• भारतीय संसद द्वारा सन् 1993 में मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 पारित किया गया था।
• इस अधिनियम के तहत राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा प्रत्येक राज्य में राज्य मानवाधिकार आयोग गठित करने का प्रावधान किया गया है।
• यह अधिनियम 28 सितम्बर, 1993 को प्रभावी हुआ था ।
♦ मानव अधिकार :-
एक मानव को मानव होने के नाते जो अधिकार प्राप्त होते है उन्हें मानव अधिकार कहते है। यह एक व्यापक अवधारणा है।
संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) ने 10 दिसम्बर, 1948 को “मानवाधिकारो की सार्वभौमिक घोषणा” (UNDHR) की थी इसलिए 10 दिसम्बर को मानव अधिकार दिवस के रूप में मनाया जाता है।
राजस्थान मानवाधिकार आयोग
मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत प्रत्येक राज्य में एक राज्य मानवाधिकार आयोग के गठन का प्रावधान किया गया था।
आयोग में एक अध्यक्ष तथा दो अन्य सदस्य होते हैं।
आयोग का अध्यक्ष उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश रह चुका व्यक्ति बन सकता है।
इसका एक सदस्य उच्च न्यायालय में कार्यरत व सेवानिवृत्त न्यायाधीश या कम से कम 7 वर्ष का अनुभव रखने वाला जिला न्यायाधीश होगा तथा दूसरा सदस्य मानवाधिकारों से संबंधित मामलों में विशेष अनुभव रखने वाला व्यक्ति होगा।
नियुक्ति
इस आयोग के अध्यक्ष एवं अन्य सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल एक समिति की अनुशंसा पर करते हैं। इस समिति में प्रमुख के रूप में राज्य का मुख्यमंत्री होता है। समिति में निम्नलिखित शामिल होते हैं।
मुख्यमंत्री
राज्य का गृहमंत्री
विधानसभा अध्यक्ष
विधानसभा में विपक्ष का नेता
नोट :- जब राज्य में विधानपरिषद् भी होती है तो विधानपरिषद् का अध्यक्ष एवं विधानपरिषद् में विपक्ष का नेता भी इस समिति के सदस्य होते हैं।
आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों का कार्यकाल 3 वर्ष या 70 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) होता है।
ये पुन: नियुक्ति के पात्र होते हैं।
अपने कार्यकाल के पश्चात आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य केंद्र सरकार या राज्य सरकारों में किसी भी पद के योग्य नहीं होते हैं।
अध्यक्ष व सदस्यों को उनके पद से किसी भी समय राष्ट्रपति निम्नलिखित परिस्थितियों में हटा सकता है-
यदि वह दिवालिया हो जाए
यदि वह अपने कार्यकाल के दौरान अपने कार्यक्षेत्र से बाहर से किसी प्रदत्त रोजगार में संलिप्त होता है।
यदि वह मानसिक व शारीरिक कारणों से कार्य करने में असमर्थ हो।
यदि वह मानसिक व शारीरिक कारणों से कार्य करने में असमर्थ हो।
यदि वह न्यायालय द्वारा किसी अपराध का दोषी व सजायाक्ता हो।
इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति अध्यक्ष तथा किसी भी सदस्य को उसके दुराचरण या अक्षमता के कारण भी पद से हटा सकता है। हालांकि इस स्थिति में राष्ट्रपति इस विषय को उच्चतम न्यायालय में जांच के लिए सौंपेगा। यदि जांच के उपरांत उच्चतम न्यायालय इन आरोपों को सही पाता है तो उसकी सलाह पर राष्ट्रपति इस सदस्यों व अध्यक्ष को उनके पद से हटा सकता है।
राज्य मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं अन्य सदस्यों के वेतन- भत्तों एवं सेवा-शर्तों का निर्धारण राज्य सरकार करती है।
राज्य मानवाधिकार आयोग के कार्य, शक्तियाँ एवं सीमाएँ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के भांति ही है।
राजस्थान ने दिनांक 18 जनवरी, 1999 को एक अधिसूचना राजस्थान राज्य मानव अधिकार आयोग के गठन के संबंध में जारी की थी।
इसमें मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के प्रावधान अनुसार एक पूर्णकालिक अध्यक्ष एवं चार सदस्य रखे गये।
अध्यक्ष एवं चार सदस्यों की नियुक्ति कर आयोग का गठन किया गया और मार्च, 2000 से यह आयोग क्रियाशील हो गया था।
मानव अधिकार संरक्षण (संशोधित) अधिनियम 2006 के अनुसार राज्य मानव अधिकार आयोग के एक अध्यक्ष और दो सदस्य का प्रावधान किया गया है।
अध्यक्ष
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क्र.स. |
अध्यक्ष का नाम |
कब से कब तक |
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1. |
कान्ता भटनागर |
23/03/2000 से 11/08/2000 तक |
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2. |
एस. सगीर अहमद |
16/02/2001 से 03/06/2004 तक |
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3. |
एन. के जैन |
16/07/2005 से 15/07/2016 तक |
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4. |
प्रकाश टाटिया |
11/03/2016 से 25/11/2019 तक |
मानवाधिकार न्यायालय
मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1953 में यह प्रावधान किया गया था कि मानव अधिकारों के उल्लंघन के मामलों की तेजी से जांच करने के लिए देश के प्रत्येक जिले में एक मानव अधिकार न्यायालय की स्थापना की जायेगी।
इस प्रकार के किसी न्यायालय की स्थापना राज्य सरकार द्वारा केवल राज्य उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर ही की जा सकती है।
आयोग के पुर्व अध्यक्ष व सदस्य :-
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क्र.सं. |
नाम |
पदनाम |
कार्यकाल |
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1 |
जस्टिस सुश्री कान्ता भटनागर |
अध्यक्ष |
23.03.2000 से 11.08.2000 |
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2 |
जस्टिस एस. सगीर अहमद |
अध्यक्ष |
16.02.2001 से 03.06.2004 |
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3 |
जस्टिस एन. के. जैन |
अध्यक्ष |
16.07.2005 से 15.07.2010 |
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4 |
जस्टिस प्रकाश टाटिया |
सदस्य |
11.03.2016 से 25.11.2019 |
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5 |
जस्टिस अमर सिंह गोदारा |
सदस्य |
07.07.2000 से 06.07.2005 |
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6 |
श्री आर.के. आकोदिया |
सदस्य |
25.03.2000 से 24.03.2005 |
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7 |
श्री बी.एल. जोशी |
सदस्य |
25.03.2000 से 31.03.2004 |
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8 |
प्रो. आलमशाह खान |
सदस्य |
24.03.2000 से 16.05.2003 |
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9 |
श्री नमो नारायण मीणा |
सदस्य |
11.09.2003 से 23.03.2004 |
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10 |
श्री धर्म सिंह मीणा |
सदस्य |
07.07.2005 से 06.07.2010 |
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11 |
जस्टिस जगत सिंह |
सदस्य |
10.10.2005 से 09.10.2010 |
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12 |
श्री पुखराज सीरवी |
सदस्य |
15.04.2004 से 13.04.2011 |
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13 |
श्री एच आर कुरी |
सदस्य |
01.09.2011 से 31.08.2016 |
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14 |
डॉ एम.के. देवराजन |
सदस्य |
01.09.2011 से 31.08.2016 |
मानवाधिकार संरक्षण विधेयक, 2019 :- मानवाधिकार संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2019 को संसद द्वारा पारित कर दिया गया है। इसमें प्रस्तावित संशोधन मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के कुछ प्रावधानों की जगह लेंगे। इस विधेयक में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission-NHRC) तथा राज्य मानवाधिकार आयोग (State Human Rights Commission-SHRC) की संरचना एवं कार्यकाल से संबंधित कुछ बदलाव किये गए हैं। अत: इस अधिनियम के तहत् निम्नलिखित बदलाव किए गए है-
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के ढाँचे से संबंधित बदलाव :-
पहले इस अधिनियम के अंतर्गत आयोग के अध्यक्ष के रूप में केवल उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ही नियुक्त किया जा सकता था परन्तु संशोधन के पश्चात् अध्यक्ष पद के लिये उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीश भी नियुक्ति के पात्र होंगे।
पहले इस अधिनियम में ऐसे दो सदस्यों की नियुक्ति का प्रावधान था जिन्हें मानवाधिकारों के क्षेत्र की व्यापक समझ एवं ज्ञान हो। संशोधन के बाद इस संख्या को बढ़ाकर तीन कर दिया गया है, इसमें कम-से-कम एक महिला सदस्य का होना आवश्यक है।
इस अधिनियम के अंतर्गत पूर्व में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC), राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) तथा राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) के अध्यक्ष ही मानवाधिकार आयोग के सदस्य होते थे लेकिन अब इसमें राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC), बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष तथा दिव्यांगों के लिये मुख्य आयुक्त को भी इसका सदस्य नियुक्त किया जा सकता है।
राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC): संशोधन से पूर्व SHRC का अध्यक्ष उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को नियुक्त किया जाता जा सकता था लेकिन अब उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशो को भी SHRC के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया जा सकता है।
कार्यकाल से संबंधित बदलाव :-
पहले NHRC तथा SHRC के अध्यक्ष का कार्यकाल पाँच वर्ष अथवा 70 वर्ष की आयु (जो भी पहले पूर्ण हो) होती थी। संशोधन के बाद अब इस कार्यकाल को घटा कर 3 वर्ष कर दिया गया है हालाँकि आयु सीमा पूर्ववत ही है। इसके अतिरिक्त 5 वर्ष की अवधि के लिये राष्ट्रीय मानवाधिकार अयोग तथा राज्य मानवाधिकार अयोग के अध्यक्ष की पुनर्नियुक्ति का भी प्रावधान किया गया है।
शक्तियों से संबंधित बदलाव :-
इस अधिनियम के पुर्व राष्ट्रीय मानवाधिकार अयोग के महासचिव तथा राज्य मानवाधिकार अयोग के सचिव उन्हीं शक्तियों का उपयोग करते थे जो उन्हें सौंपी जाती थी। संशोधन के पश्चात् उपर्युक्त अधिकारी अपने अध्यक्ष के अधीन सभी प्रशासनिक एवं वित्तीय शक्तियों का उपयोग कर सकते है यद्यपि इसमें न्यायिक शक्तियों को शामिल नहीं किया गया है।
संघशासित क्षेत्रों से संबंधित बदलाव :-
इस संशोधन के बाद संघशासित क्षेत्र से संबंधित मामलों को केंद्र सरकार SHRC को प्रदान कर सकती है लेकिन दिल्ली से संबंधित मामले NHRC द्वारा निपटाए जाने का प्रावधान किया गया है।