सार्वजनिक वितरण प्रणाली
-भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का इतिहास द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारंभ अर्थात् सन् 1939 से माना जाता है। उस समय औपनिवेशिक सरकार ने गरीबों को सस्ती दरों पर अनाज उपलब्ध कराया था।
-वर्तमान में भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा समवर्ती सूची के अन्तर्गत सामूहिक रूप से संचालित किया जाता है।
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का उद्देश्य खाद्य सुरक्षा प्रदान करते हुए उत्पादन असंतुलन दूर करना तथा MSP या उससे अधिक मूल्य पर किसानों से खरीद करना और नियमित आपूर्ति बनाये रखना है।
केंद्र सरकार की भूमिका-
आवश्यक वस्तुओं का अधिग्रहण, उनका भंडारण तथा उनको बड़ी मात्रा में गंतव्य स्थान तक पहुँचाने की होती है।
केन्द्र सरकार का कार्य:-
-अनाज की खरीद FCI से करना।
-अनाज का भण्डारण करना।
-परिवहन व्यवस्था व थोक में वस्तु आवंटन करना।
-राज्य सरकारों तक अनाज की उपलब्धता सुनिश्चित करना
राज्य सरकार की भूमिका-
-गंतव्य स्थान से वस्तुओं को उठाने उन्हें उचित मूल्य की दुकानों तक पहुँचाने तथा उपभोक्ताओं तक वितरित करने की होती है।
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा नागरिकों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करना भारत में लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को साकार करता है।
राज्य सरकार के कार्य:-
-वितरण व्यवस्था को सुनिश्चित करना।
-राशन डीलरों का चयन करना व उन्हें लाइसेंस जारी करना।
-लाभार्थियों की पहचान व मापदण्डों का निर्धारण करना।
-परिवार राशन कार्ड की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
-आवंटन मात्रा निर्धारण की जिम्मेदारी।
खाद्य सुरक्षा
-खाद्य सुरक्षा से तात्पर्य प्रत्येक व्यक्ति को स्वस्थ जीवन यापन करने हेतु आवश्यकतानुसार आर्थिक स्थिति के अनुरूप पोषक तत्त्व युक्त भोजन सामग्री की उपलब्धता प्राप्त होना है।
-प्रत्येक व्यक्ति को खाद्य सुरक्षा प्राप्त हो इसके लिए-
- सन् 1960 में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की व्यवस्था प्रारंभ की गई।
-सन् 1975 में समन्वित बाल विकास योजना (ICDS)
-सन् 1995 में मध्याह्न भोजन कार्यक्रम (MDM) चलाया गया।
खाद्य सुरक्षा से लाभ:-
पर्याप्तता- उपलब्धता व उत्पादकता में वृद्धि
पाचन- बेहतर स्वास्थ्य व स्वच्छ पेयजल की सुनिश्चितता
पोषकता- दलहन आदि पोषक तत्त्वों की उपलब्धता
पहुँच - प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि से क्रय क्षमता में वृद्धि करना
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन-2007
-इस मिशन के तहत वर्ष 2011-12 के अंत तक चावल, गेहूँ और दालों के उत्पादन को 10 मिलियन टन, 8 मिलियन टन तथा 2 मिलियन टन तक बढ़ाने का लक्ष्य था।
-11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012) में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन का कुल व्यय 4883 करोड़ रखा गया।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA)-2013
-प्रत्येक व्यक्ति को खाद्य सुरक्षा की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 लागू किया गया, जिसके अंतर्गत 2 अक्टूबर, 2013 को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना का शुभारंभ किया गया।
-यह अधिनियम लागू करने वाला राजस्थान देश का प्रथम राज्य बना।
-राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना में केंद्र तथा राज्य की 60 : 40 की भागीदारी है।
-राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत ग्रामीण जनसंख्या का 75% तथा शहरी जनसंख्या का 50% को समस्त भारत की लगभग 67% जनसंख्या को सस्ता अनाज उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया।
-राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का उद्देश्य देश से भूख तथा कुपोषण की समस्या को समाप्त करना था।
-राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के तहत प्राथमिकता वाले निर्धन परिवारों को मोटा अनाज 1 रुपये किलो, गेहूँ 2 रुपये किलो और चावल 3 रुपये प्रति किलो।
-प्रति व्यक्ति 5 किलोग्राम अनाज प्रतिमाह उपलब्ध करवाया गया।
-राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना के तहत 1 मार्च, 2019 से 1 रुपये प्रति कि.ग्रा. की दर से पात्र लाभार्थियों को बायोमैट्रिक सत्यापन के पश्चात् पीओएस मशीनों के माध्यम से गेहूँ उपलब्ध करवाया जा रहा है।
-परिवार का मुखिया वरिष्ठ महिला को माना जायेगा।
-गर्भवती महिलाओं की पोषण संबंधी आवश्यकता पूर्ति हेतु 6000 रुपये की नकद सहायता दी जाती है।
-बेघरों के लिए लंगर व्यवस्था का प्रावधान है।
-राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर खाद्य सुरक्षा आयोग की स्थापना की जाएगी।
-बीपीएल पात्र परिवारों को 5 किग्रा प्रति यूनिट प्रतिमाह उपलब्ध करवाया जा रहा है।
-बाराँ जिले के सहरिया जनजाति तथा उदयपुर और खैरवा की कथौड़ी जनजाति के परिवारों को 35 किग्रा गेहूँ प्रतिमाह प्रति परिवार नि:शुल्क वितरण किया जा रहा है।
-सन् 2020 में दिव्यांगों को भी NFSA में शामिल किया गया है।
खाद्य सुरक्षा योजना में शामिल लाभार्थी परिवार-
-अंत्योदय, बीपीएल, स्टेट बीपीएल के कार्डधारी परिवार।
-अन्नपूर्णा योजना के लाभार्थी।
-सहरिया एवं कथौड़ी जनजाति के परिवार।
-विधवा, विशेष योग्यजन, एकल नारी पेंशन योजना की लाभार्थी महिलाएँ।
-घुमंतु व अर्द्ध-घुमंतु जातियाँ, गाड़िया लुहार, भेड़ पालक व वनवासी।
-पालनहार योजना अंतर्गत लाभार्थी बच्चे।
-शहरी क्षेत्र के कच्ची बस्ती में निवास करने वाले परिवार।
खाद्य सुरक्षा योजना में शामिल नहीं होने वाले लाभार्थी परिवार-
-ऐसे परिवार जिसका कोई भी एक सदस्य आयकर दाता हो अथवा जिनकी वार्षिक आय 1 लाख रुपये से अधिक हो।
-ऐसे परिवार जिनका कोई भी एक सदस्य सरकारी / अर्द्ध-सरकारी संस्था में नियमित सेवारत हो अथवा 1 लाख रुपये से अधिक वार्षिक पेंशन प्राप्त करता हो।
-ऐसे परिवार जिसके किसी भी एक सदस्य के पास चार पहिया वाहन हो (वाणिज्यिक वाहन को छोड़कर)
-नगर निगम क्षेत्र में 1000 वर्ग फीट या नगर पालिका क्षेत्र में 1500 फीट से अधिक क्षेत्रफल में निर्मित पक्का आवासीय या व्यावसायिक मकान हो।
-ऐसे परिवार जिनके पास कुल कृषि भूमि निर्धारित सीमा से अधिक हो।
-ग्रामीण क्षेत्र का ऐसा परिवार जिसके पास ग्रामीण क्षेत्र में 2000 वर्ग फीट से अधिक क्षेत्र में पक्का मकान हो।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली से तात्पर्य-
-भारतीय खाद्य निगम द्वारा राशन की दुकानों के माध्यम से समाज के गरीब वर्गों तक खाद्यान्न वितरण सुविधा उपलब्ध करवायी जाती है। इसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली कहते हैं।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली से संबंधित मुख्य तथ्य-
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत खाद्यान्न उपलब्ध करवाने का कार्य भारतीय खाद्य निगम (FCI) द्वारा किया जाता है।
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली का उद्देश्य उपभोक्ताओं को सस्ती कीमत पर आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध कराना है।
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत उचित मूल्यों की दुकानों पर चीनी, खाद्यान्न और केरोसीन तेल को बाजार कीमत से कम कीमत पर उपलब्ध करवाया जाता है।
-निम्न पाँच वस्तुओं का वितरण किया जाता है-चावल, गेहूँ, चीनी, केरोसीन, खाद्य तेल।
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली सुदृढ़ीकरण हेतु राशन की दुकानों तथा गोदामों और थोक विक्रेताओं का डेटाबेस कंम्प्यूटरीकृत किया जा चुका है।
-राज्य में डिजीटल राशन कार्ड बनाए जा रहे हैं।
-राज्य की उचित मूल्यों की दुकानों पर POS मशीनें स्थापित कर बायोमैट्रिक सत्यापन के बाद राशन सामग्री का वितरण किया जा रहा है।
राजकॉम्प इन्फो सर्विस लिमिटेड
-POS मशीनों की खरीद एवं उचित मूल्य की दुकानों पर इन्हें स्थापित करने का कार्य राजकॉम्प इन्फो सर्विस लिमिटेड द्वारा किया जा रहा है।
राजस्थान राज्य खाद्य एव नागरिक आपूर्ति निगम लि.
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली को प्रभावी एवं सुदृढ़ बनाने हेतु राजस्थान राज्य खाद्य एव नागरिक आपूर्ति निगम लि.की स्थापना 8 दिसंबर, 2010 को की गई।
राजस्थान खाद्य आयोग
-राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत राज्य सरकार द्वारा राजस्थान खाद्य आयोग का गठन 21 मई, 2015 को किया गया।
भारतीय खाद्य निगम (FCI)
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को खाद्यान्न उपलब्ध करवाने हेतु FCI की स्थापना सन् 1965 में की गई।
-यह केंद्र सरकार की नोडल एजेन्सी है जहाँ से केंद्र सरकार द्वारा PDS हेतु अनाज की खरीद न्यनूतम समर्थन मूल्य (MSP) पर की जाती है।
न्यनूतम समर्थन मूल्य (MSP)
-वह कम से कम मूल्य जिस पर सरकार द्वारा उत्पादकों को उनके उत्पाद की खरीद का आश्वासन प्रदान किया जाता है वर्तमान में 22 फसलों के लिए MSP जारी किया जाता है।
-न्यूनतम समर्थन मूल्य की गणना कृषि मूल्य व लागत आयोग द्वारा की जाती है।
भारतीय खाद्य निगम (FCI) के कार्य
-खाद्यान्न सामग्री की खरीद, भंडारण, संग्रहण, स्थानांतरण का कार्य।
-उपभोक्ताओं को एक समान कीमत पर खाद्यान्न सामग्री उपलब्ध करवाना।
-खाद्यान्न सामग्री का बफर स्टॉक बनाकर रखना।
-किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में भारतीय खाद्य निगम (FCI) का योगदान
-उचित मूल्यों पर गरीबों की खाद्यान्न आवश्यकताओं को पूर्ण करता है।
-वैज्ञानिक भंडारण व्यवस्था निर्माण में सहायता प्राप्त होती है।
-FCI द्वारा किसानों से आवश्यक अनाज खरीद करने से अन्य देशों से खाद्यान्न आयात में कमी आई।
-FCI के पास बफर स्टॉक होने से PDS को मांग की पूर्ति करने में आसानी हुई।
-FCI द्वारा खाद्यान्न हेतु सब्सिडी प्रदान की जाती है।
नवीनीकृत सार्वजनिक वितरण प्रणाली
-जून, 1992 से प्रारंभ की गई, जिसके तहत रेगिस्तानी क्षेत्रों, जनजाति बहुल क्षेत्रों, पहाड़ी क्षेत्रों, शहरों की मलिन बस्तियों को चिह्नित किया गया।
वाधवा कमेटी
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली के कार्यों की समीक्षा करने हेतु सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश डी.पी. वाधवा की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गई, जिसने PDS को सर्वाधिक भ्रष्ट प्रणाली बताया और जिसकी सिफारिश पर लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) प्रारंभ की गई, जिससे लक्षित वर्ग तक खाद्यान्न सुविधा की उपलब्धता सुनिश्चित हो सकें।
लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली-TPDS
-1जून, 1997 से लक्षित वर्ग तक खाद्यान्नों को बेहतर तरीके से पहुँचाने हेतु TPDS शुरू की गई।
-इस प्रणाली के तहत राज्य सरकारों को गरीबी रेखा से नीचे (BPL) जीवन-यापन करने वाले लोगों का पता लगाने हेतु कहा गया।
-जिन परिवारों की वार्षिक आय 5000 रुपये से कम थी, उन्हें बीपीएल श्रेणी में रखा गया।
-प्रत्येक परिवार को 1 अप्रैल, 2002 से 35 किग्रा. खाद्यान्न प्रतिमाह देने की व्यवस्था की गई।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लाभ-
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली खुले बाजार में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रण में रखती है।
-आवश्यक वस्तुओं के सामाजिक वितरण को सुनिश्चित करती है।
-सामाजिक वितरण प्रणाली द्वारा उचित मूल्य पर पोषणयुक्त अनाज उपलब्ध कराने से कुपोषण,बच्चों एवं महिलाओं में एनिमिया, चाइल्ड अंडर वेट, चाइल्ड स्टंटींग आदि से छुटकारा पाया जा सकता है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दोष/कमियाँ
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली का सबसे बड़ा दोष यह है कि इसके द्वारा अभी तक अपेक्षित मात्रा में निरपेक्ष गरीबी को कम नहीं किया जा सका है।
-निर्धन लोग अपनी आवश्यकताओं का लगभग 25 प्रतिशत भाग ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली से कर पाते हैं।
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आपूर्ति की जाने वाली वस्तुओं की गुणवत्ता सही नहीं होना जिससे कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली का झुकाव शहरी क्षेत्रों की ओर अधिक होना।
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली में क्षेत्रीय विषमताओं का पाया जाना जैसे- PDS दक्षिण भारत में जितनी सफल रही उतना उत्तर भारत में सफल नहीं रही।
-PDS में रिसाव की समस्या का मुख्य कारण सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार है।
-केवल गेहूँ व चावल की उपलब्धता के कारण पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूर्ण करने में सफल।
-स्थायी आवास वालों को राशन कार्ड अपर्याप्त स्थायी आवास की अनुलब्धता वाले राशनकार्ड में शामिल नहीं।
-सरकारी व्यय में वृद्धि से राजकोषीय घाटे में वृद्धि होना।
-अशिक्षा व तकनीक के अभाव के कारण मापतौल में गड़बड़ी से भ्रष्टाचार की समस्या उत्पन्न होना।
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली उत्तर भारत के राजस्थान, उत्तर प्रदेश तथा बिहार आदि में ज्यादा सफल नहीं रही।
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली में मोटे अनाज (मक्का, बाजरा) पर कुल व्यय का 1% से भी कम खर्च किया जाता है जबकि गरीब जनता मोटे अनाज का ज्यादा प्रयोग करती है।
-राज्यों को निर्धारित कोटे से आधा अनाज जारी किया जाता है, जिसमें से भी लाभार्थियों तक 20% पहुँच पाता है।
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली के कारण कीमतों में वृद्धि हुई है, क्योंकि सरकार द्वारा खाद्यान्नों की वसूली कर लेने से खुले बाजार में खाद्यान्नों की पूर्ति कम हो जाती है। इस स्थिति का लाभ उठाकर व्यापारी खाद्यान्नों की कीमत बढ़ाने में सफल हो जाते हैं।
-PDS का सबसे महत्वपूर्ण दोष PDS को बनाए रखने के लिए दी जाने वाली सब्सिडी है।
-FCI अच्छी किस्म के खाद्यान्नों को खरीदकर PDS हेतु उपलब्ध करवाता है किंतु इसका बहुत बड़ा भाग खुले बाजार में चला जाता है और उचित मूल्य की दुकानों पर घटिया अनाज उपलब्ध करवाया जाता है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आने वाली समस्याएँ
-FCI की भंडारण क्षमता कम होना तथा अधिकांश खुले क्षेत्र में होने से प्राकृतिक आपदाओं से अनाज खराब होना।
-भंडारण क्षमता का वैज्ञानिक ना होना तथा वेंटीलेशन का अभाव होना।
-परिवहन लागत अधिक होना।
-भ्रष्टाचार तथा कालाबाजारी का व्याप्त होना।
-लाभार्थियों में जागरूकता की कमी होना।
-वास्तविक लक्षित गरीब व्यक्ति की पहचान न हो पाना।
-सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार के निम्न उपाय किये जा सकते हैं-
-JAM योजना को सार्वजनिक वितरण प्रणाली में लागू किया जाना चाहिए।
-(JAM-जनधन खाता, आधार कार्ड संख्या और मोबाइल नम्बर)
-लक्षित गरीब व्यक्ति की पहचान की जाये।
-PDS के लाभ गैर-निर्धनों तक पहुँचने को न्यूनतम किया जाए।
-अनिवार्य वस्तुओं की जारी कीमत तथा बाजार कीमत में अधिक अंतर होना चहिए।
-FCI गरीबों को खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराने का सबसे उचित संस्थान नहीं है।
-PDS के तहत वितरित की जाने वाली वस्तुओं के प्रकारों में वृद्धि की जाए।
-PDS में भष्टाचार को समाप्त किया जाए।
-चावल तथा गेहूँ के अलावा अन्य मदों को खाद्य सब्सिडी से बाहर कर दिया जाए।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली से संबंधित सरकार की योजनाएँ-
अन्त्योदय अन्न योजना– 2000
-योजना के तहत लाभार्थी – BPL परिवार को प्रति माह 35 किलो अनाज दो रुपये प्रति किलो के दर से उपलब्ध करवाया जा रहा है।
अन्नपूर्णा अन्न योजना– 2000
- लाभार्थी – वरिष्ठ नागरिक
लाभ–प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 10 किलो. अनाज की नि:शुल्क उपलब्धता करवायी जा रही है।
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना
COVID -19 के समय प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना चलायी गई जिसके तहत निःशुल्क अनाज की उपलब्धता करवायी जा रही है।
BAPU प्रणाली-बापू योजना
-BAPU (Biometrically Authenticated Physical Uptake) -लाभार्थी की वास्तविक पहचान हेतु यह योजना लाई गई है।
PDS सुधार मॉडल
राजस्थान मॉडल-
-P.P.P आधार पर राशन की दुकानें
ग्रामीण मिनी मॉल -
-खाद्य आपूर्ति विभाग तथा फ्युचर ग्रुप द्वारा मिलकर ग्रामीण मिनी मॉल स्थापित किये गये हैं।
-50 वस्तुओं 150 से ज्यादा प्रकार
-ऑनलाइन प्रणाली
-अन्नपूर्णा भण्डार– 31 अक्टूबर, 2019
छत्तीसगढ़ मॉडल-
-PDS में छत्तीसगढ़ राज्य का मॉडल सराहनीय है। यहाँ FPS के संचालन में सामाजिक क्षेत्र जैसे-NGO,SHG आदि का सहयोग तथा डोर स्टेप डिलीवरी आदि नवीन प्रयोग सफल रहे तथा इसी कारण छत्तीसगढ़ में PDS में रिसाव 0 प्रतिशत पाया गया।
वन नेशन वन राशनकार्ड योजना-2020
-खाद्य, सार्वजनिक वितरण व उपभोक्ता मंत्रालय के अनुसार ‘एक देश, एक राशन कार्ड’ योजना सम्पूर्ण देश में वर्ष 2021 से लागू जिसकी अवधि वर्ष 2030 तक होगी।
-भारत सरकार की एक देश, एक राशन कार्ड योजना राज्यों में कार्य कर रही सार्वजनिक वितरण प्रणाली को एक नया आयाम प्रदान करेगी।
-इस योजना के तहत आधार कार्ड की तर्ज पर हर एक राशन कार्ड को एक विशिष्ट पहचान नम्बर दिया जायेगा जिससे फर्जी राशन कार्ड बनाना मुश्किल हो जायेगा।
-इस कार्ड को ऑनलाइन सिस्टम करने का लाभ यह होगा कि कोई भी लाभार्थी देश के किसी भी हिस्से में और किसी भी राशन की दुकान पर सब्सिडी वाला अनाज ले सकेंगे।
POS मशीन -point of sale
-वर्तमान में राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, झारखंड और त्रिपुरा ऐसे 10 राज्य है जहां खाद्य वितरण का 100 प्रतिशत कार्य point of sale मशीनों के द्वारा हो रहा है। साथ ही इन राज्यो में सार्वजनिक वितरण की सभी दुकानों को इंटरनेट से जोड़ा जा चुका है।