पशुपालन
(Animal Husbandry)
- राजस्थान में अधिकांश भाग रेतीला व शुष्क होने के कारण कृषि क्षेत्र की सीमित संभावनाओं के चलते पशुपालन प्रारंभ से ही ग्रामीण आजीविका का प्रमुख साधन रहा है।
- राजस्थान में पशुपालन विशेषकर शुष्क व अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में कृषि की सहायक गतिविधि ही नहीं है। बल्कि एक प्रमुख आर्थिक गतिविधि व आजीविका का साधन है, जो अकाल की स्थिति में कृषकों को अत्यधिक सुरक्षा प्रदान करता है।
- पशुपालन शुष्क कृषि का महत्वपूर्ण अंग है। पशुपालन वर्षा आधारित क्षेत्र में कृषि प्रणाली की आर्थिक व्यवहार्यता और स्थायित्व को बढ़ाता है। शुष्क पश्चिमी क्षेत्र में पशुपालन, सूखे एवं अकाल की मार के विरुद्ध सुरक्षा कवच का काम करता है और गरीब ग्रामीणों को सतत एवं स्थायी आजीविका प्रदान करता है।
-राजस्थान पशुसंपदा की दृष्टि से समृद्ध राज्य है। यहाँ देश के सर्वोत्तम नस्ल के गौवंश, भेड़, बकरी, घोड़ा व ऊँट की नस्लें पायी जाती हैं।
पशु गणना 2019 के अनुसार - राज्य में कुल 567.76 लाख पशुधन एवं 146.23 लाख कुक्कुट है। देश के कुल पशु धन का 10.60 प्रतिशत पशुधन राजस्थान में उपलब्ध है। यहाँ देश का 7.23 प्रतिशत गौवंश, 12.47 प्रतिशत भैंस, 14 प्रतिशत बकरियाँ , 10.64 प्रतिशत भेड़ तथा 84.43 प्रतिशत ऊँट उपलब्ध है। राष्ट्रीय उत्पादन में वर्ष 2017-18 में राज्य का योगदान दूध उत्पादन में 12.72 प्रतिशत एवं ऊन उत्पादन में 34.46 प्रतिशत है।
-पशुओं में रोग नियंत्रण - वर्ष 2019-20 में 348.69 लाख टीकाकरण किए गए। पशुओं में उन्नत नस्लों के लिए दिसम्बर, 2019 तक 2.42 लाख बड़े पशुओं एवं 4.05 लाख छोटे पशुओं का बंध्याकरण तथा 27.22 लाख कृत्रिम गर्भाधान किए गए।
राजस्थान में पशुधन :
(1) गौवंश - राजस्थान गौवंश की दृष्टि से देश का 6वाँ बड़ा राज्य है।
-यहाँ पर देश का 7.23 प्रतिशत गौवंश पाया जाता है।
-संख्या – 139 लाख
- गतगणना में परिवर्तन – 4.4 की वृद्धि
-राज्य में कुल पशुधन में योगदान – 24.47%
-सर्वाधिक – उदयपुरन्यूनतम – धौलपुर
-प्रमुख नस्लें – गिर, थारपारकर, नागौरी, राठी, कांकरेज, हरियाणवी, मालवी सांचोरी हैं।
▪गिर – अजमेर, किशनगढ़, भीलवाड़ा, पाली (मध्य राजस्थान)
- मूल स्थान – गुजरात का गिर प्रदेश व काठियावाड़
-अन्य नाम – रेडा व अजमेरी
▪ नागौरी – नागौर, जोधपुर एवं बीकानेर
- मूल स्थान – नागौर का सुहालक जिला
- नागौर बैल दौड़ने में तेज, मजबूत भारवाहन तथा कृषि कार्यों में उत्तम क्षमता वाला होता है।
▪ राठी – बीकानेर, गंगानगर, जैसलमेर व चूरू
- मूल स्थान – गुजरात का कच्छ का रण
- लालसिंधी, हरियाणवी व साहिवाल की मिश्रित नस्ल
- राजस्थान की कामधेनु भी कहा जाता है।
▪ कांकरेज – बाड़मेर, सांचौर, जालोर, जोधपुर व पाली
- मूल स्थान – गुजरात का कच्छ का रण
- बैल भारवाहन व गाय अधिक दुग्ध देने के लिए प्रसिद्ध है।
▪ थारपारकर - जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर एवं सांचौर (पश्चिमी राजस्थान)
- मूल स्थान - पाक का सिंध तथा बाड़मेर का मालाणी क्षेत्र
▪हरियाणवी - हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, सीकर, झुंझुनूँ , चूरू एवं जयपुर।
- मूल स्थान - हरियाणा का रोहतक व हिसार जिला
- बैल व गाय दोनों भारवाहन व अधिक दुग्ध के लिए प्रसिद्ध है।
▪मालावी– बाँसवाड़ा, डूँगरपुर, उदयपुर, कोटा एवं झालावाड़।
-मूल स्थान – झालावाड़ का मालवा क्षेत्र
- बैल भारवाहन के लिए प्रसिद्ध है।
▪सांचौरी – यह सांचौर, उदयपुर, पाली सिरोही
▪मेवाती – अलवर, भरतपुर
- बैल हल जोतने व बोझ ढोने के लिए उपयुक्त
▪अन्य नस्ल – लालसिंधी, साहीवाल
▪विदेशी नस्लें
- जर्सी गाय का मूल स्थान अमेरिका है अधिक दूध देने के लिए प्रसिद्ध
▪रेडडेन – डेनमार्क
▪हॉलिस्टिन – हॉलैण्ड
- सर्वाधिक दूध देने वाली नस्ल
-गौ विकास कार्यक्रम –
-राज्य गौ संरक्षण अधिनियम – 2016
-राज्य का प्रथम गौ अभ्यारण्य – बीकानेर, पथमेड़ा, (सांचौर, जालोर) में देश की प्रथम गौ मूत्र रिफायनरी
-गौवंश संवर्धन फार्म – बस्सी, जयपुर
-गौ प्रजनन केन्द्र –
1. डग (झालावाड़) – गिर व मालवी
2. कुम्भेर (भरतपुर) – हरियाणवी नस्ल
3. नागौर – नागौरी नस्ल
4. चांदन गाँव, जैसलमेर – हरियाणवी नस्ल
5. रामसर अजमेर – गिर
6.केन्द्रीय पशु प्रजनन केन्द्र – सूरतगढ़, श्रीगंगानगर - थारपारकर
2.भैंस –
-देश में भैंसों की संख्या के आधार पर राजस्थान दूसरा बड़ा राज्य है।
-यहाँ भारत की 12.47 प्रतिशत भैंसें पायी जाती है।
-संख्या : 137 लाख
-गतगणना में परिवर्तन : 5.53 की वृद्धि
-कुल पशुधन में योगदान : 24.11%
-प्रमुख नस्लें :
- मुरहि/ खुण्डी - जयपुर, अलवर, उदयपुर, भरतपुर व श्रीगंगानगर
- मूल स्थान : मोंटगोमरी पाकिस्तान
▪ सूरती : उदयपुर तथा इसके आस-पास का क्षेत्र
- मूल स्थान : गुजरात का काठियावाड़
▪ जाफरावादी : गुजरात से लगे हुए दक्षिण पश्चिमी राजस्थान
- मूल स्थान : गुजरात का काठियावाड़
▪ मेहसाणा : मुर्राह + सूरती की संकरण नस्ल
- सिरोही व जालोर
▪ अन्य नस्लों : नागपूरी, रथ/राठ (भदावरी – दुग्ध में वसा की मात्रा अधिक)
▪ विकास कार्यक्रम – केन्द्रीय भैंस प्रजनन तथा अनुसंधान केन्द्र वल्लभ नगर (उदयपुर)
▪ हंसा – भैंस के दुग्ध में मिलावट की जाँच हेतु परीक्षण
3.भेड़वंश - संख्या की दृष्टि से राजस्थान आंध्रप्रदेश, तेलंगाना व कर्नाटक के बाद चौथा सर्वाधिक भेड़ों वाला राज्य है
- यहाँ देश की कुल 10.64 प्रतिशत भेड़े विद्यमान है।
-संख्या – 79 लाख
-गतगणना से परिवर्तन – 12.9% की कमी
-जिला –
सर्वाधिक – बाड़मेर न्यूनतम – बाँसवाड़ा
-उपनाम – लरड़ी, गाडर, गारो-
प्रमुख नस्लें :
▪मालपुरी – टोंक, जयपुर, सवाईमाधोपुर, भीलवाड़ा, अजमेर, बूँदी।
-ऊन मोटी होने के कारण गलीचे के लिए उपयुक्त होती है।
▪चोकला – सीकर, चुरू, झुंझुनू, बीकानेर, नागौर व जयपुर
-यह छापर व शेखावाटी के नाम से जानी जाती है।
-ऊन फाइन के मध्यम किस्म का
- भारत की 'मैरिनो भौ' भी कहा जाता है।
▪सोनाड़ी– डूँगरपुर,चित्तौड़गढ़,उदयपुर, भीलवाड़ा
-उपनाम – चनोथर
-बहुत मोटी ऊन प्राप्त होती है।
-गलीचे के लिए सर्वोपयुक्त
▪नाली – श्रीगंगानगर, बीकानेर, चूरू, सीकर, झुंझुनूँ
-मध्यम आकार की मोटी ऊन इससे प्राप्त होती है।
-पूडाल – बीकानेर व जैसलमेर, जालोर – मध्यम व मोटी ऊन
▪मगरा – बीकानेर, जैसलमेर, नागौर
-चकरी व बीकानेर चौकला भी कहते हैं
-मध्य व मोटी ऊन
▪मारवाड़ी – जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर
- मध्यम श्रेणी की ऊन
-पाली, सिरोही – सर्वाधिक संख्या में पाए जाने वाली भेडे़
▪जैसलमेरी – जैसलमेर, जोधपुर व बाड़मेर का पश्चिमी भाग
-सर्वाधिक ऊन इसी नस्ल से प्राप्त की जाती है।
-खेरी – जोधपुर, पाली एवं नागौर
- गलीचे के लिए उपयुक्त, सफेद व मध्यम किस्म की ऊन के लिए प्रसिद्ध
-बागड़ी – अलवर
-विकास कार्यक्रम – केन्द्रीय भेड़ तथा ऊन अनुसंधान केन्द्र – अविकानगर, टोंक - इसकी शाखा
- बीछवाल (बीकानेर)
-स्थापना – 1962 में ICAR - भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् द्वारा
-भेड़ प्रजनन केन्द्र -
1. फतेहपुर – (सीकर)
2. बांलकलिया – (नागौर)
ऊन विकास -
1.केन्द्रीय ऊन विकास बोर्ड – जोधपुर
2.भेड़ व ऊन प्रशिक्षण केन्द्र – जयपुर
3.केन्द्रीय ऊन विश्लेषण प्रयोगशाला में – बीकानेर
*भेड़ निष्क्रमण : अक्टूबर माह भेड़ों का राज्य की सीमा छोड़कर अन्य राज्यों में प्रवेश करना भेड़ निष्क्रमण कहलाता है
-वर्षा ऋतु प्रारंभ होने पर वापस राज्य की सीमा में लौट आती है।
-इसे व्यवस्थित करने हेतु 41 स्थायी व 132 अस्थायीभेड़ चौकियों की स्थापना की गई है।
4.बकरी वंश - भारत की कुल बकरियों के 14 प्रतिशत के साथ राजस्थान देश में प्रथम स्थान पर है।
-बकरी को गरीब की गाय व रेगिस्तान का फ्रीज भी कहा जाता है।
-संख्या – 208.4 लाख
-गतगणना से परिवर्तन – 3.8% की कमी
-राज्य की कुल पशुधन में योगदान – 36.6%
-जिला - सर्वाधिक – बाड़मेर, न्यूनतम – धौलपुर
-उपनाम -टेटों, टेटी, टाट, छयाली
-प्रमुख नस्लें
▪मारवाड़ी – राज्य के मरुस्थलीय तथा अर्द्धमरुस्थली क्षेत्र
-जोधपुर, जालोर, बाड़मेर, पाली, नागौर, बीकानेर, जैसलमेर
-मांस के लिए प्रसिद्ध है- काले रंग की मध्यम आकार की बकरी
▪बारबरी - भरतपुर, अलवर, सवाई माधोपुर, करौली, धौलपुर।
-दूध देने के लिए प्रसिद्ध – हरिण की तरह बहुत सुंदर व सुशील होती है।
▪जखराना/अलवरी – अलवर के जखराना गाँव, अलवर व आस - पास का क्षेत्र
▪सिरोही – सिरोही, जालोर , राजसमंद, अजमेर, टोंक उदयपुर
-मांस के लिए प्रसिद्ध
▪शेखावाती – सीकर झुंझुनूँ
-काजरी वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की जाती है,
-बिना सींग की बकरी
▪परबतसरी – नागौर, अजमेर, जयपुर।
-अधिक दुग्ध देने हेतु प्रसिद्ध
-जमनापरी – कोटा, बूँदी, झालावाड़–अधिक मांस हेतु प्रसिद्ध
-विकास कार्यक्रम –
-केन्द्रीय बकरी प्रजनन केन्द्र – अविकानगर, टोंक
-इसकी शाखा – रामसर (अजमेर)
-वरुण गाँव (नागौर) की बकरियाँ प्रसिद्ध है।
5.ऊँट
-ऊँटों की संख्या की दृष्टि से राजथान देश में प्रथम स्थान रखता है।
-राज्य में देश के लगभग 84.43 प्रतिशत ऊँट पाये जाते हैं।
-नाचना (जैसलमेर) का ऊँट पूरे देश में प्रसिद्ध है। ऊँट रेगिस्तान क्षेत्रों में परिवहन का प्रमुख साधन है।
-संख्या – 2.13 लाख
-गतगणना से परिवर्तन – 34.6% की कमी
-कुल पशुधन में योगदान – 0.37%
-देश में प्रथम स्थान (84%)
-जिला सर्वाधिक – जैसलमेर, बीकानेर,
न्यूनतम - प्रतापगढ़
प्रमुख नस्लें :
-बीकानेरी – बीकानेर, श्रीगंगानगर, चूरू, नागौर, जोधपुर
-भारवाहन करने हेतु
▪जैसलमेरी – जैसलमेर, जोधपुर, बाड़मेर,बीकानेर
- तेज दौड़ने हेतु
▪अन्य नस्लें – सिंधी, कच्छी, अलवरी, मारवाड़ी, गुरहा
-गोमठ ऊँट - फलोदी, जोधपुर की प्रसिद्ध प्रजाति
विकास कार्यक्रम
- केन्द्रीय ऊँट प्रजनन केन्द्र – जोहड़बीड़ (बीकानेर)
-जुलाई, 2014 में ऊँट को राज्य पशु का दर्जा दिया गया।
-ऊँटनी के दुग्ध हेतु प्रसंस्करण केन्द्र – जयपुर 2017
-कॉपी – ऊँट की खाल से बना जलपात्र को कॉपी कहते हैं।
-ऊँट पालन की जाति को रेबारी कहते हैं।
6.अश्व वंश -
-घोड़ों की संख्या की दृष्टि से राजस्थान का स्थान 6 प्रतिशत के साथ देश में तीसरा स्थान हैं।
-यहाँ मालाणी, मारवाड़ी, काठियावाड़ी नस्ल के घोड़े पाये जाते हैं।
-संख्या – 34 हजार
-गतगणना से परिवर्तन – 10.8% की कमी
-जिला सर्वाधिक – बीकानेर, न्यूनतम – डूंगरपुर
प्रमुख नस्लें –
▪मालाणी – बाड़मेर का मालाणी व सिवाना क्षेत्र – घुड़दौड़ हेतु प्रसिद्ध
▪मारवाड़ी – मारवाड़ क्षेत्र – घुड़दौड़ हेतु प्रसिद्ध
▪काठियावाड़ी - गुजरात के आस-पास के क्षेत्रों में अरबी घोड़ों से मिलती, जुलती नस्ल
विकास कार्यक्रम :
-अश्व विकास कार्यक्रम – सिवाना (बाड़मेर)
-अश्व प्रजनन तथा अनुसंधान केन्द्र, केरु जोधपुर
7.गधा
-संख्या - 23 हजार
-गतगणना से परिवर्तन - 71.31 कमी
-देश में राजस्थान का स्थान - प्रथम
-जिला - सर्वाधिक - बाड़मेर, न्यूनतम - टोंक
-गधों का मेला - लूणियावास (जयपुर)
-गधा अभयारण्य - डुण्डलोद (झुंझुनूँ)
8.कुक्कुट पालन :
-20वीं पशुगणना के अनुसार मुर्गियाँ –146.23 लाख
-सर्वाधिक – अजमेर, न्यूनतम – बाड़मेर
-नस्ल - वरखा, वनराजा, कड़कनाथ
-विदेशी नस्ल - व्हाइट लेग हॉर्न
-विकास कार्यक्रम : राजकीय कुक्कट प्रशिक्षण संस्थान, अजमेर
राजकीय कुक्कट शाला, जयपुर
चूजा पालन केन्द्र - बाँसवाड़ा – डूँगरुपर
-वर्ष 2019-20 के दौरान पशुपालन विभाग द्वारा उठाए गए प्रमुख कदम
1. राज्य के गौ एवं भैंस वंशीय पशुओं को FMD (खुरपका, मुँहपका रोग) रोग से मुक्त किये जाने के लिए केन्द्र सरकार के सहयोग से चलाये जा रहे राजव्यापी टीकाकरण कार्यक्रम के अन्तर्गत एक वर्ष में दो बार टीकाकरण अभियान चलाये जा रहे है। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत वर्ष 2019-20 में दिसम्बर, 2019 तक 163.28 लाख पशुओं का टीकाकरण किया गया।
2. पशुधन नि:शुल्क आरोग्य योजना के अंतर्गत पशुपालकों को नियमित लाभान्वित किया जा रहा है। वित्तीय वर्ष 2019-20 में दिसम्बर, 2019 तक इस योजना में 78.58 लाख किसान लाभान्वित हुए है। यह योजना समस्त विभागीय पशु चिकित्सा संस्थाओं एवं समस्त उपचार शिविरों में उपलब्ध है।
3. भारत सरकार के राष्ट्रीय पशुधन मिशन अंतर्गत राजस्थान में भेड़ व बकरी वंश की नस्ल सुधार (GIGS) योजना संचालित की जा रही है जिससे केन्द्र एवं राज्य की हिस्सा राशि का प्रतिशत 60:40 है। यह परियोजना वर्तमान में राजस्थान के अजमेर, जयपुर, सीकर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, चूरू, सिरोही एवं कुचामन सिटी (नागौर) जिलों में संचालित है।
राजस्थान की अर्थव्यवस्था में पशुपालन का योगदान
1.पशुधन से प्राप्त उत्पादों दुग्ध, ऊन, मांस, चमड़ा, हड्डियाँ आदि का उत्पादन गतिविधियों में उपयोग किया जाता है।
2. राज्य में पशुपालन वर्षभर रोजगार मुहैया करवाने के साथ ही आर्थिक संसाधनों में पशुपालन व पशु उत्पाद प्रसंस्करण से लगभग 10 प्रतिशत राजस्व की प्राप्ति भी होती है।
3. ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 70 प्रतिशत परिवारों की आय का प्रमुख स्रोत पशुपालन ही है। पशुपालन की विकास दर हमेशा ऊँची बनी रहती है। साथ ही इस क्षेत्र में 90 प्रतिशत श्रम महिलाओं द्वारा किया जाता है।
4. राज्य के लघु व सीमांत कृषकों की आय में लगभग 35 प्रतिशत योगदान पशुपालन का है।
5. 2022 तक किसानों की आय को दुगुनी करने के उद्देश्य से भी पुशपालन का विशिष्ट महत्त्व है। इस महत्त्व को देखते हुए केन्द्रीय बजट 2019-20 में पृथक् राष्ट्रीय कामधेनु आयोग की स्थापना का प्रावधान भी किया गया है।
राज्य में पशुपालन के विकास हेतु संचालित योजनाएँ
(1) नस्ल सुधार कार्यक्रम का भी क्षमतावर्द्धन किया जा रहा है। निजी एकीकृत विकास केन्द्रों के विस्तार के माध्यम से प्रजनन सेवाओं में सुधार किया जा रहा है।
(2) टीकाकरण अभियान - खुरपका व मुँहपका के लिए (गाय-भैंस)।
(3) पशुधन नि:शुल्क आरोग्य दवा योजना के अन्तर्गत पशुपालकों को नियमित लाभान्वित किया जा रहा है।
(4) भामाशाह पशु बीमा योजना - यह योजना राज्य में पशुपालकों के कल्याण के लिए क्रियान्वित की जा रही है। इसके तहत SC/ST/BPL पशुपालकों को मवेशी बीमा प्रीमियम पर 70 प्रतिशत अनुदान और सामान्य पशुपालकों को मवेशी बीमा प्रीमियम पर 50 प्रतिशत अनुदान प्रदान किया जाता है।
(5) अविका कवच बीमा योजना - इस योजना के अन्तर्गत SC/ST व BPL भेड़ पालकों को भेड़ों के बीमा प्रीमियम पर 80 प्रतिशत अनुदान और सामान्य भेड़ पालकों को भेड़ो के बीमा प्रीमियम पर 70 प्रतिशत अनुदान प्रदान किया जाता है।
(6) राष्ट्रीय बोवाइन उत्पादकता मिशन - यह मिशन जून 2016 में केन्द्र सरकार द्वारा 3 वर्ष के लिए चलाया गया। इसका मुख्य उद्देश्य दुग्ध उत्पादन बढ़ाना, पशुओं की उत्पादकता बढ़ाना व डेयरी व्यवस्था का विकास करना है।
गोपालन विभाग
गोपालन निदेशालय का लक्ष्य संरक्षण कार्यक्रमों एवं राज्य में गौवंश की संख्या में वृद्धि (जिसमें राज्य की गौशालओं के दुर्लभ गौवंश भी सम्मिलित हैं) एवं राज्य में विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से गौशाला प्रबंधकों को जैविक कृषि, चारा उत्पादन, गौवंश विपणन, पंचगव्य उत्पादों में अक्षम उर्जा का उपयोग एवं मूल्य संवर्द्धन क्षेत्र में प्रबंधकीय कौशल प्रदान करने हेतु दृढ़ता के साथ बढ़ावा देना है।
-पशु वि.वि.
-राज्य पशु चिकित्सा व पशु विज्ञान – वि.वि. बीकानेर में 13 मई, 2010 में
-उद्देश्य – पशुधन संसाधन का सुधार
-पशुधन में तकनीक व अनुसंधान को बढ़ाना।
-पशु वि. वि के अधीन अनुसंधान केन्द्र – 8
1. बीकानेर
2. कोडमदेसर (बीकानेर)
3. बीछवाल, बीकानेर
4. चांदन गाँव , जैसलमेर
5. नंनानिया (उदयपुर)
6. बोजुन्दा (चित्तौड़गढ़)
7. डग (झालावाड़)
8. नोहर (हनुमानगढ़)
-धीणे री बांता – पशु वि. वि द्वारा 2013 से प्रसारित रेडियो कार्यक्रम
-राज्य का प्रथम पशु महाविद्यालय – बीकानेर, 16 अगस्त, 1954
-बजट – 2019 - 20 में राज्य का दूसरा प्रस्तावित पशु वि.वि – जोधपुर
-पशु विभाग द्वारा आयोजित पशु मेले –
1.नागौर, (नागौरी)
1. रामदेव पशुमेला – मानसर, नागौर
2. बलदेव पशुमेला – मेड़तासिटी, नागौर
3. वीर तेजाजी पशुमेला – परबतसर , नागौर
2.झालावाड़, (मालवी) :
1. चन्द्रभागा पशुमेला झालरापाटन (झालावाड़)
2. गोमती सागर पशुमेला झालरापाटन, (झालावाड़)
3.करौली - (हरियाणवी) :
1. महाशिवरात्रि पशुमेला
4.अजमेर :
1. कार्तिक पशु मेला (पुष्कर) – गिर
5.बाड़मेर :
1. मल्लीनाथ पशुमेला – तिलवाड़ा (बाड़मेर)
6.हनुमानगढ़
1. गोगामंडी पशुमेला,नोहर (हरियाणवी)
7.भरतपुर
1. जसवंत पशु मेला (हरियाणवी)
मत्स्य संसाधन :
- मत्स्य क्षेत्र द्वारा राज्य में उपलब्ध जल संसाधनों में मत्स्य विकास के कार्य के अलावा मछली के रूप में प्रोटीन युक्त आहार तथा कमजोर ग्रामीण वर्ग को रोजगार भी उपलब्ध कराया जाता है। राज्य में मत्स्य उत्पादन के लिए किये जा रहे प्रयास इस प्रकार हैं-
(1) आजीविका मॉडल - यह आदिवासी मछुआरों के लिए शून्य राजस्व मॉडल है। राज्य के तीन बड़े जलाश्यों यथा जयसमंद (उदयपुर), माही बजाज सागर (बांसवाड़ा) व कडाना बैक वाटर (डूँगरपुर) में प्रारंभ की गई है।
(2) नेशनल मिशन फॉर प्रोटीन सप्लीमेंट एक्वाकल्चर योजना - (जयसमंद व कडाना बैक वाटर सम्मिलित) है।
(3) सजावटी मछली - बीसलपुर बाँध
(4) मत्स्य अभयारण्य- बड़ी तालाब (उदयपुर))
पशुगणना
-मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के पशुपालन एवं डेयरी विभाग ने अक्टूबर, 2019 में 20वीं पशुधन गणना की।
-यह गणना हर 5 वर्ष में की जाती है।
-1919 में पहली गणना की गई थी।
-राज्य में राजस्व मण्डल अजमेर, द्वारा प्रति 5 वर्ष बाद पशु गणना की जाती है।
-20वीं पशुगणना के अनुसार राज्य में पशु संख्या 567.77 लाख जो कि देश की कुल पशु आबादी का 10.6% हिस्सा है।
-गतगणना की पशु संख्या 577 लाख से 1.6% की कमी आई है।
-19वीं गणना के अनुसार पशु-घनत्व 166 पशु प्रतिवर्ग कि.मी.
राष्ट्रीय पशुधन मिशन (नेशनल लाइव स्टॉक मिशन) (2014-15)
-इसके तहत देश में पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए किसानों को सब्सिडी दी जाती है।
-इस मिशन के तहत बकरी पालन और भेड़ पालन को बढ़ावा देकर किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त करने का प्रयास किया जा रहा है।