राजस्थान कृषि
(Agriculture)

-राजस्थान की अर्थव्यवस्था प्रमुखत: कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है। राजस्थान में कुल क्षेत्रफल के लगभग 55-60 प्रतिशत भाग पर कृषि की जाती है लेकिन राज्य का कुल कृषि क्षेत्रफल के लगभग 30 प्रतिशत भाग पर ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। शेष भाग पर कृषि मानसून के भरोसे रहती है। इसलिए कृषि को “मानसून का जुआ” भी कहा जाता है।

राजस्थान की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान

1. राजस्थान देश में सरसों, चना एवं बाजरा के उत्पादन में प्रथम स्थान रखता है।

2. राज्य में कृषि गणना आँकड़ों (2015-16) के अनुसार 2010-11 की तुलना में राज्य में कृषि जोतों की संख्या में 11.14 प्रतिशत की वृद्धि होने के कारण भूमि जोतों के औसत आकार में 11.07 प्रतिशत की कमी आयी है।

3. वर्ष 2020-21 में प्रचलित मूल्यों पर सकल राज्य मूल्यवर्धन में कृषि क्षेत्र का योगदान 29.77 प्रतिशत है।

4. प्रारम्भिक पूर्वानुमान के अनुसार राज्य में वर्ष 2020-21 में खाद्यान्न का कुल उत्पादन 271.33 लाख मैट्रिक टन होने की संभावना है, जो कि गत वर्ष के 265.81 लाख मैट्रिक टन की तुलना में 2.08 प्रतिशत अधिक है।

5. राज्य में कृषि क्षेत्र सबसे बड़ा रोजगार प्रदात्ता है। कृषि क्षेत्र के द्वारा राज्य की लगभग 58 प्रतिशत जनसंख्या को रोजगार प्रदान किया जाता है।

6. भू-उपयोग सांख्यिकी 2018-19 के अनुसार राज्य में 51.85 प्रतिशत शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल है। 11.04 प्रतिशत क्षेत्र बंजर भूमि है। वहीं, लगभग 8.05 प्रतिशत क्षेत्र वानिकी के अंतर्गत है।

राजस्थान में कृषि की प्रमुख विशेषताएँ :

1राज्य में कृषि मानसून पर आधारित है अत: मानसून की सक्रियता और निष्क्रियता का कृषि पर प्रभाव पड़ता है।

2. राजस्थान में उगायी जाने वाली रबी की फसलों में – गेहूँ, सरसों, जौ, चना, तारामीरा इत्यादि हैं तथा खरीफ की फसलों में - बाजरा, ज्वार, ग्वार, मूंग, उड़द, सोयाबीन, मूंगफली इत्यादि प्रमुख हैं। जायद की फसलों में - खीरा, तरबूज, ककड़ी, खरबूजा व हरी सब्जियाँ इत्यादि।

3. राज्य में लगभग 52 प्रतिशत भाग पर कृषि की जाती है। जिसमें से मात्र 30 प्रतिशत भाग ही सिंचित क्षेत्र है।

4. भारत के कुल कृषिगत क्षेत्रफल का लगभग 11 प्रतिशत राजस्थान में हैं, लेकिन सतही जल की उपलब्धता देश की मात्र 1.16 प्रतिशत ही है।

5. राज्य में भू-जल की स्थिति भी बहुत विषम है। साथ ही इसमें पिछले दो दशकों में तेजी से गिरावट आयी है। राज्य के 249 खंडों में से अधिकांश डार्क जॉन में हैं। तथा केवल 40 खंड ही सुरक्षित श्रेणी में हैं। यद्यपि पिछले वर्षों में मुख्यमंत्री स्वावलंबन अभियान के कारण इसमें कुछ सुधार देखा गया है।

6.राजस्थान में कृषि प्राथमिक रूप से वर्षा पर निर्भर है एवं सिंचाई की सुविधाओं में कमी के कारण प्रति हैक्टेयर उत्पादकता काफी कम रहती है।

7.राज्य में सिंचाई के प्रमुख स्रोत कुएँ, नलकूप, नहर और तालाब हैं, जिसमें सर्वाधिक प्रतिशत क्षेत्र कुओं व नलकूपों का है।

8.राज्य में प्रतिव्यक्ति स्त्रोत के आकार में निरंतर गिरावट आयी है।

राज्य की प्रमुख कृषि फसलें :

1.खरीफ फसलें खरीफ का मौसम राजस्थान में चौमासा एवं सियालु कहा जाता है।

-राज्य में ये फसलें जून-जुलाई में बोई जाती हैं तथा सितम्बर, अक्टूबर में काटी जाती है। मुख्य खरीफ फसलें - ज्वार, बाजरा, चावल, मक्का, मूँग, उड़द, अरहर, मोठ, मूँगफली, अरण्डी, तिल, सोयाबीन, कपास, गन्ना, ग्वार आदि।-राज्य में खरीफ की 90 फसलें बारानी क्षेत्र पर बोई जाती हैं, जो पूर्णत: वर्षा पर निर्भर होती है।

-खाद्यान्नों में बाजरे का कृषित क्षेत्रफल सर्वाधिक है।

2. रबी फसलें - इन्हें उनालु/सियालु भी कहा जाता है।

-ये फसलें अक्टूबर-नवम्बर में बोकर मार्च-अप्रैल में काट ली जाती है।

-मुख्य रबी फसलें - गेहूँ, जौ, चना, मटर, सरसों, अलसी, तारामीरा, सूरजमुखी, धनियाँ, जीरा, मेथी आदि है।

3.जायद फसलें - इन फसलों को मार्च–अप्रैल से  मध्य जून तक उगाया जाता हैं।

-राज्य में जायद फसलों की कृषि जल की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में की जाती हैं।

-मुख्य जायद फसलें - तरबूज, खरबूजा, ककड़ी, सब्जियाँ इत्यादि।

कृषि के प्रकार :

1. शुष्क कृषि (Dry Farming) – सिंचाई के अभाव के कारण रेगिस्तान के कई भागों में शुष्क कृषि की जाती है। जिससे जमीन में नमी का संरक्षण हो सके।

-Drip System व फव्वारा System (Spray)

-इजरायल के सहयोग से शुष्क कृषि राजस्थान में की जाती है।

2.सिंचित कृषि (Irrigated Farming) ऐसी जगह जहाँ पानी की प्राप्त मात्रा उपलब्ध हो और वहीं फसलें बोई जाती है जिनकों पानी की अधिक आवश्यकता हो।

3.मिश्रित कृषि जहाँ कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी किया जाता है, उसे मिश्रित कृषि क्षेत्र कहते हैं।

4.मिश्रित खेती दो या दो से अधिक फसलें  एक साथ बोई जाये, उसे मिश्रित खेती कहते हैं।

5. वालरा कृषि (Zooming Agriculture):  वृक्षों को जलाकर उसकी राख को खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है।

-इसे वालरा, चिमाता या दजिया खेती भी कहते हैं।

-उदयपुर, डूँगरपुर, बाराँ में वालरा कृषि की जाती है, इससे पर्यावरण को अत्यधिक नुकसान होता है।

राजस्थान में कृषि से संबधित समस्याएँ :-

•मृदा में पोषक तत्त्वों की कमी व उर्वरकों के उपयोग का प्रतिशत कम होना तथा उर्वरकों का असंतुलित उपयोग।

•कृषि को व्यवसाय के स्थान पर आजीविका का स्रोत मानना।

•भू-जल की कमी व अपर्याप्त जल प्रबंधन के कारण सिंचित क्षेत्र की कमी।

•मानसून की अनिश्चितता, अपर्याप्तता व असमानता के कारण सूखा व अकाल की स्थिति।

•कृषि उत्पादों के विपणन के संबंध में आधारभूत सुविधाओं का अभाव।

•कृषि में पूँजी निवेश में कमी के कारण प्रबंधन व शोध-अनुसंधान का स्तर निम्न होना।

•प्रति व्यक्ति जोतों का घटता आकार जो 2010-11 में 3.07 हेक्टेयर से 2015-16 में 2.73 मात्र हेक्टेयर हो गया है।

•कृषि में परम्परागत तरीकों के कारण प्रति हेक्टेयर उत्पादन का औसत कम है।

•सिंचाई संबंधी अवसंरचना का अभाव जिससे एक बड़ा क्षेत्र कृषि के योग्य नहीं है।

•कृषि संबंधी नीतियों व योजनाओं का क्रियान्वयन कुशल तरीके से न हो पाना।

कृषि विपणन

कृषि संबंधी उत्पादों को कृषकों से उपभोक्ताओं तक पहुँचाने से संबद्ध क्रियाओं को कृषि विपणन कहा जाता है।

राज्य में कृषकों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने हेतु अच्छी विपणन की सुविधा उपलब्ध कराने तथा राज्य में मण्डी नियामक एवं प्रबंधन को प्रभावी ढंग से लागू करने हेतु कृषि विपणन निदेशालय कार्यरत है।

 

1. ‘राजीव गांधी कृषक साथी योजना' के अन्तर्गत कृषकों/ खेतिहर मजदूरों एवं हम्मालों आदि को कार्यस्थल पर दुर्घटनावश मृत्यु होने पर 2 लाख रुपये की सहायता राशि उपलब्ध करवायी जाती है।

2.महात्मा ज्योतिबा फुले मंडी श्रमिक कल्याण योजना - मंडी श्रमिकों के लिए राज्य में वर्ष 2015 से यह योजना चलाई जा रही हैं जिसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं -

1. प्रसूति सहायता - लाभार्थी श्रमिक महिलाओं को अधिकतम दो प्रसूतियों के लिए राज्य सरकार द्वारा अकुशल श्रमिक के रूप में निर्धारित 45 दिन प्रचलित मजदूरी दर के अनुसार भुगतान किया जा रहा है। नवजात शिशु के पिता को राज्य सरकार द्वारा अकुशल श्रमिक के रूप में निर्धारित प्रचलित मजदूरी दर अनुसार 15 दिन की मजदूरी के समतुल्य राशि का भुगतान किया जा रहा है।

2. छात्रवृत्ति/मेधावी छात्र पुरस्कार योजना - मण्डी में ऐसे लाभार्थी श्रमिकों जिनके पुत्र/पुत्री जो 60 प्रतिशत एवं उससे अधिक अंक प्राप्त करते हैं, को इस योजना के अन्तर्गत छात्रवृत्ति दी जाएगी।

3. विवाह के लिये सहायता लाभार्थी श्रमिक महिलाओं की पुत्रियों के विवाह के लिए 50,000 रूपये की सहायता राशि देय होगी। यह सहायता अधिकतम दो पुत्रियों के लिए ही देय होगी।

4.चिकित्सा सहायता - लाभार्थी श्रमिकों को गंभीर बीमारी (कैंसर, हार्ट अटैक, लीवर, किडनी आदि) होने की दशा में सरकारी अस्पताल में भर्ती रहने पर वित्तीय सहायता के रूप में अधिकतम रु. 20,000 की राशि स्वीकृत की जाएगी।

कृषि विपणन बोर्ड

 राज्य में एक व्यापक नीति “राजस्थान कृषि प्रसंस्करण, कृषि व्यवसाय एवं कृषि निर्यात प्रोत्साहन नीति-2019" दिनांक 17 दिसम्बर, 2019 से प्रारम्भ की गयी है।

इस नीति की मुख्य विशेषताएं निम्न प्रकार है: -

-समूह आधारित कार्य प्रणाली द्वारा फसल कटाई के बाद

की हानियों को कम करना।

- कृषकों एवं उनके संगठनों की सहभागिता बढ़ाना।

- कृषकों एवं उनके संगठनों की आपूर्ति एवं मूल्य संवर्धन

 श्रृंखला में प्रत्यक्ष भागीदारी बढ़ाते हुए उनकी आय मे वृद्धि के उपाय करना।

- राज्य की उत्पादन बहुलता वाली विशिष्ठ फसलों जैसे-जीरा, धनिया, सौंफ, अजवाइन, ग्वार, ईसबगोल, दलहन, तिलहन, मेहंदी, किन्न सेन्ना, अनार एवं ताजा सब्जियों आदि के मूल्य संवर्धन तथा निर्यात को प्रोत्साहन देना।

- खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों के द्वारा कौशल विकास कर रोजगार का सृजन करना।

वित्तीय प्रावधानः

- किसानों और उनके संगठन के लिए कृषि-प्रसंस्करण और अवसंरचना विकास के लिए पूंजीगत अनुदान के रूप में परियोजना लागत का 50 प्रतिशत या अधिकतम ₹100 लाख, कृषकों को और अन्य सभी पात्र उद्यमियों के लिए परियोजना लागत का 25 प्रतिशत अधिकतम ₹50 लाख का प्रावधान है।

-भारत सरकार द्वारा स्वीकृत परियोजनाओं फूड पार्क, कृषि प्रसंस्करण क्लस्टर और प्राथमिक प्रसंस्करण केंद्र, ग्रामीण क्षेत्रों में फलों और सब्जियों के संग्रह केंद्र हेतु पूंजी निवेश परियोजना लागत का 10 प्रतिशत के अतिरिक्त टॉप अप अनुदान के रूप में एवं अन्य सभी उद्यमियों के लिए अधिकतम 50 लाख तक देय है।

-परिचालन लागत को कम करने के लिए टर्म लोन पर 5 प्रतिशत की ब्याज सब्सिडी दी जाएगी।

-जनजाति उप-योजना क्षेत्र या पिछड़े जिलों में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति किसानों और उनके संगठनों के 100 प्रतिशत स्वामित्व वाली इकाइयाँ या महिला उद्यमी और युवा उद्यमी, जिनकी आयु 35 वर्ष से कम हो को एक प्रतिशत अतिरिक्त सब्सिडी देय है।

-किसानों और उनके संगठनों तथा ढ़ाचागत परियोजनाओं के लिए ब्याज सब्सिडी की अधिकतम सीमा ₹100 लाख है एवं अन्य सभी परियोजनाओं के लिए ₹50 लाख है।

- राज्य के फल, सब्जियों और फूलों को अन्य राज्यों के बाजारों में ले जाने के लिए 300 किमी. से अधिक परिवहन के लिए तीन साल की अवधि तक प्रतिवर्ष ₹15 लाख तक का अनुदान का प्रावधान है।

- भोजन, सब्जियां, फूल, मसाले संसाधित कृषि उत्पाद और असंसाधित उत्पाद के निर्यात के किराए में तीन वर्षों की अवधि के लिए प्रति वर्ष अधिकतम ₹10 से ₹15 लाख का अनुदान देय है।

- जैविक उत्पादों की गुणवत्ता उत्पादन और निर्यात बाजारों का उपयोग करने के लिए, 5 साल की दीर्घावधि हेतु अधिकतम ₹20 लाख प्रतिवर्ष के परिवहन अनुदान का प्रावधान किया गया है।

- 5 वर्ष की अवधि के लिए प्रतिवर्ष ₹2.00 लाख की अधिकतम सीमा के साथ ₹1 किलोवाट प्रति घण्टा की दर से बिजली दर अनुदान तथा ₹10 लाख की अधिकतम सीमा के साथ सौर ऊर्जा संयंत्र पर लागत का 30 प्रतिशत अनुदान का प्रावधान है।

राज्य में कृषि विभाग की प्रमुख योजनाएँ :

(1) राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) -  राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एन.एफ.एस.एम.)

- केन्द्रीय सरकार द्वारा केन्द्र प्रवर्तित योजना के रूप में वर्ष 2007-08 से राज्य में गेहूँ एवं दलहन पर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन प्रारम्भ किया गया था। केन्द्रीयांश एवं राज्यांश का वित्त पोषण अनुपात 60:40 है।

- गेहूँ एवं दलहन पर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एन.एफ. एस.एम.) के अन्तर्गत प्रमाणित बीजों का वितरण, उन्नत उत्पादन तकनीक का प्रदर्शन, जैविक खाद, सूक्ष्म तत्त्वों, जिप्सम, समन्वित कीट प्रबन्धन (आई.पी.एम.), कृषि यंत्रो, फव्वारा, पम्प सैट, सिंचाई जल हेतु पाइप लाईन एवं फसल तंत्र आधारित प्रशिक्षण द्वारा किसानों को सहयोग देना आदि महत्वपूर्ण कार्यक्रम हैं।

- राज्य में गेहूँ के लिए 14 जिलों यथा- बाँसवाड़ा, भीलवाड़ा, बीकानेर, जयपुर, झुन्झुनूँ, जोधपुर, करौली, नागौर, पाली, प्रतापगढ़, सवाई माधोपुर, सीकर, टोंक एवं उदयपुर में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन को लागू किया गया है।

- राज्य में मोटा अनाज मक्का के लिए 5 जिलों यथा बाँसवाड़ा, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, डूँगरपुर, तथा उदयपुर में एन.एफ.एस.एम. क्रियान्चित किया जा रहा है। मोटा अनाज जी के लिए 7 जिलों यथा- अजमेर, भीलवाड़ा, हनुमानगढ़, जयपुर, नागौर, श्रीगंगानगर तथा सीकर में एन.एफ.एस.एम. क्रियान्वित किया जा रहा है।

- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन न्यूट्रिसीरियल योजना-

- एक केन्द्रीय प्रवर्तित योजना के रूप में राज्य में वर्ष 2018-19 में प्रारम्भ किया गया है। इस योजना में प्रमाणित बीज का वितरण एवं उत्पादन, उत्पादन तकनीक में सुधार का प्रदर्शन, जैव उर्वरकों को बढ़ावा देना, सूपम तत्वों का प्रयोग, समन्वित कीट प्रबन्धन और फसल प्रदर्शन पर किसानों को प्रशिक्षण देना है।

इस योजना में चयनित जिलों में भारत सरकार द्वारा ज्वार फसलें 10 जिलों यथा अजमेर, अलवर, भरतपुर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, जयपुर, जोधपुर, नागौर, पाली व टोंक तथा बाजरा फसलें 21 जिलों यथा- अजमेर, अलवर, बाड़मेर, भरतपुर, बीकानेर, चूरू, दौसा, धौलपुर, हनुमानगढ़, जयपुर. जैसलमेर, जालोर, झुन्झुनूं, जोधपुर, करौली, नागौर, पाली, सवाईमाधोपुर, सीकर, सिरोही व टोंक में सम्मिलित की गई हैं।

- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एन.एफ.एस.एम.) वाणिज्यिक फसलों के अन्तर्गत कपास के लिए अग्रिम प्रदर्शन और पौध संरक्षण रसायन सम्मिलित है।

 (2) राष्ट्रीय तिलहन एवं ऑयल पॉम मिशन:-

इस मिशन की मुख्य गतिविधियाँ आधारभूत एवं प्रमाणित बीज का उत्पादन, प्रमाणित बीज का वितरण, फसल प्रदर्शन, समन्वित जीवनाशी प्रबन्धन, पौध संरक्षण रसायन, पौध संरक्षण उपकरण, जैव उर्वरक, जिप्सम, जल संबहन के लिए पाइन लाईन, कृषक प्रशिक्षण, कृषि सुधार, नवाचार, बीज उपचार इम, फवारा सेट, बीज मिनी किट वितरण तथा आधारभूत विकास आदि हैं। केन्द्रीयांश एवं राज्यांश का वित्त पोषण पैटर्न का अनुपात 60:40 है।

 - वर्ष 2020-21 के अन्तर्गत ₹352.45 करोड़ के प्रावधान के विरुद्ध माह दिसम्बर, 2020 तक ₹19722 करोड़ व्यय किए गए है।

(3) राष्ट्रीय टिकाऊ खेती मिशन (एन.एम.एस..)

-पूर्व में संचालित योजनाओं- राष्ट्रीय सूक्ष्म सिंचाई मिशन, राष्ट्रीय जैविक खेती परियोजना, राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य एवं उर्वरता प्रबन्ध परियोजना तथा वर्षा आधारित क्षेत्र विकास कार्यक्रम जलवायु परिवर्तन को केन्द्रित करते हुए पुनर्गठन कर एक नया कार्यक्रम राष्ट्रीय टिकाऊ खेती मिशन क्रियान्वित किया जा रहा है। केन्द्रीयांश एवं राज्यांश का वित्त पोषण पैटर्न का अनुपात 60:40 है।

- राष्ट्रीय टिकाऊ खेती मिशन के अन्तर्गत चार सब-मिशन सम्मिलित किए गए है:

(4) राष्ट्रीय कृषि विस्तार एवं तकनीकी मिशन (एन.एम...टी.)

-इस मिशन का उद्देश्य कृषि विस्तार का पुनर्गठन एवं सशक्तीकरण करना है, जिसके द्वारा किसानों को उचित तकनीक एवं कृषि विज्ञान की अच्छी पद्धतियों का हस्तांतरण किया जा सके । केन्द्रीयांश एवं राज्यांश का वित्त पोषण पैटर्न का अनुपात 60:40 है। "राष्ट्रीय कृषि विस्तार एवं तकनीकी मिशन" के अन्तर्गत चार उप मिशन सम्मिलित किए गए है –

-  कृषि विस्तार पर उप मिशन (एस.एम.ए.ई.)

- बीज एवं रोपण सामग्री पर उप मिशन (एस.एम.एस.पी.)

- कृषि यंत्रीकरण पर उप मिशन (एस.एम.ए.एम.)

- कृषि में राष्ट्रीय ई-गवर्नेन्स प्लान (एन.ई.जी.पी.-ए.)

वर्ष 2020-21 के अन्तर्गत ₹96.52 करोड़ के प्रावधान के विरुद्ध माह दिसम्बर, 2020 तक 65.34 करोड़ व्यय किए गए है।

(5) राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आर.के.वी.वाई./राष्ट्रीय कृषि विकास कार्यक्रम)

- कृषि और सम्बद्ध क्षेत्रों में निवेश में लगातार हो रही कमी को देखते हुए, केन्द्र सरकार ने वर्ष 2007-08 के दौरान कृषि क्षेत्र के लिए योजनाओं को अधिक व्यापक रूप से तैयार करने के लिए आर.के.वी.बाई. की शुरुआत की।

- राज्य के कृषि-जलवायु परिस्थितियों, प्राकृतिक संसाधन मुद्दों और प्रौद्योगिकी पर विचार करने के लिए एवं कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, मुर्गी पालन, बागवानी, डेयरी और कृषि विश्वविद्यालयों आदि के क्षेत्र में एकीकृत जिला कृषि योजना तैयार करने हेतु परियोजना आधारित सहायता प्रदान की जा रही है।

- केन्द्र और राज्य सरकार का वित्त पोषण पैटर्न क्रमशः 60:40 अनुपात में है।

-वर्ष 2020-21 में ₹319.50 करोड़ प्रावधान के विरुद्ध माह दिसम्बर, 2020 तक ₹133.31 करोड़ व्यय किए गए हैं।

(6) परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) –

-जैविक खेती में पर्यावरण आधारित न्यूनतम लागत तकनीकों के प्रयोग से रसायनों व कीटनाशकों का प्रयोग कम करते हुए कृषि उत्पादन किया जाता है।

-राष्ट्रीय टिकाऊ कृषि मिशन (NMSA) के अन्तर्गत मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन का ही विस्तार परंपरागत कृषि विकास योजना है।

-इसके अन्तर्गत क्लस्टर व PGS प्रमाणन के माध्यम से जैविक कृषि को प्रोत्साहित किया जाता है।

-इसमें केन्द्र व राज्य का अंशदान 60-40 हैं।

(7) प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना

-प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना भारत सरकार द्वारा वर्ष 2015-16 से वित्त पोषित पैटर्न केन्द्र एवं राज्य के बीच अनुपात 60 : 40 से लागू की गई है।

-इस योजना का नोडल विभाग उद्यानिकी विभाग है तथा कृषि एवं उद्यानिकी विभाग द्वारा विभिन्न गतिविधियां क्रियान्वित की जा रही  है।

-वर्ष 2020-21 में ₹185.00 करोड़ प्रावधान के विरुद्ध माह दिसम्बर, 2020 तक ₹28.01 करोड़ व्यय किए गए हैं।

(8) प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना

-प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना खरीफ, 2016 से प्रारम्भ की गई है। इस योजना में खाद्यान्न फसलों (अनाज, मोटा अनाज और दालें) तिलहन और वार्षिक वाणिज्यिक/वार्षिक बागवानी फसलों को शामिल किया गया है।

-प्रीमियम राशि के अंतर्गत कृषक से खरीफ फसल में 2 प्रतिशत, रबी में 1.5 प्रतिशत एवं वार्षिक वाणिज्यिक/वार्षिक बागवानी फसलों के लिए 5 प्रतिशत लेकर फसल का बीमा किया जा रहा है।

-प्रीमियम का शेष भाग केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा समान रूप से 50-50 प्रतिशत के अनुपात में बीमा कम्पनी को भुगतान किया जाता है।

- भारत सरकार द्वारा जारी निर्देशानुसार मौसम खरीफ 2020 में असिंचित क्षेत्रों के लिये 30 प्रतिशत एवं सिंचित क्षेत्रों के लिये 25 प्रतिशत की अधिकतम प्रीमियम का अनुदान ही केन्द्रीयांश द्वारा वहन किया जायेगा।

-राज्य में प्रीमियम सब्सिडी का भुगतान और फसल कटाई प्रयोगों के संचालन हेतु राज्य वित्त पोषित योजना क्रियान्वित की जा रही है।

(9) ग्लोबल राजस्थान एग्रीटेक मीट (GRAM)

-इसका प्रारम्भ सीतापुरा (जयपुर) से किया गया। इसके बाद राजस्थान सरकार द्वारा GRAM का आयोजन कोटा, उदयपुर में किया जा चुका है।

-इसका उद्देश्य कृषि क्षेत्र में विकास दर को बढ़ाकर सतत विकास एवं आर्थिक विकास के माध्यम से किसानों की आय को 2022 तक दुगुनी करना है।

-यह कृषि और सम्बद्ध क्षेत्र की नीतिगत पहल है इसके द्वारा किसानों को खेती के नये तरीकों व तकनीकी की जानकारी दी जाती है।

10. टिड्डी प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकार द्वारा किए गए प्रयास

-राज्य और जिला स्तर पर टिड्डी के प्रकोप के प्रबंधन के लिए कार्य योजना तैयार की गई थी और इसके लिए अलग से सर्वेक्षण और नियंत्रण दल गठित किए गए थे।

 राज्य के कृषि विभाग द्वारा 120 सर्वेक्षण वाहनों का उपयोग किया गया और 45 नियंत्रण वाहनों को टिड्डी चेतावनी संगठन (एल.डब्लग.ओ.) को उपलब्ध कराये गये।

 ट्रैक्टर द्वारा स्प्रेयर, ट्रैक्टर के साथ पानी के टैंकर, फायर ब्रिगेड और जरूरत के अनुसार पौधों की सुरक्षा करने वाले रसायनों का इस्तेमाल किया गया।

 -टिड्डी प्रभावित जिलों में, राजस्थान कृषि प्रतिस्पर्धात्मक परियोजना (आर.ए.सी.पी.) द्वारा 411 एवं उप-मिशन द्वारा कृषि तकनीकी के तहत 620 ट्रैक्टर माउंटेड सोयर्स निःशुल्क उपलब्ध कराये गये। हॉपर की निगरानी के लिए, कृषि विभाग द्वारा राजकिशन टिडी मोबाइल एप विकसित किया गया।

- टिड्डी चेतावनी संगठन (एल.डब्ल्यू .ओ.), भारत सरकार ने राज्य के अगम्य क्षेत्रों में टिड्डी को नियंत्रित करने के लिए 2 हेलीकॉप्टर और 15 ड्रोन उपलब्ध कराए और 104 वाहन योजित स्प्रेयर का भी उपयोग किया गया । टिड्डी चेतावनी संगठन ने टिड्डी को नियंत्रित करने के लिए 190 मैनपावर की मदद से 2,61,595 हेक्टेयर क्षेत्र में -2,28.717 लीटर मैलाथियान 16 प्रतिशत अल्ट्रा लो बोल्यूम (यू.एल.वी.) का उपयोग किया गया।

राज्य के कृषि विभाग ने 259,805 हेक्टेयर में टिड्डी सुरक्षा के लिए 70,156 किसानों को 4,565 लीटर कीटनाशी रसायन प्रदान किये गये। इसके साथ ही 498 फायर ब्रिगेड, 20,04-4 ट्रेक्टर माउंटेड स्प्रेयर्स और 3,950 सर्वे वाहनों का इस्तेमाल टिड्डी नियंत्रण के लिए किया गया।
 5,240 प्रशिक्षणों का आयोजन कर 1.18.717 हितधारकों को टिडीयों की निगरानी, नियंत्रण और जागरूकता के उद्देश्य के लिए प्रशिक्षित किया गया।

11. सौर ऊर्जा आधारित पम्प परियोजना (प्रधानमंत्री 'कुसुम' योजना कम्पोनेंट 'बी')

-वर्ष 2019-20 से भारत सरकार के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा पी.एम. कुसुम (प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महा-अभियान) कम्पोनेन्ट-बी स्टैण्ड अलोन सौर ऊर्जा पम्प संयंत्र योजना क्रियान्वित की जा रही है।

- जिसमें 3एचपी से 10 एचपी क्षमता तक के सौर ऊर्जा पम्प संयंत्रों की स्थापना के प्रावधान के साथ अधिकतम 7.5 एचपी क्षमता तक के पम्प हेतु अनुदान देय है।

- राज्य में वर्ष 2010-11 से वर्ष 2018-19 तक 40,224 सौर ऊर्जा पम्प संयंत्र स्थापित करवाये जा चुके है जिससे लगभग 161 मेगावाट विद्युत का उत्पादन हो रहा है एवं लगभग 1,00,000 हैक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की जा रही है।

इस योजनान्तर्गत कुल 60 प्रतिशत (केन्द्रीयांश 30 प्रतिशत, राज्यांश 30 प्रतिशत) अनुदान देय है।

- वर्ष 2020-21 में इस योजनान्तर्गत राज्य मद से कुल प्रावधान 267.00 करोड़ के विरुद्ध 25.53 करोड़ व्यय कर कुल 25,000 सौर ऊर्जा संयंत्रों के लक्ष्यों के विरुद्ध दिसम्बर, 2020 तक 5,011 सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना हो चुकी है।

12. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना-सूक्ष्म सिंचाई (पी.एम.के.एस.वाई.-एम.आई.)

-राज्य में जल एक सीमित एवं बहुमूल्य संसाधन है। इस दृष्टि से फसल उत्पादकता बढ़ाने एवं पानी को बचाने के लिए लघु सिंचाई पद्धति में ड्रिप एवं फवारा सिंचाई पद्धति, प्रभावी जल प्रबन्धन की व्यवस्था है। इसमें सभी श्रेणी के कृषकों के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार का अनुपात 60:40 है। इन पद्धतियों के समुचित उपयोग को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार द्वारा वर्ष 2020-21 में विभिन्न श्रेणी के कृषकों को सूक्ष्म सिंचाई संयंत्रों पर अनुदान दिया जा रहा है. इसके साथ ही राज्य सरकार द्वारा अतिरिक्त अनुदान भी दिया जा रहा है। वर्ष 2020-21 के लिए ₹91.67 करोड़ (केन्द्रीयांश ₹55.00 करोड़ व राज्यांश ₹36.67 करोड़) का प्रावधान किया गया है। ड्रिप एवं फव्वारों द्वारा सिंचाई के लिए राज्य निधि में अतिरिक्त अनुदान के रूप में ₹15.77 करोड रखे गए है। वर्ष 2020-21 में दिसम्बर, 2020 तक 77.43 करोड़ (केन्द्रीयांश ₹46.41 करोड़ एवं राज्यांश ₹31.02 करोड़) एवं अतिरिक्त सब्सिडी के ₹13.72 करोड़ व्यय किए गए हैं। दिसम्बर, 2020 तक राज्य का 13.755 हैक्टेयर क्षेत्र ड्रिप, मिनी फव्वारा संयंत्रों एवं 28,526 हैक्टेयर क्षेत्र फवारा सिंचाई के अन्तर्गत आता है।

राज्य में कृषि क्षेत्र के विकास हेतु सुझाव -

•किसानों को उत्तम बीज, खाद, कीटनाशक आदि से संबंधित विधियों का समय-समय पर उचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

•सर्वप्रथम कृषि पशुपालन व वानिकी में समन्वय किया जाना चाहिए, राजस्थान में कृषि व पशुपालन दोनों में पारस्परिकता का सम्बन्ध माना गया है।

•सीमान्त व लघु कृषकों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

•राजस्थान में जल प्रबंधन पर जोर दिया जाना चाहिए क्योंकि राज्य के अनेक क्षेत्रों में जल स्तर भूमि में काफी नीचे चला गया है। ज्यादा पानी वाली फसलों से बचना चाहिए।

•हरित क्रांति (कृषि/खाद्यान्न), श्वेत क्रांति (दूध), नीली क्रांति (मत्स्य), स्वर्णिम क्रांति (फल व सब्जी) के बढ़ते हुए महत्त्व को देखते हुए राज्य में इन्हें अपनाया जाना चाहिए। जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षभर रोजगार के अवसर सृजित किये जा सकेंगे।

•राज्य में सिंचाई की सुविधा का अभाव रहने से बूँद- बूँद सिंचाई व स्प्रिंक्लर सिंचाई का व्यापक रूप से प्रयोग किया जाना चाहिए। जल संरक्षण पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

•राज्य में प्राकृतिक प्रकोपों, वर्षा का अभाव, ओला वृष्टि व सूखा आदि का अंदेशा बना रहता है। जिससे सुरक्षा के लिए उचित प्रीमियम युक्त फसल बीमा की व्यवस्था होनी चाहिए। जैसे- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना।

•वर्तमान में कृषि में यंत्रीकरण तथा फसल विविधीकरण पर बल दिया जाना चाहिए।

•कृषिगत माल के विपणन के लिए नयी पद्धतियों पर बल दिया जाने लगा है। राज्य APMC अधिनियम में संशोधन कर रहे हैं। उचित कीमत दिलवाने के प्रयास किये जाने चाहिए।

•किसानों को कम ब्याज पर फसल ऋण की व्यवस्था की जानी चाहिए।

महत्वपूर्ण तथ्य :

1.केन्द्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्र दुर्गापुरा जयपुर में स्थित है।

2.राजस्थान का अन्न भंडार व कमाउपूत श्रीगंगानगर जिलें को कहते हैं।

3.काजरी संस्थान, जोधपुर में स्थित है। (1959)

4.गुलाब का सबसे अधिक उत्पादन पुष्कर (अजमेर)  में होता है। (Rose India)

5.केन्द्रीय सरसों अनुसंधान केन्द्र – भरतपुर, 20 अक्टूबर, 1993 में स्थापित।

6.चुकंदर से चीनी बनाने का एकमात्र कारखाना श्रीगंगानगर में स्थित है।

7.वालरा खेती  - डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, उदयपुर

8.राजस्थान राज्य सरकारी तिलहन उत्पादक संघ लिमिटेड, तिलम संघ की स्थापना सन्1990 में हुई।