भारतीय कृषि
प्रमुख फसलें और मौसम- भारत में मोटे तौर पर तीन प्रकार की फसलें होती हैं-
कृषि प्रकार :
फसल चक्र के आधार पर:-रबी, खरीफ, जायद
फसल उपयोग के आधार पर:-खाद्यान्न फसल, व्यापारिक फसल
- प्रकिया के आधार पर:- शुष्क कृषि, तर कृषि, झूमिंग कृषि, समोच्य रेखीय, सीढ़ीदार कृषि, रिले क्रॉपिंग, विस्तृत कृषि, गहन कृषि, जैविक कृषि।
- शुष्क कृषि- उन फसलों का उत्पादन करना जिनके लिए जल की आवश्यकता कम होती है जैसे बाजरा।
- तर कृषि- जल की अधिक उपलब्धता वाले क्षेत्रों में उन फसलों का उत्पादन करना जिन्हें जल की अधिक आवश्यकता होती है जैसे चावल, जूट।
मिश्रित कृषि (Mixed Agriculture):-
- शुष्क तथा अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में कृषि आय को बढ़ाने के लिए कृषि के साथ-साथ पशुपालन के कार्य भी किए जाते हैं, अर्थात् जब कृषि तथा पशुपालन एक साथ किए जाए मिश्रित कृषि कहलाती है।
सीढ़ीदार कृषि (Strip agriculture)
- पहाड़ी ढलान के विपरीत दिशा में मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए सीढ़ीदार आकृति बनाकर कृषि कार्य करना।
समोच्चय रेखीय कृषि (Counter Framing):-
- पहाड़ी ढलान के विपरीत दिशा में मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए समान उँचाई पर पेड़ों की कतार लगाकर किए जाने वाले कृषि कार्य।
गहन कृषि:-
- भूमि उपलब्धता कम एवं जन आधिक्य छोटी कृषि जोतों पर अधिक मानवीय श्रम की सहायता से किए जाने वाले कृषि कार्य
विस्तृत कृषि:-
- भूमि की अधिक उपलब्धता एवं जनसंख्या कम बड़े-बड़े कृषि फार्मों पर अधिक मशीनीकरण की सहायता से किए जाने वाले कृषि कार्य
झूमिंग/स्थानान्तरित कृषि (slash and bran agri):
- आदिवासी क्षेत्रों में जंगलों को जलाकर या काटकर प्राप्त किए गए कृषि क्षेत्रों को बदल-बदल कर किए जाने वाले कृषि कार्य
- रिले क्रॉपिंग:- कृषि क्षेत्रों पर 1 वर्ष में एक साथ 3-4 फसलों के उत्पादन के कार्य रिलें क्रॉपिंग कहलाते हैं।
- ट्रक फार्मिंग:- फार्म- परिवहन- बाजार
फल तथा सब्जियों के उत्पादन में परिवहन साधनों का अधिक महत्त्व होता है अत: इस प्रकार उत्पादन कार्यों को ट्रक फार्मिंग कहा जाता है।
संविदा कृषि (Contract farming):-
- किसान/उत्पादक- उत्पादन की अनिश्चितता, विपणन व्यवस्था का अभाव, निवेश की कमी, आय स्तर कम, श्रहबों से ग्रसित, मूल्यों की अनिश्चितता
- कम्पनी- खरीद आवश्यकता के अनुसार- किसान तथा कृषि उत्पादों की खरीद करने वाली कम्पनी के मध्य हुए निर्धारित समझौते के अनुसार किसानों द्वारा अपनी भूमि पर कम्पनी की मांग के अनुसार किए जाने वाले कृषि कार्य संविदा कृषि कहलाते हैं।
जैविक कृषि (organic agri) zero budget natural farming
लागत (input):- भूमि, सिंचाई, बीज, उर्वरक, कीटनाशक, श्रम
कृषि:- श्रदण ग्रस्त, लवणीकरण, रेह, बंजर
उत्पाद(output):- आय कम, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा लायक नहीं
जैविक खेती/organic farming:- दीर्घकालीन व स्थिर उपज प्राप्त करने के लिए हाइब्रिड बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, खरपतवार नाशी, आदि का उपयोग ना करते हुए, जैविक खाद, कम्पोस्ट या हरित खाद का प्रयोग करके किए जाने वाले कृषि कार्य जैविक खेती/zero budget natural farmimng.
लाभ:-
1. किसान की लागत में कमी
2. भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि- दीर्घकालीन कृषि
3. सिंचाई की कम आवश्यकता
4. बाजार मांग- किसान आय में वृद्धि
5. स्वास्थ्यवर्धक व पोषक तत्त्वों की उपलब्धता के कारण पोषण-
सुरक्षा प्राप्त होती हैं।
मिट्टी:-
- मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि
- मिट्टी की जलधारण करने की क्षमता में वृद्धि
पर्यावरण:-
- भू-जल स्तर मे वृद्धि
- जल प्रदूषण में कमी
व्यापारिक फसलें (Commercial Crops)-
भारत में प्रमुख फसलों का उत्पादन :
- केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ), सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय आय के अनुमानों के अनुसार कृषि और संबद्ध क्षेत्र वर्ष 2018- 19 के दौरान चालू मूल्यों पर भारत के सकल मूल्य वर्धन जीवीए (GVA) में लगभग 17.1 प्रतिशत का योगदान दिया।
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क्षेत्र |
वर्ष |
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2014-15 |
2015-16 |
2016-17 |
2017-18@ |
2018-19** |
2019-20*** |
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कुल जीवीए की प्रतिशतता |
18.2% |
17.7% |
18.0% |
18% |
17.1% |
17.8% |
स्त्रोत : केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, भारत सरकार
- @31 जनवरी, 2019 को जारी वर्ष 2017-18 के लिए राष्ट्रीय आय, उपभोग व्यय बचत और पूँजी निर्माण के प्रथम संशोधित अनुमानों के अनुसार
- ** 31 मई, 2019 को सीएसओ द्वारा जारी राष्ट्रीय आय वर्ष 2018-19 के दूसरे अग्रिम अनुमानों के संबंध में 2018-19 की चौथी तिमाही के लिए सकल घरेलू उत्पादन के चौमाही अनुमानों पर जारी प्रेस नोट के अनुसार।
- *** 7 जनवरी, 2020 को सीएसओ द्वारा जारी राष्ट्रीय आय 2019-20 के अग्रिम अनुमानों के अनुसार
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भारत में प्रमुख फसलों का उत्पादन (मिलियन टन) |
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फसल |
2017-18 (अंतिम) |
2018-19 (अंतिम) |
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चावल |
112.8 |
116.4 |
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गेहूँ |
99.9 |
102.2 |
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मोटे अनाज |
47.0 |
42.9 |
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दलहन |
25.4 |
23.4 |
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अनाज |
285.0 |
284.9 |
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तिलहन |
31.5 |
32.3 |
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गन्ना |
379.9 |
400.2 |
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कपास |
32.8 |
28.7 |
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पटसन और मेस्टा |
10.0 |
9.8 |
प्रमुख कृषि उत्पाद बोर्ड
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प्रमुख कृषि उत्पाद बोर्ड |
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निकाय |
मुख्यालय |
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चाय बोर्ड |
कोलकाता (प. बंगाल) |
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कॉफी बोर्ड |
बेंगलुरु (कर्नाटक) |
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तम्बाकू बोर्ड |
गुंटूर (आन्ध्र प्रदेश) |
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रबड़ बोर्ड |
कोट्टयम (केरल) |
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मसाला बोर्ड |
कोच्चि (केरल) |
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राष्ट्रीय माँस और पॉल्ट्री प्रसंस्करण |
दिल्ली |
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भारतीय अंगूर प्रसंस्करण बोर्ड |
पुणे (महाराष्ट्र) |
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राष्ट्रीय जूट बोर्ड |
कोलकात्ता (प. बंगाल) |
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राष्ट्रीय मत्स्य विभाग बोर्ड |
हैदराबाद (तेलंगाना) |
पशुपालन व दूध उत्पादन (2020-21)
भारतीय अर्थव्यवस्था मे कृषि का एक महत्वपूर्ण उपक्षेत्र हैं। पशुपालन का योगदान जीवीए में निरंतर कीमत पर 24.32% 2014-15 से बढ़कर 28.63% 2018-19 हो गया है। पशुपालन उद्योग ने वर्ष 2018-19 मे कुल जीवीए मे 4.2% योगदान दिया।
दूध उत्पादन के मामले मे भारत सम्पूर्ण विश्व में पहले स्थान पर है। देश मे दूध का उत्पादन वर्ष 2014-15 के 146.3 मिलियन टन से बढ़ कर वर्ष 2019-20 मे 198.4 मिलियन तब हो गया है । (2019-20 के आँकड़े अस्थायी है अर्थात अग्रिम आँकड़े )
ये आँकड़े राष्टीय डेयरी बोर्ड और डीएएचडी द्वारा दिए गए है।
वर्ष 2019-20 के दौरान दूध उत्पादन मे 5.68% की वृद्धि हुई है।
वर्ष 2019-20 मे प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 407 ग्राम प्रतिदिन थी।
पशुपालन अवसंरचना विकास निधि (एएचआईडीएफ) आत्मनिर्भर भारत अभियान प्रोत्साहन पैकेज के हिस्से के रूप में, सरकार ने 15000 करोड़ रुपये का एक पशुपालन अवसंरचना विकास् निधि (एएचआईडीएफ) गठित किया है।
पशुपालन अवसंरचना विकास् निधि (एएचआईडीएफ)
1. डेयरी प्रसंस्करण और वैल्यू एडीशन इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करने
2. मांस के प्रसंस्करण और वैल्यू एडीशन इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करने पशुओं के लिए चारा उत्पादन संयंत्र स्थापित करने के लिए निवेश करने वाले निजी उद्यमियों ,निजी कंपनियों ,एमएसएमई ,किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ ) सहित एमएसएमई को प्रोत्साहित करेगी।
राष्टीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम
इसका लक्ष्य मवेशियों ,भैंस ,बकरी तथा सूअरों का टीकाकरण सुनिश्चित करते हुए पैर और मुंह की बीमारी (एफएमड़ी ) और ब्रसेलोसिस को नियंत्रण करना है।
मत्स्यपालन –
मछली उत्पादन के मामले मे विश्व मे भारत का दूसरा स्थान हैं और वैश्विक उत्पादन मे इसका योगदान 7.58% है। वर्ष 2019-20 में भारत मे अभी तक सबसे अधिक मछली उत्पादन 14.16 मिलियन टन दर्ज किया गया। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में मत्स्य पालन उद्योग कुल राष्ट्रीय जीवीए के 1.24% तथा कृषि जीवीए के 7.28% के बराबर योगदान देती है।
वर्ष 2019-20 के दौरान 12.9 लाख मिट्रिक टन समुद्री उत्पादों का निर्यात किया गया जिनकी कीमत 46662 करोड़ थी।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमसवाई) के माध्यम से मछुआरों के लिए 20000 करोड़ रूपये । इसका उदेश्य मछली पकड़ने के लिए बंदरगाह , कोल्ड चेन , बाजार इत्यादि जैसे अवसंरचनाओं को विकसित करके समुद्री और अन्तर्देशीय मत्स्य पालन का एकीकृत ,सतत और समावेशी विकाश करना है।
भूमि सुधार :-
- भारत में भूमि सुधार पर आधिकारिक स्वरूप एवं प्रभाव की स्थिति में परिवर्तन लाने के लिए कई कदम उठाए गए।
- सरकार द्वारा तीन मुख्य कदम उठाए गए।
मध्यस्थों की समाप्ति
– इससे लंबे अरसे से चली आ रही, जमींदारी, महालवाड़ी और रैय्यतवाड़ी व्यवस्थाओं को समाप्त कर दिया।
काश्तकारी सुधार
- लगान का नियमन : जोतदारों के द्वारा भूमि मालिक को दिए जाने वाले लगान की एक दर नियत कर दी गई।
- बटाईदारों के हितों की रक्षा करना : जमीन जोतने वाले (बटाईदार) का जोत का अधिकार सुरक्षित रहें।
- काश्तकारों को स्वामित्व का अधिकार
कृषि का पुनर्गठन
- भूमि का पुनर्वितरण : हदबंदी कानून लागू कर भूमिहीन गरीब लोगों के बीच भूमि का पुन:वितरण
- पश्चिम बंगाल, केरल तथा आंध्र प्रदेश के कुछ भागों में विफल रहीं।
भूमि की चकबंदी
- व्यक्तिगत खेती के टुकड़ों में विभक्त होने से रोका एवं संचायित किया जाता है तथा किसी ग्राम की समस्त भूमि को और कृषकों के बिखरे हुए भूमि खंडों को एक पृथक् क्षेत्र में पुनर्नियोजित किया जाता है।
- सहकारी कृषि :- इस कृषि का सामाजिक, आर्थिक तथा नैतिक आधार था तथा इसका उपयोग बड़े किसानों द्वारा हदबंदी कानून से अपनी भूमि को बचाने के लिए किया गया।
भारत में कृषि क्षेत्र से जुड़ी प्रमुख क्रांतियाँ-
हरित क्रांति
हरित क्रांति संज्ञा- विलियम गौड़
हरित क्रांति की परिभाषा:- उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशी खरपतवार नाशी सिंचाई व मशीनीकरण के उपयोग से कृषि उत्पादन में वृद्धि की प्रक्रिया हरित क्रांति कहलाती है।
प्रभावित फसलें- गेहूँ, चावल
लाभांवित क्षेत्र- पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश
कारक- उच्च गुणवत्ता वाले बीज, रासायनिक उर्वरक, पूँजी, सिंचाई, मशीनीकरण।
आजादी के बाद भी देश के पास कई बड़ी चुनौतियाँ थी-
- सबसे बड़ी चुनौती – खाद्यान्न संकट – खाद्यान्न की भारी कमी से देश जूझ रहा था।
- 1960 के दशक में कृषि में कुछ नए तकलीफों की शुरुआत की गई, जो विश्वभर में हरित क्रांति के नाम से प्रसिद्ध है।
- बंगाल में भीषण अकाल के कारण 20 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई थी- जिसका कारण कृषि के औपनिवेशिक शासन की कमजोर नीतियाँ थी।
- उस समय देश में लगभग 10% हिस्से में ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध थी।
- 1960 में देश ने विदेशी देशों से हाईब्रिड प्रजाति के बीजों का आयात हुआ जिन्हें High Yielding Varities वाले बीज कहा गया।
- सबसे पहले 7 जिलों में इसका प्रयोग हुआ, बाद में पूरे देश में हरित क्रांति को औपचारिक तौर पर अपनाया गया।
- कृषि उत्पादन को बढ़ावा, अनाज उगाने के लिए HYV बीजों का प्रयोग बढ़ाने के लिए हरित क्रांति को जाना जाता है।
- प्रारंभ में HYV का प्रयोग गेहूँ, चावल, बाजरा, ज्वार व मक्का में किया गया।
हरित क्रांति के घटक
1. उन्नत किस्म के बीज (HYV’s)
2. रासायनिक उर्वरक सिंचाई
3. सिंचाई
4. रासायनिक कीटनाशक तथा जीवाणुनाशी का उपयोग सुनिश्चित उपज के लिए आवश्यक था।
5. साख भंडारण विपणन और वितरण
प्रभाव
सकारात्मक प्रभाव-
- खाद्य सुरक्षा की उपलब्धता
- राष्ट्रीय आय में वृद्धि
- खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता
- किसानों के जीवन में सुधार
- रोजगार में कृषि
- कच्चे माल की उपलब्धता के कारण कृषि आधारित उद्योग में वृद्धि
नकारात्मक प्रभाव-
- केवल गेहूँ तथा चावल फसलें लाभांवित
- अन्य पर नकारात्मक प्रभाव केवल बड़े किसानों द्वारा रहित क्रांति के लाभों की प्राप्ति, अर्थात् कृषि में क्षेत्रीय विषमता बढ़ी किसान की लागत में वृद्धि, जिससे किसानों की ऋण ग्रस्तता में वृद्धि
- अधिक रासायनिक उवर्रक उपयोग से भूमि बंजर हो रही है।
- सिंचाई हेतु जल की अधिक मांग
- भूजल स्तर में गिरावट
- जलप्रदूषण की समस्या
- कृषि व्यवसायीकरण के कारण मूल्यों में गिरावट
अन्य क्रांति
द्वितीय हरित क्रांति (एवर ग्रीन रिवोल्यूशन) 2006
प्रणेता- एम.एस.स्वामीनाथन, ए.पी.जे अब्दुल कलाम
उद्देश्य-
- लैण्ड-टु लेब एप्रोच
- कृषि में वित्तीय सुविधा उपलब्ध कराना
- जैविक खेती का विकास
- पर्यावरण तथा जल संसाधनों का संरक्षण
- नियत समय में कृषि उत्पादन को दुगुना करना
श्वेत क्रांति या ऑपरेशन फ्लड-
रजत क्रांति
भूरी क्रांति
गुलाबी क्रांति
नीली क्रांति
लाल क्रांति
पीली क्रांति
सुनहरी क्रांति
ब्लैक क्रांति
गोल क्रांति
बादामी क्रांति
इंद्रधनुषी क्रांति
कृषि विकास हेतु कार्यरत विभिन्न संगठन/ नीतियाँ / विधेयक
भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास परिसंघ
(Tribal Co-operative Marketing Development Fedration of India Ltd. - TRIFED)
राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ
(National Agriculture Co-operative Marketing Fedration of India Ltd.- NAFED)
केन्द्रीय भण्डारण निगम
(Central Warehousing Corporation)
कृषि निर्यात क्षेत्र (Agriculture Export Zone- AEZ)
कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद-निर्यात विकास प्राधिकरण (Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority -APEDA)
कृषि स्थिरीकरण कोष की स्थापना-
कृषि सेवा केन्द्र
राष्ट्रीय कृषि नीति, 2000
प्रमुख उद्देश्य
प्रमुख लक्ष्य
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, 2007
प्रमुख उद्देश्य
राष्ट्रीय कृषक नीति, 2007
प्रमुख उद्देश्य
न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था- न्यूनतम समर्थन मूल्य वह मूल्य है जिस पर सरकार किसानों को फसल खरीदने की गारंटी प्रदान करती है। यह बुवाई से पूर्व घोषित किया जाता है। सरकार द्वारा 24 फसलों व गन्ना के लिए MPS की घोषणा की जाती है। कृषि फसलों के लिए MPS की घोषणा कृषि लागत एवं मूल्य आयोग CACP की सलाह पर मंत्रिमंडलीय समिति द्वारा की जाती है।
कृषि निर्यात नीति-2018
प्रमुख उद्देश्य :
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (National Food Security Mission)
1. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन- धान
2. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन- गेहूँ
3. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन- दलहन
मिशन के उद्देश्य
वर्तमान परिदृश्य
किसान कॉल सेन्टर
कृषि चैनल
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पी एम-किसान)
खाद्य सुरक्षा विधेयक (Food Security Bill)
1. प्राथमिकता परिवार
2. सामान्य परिवार।
राष्ट्रीय बाँस मिशन-
क्रॉप एग्रीकल्चर प्रोड्यूज लॉन स्कीम (CAPL)-
किसान क्रेडिट कार्ड (KCC)-
नाबार्ड-
APMC Act, 2003 – कृषि उत्पाद विपणन समिति अधिनियम, 2003
- कृषि मंत्रालय (भारत सरकार) ने आदर्श एपीएमसी कानून, 2003 को बनाया। और राज्य सरकारों की अनुमति दी वह अपने हिसाब से कानून में बदलाव कर सकती हैं-
APMC Act के तहत-
- किसान अपनी कृषि उपज को सीधे ठेके पर कृषि प्रायोजकों को बचे सकते हैं।
- निजी व्यक्तियों, किसानों और उपभोक्ताओं को कृषि उत्पादों के लिए नए बाजार के निर्माण की अनुमति देना।
- APMC के जरिए कमाए गए राजस्व से बाजार के आधारभूत क्षेत्रों का निर्माण करना।
- प्रभावी विपणन सरंचना का विकास
- प्रथम बिक्री कृषि मंडियों ने ही।
- बाजार में मध्यवर्ती संस्थाओं के समान पंजीकरण की अनुमति देकर कृषि उत्पाद के बाजार ने प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देना।
फसल बीमा –
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (13 जनवरी 2016 ) एक दूरदर्शी अभियान है और इसका लक्ष्य सम्पूर्ण देश मे किसानों को न्यूनतम समान प्रीमियम पर समग्र जोखिम समाधान उपलब्ध कराना हैं। किसानों के लिए जोखिम के सग्रम समाधान की प्रक्रिया के रूप मे , यह योजना बुआई से पहले , कटाई के बाद- बुआई रुकने से होने वाली हानी और बीच मौसम के प्रतिकूलताओं सहित फसल चक्र के दौरान कवरेज उपलब्ध करती है।
वर्तमान मुद्दे-
किसान अधिनियम :-
- केन्द्र सरकार ने तीन नये कृषि बिलों को पारित किया।
- किसान उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक/Farmers’ Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Bill
- किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) विधेयक मूल्य आश्वासन / Farmers (Empowerment and Protection) Agreement on Price Assurance
- सेवा विधेयक और आवश्यक वस्तुएँ (संशोधन) विधेयक/ Services Bill and Essential Commodities (Amendment) Bill
- सरकार का दावा है कि कृषि क्षेत्र को बदल देंगे और किसानों की आय बढ़ाएंगे। केन्द्र ने 2022 तक किसानों की आय को दुगुना करने का वादा किया था। यह बिल कहता है कि किसानों को सरकार द्वारा नियंत्रित बाजारों से स्वतंत्र कर देंगे और उन्हें उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाएंगे।
- बिलों में एक प्रणाली बनाने का प्रस्ताव है जहाँ किसान और व्यापारी "मंडियों के बाहर उत्पाद बेच और खरीद सकते हैं"। वे अंतर-राज्य व्यापार को प्रोत्साहित करते हैं और परिवहन लागत को कम करने का प्रस्ताव करते हैं।
- विधेयकों ने समझौतों पर एक रूपरेखा तैयार की है जो किसानों को कृषि प्रौद्योगिकी कंपनियों, निर्यातकों और खुदरा विक्रेताओं के साथ जुड़ने के लिए सक्षम बनाता है, जबकि आधुनिक तकनीक के लिए किसान पहुँच प्रदान करते हुए सेवाओं और उपज की बिक्री करता है।
- पाँच हेक्टेयर से कम भूमि वाले छोटे और सीमांत किसानों के लिए लाभ प्रदान करते हैं। बिल आवश्यक वस्तुओं की सूची से अनाज और दालों जैसी वस्तुओं को हटाने के लिए भी प्रदान करते हैं और एफडीआई को आकर्षित करते हैं।
किसानों की चिंताएँ :
- किसान अपनी उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य प्राप्त करने को लेकर आशंकित हैं। अन्य चिंताओं में कृषि-व्यवसायों और बड़े खुदरा विक्रेताओं की बातचीत में ऊपरी हाथ शामिल हैं, जिससे किसानों को नुकसान हो रहा है। कंपनियों से छोटे किसानों के लिए लाभ उनके साथ प्रायोजकों की कमाई को कम करने की संभावना है। किसानों को यह भी डर है कि कंपनियाँ वस्तुओं की कीमतें निर्धारित कर सकती हैं।
सहकारी संघवाद को बढ़ावा :
- चूंकि कृषि और बाजार राज्य विषय हैं - सूची 14 में क्रमशः 14 और 28 में दर्ज - अध्यादेशों को राज्यों के कार्यों और संविधान में निहित सहकारी संघवाद की भावना के खिलाफ प्रत्यक्ष अतिक्रमण के रूप में देखा जा रहा है। हालाँकि, केंद्र ने तर्क दिया कि खाद्य पदार्थों में व्यापार और वाणिज्य समवर्ती सूची का हिस्सा है, इस प्रकार यह संवैधानिक स्वामित्व प्रदान करता है।
न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP के लिए अंत?
- किसानों का उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश किसानों के लिए अधिसूचित कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) मंडियों के बाहर कृषि बिक्री और विपणन खोलने का लक्ष्य रखता है, यह कृषि उपज के लिए अंतर-राज्य व्यापार के लिए बाधाओं को दूर करता है और इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग के लिए एक ढाँचा प्रदान करता है। यह राज्य सरकारों को एपीएमसी बाजारों के बाहर व्यापार शुल्क, उपकर या लेवी एकत्र करने से रोकता है।
- पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार, APMC किसानों की उपज की प्रभावी खोज के लिए खरीददारों और विक्रेताओं के बीच उचित व्यापार सुनिश्चित करने के उद्देश्य से स्थापित किए गए थे। MSP खरीदारों, कमीशन एजेंटों और निजी बाजारों को लाइसेंस प्रदान करके किसानों की उपज के व्यापार को विनियमित कर सकता है; इस तरह के व्यापार पर लेवी बाजार शुल्क या कोई अन्य शुल्क; और व्यापार को सुविधाजनक बनाने के लिए अपने बाजारों के भीतर आवश्यक बुनियादी ढाँचा प्रदान करते हैं।
- आलोचक MSP के एकाधिकार के विघटन को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खाद्यान्न की सुनिश्चित खरीद को समाप्त करने के संकेत के रूप में देखते हैं। केंद्र के "एक राष्ट्र, एक बाजार/ One Nation, One Market" के लिए, आलोचकों ने "एक राष्ट्र, एक एमएसपी / One Nation, One MSP" मांगा है।
मूल्य निर्धारण के लिए कोई तंत्र नहीं होगा
- मूल्य आश्वासन विधेयक, मूल्य शोषण के खिलाफ किसानों को सुरक्षा प्रदान करते हुए, मूल्य निर्धारण के लिए तंत्र को निर्धारित नहीं करता है। ऐसी आशंका है कि निजी कॉर्पोरेट घरानों को दिए जाने वाले फ्री हैंड से किसान का शोषण हो सकता है।
- कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग देश के किसानों के लिए एक नई अवधारणा नहीं है। अन्न, अनाज और कुक्कुट क्षेत्रों में औपचारिक अनुबंधों के लिए अनौपचारिक अनुबंध आम हैं। खेत क्षेत्र की असंगठित प्रकृति और निजी कॉर्पोरेट संस्थाओं के साथ कानूनी लड़ाई के लिए संसाधनों की कमी के कारण औपचारिक दायित्वों के बारे में आलोचक आशंकित हैं।
खाद्य पदार्थों का अपव्यय बढ़ावा:
- आवश्यक वस्तुएँ (संशोधन) अध्यादेश आवश्यक वस्तुओं की सूची से अनाज, दालें, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू को हटा देगा। संशोधन इन खाद्य वस्तुओं के उत्पादन, भंडारण, संचलन और वितरण को निष्क्रिय कर देगा। केंद्र सरकार को युद्ध, अकाल, असाधारण मूल्य वृद्धि और प्राकृतिक आपदा के दौरान आपूर्ति के विनियमन की अनुमति है, जबकि ऐसे समय में निर्यातकों और प्रोसेसर के लिए छूट प्रदान करते हैं।
- अध्यादेश के लिए आवश्यक है कि कृषि उपज पर किसी भी स्टॉक सीमा को लागू करना मूल्य वृद्धि पर आधारित होना चाहिए। स्टॉक सीमा केवल तभी लगाई जा सकती है जब बागवानी उत्पादों के खुदरा मूल्य में 100% की वृद्धि हो; पीआरएस के अनुसार गैर-खराब कृषि खाद्य पदार्थों के खुदरा मूल्य में 50% की वृद्धि हो जाएगी।,
विश्व व्यापार संगठन और भारतीय कृषि
- 1954 में विश्व व्यापार समझौता लागू किया गया। इस समझौते से कृषि क्षेत्र में निवेश और व्यापार के नये रास्ते वैश्विक स्तर पर खुले।
- इस समझौते का मुख्य उद्देश्य कृषि क्षेत्र को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना तथा व्यापार व उत्पाद का निजीकरण था।
- WTO का कहना था कि यदि कोई देश अपने सुरक्षित अन्न भंडार की सीमा को हटा दे, तो विश्व व्यापार किसानों को विनियोजित बाजार से उनके उत्पादनों को बेहतर मूल्य तथा अधिक लाभ दिखाने की दिशा मे आगे बढ़ेगा।
- बाजार की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से उपभोक्ताओं को सस्ते मूल्य पर खाद्य सामग्रियाँ मिलेगी।
- कृषि क्षेत्र में विश्व व्यापार समझौते का प्रभाव
- विकसित देशों के किसानों की व्यक्तिगत उत्पादन लागत कम होने के कारण वे कम कीमत पर अपने उत्पादों को बेचकर भी मुनाफा कमा रहे थे, जबकि भारतीय किसान अपनी अत्यधिक कृषि लागत और कम बाजार भाव के कारण कर्जदार होकर आत्महत्या करने को मजबूर थे।
- कृषि सब्सिडी जो विश्व व्यापार संगठन द्वारा दी जाती थी उससे विकसित देशों के किसानों को भारी सहायता मिली।
2020 – 21 का बजट
कृषि
- MSP की व्यवस्था में सभी प्रकार की जिंसों के मामले में उत्पादन लागत 1.5 गुना कीमत मिलेगी।
- वर्ष के शुरू में स्वामित्व स्कीम प्रारंभ की गई जिसके अंतर्गत गाँवों में संपत्तियों के मालिकों को अधिकार के दस्तावेज दिए जा रहे हैं। वर्ष 2021- 22 से इस योजना को सभी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों में लागू किया जाएगा।
- किसानों को पर्याप्त ऋण सुलभ कराने के लिए वर्ष 2020 में कृषि ऋण के लक्ष्य को बढ़ाकर 16.5 लाख करोड़ रुपये कर दिया है।
- ग्रामीण अवसंरचना विकास कोष को 40,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
- नाबार्ड के अंतर्गत 10,000 करोड़ रुपये से एक Micro Irrigation Fund स्थापित किया जाएगा।
- कृषि और संबंध उत्पादों के मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देने और उसके निर्यात को बढ़ाने के लिए ‘ऑपरेशन ग्रीन स्कीम’ के दायरे में टमाटर, प्याज और आलू के अलावा खराब होने वाले 22 और उत्पादों को शामिल किया जाएगा।
- E-Nam से जो पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा आयी है उसको ध्यान में रखते हुए 1000 और मंडियों को E-Nam के अंतर्गत लाया जाएगा।
- APMC कृषि अवसंरचना कोष की सुविधा प्रदान की जाएगी जिससे किसान अपनी बुनियादी सुविधाओं में वृद्धि कर सकेंगे।