिए यह सीमा  20 लाख रुपये है।

- रिवर्स चार्ज इसके अंतर्गत सेवाकर के भुगतान की जिम्मेदारी सेवा प्राप्तकर्ता पर होगी। इस प्रकार यदि कोई सेवा प्रदाता अपनी आय छिपाने के लिये जीएसटी रिटर्न दाखिल नहीं करता है तब सेवा प्राप्तकर्ता द्वारा दिए गए विवरण के आधार पर  सिस्टम स्वत: उसे पहचान लेगा और इन सभी सूचनाओं को आयकर विभाग के साथ साझा किया जा सकेगा।

-  ई-वे बिल्स जीएसटी अधिनियम (2016) के अनुसार, की धारा- 68 के अनुसार जीएसटी के अंतर्गत 50,000 रु. से अधिक मूल्य की वस्तुओं को 10 किलोमीटर की परिधि से बाहर ले जाने वाले वाहन के प्रभारी व्यक्ति द्वारा इस बिल को ले जाना अनिवार्य है। इसमें हस्तांतरित की जाने वाली वस्तुओं की संपूर्ण जानकारी होती है। इससे कर योग्य वस्तुओं पर निगरानी रखना आसान होगा तथा कर चोरी में कमी आएगी। यह व्यवस्था 1 अप्रैल, 2018 से संपूर्ण देश में लागू की गई है।

- उपभोक्ता कल्याण निधि - केंद्रीय जीएसटी अधिनियम-2017 (CGST Act, 2017) – इस अधिनियम की धारा 57 तथा 58 के अंतर्गत एक फंड तैयार किया गया है, जिसका उपयोग देश के उपभोक्ताओं के कल्याण हेतु किया जाएगा। इसमें वसूली हुई राशि, ब्याज सहित यदि पात्र व्यक्ति को वापस न की जा सकें, ऐसी स्थिति में, वसूली हुई राशि इस निधि में जमा करा दी जाएगी।

- कम्पोजिशन योजना जिन छोटे उद्यमियों और कारोबारियों को जीएसटी प्रणाली मुश्किल लगती है, उनके लिए यह आसान योजना शुरू की गई है। इस योजना को चुनने वाले व्यापारियों को वर्ष में केवल एक बार ही रिटर्न भरना होगा तथा उनके लिए  कर की दर 5 प्रतिशत की गई है, लेकिन इस योजना का  लाभ केवल वे ही व्यापारी / छोटे उद्यमी उठा सकते हैं जिनका पिछले वित्तीय वर्ष में वार्षिक कारोबार 50 लाख रूपए से कम है। प्रारंभ में इसमें केवल वस्तुओं को ही शामिल किया गया था, किंतु वर्तमान में इसमें वस्तु एवं सेवाएँ दोनों शामिल है।

- जीएसटी प्रणाली के अंतर्गत राज्यों को होने वाली राजस्व हानि से संबंधित बिंदु:-

- 101 वें संविधान संशोधन अधिनियम में यह प्रावधान किया गया है कि जीएसटी लागू करने के कारण राज्यों को होने वाले राजस्व के नुकसान के लिये 5 वर्षों तक की अवधि के लिये उन्हें क्षतिपूर्ति करने की व्यवस्था की गई।

- जीएसटी (राज्यों की क्षतिपूर्ति) अधिनियम, 2017 ने वित्तीय वर्ष 2015 -16 के राजस्व को आधार वर्ष राजस्व के रूप में निर्धारित किया है।

- इसके अतिरिक्त 14 प्रतिशत की दर से नाममात्र की वार्षिक वृद्धि प्रदान की गई है।

- इस अधिनियम में एक उपकर (वस्तु एवं सेवा उपकर) वसूल करने की व्यवस्था की गई है, जिसे राजस्व की हानि की स्थिति में राज्यों को क्षतिपूर्ति करने के लिये उपयोग किया जाएगा।

- प्रत्येक दो महीनों के अंतराल पर इस क्षतिपूर्ति को करने का प्रावधान किया गया है।

- CAG को इसके अंकेक्षण करने का दायित्व सौंपा गया है।

निष्कर्ष:-

- जीएसटी एक आधुनिक कर व्यवस्था है जो पहले की कर व्यवस्था से अधिक सरल एवं पारदर्शी और भ्रष्टाचार को रोकने में मददगार भी है। जीएसटी से सरकार, उद्योग और उपभोक्ता सभी हितधारक लाभान्वित हो रहे हैं। भारत में जीएसटी लागू होने से उपभोक्ताओं को दोहरे कराधान (कर पर कर - Cascading) से मुक्ति मिली है जिससे होने वाले लाभों के कारण वस्तुओं की कीमतों में कमी की अपेक्षा की जा रही है। इसके द्वारा उत्पादन क्रियाकलापों तथा निर्यात को बढ़ावा मिलेगा तथा रोजगार के नए अवसरों का सृजन तथा बेहतर वित्तीय संसाधनों का विकास होगा जिससे गरीबी उन्मूलन में मदद मिलेगी और अंतत समावेशी विकास का स्वप्न साकार हो सकेगा।