भारतीय उद्योग
- भारत में औद्योगिक क्षेत्र को अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। औद्योगिक क्षेत्र का देश की GDP में लगभग 25% योगदान है। भारत की जनसंख्या के एक बड़े भाग को औद्योगिक क्षेत्र से रोजगार प्राप्त होता है। वर्तमान में कुल कार्यशील जनसंख्या का लगभग 27% औद्योगिक क्षेत्र से रोजगार प्राप्त कर रही हैं।
- देश में अवसंरचना निर्माण में औद्योगिकी निर्माण में औद्योगिक क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान है। बड़े उद्योगों की स्थापना के साथ ही अवसंरचनात्मक निर्माण को भी बढ़ावा मिलता है।
- औद्योगिक उत्पादों के निर्यात से बहुमूल्य विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। जिससे चालू खाता घाटे (CAD) को कम किया जा सकता है। औद्योगिक क्षेत्र से देश में बाह्य निवेश को बढ़ावा मिलता है।
- अर्थव्यवस्था के अंतर्गत उद्योग को द्वितीयक क्षेत्र में सम्मिलित किया जाता है।
भारतीय औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के अंतर्गत
1. खनन
2. विनिर्माण
3. विद्युत को शामिल किया जाता हैं।
- सर्वप्रथम 1937 को आधार वर्ष मानते हुए औद्योगिक उत्पादन सूचकांक तैयार किया गया।
- 1937 से लेकर आज तक 9 बार संशोधन किया जा चुका हैं।
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP)
केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (CSO),"सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय" के अंतर्गत एक विभाग है जो कि 1950 से औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) से सम्बंधित आँकड़े एकत्र और प्रकाशित करता है. औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) देश के 8 कोर सेक्टर्स में एक महीने के दौरान हुए उत्पादन के उतार चढ़ाव को नापता है.
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) के अंतर्गत निम्न 8 क्षेत्रों के आँकड़े को मापा जाता है. ये क्षेत्र हैं;
1. कोयला: इसका कुल भार 10.33% है.
2. कच्चा तेल: इसका कुल भार 9 % है.
3. प्राकृतिक गैस: इसका कुल भार 6.9 % है.
4. रिफाइनरी उत्पाद: इसका कुल भार 28.0% है.
5. स्टील: इसका कुल भार 17.92% है.
6. सीमेंट: इसका कुल भार 5.4 % है.
7. उर्वरक: इसका कुल भार 2.6% है.
8. बिजली: इसका कुल भार 19.9 % है
केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (CSO, निम्न 16 एजेंसियों से आँकड़े प्राप्त कर औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) का निर्माण करता है
1. औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग
2. भारतीय खान ब्यूरो
3. केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण
4. संयुक्त संयंत्र समिति
5. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय
6. वस्त्र आयुक्त कार्यालय
7. रसायन और पेट्रोकेमिकल्स विभाग
8. चीनी निदेशालय
9. उर्वरक विभाग
10. वनस्पति तेल और वसा निदेशालय
11. चाय बोर्ड
12. जूट आयुक्त कार्यालय
13. कोयला नियंत्रक कार्यालय
14. रेलवे बोर्ड
15. नमक आयुक्त का कार्यालय
16. कॉफी बोर्ड
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) में बेस ईयर
1. IIP के लिए आधार हमेशा 100 माना जाता है.
2. IIP का आधार वर्ष 2011-2012
उद्योग के विभिन्न भेद:-
♦ कुटीर उद्योग :-
- ऐसे उद्योग जो पारिवारिक सदस्यों द्वारा किए जाते हैं।
- पूँजी निवेश का स्तर निम्न होता हैं।
- बाह्य श्रम की सहायता नहीं की जाती है।
- उत्पादन कार्य मशीनों के बजाय हाथों से किए जाते हैं।
♦ प्रशुल्क आयोग 1949-50 के अनुसार :-
- कुटीर उद्योग धन्धे में पारिवारिक सदस्यों द्वारा आंशिक तथा पूर्णकालिक रूप से किए जाने वाले उद्योगों को शामिल किया जाता है।
- कुटीर उद्योगों को दो भागों में बाँटा गया है।
(1) ग्रामीण कुटीर उद्योग – इसमें कृषि आधारित उद्योग जैसे - मुर्गीपालन, सूअर, मधुमक्खी पालन, कॉपर उद्योग आदि को शामिल किया जाता है।
(2) शहरी कुटीर उद्योग - इसमें मोमबत्ती, अगरबत्ती, बुनाई, कटाई, छपाई व फर्नीचर आदि को शामिल किया जाता है।
♦ लघु उद्योग :-
- कम पूँजीं निवेश करके किए जाने वाले उत्पादन कार्य लघु उद्योग श्रेणी में आते हैं।
- औद्योगिक नीति 1977 में लघु उद्योगों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है-
1. सूक्ष्म
2. लघु
3. मध्यम
MSME Act - 2006 के अनुसार
♦ MSME की परिभाषा :- के आधार पर उद्योगों को दो भागों में बाँटा गया है-
1. विनिर्माण 2. सेवा क्षेत्र

- आत्मनिर्भर भारत के दौरान MSME को पुन: परिभाषित किया गया है। (मई, 2018)
- MSME के लिए विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्र के अन्तर को समाप्त किया गया।
- MSME को निवेश के साथ टर्नऑवर के आधार पर परिभाषित किया गया है।
नोट :- (बजट 2021-22 - लघु उद्योगों की परिभाषा में संशोधन किया जाएगा। इनके मौजूदा 50 लाख रुपये के पूँजी आधार को बढ़ाकर 2 करोड़ रुपये किया जाएगा।
- वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 2021-22 आम बजट में वित्तीय उत्पादों के लिए निवेशक चार्टर शुरू करने का प्रस्ताव भी रखा है।)
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निवेश |
टर्नऑवर |
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Micro सूक्ष्म |
1 करोड़ रु. तक |
5 करोड़ रु. तक |
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Small (लघु) |
10 करोड़ रु. तक |
50 करोड़ रु. तक |
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Medium |
50 करोड़ रु. तक |
250 करोड़ रु. तक |
MSME उद्योगों का महत्त्व :-
1. बेरोजगार सृजन कार्य :- इसके अंतर्गत 55.8 मिलियन के द्वारा 124 मिलियन लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया गया है।
2. आय वितरण में समानता :- इसके अनुसार 14% MSME महिला नेतृत्व, 59.5% ग्रामीण क्षेत्र में स्थित, व 40% से ज्यादा हिस्सा अन्य पिछड़ा वर्ग के स्वामित्व है।
3. सकल घरेलू उत्पाद में 29% व निर्यात में 49% योगदान कुटीर व MSMF उद्योग।
4. ग्रामीण अर्थव्यवस्था अनुरूप :- 59.5% उपक्रम ग्रामीण क्षेत्र में स्थापित किए गए है।
5. उद्योगों के विभेन्द्रीकरण में सहायक :- इसके अंतर्गत उद्योगों की स्थापना गाँवों तथा छोटे-छोटे कस्बों में की जाती हैं।
6. कृषि पर जनसंख्या के भार में कमी करते हैं।
7. कम तकनीकी आय की आवश्यकता होती है।
8. शीघ्र उत्पादक उद्योग होते हैं।
9. निर्यात में वृद्धि तथा आयत पर निर्भरता को कम करता है।
10. औद्योगिक समस्याओं से मुक्ति :-
- मजदूर हड़ताल,श्रमिकों की छंटनी
- वेतन वृद्धि व बोनस की मांग आदि से मुक्ति
- बड़े उद्योगों में सेवा शर्तों में सुधार आदि को शामिल किया गया है।
- लघु उद्योगों में आपसी सहमति द्वारा समस्या को सुलझाया जाता है।
11. बड़े उद्योगों के लिए सहायक उद्योग के रूप में कार्य किया जाता है।
12. स्थानीय साधनों का उपयोग :-
- कच्चे माल की आवश्यकता पूर्ति स्तर पर की जाती है।
- इससे स्थानीय उत्पादकों की आय में वृद्धि होती है।
♦ लघु तथा कुटीर उद्योगों की समस्या :-
1. कच्चे माल सम्बन्धी समस्या :-
- अधिक कीमत पर कच्चे माल की उपलब्धता स्थानीय स्तर पर उपलब्ध माल की गुणवत्ता निम्न होना।
प्रभाव:- उत्पाद की गुणवत्ता निम्न व कीमत ज्यादा होती है।
- उत्पाद बाजार में प्रतिस्पर्धी नहीं रहता है और इससे लाभ में कमी आती है।
2. वित्त की समस्या :-
- पूँजी का अभाव होता हैं।
- Credit History तथा स्थायी सम्पत्ति का अभाव होता है।
- डिफाल्टर होने का अनुपात ज्यादा होता है।
- सूक्ष्म उद्योगों को पूँजी उपलब्ध कराने वाले संगठनों के पास पूँजी का अभाव होता है।
- डिजिटल साक्षरता का अभाव होता है।
- व्यक्तिगत उद्यमों को ऋण देने के लिए निषेध किया गया है।
♦ NSSO के 73 वें दौर अनुसार राज्यवार MSME :-
I उत्तरप्रदेश - 14.2% - 89.99 लाख
II. प. बंगाल - 14% - 88.67 लाख
III. तमिलनाडु - 8% - 49.48 लाख
♦ रोजगार :-
MSME रोजगार उपलब्ध कराने में उत्तर प्रदेश का प्रथम स्थान है।
♦ लघु तथा कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करने हेतु संगठन:-
1. SISI लघु उद्योग सेवा संस्थान :-
- इसकी स्थापना- 14 जनवरी, 1958 को की गई।
- इसका मुख्य कार्य :- लघु उद्योगों से जुड़े कार्यकारों को प्रशिक्षण सुविधा उपलब्ध कराना व कौशल विकास को प्रोत्साहित करना।
2. लघु उद्योग विकास संस्थान (सीडो)
- इसकी स्थापना वर्ष 1954 में की गई थी।
- कार्य- सरकार की नीतियाँ और कार्यक्रम तैयार करने में सहयोग प्रदान करना व नीतियों के क्रियान्वयन पर नजर रखना है।
जिला उद्योग केन्द्र 1978 :-
- यह केन्द्र सरकार द्वारा प्रायोजित योजना हैं जिसके तहत प्रत्येक जिले में जिला उद्योग केन्द्र की स्थापना की जायेगी।
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) :-
- इसकी स्थापना अप्रैल, 1990में की गई थी।
- इसका मुख्यालय लखनऊ में है।
- इसका कार्य - लघु उद्योगों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना।
- बाजार दरों से रियायती दरों पर सहायता प्रदान करना
- कस्बे तथा उपनगरीय क्षेत्रों में उद्योगों के विकास को प्रोत्साहित करना।
मुद्रा बैंक :-
Micro Units Development and Refinance Agency Ltd.
इसकी स्थापना- अप्रैल, 2015 में की गई थी।
- SIDBI के अनुषंगी निकाय के रूप में इसका गठन किया गया था।
इसकी पूँजी- 20000 करोड़ रुपये थी।
इसके अंतर्गत गारंटी फण्ड - 3000 करोड़ रुपये को बनाया गया है।
- यह एक पुनर्वित्त संस्थान है।
- इसके द्वारा उन वित्तीय संगठनों को वित्तीय सुविधा उपलब्ध कराई जाती है जो माइक्रो क्षेत्र ऋण उपलब्ध कराते हैं।
- हाल ही में आत्म निर्भर भारत पैकेज में MSME के लिए प्रस्ताव के अतंगर्त MSME हेतु 3.70 लाख करोड़ रु. की प्रोत्साहन राशि प्रदान की गई।
3 लाख करोड़ :-
- MSME को ऋण, कच्चा माल, विपणन, प्रबंधन बिना गारन्टी को लोन उपलब्ध कराया गया।
- MSME की बैंक बकाया का अधिकतम 20%
- पूर्व भुगतान - 4 वर्षोँ में, 12 महीनों की मोरोटोरियम सुविधा दी गई।
♦ फड्स ऑफ फण्ड्स- 50000 करोड़ :-
- MSME को इंक्विटी पूँजी की उपलब्धता आकार व क्षमता विस्तार करना।
- स्टॉक मार्केट में सूचीबद्ध करने हेतु आकर्षित करना।
- इसके अन्तर्गत 50,000 करोड़ रुपये में से 10,000 करोड़ रुपये का मदर फण्ड बनाया जायेगा। जिसमें से 40,000 करोड़ रुपये डॉटर फण्ड बनाया जायेगा।
♦ गौण शास्त्र Sub ordinate 20000 करोड़ :-
- N.P.A वार्डों MSME की सहायता प्रदान की गई।
- MSME प्रवर्तकों को ऋण इक्विटी के रूप में ऋण उपलब्ध कराया जायेगा।
- 4000 करोड़ की क्रेडिट गारन्टी फण्ड जो बैंक हेतु उपलब्ध कराई जायेगी।
- 200 करोड़ रु. तक की सार्वजिनक खरीद हेतु विदेशी निविदा जारी नहीं की जाएगी।
♦ फिनटेक का उपयोग :-
- ई मार्केट प्लेस द्वारा सृजित डेटा का उपभोग करके ऋण वितरण बढ़ाने हेतु फिनटेक उपभोग
- MSME परिभाषा में परिवर्तन में भी परिवर्तन किया गया।
♦ अन्य पहल :-
- ऑनलाइन पोर्टल से 59 मिनट में 1 करोड़ रु. तक का ऋण उपलब्ध कराया जायेगा।
- 1 करोड़ रु. तक ऋण को GST पंजीकृत इकाई द्वारा लिए जाने 2% का ब्याज अनुदान दिया जायेगा।
- सार्वजनिक खरीद अनिवार्य रूप से GEM पोर्टल से किया जायेगा।
- 6000 करोड़ रु. की लागत से 20 प्रौद्योगिकी केन्द्र
व 100 विस्तारण केन्द्रों की स्थापना की जायेगी।
- (फार्म क्लस्टर) हेतु 70% राशि भारत सरकार द्वारा वहन की जायेगी।
- निरीक्षक का दौरा कम्प्यूटर आधार पर तय किया जाएगा।
- निरीक्षक का दौरा कम्प्यूटर आधार पर तय किया जाएगा वायु तथा जल प्रदूषण सम्बन्धी कानूनों के लिए एकल सहमति का प्रावधान किया गया।
GEM पोर्टल :-
- मई, 2017 में लॉन्च किया गया।
- यह केन्द्र सरकार का सरकारी खरीद हेतु पोर्टल है
- MSME द्वारा तैयार उत्पादों की खरीद की जाती है।
P.M. रोजगार सृजन कार्यक्रम :-
- यह वर्ष 2008 से प्रारंभ किया गया था।
- पूर्व योजना:- P.M. रोजगार कार्यक्रम एवं ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम को शामिल किया गया ।
- इस योजना के तहत लाभार्थी व्यक्ति जिसकी आयु18 वर्ष से अधिक हो एवं SHG पंजीकृत सोसायटी, ट्रस्ट आदि को शामिल किया गया है।
लाभ :-
- उद्योग स्थापित करने हेतु - 10 लाख रु. सेवा क्षेत्र एवं 25 लाख रु. विनिर्माण क्षेत्र को ऋण सुविधा प्रदान की गई।
- 15 से 35% तक सब्सिडी उपलब्ध कराई गई है।
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सामान्य श्रेणी |
शहरी 15% |
ग्रामीण 25% |
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SC, ST, महिला OBC, पूर्व क्षेत्रीय दिव्यांग |
25% |
35% |
चैम्पियन पोर्टल
- यह MSME को सुविधा प्रदान करने हेतु online portal है।
♦ P.M. मुद्रा योजना :-
8 अप्रैल, 2015 को इस योजना को प्रारंभ किया गया था।
उद्देश्य- सूक्ष्म इकाइयों को वित्तीय सुविधा उपलब्ध कराना
इसके अंतर्गत तीन प्रकार के ऋण प्रदान किये जाते हैं।
शिशु - 50000 रु. तक का ऋण
किशोर - 50 हजार - 5 लाख रु. तक का ऋण
तरुण - 5 लाख - 10 लाख रु. तक का ऋण उपलब्ध कराया जाता है।
उद्योगों के लिए आवश्यक तत्त्व:-
ऊर्जा की आपूर्ति
सस्ती भूमि
सस्ता एवं कुशल श्रम
जलापूर्ति
परिवहन व संचार
पूँजी की उपलब्धता
बाजार की उपलब्धता
भारतीय औद्योगिक नीति:-
देश में औद्योगिक विकास के नियमन, नियंत्रण एवं निर्देशित करने वाली नीति औद्योगिक नीति कहलाती हैं। सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र में उद्योगों की स्थापना, वित्त प्रबंधन, विकास आदि के लिए नीति का निर्धारण किया जाता है जिससे कि देश का संतुलित विकास हो सके।
भारत में अब तक 5 बार औद्योगिक नीति घोषित की जा चुकी है।
औद्योगिक नीति, 1948:-
- स्वतंत्र भारत की प्रथम औद्योगिक नीति की घोषणा 6 अप्रैल, 1948 को तत्कालीन केन्द्रीय उद्योग मंत्री डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा की गई थी।
- इस नीति में मिश्रित अर्थव्यवस्था की आर्थिक विचारधारा स्वीकार की गई जिसमें औद्योगिक विकास के लिए सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्रों पर बल दिया गया।
I. प्रथम औद्योगिक नीति में उद्योगों को चार भागों में विभाजित किया गया था।
प्रथम श्रेणी उद्योग:- सरकार का एकाधिकार
- अस्त्र-शस्त्र का निर्माण, अणु शक्ति का उत्पादन तथा नियंत्रण, रेल यातायात का स्वामित्व एवं नियंत्रण।
द्वितीय श्रेणी उद्योग:- सरकारी व निजी क्षेत्र
- कोयला, लोहा एवं इस्पात, हवाई जहाज निर्माण, जलयान निर्माण, टेलीफोन तथा वायरलेस बनाना तथा खनिज तेल उद्योग। (द्वितीय श्रेणी में 6 उद्योगों को रखा गया)
- इन उद्योगों से संबंधित जो औद्योगिक इकाइयाँ वर्तमान (1948 के समय) में निजी क्षेत्र में उन्हें अगले 10 साल तक निजी क्षेत्र में रहने दिया जायेगा, परन्तु इनसे संबंधित नई औद्योगिक इकाइयाँ स्थापित करने का अधिकार पूर्णतया सरकारी क्षेत्र को दिया जायेगा।
तृतीय श्रेणी उद्योग:-
- जिनका नियंत्रण व नियमन केन्द्रीय सरकार द्वारा किया जायेगा। भारी रासायनिक उद्योग, चीनी, सूती एवं ऊनी वस्त्र, सीमेंट, कागज, नमक, मशीन टूल्स आदि शामिल किए गए। (तृतीय श्रेणी में 18 उद्योगों को रखा गया)
चतुर्थ श्रेणी उद्योग:-
- इस श्रेणी में शेष सभी उद्योगों को रखा गया तथा उद्योगों को खोलने तथा चलाने के सम्बन्ध में निजी तथा सहकारी क्षेत्रों को पूर्ण स्वतंत्रता दी गई। इन उद्योगों पर निजी क्षेत्र का पूर्ण अधिकार होगा परन्तु इन पर सरकार का सामान्य नियंत्रण रहेगा।
II. कुटीर एवं लघु उद्योग का विकास
- इस नीति में लघु एवं कुटीर उद्योगों को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
- इनके विकास का उत्तरदायित्व राज्य सरकारों को सौंपा गया और इनकी सहायता के लिए विभिन्न स्तरों पर विशेष संस्थाओं के निर्माण पर जोर दिया गया।
III. विदेशी पूँजी :-
- तीव्र औद्योगिकीकरण के लिए तथा उच्च तकनीकी ज्ञानवर्द्धन की दृष्टि से विदेशी पूँजी को आवश्यक समझा गया।
IV. प्रशुल्क एवं कर नीति :-
- अनावश्यक विदेशी स्पर्द्धा को रोकने के लिए सरकार ने प्रशुल्क नीति बनाई।
- जिससे उपभोक्ता पर अनुचित भार डाले बिना विदेशी साधनों का उपयोग किया जा सकें।
- पूँजीगत विनियोग करने, बचत में वृद्धि करने एवं कुछ व्यक्तियों के हाथों में संपत्ति का केन्द्रीकरण रोकने के लिए कर-प्रणाली में आवश्यक सुधार किया जायेगा।
V. श्रमिकों के हितों की सुरक्षा :-
- इस नीति के लिए अभिप्रेरणा एवं कल्याणात्मक कार्यक्रमों को चलाने तथा प्रबंध में श्रमिकों का भाग जैसी बातों पर जोर दिया गया है।
औद्योगिक नीति, 1956:-
- भारतीय संविधान में नीति निदेशक सिद्धांतों के अंतर्गत समाजवादी प्रकार के समाज की स्थापना करने का संकल्प लिया इस संकल्प के अनुसरण में 1948 की औद्योगिक नीति में परिवर्तन करते हुए देश की दूसरी औद्योगिक नीति की घोषणा 30 अप्रैल, 1956 को की गई जिसे भारत का आर्थिक संविधान या “औद्योगिक नीति का मैग्नाकार्टा” कहा जाता है।
- 1956 की औद्योगिक नीति में उद्योगों को तीन भागों में विभाजित किया गया था।
प्रथम श्रेणी उद्योग:-
- इस श्रेणी में ऐसे 17 उद्योगों को रखा गया जिनके भावी विकास की पूरी जिम्मेदारी सरकार की होगी। ये उद्योग निम्नलिखित हैं- अस्त्र-शस्त्र, अणुशक्ति, लोहा इस्पात, भारी मशीने, बिजली के भारी उपकरण, लोहे एवं इस्पात इत्यादि।
द्वितीय श्रेणी उद्योग:-
- इस श्रेणी में ऐसे 12 उद्योगों को रखा गया जो धीरे-धीरे सरकार के स्वामित्व में आ जायेंगे। ये उद्योग निम्नलिखित हैं- रासायनिक खाद्य, मशीन टूल्स, दवाइयाँ, सड़क यातायात, समुद्री यातायात, एल्युमिनियम, कृत्रिम रबर आदि।
तृतीय श्रेणी उद्योग:-
- इस श्रेणी में उन सभी उद्योगों को रखा गया जो प्रथम श्रेणी उद्योग में नहीं थे। इन उद्योगों के भावी विकास की जिम्मेदारी निजी उद्यमियों की होगी। इस सूची में मुख्यतया उपभोग वस्तुओं के उद्योगों को रखा गया।
उद्देश्य:-
- औद्योगीकरण की गति में तीव्रता लाने के लिए
- कुटीर व लघु उद्योगों का विस्तार तथा सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार करना।
- रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध कराना।
- निजी व सार्वजनिक क्षेत्र में पारस्परिक सहयोग :- इस नीति के अंतर्गत सरकार ने यह स्पष्ट किया की निजी व सार्वजनिक उद्योग अलग-अलग नहीं बल्कि एक दूसरे के सहयोगी है।
- निजी क्षेत्र के विकास में सहायता देने की दृष्टि से सरकार पंचवर्षीय योजना द्वारा निर्धारित कार्यक्रमों के अनुसार विद्युत परिवहन व अन्य सेवाओं और राजकीय उपायों से उद्योगों के विकास को प्रोत्साहन देगी- निजी क्षेत्र को औद्योगिक इकाइयों को सामाजिक व आर्थिक नीतियों के अनुसार ही कार्य करना होगा।
- सरकारी उद्योग, कृषि व निजी उद्योगों का संतुलित विकास करके और प्रादेशिक विषमताओं को समाप्त करके संपूर्ण देश के निवासियों को उच्च जीवन स्तर उपलब्ध कराना।
- तकनीकी एवं प्रबन्धकीय सेवाओं को विकसित कर उद्योगों में प्रशिक्षण सुविधाएँ बढ़ाना।
औद्योगिक नीति, 1977:-
- दिसम्बर, 1977 में जनता सरकार (उद्योग मंत्री जार्ज फर्नाडिस) द्वारा की गई थी।
- इस औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका के संबंध में 1956 की नीति पर ही बल दिया गया।
- लघु तथा कुटीर उद्योग धन्धों के प्रवर्तन तथा विकास पर विशेष बल।
- प्रत्येक जिले में जिला उद्योग केन्द्र स्थापित किए गए।
- इस औद्योगिक नीति में उद्योगों के विकेन्द्रीकरण पर ध्यान दिया गया।
औद्योगिक नीति, 1980:-
- जुलाई, 1980 कांग्रेस सरकार (तत्कालीन उद्योग और वाणिज्य मंत्री प्रणव मुखर्जी) द्वारा घोषित इस औद्योगिक नीति में सार्वजनिक उद्योगों के कुशलतम प्रबन्ध पर बल दिया गया।
- इस नीति का मुख्य उद्देश्य आधुनिकीकरण, विस्तार एवं पिछड़े क्षेत्रों का विस्तार करना था।
- इस नीति में आर्थिक संघवाद की धारणा पर बल दिया गया ताकि प्रत्येक ऐसे जिले में जिसे पिछड़ा चिह्नित किया जाए, और उन जिलों में कुछ केन्द्रीय प्लांट खोले गए जिससे उन क्षेत्रों में लघु एवं अन्य सहायक उद्योगों का विकास हो सके तथा स्थानीय संसाधनों का प्रयोग एवं रोजगार का सृजन हो सके।
- ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योगों के प्रवर्तन, क्षेत्रीय विषमता को दूर करने, रूग्ण औद्योगिक इकाइयों की समस्याओं के समाधान आदि पर बल दिया गया।
· अति लघु इकाइयों के सम्बन्ध में निवेश की सीमा को ₹1 लाख से ₹10 लाख, लघु इकाइयों के सम्बन्ध में ₹ 10 लाख से ₹ 20 लाख तथा अनुषंगी इकाइयों के सम्बन्ध में निवेश सीमा को ₹ 15 लाख से बढ़ाकर ₹ 20 लाख कर दिया गया।
औद्योगिक नीति, 1991:-
· 24 जुलाई, 1991 को कांग्रेस सरकार (तत्कालीन केन्द्रीय राज्य वाणिज्य मंत्री चिदम्बरम) ने नई औद्योगिक नीति की घोषणा की।
· औद्योगिक लाइसेन्सिंग प्रणाली:- उद्योग विकास नियमन अधिनियम, 1951 (जो 8 मई, 1952 से लागू) में प्रावधान किया गया कि केन्द्र सरकार से लाइसेंस लिए बिना किसी भी नई औद्योगिक इकाई की स्थापना अथवा वर्तमान संयंत्रों का बहुत अधिक विस्तार नहीं किया जा सकता है।
- नई औद्योगिक नीति 1991 में औद्योगिक लाइसेन्सिंग प्रणाली में व्यापक परिवर्तन करते हुए 18 प्रमुख उद्योगों को छोड़कर अन्य सभी उद्योगों को लाइसेंस से मुक्त कर दिया गया।
- इन उद्योगों में कोयला, पेट्रोलियम, चीनी, चमड़ा, मोटर कारें, बसे कागज तथा अखबारी कागज, रक्षा उपकरण, औषधि इत्यादि शामिल है
- सुरक्षा कारण, सामाजिक कारण, वनों की सुरक्षा, पर्यावरण समस्याएँ, हानिकारक वस्तुओं का उत्पादन तथा धनी लोगों के उपयोग की वस्तुएँ मुख्य है-
औद्योगिक नीति 1991/ नई औद्योगिक नीति/ भारत में आर्थिक सुधार – 1991
- लाइसेंस तथा कोटा सिस्टम को समाप्त करने वाली नीति।
- जुलाई, 1991 में इस औद्योगिक नीति को पारित किया गया जिसके कारण निम्नलिखित हैं –
1. देश में आर्थिक मंदी का दौर होना।
2. प्रतिकूल भुगतान संतुलन की अवस्था।
3. आयात आधारित अर्थव्यवस्था।
4. लाइसेंस तथा कोटा सिस्टम के कारण देश में मुद्रास्फीति का दौर होना।
5. निवेश पूँजी की आवश्यकता होना।
6. राजकोषीय घाटे की प्रवृत्ति तीव्र गति से बढ़ते जाना।
7. विदेशी संगठनो का दबाव जैसे – IMF, WTO आदि।
1991 की औद्योगिक नीति के प्रस्ताव:-
(i) लाइसेंस की आवश्यकता को समाप्त कर दिया गया, केवल निम्न उद्योगों के लिए लाइसेंस आवश्यक रहा – सिगरेट, शराब, इलेक्ट्रॉनिक एयरोस्पेस उपकरण, खतरनाक रसायन, औद्योगिक विस्फोटक औषधी तथा फार्मास्यूटिकल्स।
(ii) सरकारी क्षेत्र के एकाधिकार वाले उद्योगों की संख्या घटाकर तीन कर दी गई – परमाणु ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा से सम्बन्धित खनिज परिचालन एवं परिवहन और रेलवे।
(iii) खनिज उद्योग को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया।
(iv) लाइसेंस मुक्त किए गए उद्योग केवल एक स्मरण पत्र प्रस्तुत करके उद्योग प्रारंभ कर सकते हैं।
(v) कोटा प्रणाली को समाप्त कर बाजार मांग के आधार पर उत्पादन की छूट प्रदान कर दी गई।
(vi) दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में 25 किलोमीटर दूर उद्योग स्थापित करने पर अनुमति आवश्यक नहीं। जैसे:- इलेक्ट्रॉनिक कम्प्यूटर सामग्री आदि को 25 किलोमीटर की सीमा से छूट।
(vii) MRTP Act 1969 को समाप्त कर दिया गया।
(viii) लघु उद्योगों के पंजीयन की आवश्यकता को समाप्त किया गया। इन्हें राज्य उद्योग निदेशालय में पंजीयन करवाना पड़ेगा।
(ix) निजी क्षेत्र को व्यवसाय की छूट प्रदान की गई।
(x) विदेशी पूँजी विनियोग की सीमा में वृद्धि की गई तथा विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए नये क्षेत्र में छूट प्रदान की गई।
(xi) विदेशी तकनीक को बढ़ावा दिया गया:- उच्च प्राथमिकता प्राप्त 35 उद्योगों के लिए समझौते के स्वत: अनुमोदन का प्रावधान किया गया तथा साथ ही विदेशी पूँजी की आवश्यकता वाले उद्योगों में छूट प्रदान कर दी गई।
- वर्ष 2017 के अनुसार अनिवार्य लाइसेंस वाले उद्योगों की संख्या घटकर 5 रह गई है जो निम्नलिखित हैं-
- अल्कोहल युक्त पेय पदार्थां का आसवन एवं निर्माण।
- तम्बाकू के सिगार एवं सिगरेट एवं तम्बाकू से बनी अन्य वस्तुएँ।
⇒ इलेक्ट्रॉनिक एयरोस्पेस तथा रक्षा साज सामान।
⇒ औद्योगिक विस्फोटक & जोखिम वाले रसायन।
सार्वजनिक क्षेत्र संबंधी नीति:- नई औद्योगिक नीति, 1991 के अंतर्गत 1956 के आधार पर सार्वजनिक क्षेत्रों के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या 17 घटाकर 8 कर दी गई हैं।
वर्तमान समय में सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या घटकर 2 रह गई है-
⇒ परमाणु ऊर्जा
- रेलवे परिवहन
भारत में औद्योगिक विकास के प्रमुख चरण:-
1951-65 तक
अर्थव्यवस्था के लिए औद्योगिक आधार बनाने पर बल दिया गया।
बड़े उद्योगों की स्थापना पर बल- राउरकेला, भिलाई, दुर्गापुर इस्पात उद्योग की स्थापना।
औद्योगिक संवृद्धि दर लगभग 8 प्रतिशत रही।
1965-80 तक
इस चरण में भी औद्योगिक अवसंरचना का लगातार विकास हुआ लेकिन औद्योगिक विकास की गति अपेक्षाकृत धीमी रही।
1980-90 तक
इस चरण में देश में औद्योगिक उदारवाद की नीति अपनायी गई।
सेवा क्षेत्र में तीव्र वृद्धि देखी गई।
1991-92 से वर्तमान तक
वृहद आर्थिक सुधारों से अर्थव्यवस्था में निवेश का वातावरण बना, जिससे औद्योगिक क्षेत्र में भी निवेश बढ़ा।
उदारीकरण व निजीकरण के कारण उद्योगों में निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ी।
विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में औद्योगिक विकास
प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951 - 56)
- सिंदरी उर्वरक कारखाना, इंटीग्रल कोच फैक्ट्री, पिम्परी, पेनिसलीन, फैक्ट्री, नेपा न्यूज प्रिंट, हिंदुस्तान केबल्स आदि की स्थापना हुई।
- औद्योगिक उत्पादन 7.3 वर्ष प्रतिवर्ष की संचयी विकास दर से बढ़ा।
द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956 -61)
- इस योजना में तीव्र औद्योगिक विकास को प्राथमिकता दी गई।
- राउरकेला इस्पात कारखाना, मध्य प्रदेश (वर्तमान में छत्तीसगढ़) में भिलाई, इस्पात कारखाना और पश्चिम बंगाल में दुर्गापुर इस्पात कारखानों की स्थापना की गई।
- औद्योगिक विकास दर – 6.6%
तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961-66)
- बोकारो स्टील कारखानों की स्थापना के साथ-साथ भारी एवं संरचनात्मक उद्योगों का विकास कार्य निजी क्षेत्र को सौंपा गया
- इसमें सार्वजनिक व उपभोक्ता उद्योगों को भी निजी क्षेत्र में सौंपा गया।
- औद्योगिक विकास दर – 9%
चतुर्थ पंचवर्षीय योजना (1969-74)
- इस योजना में औद्योगिक प्रगति मंद रही और औद्योगिक विकास की दर 4.7% ही रही।
- इस योजना में ही SAIL (24 जनवरी, 1973) की स्थापना हुई।
पंचम पंचवर्षीय योजना (1974-78)
- औद्योगिक नीति (23 दिसंबर1977) भाजपा सरकार द्वारा
- इसके तहत देश में जिला स्तर पर जिला उद्योग केन्द्र (DIC) स्थापित किये गये।
- औद्योगिक विकास दर – 5.9%
छठीं पंचवर्षीय योजना (1980-85)
- औद्योगिक विकास दर 5.9%, समग्र विकास की रणनीति अपनाई गई।
- राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड की स्थापना की गई – 18 फरवरी, 1982
सांतवी पंचवर्षीय योजना (1985-90)
- औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने को प्राथमिकता – सामाजिक न्याय सहित विकास
- औद्योगिक विकास दर – 8.5%
- विकास संभावना वाले सनराइज उद्योगों (Sunrise Industries) को स्थापित किया गया।
आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-97)
- आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई-
- 7.3% वीं औद्योगिक विकास दर थी।
नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997-02)
- 5.2% की औद्योगिक विकास दर, जो कि लक्ष्य से बहुत कम थी।
- इसका कारण विश्व अर्थव्यवस्था में मंद गति के परिणाम स्वरूप विदेशी मांग का अभाव
दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-07)
- इसमें तीव्र औद्योगिकीकरण हेतु विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) की स्थापना हुई।
- सरंचनात्मक विकास को प्राथमिकता प्रदान करना।
- लघु एवं कुटीर उद्योगों के विकास के प्राथमिकता देना।
- निर्यातोन्मुखी उद्योगों को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करना।
- औद्योगिक एवं आर्थिक विकास के मार्ग में आने वाली बाधाओं एवं प्रतिबंधों को न्यूनतम करना।
ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-12)
- औद्योगिक विकास दर 7.2%
- इस योजना में उवर्रक व चीनी उद्योगों के ऊपर से अनावश्यक नियंत्रण हटा दिया गया।
- राष्ट्रीय विनिर्माण नीति घोषित की गई।
- लक्ष्य ‘त्वरित और समावेशी’ विकास रखा गया।
- औद्योगिक वृद्धि दर 10% के लगभग रखी गई है।
- विभिन्न योजनाओं के आधुनिकीकरण के प्रयास का लक्ष्य।
बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012-17)
- 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-2017) के प्रस्ताव पत्र को काफी सलाह मशविरा के साथ तैयार किया गया था। इसके प्रस्ताव पत्र को वर्ष 2011 के मध्य तक राष्ट्रीय विकास परिषद् (NDC) से मंजूरी मिल चुकी थी।
- प्रस्ताव पत्र में योजना के मुख्य लक्ष्यों के अलावा उसे पूरा करने की राह में आने वाली चुनौतियों का जिक्र भी किया गया है। इसके अलावा इसमें लक्ष्यों को पूरा करने की प्रक्रिया और उसके तरीके को भी शामिल किया गया है।
12वीं पंचवर्षीय योजना के लक्ष्य :
- ‘समावेशी संवृद्धि की अवधारणा‘ - तीव्र अधिक समावेशी एवं सतत विकास
- योजना ने आर्थिक वृद्धि दर का लक्ष्य 9 प्रतिशत रखा गया (बाद में संशोधन)
- कृषि क्षेत्र की वृद्धि कर का लक्ष्य 4 प्रतिशत रखा गया। खाद्यान्न वृद्धि दर का लक्ष्य 2 प्रतिशत गैर खाद्यान्न क्षेत्र वृद्धि दर 5-6 प्रतिशत
- विनिर्माण क्षेत्र में 11-12 प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य।
- योजना द्वारा योजना के लिए उचित संसाधन जुटाने हेतु ‘राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation) के क्षेत्र में कुछ कठोर निर्णय लेने की सलाह दी गई है।
- संसाधनों की कमी को देखते हुए ‘स्वास्थ्य, शिक्षा एवं आधारभूत संरचना के क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई।
- योजना में संसाधनों के अधिक ‘कार्यकुशल’ (Efficient) उपयोग पर बल दिया गया है।
- योजना आयोग 1950-51 के बाद से ही पंचवर्षीय योजनाएँ बनाता रहा है। 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) इसकी अंतिम कड़ी थी। जो 31 मार्च, 2017 को समाप्त हो गई।
औद्योगिक विकास :-
- राष्ट्रीय स्टार्टअप सलाहाकार परिषद् (21 जनवरी, 2020)
- देश में नवाचार और स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने हेतु
- फुटवियर और चमड़ा उद्योग विकास परिषद् की स्थापना 14 सितम्बर, 2020
- व्यापार सुधार कार्य योजना (BRAP) – कारोबारी सुगमता के मामले में प्रदर्शन के आधार पर राज्यों की रैंकिंग की जाती है।
- इसका उद्देश्य स्वस्थ प्रतिस्पर्धा एवं बड़े स्तर पर निवेश आकर्षित करना था।
भारत में प्रमुख औद्योगिक गलियारा:-
दिल्ली-मुम्बई औद्योगिक गलियारा (DMIC)
दिल्ली-मुम्बई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (डीएमआईसी) परियोजना भारत सरकार का एक प्रमुख कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य कम रसद लागत के साथ विश्व स्तर के बुनियादी ढाँचे के निर्माण के माध्यम से भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने में है।
बेंगलुरु-मुम्बई औद्योगिक गलियारा (BMIC)
BMIC एक प्रस्तावित 4-6 लेन की एक्सप्रेस-वे परियोजना है जो नंदी इन्फ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर एंटरप्राइजेज (NICE) द्वारा कर्नाटक में बेंगलुरु और मेसूर को जोड़ने के लिए बनाई गई है।
इस परियोजना के निर्माण के लिए राज्य सरकार और कल्याणी ग्रुप इंडिया, SAB और VHB के संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच एक समझौते पर 1995 में हस्ताक्षर किए गए थे।
बेंगलुरु मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर का उद्देश्य विश्व स्तरीय टिकाऊ कनेक्टिविटी इन्फ्रास्ट्रक्चर द्वारा परोसने वाले एक सुव्यवस्थित और संसाधन-कुशल औद्योगिक आधार के विकास सुविधा प्रदान करना है, जिससे दोनों राज्यों को नवाचार, विनिर्माण, रोजगार सृजन और संसाधन सुरक्षा के मामले में महत्वपूर्ण लाभ मिल सके।
चेन्नई-बेंगलुरु औद्योगिक गलियारा (CBIC)
चेन्नई-बेंगलुरु औद्योगिक गलियारा (CBIC)चेन्नई-बेंगलुरु चित्रदुर्ग (लगभग 560 किलोमीटर) के बीच गलियारे का प्रभाव कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु राज्यों में फैला होगा।
पूर्वी तटीय औद्योगिक गलियारा (ECIC)
आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा
अमृतसर-दिल्ली-कोलकात्ता-औद्योगिक गलियारा
पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड एवं पश्चिम बंगाल।
भारत में रेल फ्रेट गलियारा परियोजनाएँ:-
पूर्वी डेडिकेटेड फ्रेट गलियारा (Eastern DFC)
पश्चिम बंगाल के दनाकुनी से झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा एवं पंजाब के लुधियाना तक, इसकी लंबाई 1856 किमी. है।
पश्चिम डेडिकेटेड फ्रेट कोरीडोर (Western DFC)
- उत्तरप्रदेश के दादरी से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात होते हुए जवाहर लाल नेहरू पोर्ट, मुम्बई तक।
- इसकी लम्बाई 1504 किमी. है।
प्रमुख औद्योगिक वित्त संस्थान:-
Industrial Finance
औद्योगिक – वित्त
- आवश्यकता के आधार पर
- समय के आधार पर
- स्त्रोत के आधार पर
आवश्यकता के आधार पर
- स्थायी पूँजी (fixed capital)
- मशीन, भवन निर्माण, भूमि हेतु
कार्यशील पूँजी (working capital)
- कच्चामाल, मजदूरी, विपणन
समय के आधार:-
|
अल्पकालीन वित्त |
मध्यकालीन वित्त |
दीर्घकालीन वित्त |
|
15 महीने तक, कच्चामाल मजदूरी |
15 महिने से 5 वर्ष तक, छोटी मशीन |
5 वर्ष से अधिक, निर्माण नए उद्योग की स्थापना |
स्त्रोत के आधार:-
- आन्तरिक स्त्रोत, बाह्य स्त्रोत
- आन्तरिक वित्त
- स्वामी की पूँजी, अंश पूँजी लाभ का पुनर्निवेश (Reinvestment of Profit)
- बाह्य वित्त-
- व्यापारिक बैंक, सार्वजनिक जमा औद्योगिक वित्तीय संगठन
भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (Industrial Finance Corporation of India Ltd.):-
भारतीय औद्योगिक वित्त निगम एक गैर-बैंकिंग वित्त कंपनी है, जिसकी स्थापना 1 जुलाई, 1948 को हुई।
इस संस्थान का प्रमुख उद्देश्य औद्योगिक फर्मों को ऋण तथा अग्रिम प्रदान करवाना है।
कार्य-
- 25 वर्षों तक की ऋण सुविधा उपलब्धता
- ऋण पत्रों की खरीद करके वित्तीय सुविधा
- विदेशी मुद्रा में ऋण सुविधा उपलब्ध
- वाणिज्यक व सहकारी बैंकों से लिए गए ऋणों की गारन्टी प्रदान करना
विदेशों से खरीदी गई मशीनों के भुगतान की गारन्टी
लीजिंग व हायर परचेज वित्त प्रदान करना ऋणों की गांरटी – तकनीकी सलाह व प्रशिक्षण देना।
राज्य वित्त निगम (State Finance Corporation):-
SFC अधिनियम 1951 के तहत प्रत्येक राज्य में राज्य वित्त निगम स्थापित किए गए। जिनका उद्देश्य छोटे, मध्यम तथा कुटीर उद्योगों की सहायता करना है।
भारतीय औद्योगिक ऋण तथा विनियोग निगम
(Industrial Credit and Investment Corporation of India Ltd.- ICICI):-
विश्व बैंक द्वारा निजी क्षेत्रों में लघु तथा मध्यम उद्योगों के विकास के लिए जनवरी, 1955 में ICICI की स्थापना करवाई गई। यह संगठन मुख्य रूप से निजी क्षेत्रों को ऋण उपलब्ध करवाता है।
भारतीय औद्योगिक विकास बैंक (Industrial Development Bank of India- IDBI)
भारतीय औाद्योगिक विकास बैंक की स्थापना वर्ष 1964 में हुई अक्टूबर, 2004 में इसे वाणिज्यिक बैंक के रूप में परिवर्तित कर दिया गया।
यह उद्योगों की स्थापना तथा विकास संबंधी परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करता है तथा आधारभूत उद्योगों के विकास को प्रोत्साहित करता है।
वित्त स्त्रोत – RBI भारत सरकार, ऋण पत्र व Bond की बिक्री से
वर्तमान में इसका निजीकरण LIC में कर दिया गया है।
भारतीय औद्योगिक विनियोग बैंक (Industrial Reconstruction Corporation of India-IRCI)|
भारतीय औद्योगिक विनियोग बैंक की स्थापना अप्रैल, 1971 में हुई इस संगठन का मुख्य उद्देश्य औद्योगिक रुग्ण इकाइयों के पुनर्निमाण में सहायता करना है।
भारतीय निर्यात-आयात बैंक (The Export-Import Bank of India-EXIM Bank)
इस बैंक की स्थापना 1 जनवरी, 1982 में की गई। EXIM Bank की स्थापना का उद्देश्य निर्यातकों और आयातकों को विभिन्न सुविधाएँ उपलब्ध करवाना है।
खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC)
भारत सरकार ने 1956 में एक अधिनियम द्वारा (KVIC) की स्थापना की जो ग्रामीण क्षेत्रों में कम प्रतिव्यक्ति विनियोग के साथ गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार अवसरों का सृजन करती है।
प्रथम राष्ट्रीय श्रम आयोग का गठन 1966 में तथा नवीनतम श्रम आयोग का गठन अक्टूबर, 1999 में किया गया। यह आयोग संगठित क्षेत्र के साथ-साथ असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के कार्य की दशाओं को सुधारने के लिए सुझाव देता है।
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (Small Industries Development Bank of India-SIDBI)
SIDBI की स्थापना 2 अप्रैल, 1990 को संसद के एक अधिनियम के द्वारा की गई। जिसका मुख्यालय लखनऊ में हैं।
- वित्त स्त्रोत- IDBI, RBI ऋण पत्रों की बिक्री
कार्य-
1. लघु उद्योगों के लिए बाजार दरों से कम दर पर ऋण सुविधा उपलब्धता
2. उपनगरीय व कस्बों में औद्योगिक विकास प्रोत्साहन
3. SIDBI का मुख्य उद्देश्य सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम क्षेत्र के प्रोत्साहन, वित्त पोषण और विकास के लिए प्रमुख वित्तीय संस्थान के रूप में कार्य करना।
4. राज्य वित्त निगम, वाणिज्य व सहकारी बैंक को वित्तीय सहायता देना
5. उपनगरीय व कस्बों में औद्योगिक विकास
राज्य वित्त निगम
लघु उद्योग विकास संगठन (Small Industries Development Organisation-SIDO):-
SIDO की स्थापना वर्ष 1954 में हुई थी।
यह केन्द्रीय उद्योग मंत्रालय के अधीन आता है तथा इसका प्रमुख कार्य लघु उद्योगों के संबंध में नीति निर्धारक, समन्वयक तथा नायक एजेंसी के रूप में कार्य करना है।
राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (National Small Industries Corporation-NSIC)
NSIC की स्थापना वर्ष 1955 में हुई थी।
इसका प्रमुख कार्य किराया क्रय पद्धति पर छोटे उद्योगों को मशीनरी उपलब्ध करवाना है।
इसके अतिरिक्त देश में तीन राष्ट्रीय स्तर के उद्यमशीलता विकास संस्थान है-
भारतीय उद्यमशीलता संस्थान-गुवाहटी
राष्ट्रीय उद्यमशीलता एवं लघु विकास व्यापार संस्थान-नोएडा
राष्ट्रीय लघु उद्योग विस्तार प्रशिक्षण संस्थान-हैदराबाद
राष्ट्रीय निवेश कोष
- इसका गठन वर्ष 2005 में किया गया।
- सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश से प्राप्त होने वाली राशि इस कोष में जमा की जाएगी तथा यह राशि भारत के संचित कोष से बाहर रहेगी।
- इस राशि का 75% उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे सामाजिक क्षेत्र के विकास हेतु।
- 25% राशि का उपयोग पुन: लाभ अर्जन हेतु सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में निवेश।
महारत्न :-
महारत्न के दर्जे हेतु आवश्यक मानदंड:-
कंपनी को भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के नियामकों के अंतर्गत न्यूनतम निर्धारित सार्वजनिक हिस्सेदारी (Minimum Prescribed Public Shareholding) के साथ भारतीय शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध होनी चाहिए।
विगत तीन वर्षों की अवधि में औसत वार्षिक व्यवसाय (Average Annual Turnover) 25,000 करोड़ रुपये से अधिक होना चाहिए।
पिछले तीन वर्षों में औसत वार्षिक निवल मूल्य (Average Annual Net Worth) 15,000 करोड़ रुपये से अधिक होना चाहिए।
पिछले तीन वर्षों का औसत वार्षिक शुद्ध लाभ (Average Annual Net Profit) 5,000 करोड़ रुपये से अधिक होना चाहिए।
कंपनियों की व्यापार के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में महत्वपूर्ण उपस्थिति होनी चाहिए।
पूर्व में भारत में कुल 8 महारत्न कंपनियाँ थीं, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के इस सूची में जुड़ने के बाद इनकी संख्या 10 हो गई है।
⇒भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (Bharat Heavy Electricals Limited)
⇒भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (Bharat Petroleum Corporation Limited)
⇒कोल इंडिया लिमिटेड (Coal India Limited)
⇒गेल इंडिया लिमिटेड (GAIL India Limited)
⇒हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (Hindustan Petroleum Corporation Limited)
⇒इंडियन आयल कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (Indian Oil Corporation Limited)
⇒राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम लिमिटेड (National Thermal Power Corporation Limited)
⇒ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (Oil and Natural Gas Corporation Limited-ONGC)
⇒स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (Steel Authority of India Limited-SAIL)
⇒पॉवर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (Power Grid Corporation of India Limited)
नवरत्न (Navratan):-
नवरत्न सार्वजनिक उपक्रमों का एक विशिष्ट वर्ग है जिसमें सरकार ग्लोबल कम्पनी होने की सम्भाव्य क्षमता देखती है। नवरत्न वर्ग में आने के लिए सरकार ने नवरत्न कम्पनियों की धारणा का प्रारम्भ 1997 में किया। निष्पादन संकेतक (Performance Indicator) को आधार के रूप में रखा है तथा संकेतों को अलग-अलग भार दिया गया है। निर्धारित 100 अंकों में से 60 अंक पाने वाली कम्पनी नवरत्न पाने के लिए अर्हत होगी। ये संकेतक पिछले तीन वर्षों से संबंधित होंगे-
⇒ निवल मूल्य (Networth) के अनुपात के रूप में निवल लाभ
⇒ कुल उत्पादन लागत के अनुपात रूप में श्रमशक्ति लागत
⇒ लगी पूँजी के अनुपात के रूप में ह्यास, ब्याज तथा कर से पूर्व लाभ
⇒ विक्रय के अनुपात के रूप में ह्रास, ब्याज तथा कर से पूर्व लाभ
⇒ वर्तमान में निम्नलिखित 14 कंपनियों को नवरत्न का दर्जा प्राप्त है-
⇒ भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL)
⇒ हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL)
⇒ महानगर टेलीफोन लिमिटेड (MTNL)
⇒ नेशनल मिनरल डेवलममेण्ट कॉर्पोरेशन (NMDC)
⇒ ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL)
⇒ रूरल इलेक्ट्रीफिकेशन कॉर्पोरेशन (REC)
⇒ नेशनल एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड (NALCO)
⇒ नेग्वेली लिग्नाइट कॉर्पोरेशन (NLC)
⇒ पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन (PFC)
⇒ राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड (RINL)
⇒ शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SCI)
⇒ नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रशन कॉर्पोरेशन (NBCC)
⇒ इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड (EIL)
⇒ कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (CONCOR)
मिनीरत्न:-
मिनीरत्न की अवधारणा वर्ष 2002 में शुरू हुई थी। मिनीरत्न कंपनियों को संयुक्त उद्यमों में प्रवेश करने की अनुमति होती है और वे विदेशों में भी कार्यालय खोल सकती हैं लेकिन उनके लिए कुछ सीमाएँ निर्धारित की गई हैं।
वर्तमान में 73 मिनीरत्न कंपनियाँ कार्यरत है।
मिनीरत्न कंपनियों को दो श्रेणियों में बाँटा गया है-
मिनीरत्न श्रेणी- 1
मिनीरत्न कंपनी वर्ग 1 का दर्जा प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि कंपनी ने पिछले तीन वर्षों से लगातार लाभ प्राप्त किया हो तथा तीन साल में एक बार कम से कम 30 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ अर्जित किया हो।
मिनीरत्न श्रेणी- 2
कंपनी द्वारा पिछले तीन साल से लगातार लाभ अर्जित किया हो और उसकी नेट वर्थ सकारात्मक हो।
औद्योगिक अवसंरचना विकास
राष्ट्रीय विनिर्माण नीति- 2011
- औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग (DIPP) ने 04 नवम्बर, 2011 को भारत की राष्ट्रीय निर्माण नीति (NMP) अधिसूचित किया।
उद्देश्य-
- विनिर्माण क्षेत्र में 14-16% की वृद्धि करना
- 2022 तक G.D.P विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ाकर 25% करना
- 10 करोड़ नए रोजगार सृजन करना
- राष्ट्रीय निवेश अवसंरचना क्षेत्रों की स्थापना
- औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में वृद्धि करके गुणवत्ता में सुधार करना
- सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम की स्वायत्तता में वृद्धि करके रक्षा व ऊर्जा क्षेत्र को प्रोत्साहन
- राष्ट्रीय निवेश अवसंरचना क्षेत्रों की स्थापना करना
- औद्योगिक विकास उद्योग व श्रम कानूनों में सुधार करना
- औद्योगिक प्रशिक्षण व कौशल विकास पर बल देना
- भूमि अधिग्रहण से सम्बन्धित मुद्दे राज्य सरकार द्वारा हल कराए जाए।
- ग्रामीण युवाओं को जरूरी कौशल प्रदान करने ‘’रोजगार के योग्य बनाना।
- व्यापार नियमों का विवेकीकरण और सरलीकरण
- हरित प्रौद्योगिकी सहित प्रौद्योगिकी विकास के लिए वित्तीय और संस्थागत तंत्र।
औद्योगिक गलियारे (Industrial Corridor)
- एक क्षेत्र जहाँ उद्योगों के विकास के लिये अवसंरचना निवेश क्षेत्र औद्योगिक सिटी, एनर्जी, जल सुविधा, परिवहन सुविधा, आदि दी जाती है।
- वर्तमान में – 6 कॉरिडोर, भारत माला योजना के तहत 44 कॉरिडोर विकसित किये गये हैं।
1. दिल्ली मुम्बई औद्योगिक कॉरिडोर
2. मुम्बई बेंगलुरु औद्योगिक कॉरिडोर
3. बेंगलुरु कोच्ची औद्योगिक कॉरिडोर
4. बेंगलुरु चेन्नई औद्योगिक कॉरिडोर
5. पूर्वी तटीय औद्योगिक कॉरिडोर
6. अमृतसर दिल्ली कोलकात्ता औद्योगिक कॉरिडोर
NIMZ- राष्ट्रीय विनिर्माण निवेश क्षेत्र
- NIMS:- विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन व बढ़ावा देने के लिये स्थापित किये हुए क्षेत्र
- स्वायत्त शासी क्षेत्र
- क्षेत्रफल – 5000 हेक्टेयर
- 30% भाग पर विनिर्माण गतिविधि का संचालन
- समेकित औद्योगिक टाउन शिप
- आवश्यक परिस्थिति तंत्र हेतु बड़ा भू भाग
- विश्व स्तरीय विनिर्माण गतिविधि क्षेत्र
SEZ विशेष आर्थिक क्षेत्र – घरेलू सीमा में स्थित वे आर्थिक क्षेत्र जिन पर देश के सामान्य कानून लागू नहीं होते हैं तथा इनके लिये विशेष प्रावधान किया जाता है। निर्यात को बढ़ावा देने हेतु SEZ स्थापित है।
SEZ Act – 2000
- SEZ Policy – 2005
- वर्तमान में कार्यरत SEZ – 232
- प्रस्तावित 351
प्रमुख उद्योग
लौह इस्पात उद्योग
- चीन के बाद भारत का विश्व में द्वितीय स्थान
- कच्चामाल- लौह अयस्क, मैंगनीज, कोयला, चूना पत्थर प्रभावित करने वाले कारक
1. कच्चेमाल की उपलब्धता
2. बाजार तथा परिवहन की उपलब्धता
3. वित्तीय उपलब्धता
4. सरकार की नीतियाँ
इकाई -
- प्रथम - बंगाल आयरन वर्क्स- 1874 फुल्टा (प. बंगाल)
- टाटा स्टील कम्पनी लिमिटेड- 1907 जमशेदपुर
- इण्डियन आयरन व स्टील वर्क्स- प. बंगाल,
- विश्वैश्वरेया स्टील वर्क्स- 1973, शेमोगा (कर्नाटक)
- हिन्दुस्तान स्टील वर्क्स- भिलाई, छत्तीसगढ़- USSR
- हिन्दुस्तान स्टील वर्क्स दुर्गापुर, प. बंगाल- ब्रिटेन
- हिन्दुस्तान स्टील वर्क्स- राउरकेला, ओडिशा- जर्मनी
- हिन्दुस्तान स्टील वर्क्स- बोकारो, झारखण्ड
- स्टील ऑथोरिटी ऑफ इण्डिया लिमिटेड- SAIL
सूती वस्त्र उद्योग
- कृषि आधारित परम्परागत उद्योग
- सर्वाधिक रोजगार उपलब्ध कराना
महत्त्व
- G.D.P में योगदान- 4%, औद्योगिक उत्पादन का- 14% हिस्सा, रोजगार- 3.5 करोड़
- मुम्बई- भारत की सूती वस्त्र नगरी
- अहमदाबाद- भारत का मेनचेस्टर
- कोयम्बटूर - दक्षिण भारत का मेनचेस्टर
- कानपुर- उत्तर भारत का मेनचेस्टर इकाई
- प्रथम सूती वस्त्र मिल कवास जी डागर द्वारा 1854, मुम्बई में स्थापित
- प्रमुख उत्पादक राज्य:- महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, प. बंगाल
सीमेन्ट उद्योग
प्रमुख आधारभूत उद्योग
कच्चामाल - चूना पत्थर, कोयला, जिप्सम
स्थिति - विश्व में सीमेन्ट का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश, (2019 तक 54 कम्पनी 190 प्लांट) (उत्पादन- 485 मिलि. टन)
सीमेन्ट के प्रकार
1. पोर्टलैण्ड सीमेन्ट
2. पोर्टलैण्ड पोजोलोना सीमेन्ट
3. पोर्टलैण्ड फर्नेस सीमेन्ट
4. ऑयल सीमेन्ट
5. व्हाइट सीमेन्ट
सीमेन्ट इकाई-
- प्रथम- मद्रास उद्योग- 1904, इण्डिया सीमेन्ट लि.- 1946, तमिलनाडु, श्री सीमेन्ट ब्यावर अजमेर- 1997
- पूर्णत: भारत सरकार के स्वामित्व वाली इकाई सीमेन्ट कॉर्पोरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड- 1965
सफेद सीमेन्ट-
खारिया खंगार जोधपुर, बिरला व्हाइट गोटन (नागौर) J.K सीमेंट
एल्युमिनियम उद्योग
कच्चामाल- बॉक्साइट
- इकाई- एल्युमिनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इण्डिया-
J.k नगर (प. बंगाल)
हिन्दुस्तान एल्युमिनियम कम्पनी-
रेनकुट (सोनभद्र) उत्तर प्रदेश HIDALCO
- भारत एल्युमिनियम कम्पनी लिमिटेड (Balco) कोरना, छत्तीसगढ़
- भारत एल्युमिनियम कम्पनी लिमिटेड (Balco) रत्नागिरी, महाराष्ट्र
- नेशनल एल्युमिनियम कम्पनी लिमिटेड (NALCO) कोरापुर, ओडिसा
- वेदान्ता एल्युमिनियम कम्पनी लिमिटेड- लंजीगज, ओडिसा कागज उद्योग
कच्चा माल- सेलुलोज जो पेड़ों के तनों को पीसकर प्राप्त किया जाता है
वन उपज आधारित उद्योग, 2.5 टन कच्चे माल से 1 टन कागज का निर्माण
- 70% बाँस - कर्नाटक, असम (कच्चामाल),
- 15% सबई घास - मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, 7% Soft Wood- हिमालयन क्षेत्र
इकाई-
- प्रथम आधुनिक कारखाना- सेरामपुर (प. बंगाल) 1832,
अखबारी कागज-
- प्रथम कारखाना- नेपानगर (M.P) मैसूर न्यूज प्रिन्ट पेपर लिमिटेड, मैसूर, कर्नाटक, तमिलनाडु न्यूज प्रिन्ट पेपरलि, वैल्लोर, तमिलनाडु
चीनी उद्योग
- परम्परागत कृषि आधारित उद्योग- कच्चामाल, गन्ना, चुकन्दर
- चीनी उत्पादन में विश्व में दूसरा व उपभोग में देश का प्रथम स्थान है।
- विश्व का सर्वाधिक चीनी उत्पादक देश - ब्राजील, चीनी का कटोरा- क्यूबा
देश का प्रथम चीनी कारखाना-
बिहार-1904
प्रमुख उत्पादक राज्य –
1. उत्तर प्रदेश
2. महाराष्ट्र
3. कर्नाटक
चीनी उद्योग की समस्या
1. प्रति हेक्टेयर गन्ने का निम्न उत्पादन
2. गन्ने की निम्न गुणवत्ता
3. मिल द्वारा गन्ने के कुल उत्पादन का एक निश्चित भाग
उपयोग में लिया जाता है
4. तकनीक के अभाव के कारण लागत में वृद्धि।
पेट्रोलियम उद्योग:- (क्रूड ऑयल, रिफायनरी)
- उत्पादन क्षेत्र- असम, त्रिपुरा, मणिपुर, प. बंगाल, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, J&K, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, राजस्थान, केरल, अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह
- भण्डार- 75.6 करोड़ टन, उत्पादन 35.7 m. टन
भारत में सर्वप्रथम तेल की खोज-
- ब्रह्मपुत्र घाटी में उत्पादन में सफलता- 1867
- उत्पादक कम्पनी- ONGC- 1956, OIL- 1981 ब्रह्मा ऑयल कम्पनी को परिवर्तन रिफाइनरी
- संख्या – 23, कुल क्षमता- 247.6 M.M.T प्रतिवर्ष, 2030 तक बढ़कर- 439 M.M.T प्रतिवर्ष
- रिफाइनरी-23 (सरकारी क्षेत्र में-18, निजी क्षेत्र में-3, संयुक्त उपक्रम में - 2)
सर्वाधिक क्षमता
- रिलायंस रिफाइइनरी- जामनगर, गुजरात
- 2006- से एथेनॉल युक्त पेट्रोलियम, 10% एथेलॉल की मात्रा
- कृष्ण क्रान्ति- पेट्रोलियम उत्पादन
- भारत द्वारा सर्वाधिक आयात क्रूड ऑयल, निर्यात सर्वाधिक पेट्रोलियम उत्पाद औद्योगिक उत्पादन सूचकांक
- औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) किसी अर्थव्यवस्था के औद्योगिक क्षेत्र में अवधि विशेष में उत्पादन की स्थिति के बारे में ज्ञान करता है।
- भारत में इस सूचकांक के आँकड़े केन्द्रीय सांख्यकीय कार्यालय द्वारा मासिक आधार पर जारी किए जाते हैं।
- वर्तमान में औद्योगिकी उत्पादन सूचकांक तुलना के लिए वर्ष 2011-12 के आधार वर्ष माना गया हैं।
- ये सूचकांक उद्योग क्षेत्र में ही हो रही वृद्धि या कमी को बताने का सबसे सरल तरीका हैं।
बजट 2020-21
- आर्थिक गतिविधि का सुदृढ़ वी-शेपड सुधार की पुष्टि oct आईआईपी मे की गई।
- भारत सरकार ने एक उपचारात्मक पैकेज की घोषणा (आत्मनिर्भर भारत अभियान )की जिसमें भारत का सकल घरेलू उत्पाद का 15% तक के पैकेज का प्रोत्साहन शामिल है।
- व्यापार सुगमता सूचकांक के अनुसार 190 देशों मे भारत का स्थान सुधर कर 63 वाँ हो गया है ,जो पिछले साल 77 वाँ था।
- भारत ने 10 मे से 7 संकेतकों में अपनी स्थिति मे सुधार किया गया है और अंतर्राष्ट्रीय उत्कृष्ट पद्धतियों को अपनाने की ओर अग्रसर है।
- एफ़डीआई वित वर्ष 2019 के दौरान 44.37 बिलियन $ से 2020 तक 49.98 बिलियन $ था।
- विनिर्माण क्षेत्र मे ऑटोमोबाइल , दूरसंचार , धातुकर्मीय , गैर पारंपरिक ऊर्जा ,रसायन (उर्वरकों के अलावा), खाद्य प्रसंस्करण और पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस जैसे एफ डी आई इक्विटी का बाद हिस्सा है।
- भारत की विनिर्माण क्षमता और निर्यातों मे आत्मनिर्भर भारत के तत्त्वावधान मे 10 प्रमुख सेक्टरों में भारत सरकार ने वृद्धि करने के उदेश्य से उत्पादन सम्बद्ध प्रोत्साहन (पी.एल.आई) स्कीम प्रारंभ की है।